NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
मज़दूर-किसान
स्वास्थ्य
भारत
विश्लेषण : कैसे एक ख़राब नियोजित लॉकडाउन बड़ी आपदा में बदल रहा है?
इसने प्रवासी श्रमिकों को बड़े पैमाने पर घर वापस लौटने पर मजबूर कर दिया है। स्वास्थ्य सेवा प्रणाली ने नियमित मामलों से अपना मुंह मोड़ लिया है और राजकोषीय नीति ग़लत जगह पर ज़ोर लगा रही है।
सुबोध वर्मा
30 Mar 2020
lockdown

राज्यों के साथ इस मामले पर चर्चा करने और पहले से तैयार योजना बनाने की अविश्वसनीय अक्षमता वाली नरेंद्र मोदी सरकार ने फिर से कोरोनो वायरस के ख़िलाफ़ लड़ाई को बड़े पैमाने पर गड़बड़ कर दिया है। कोई भी देश इस बीमारी की रोक-थाम के लिए तीन सप्ताह के इतने लंबे लॉकडाउन में नहीं गया है, और निश्चित रूप से इस तरह से घोड़े पर सवार होकर तो बिल्कुल नहीं। लेकिन, भले ही महज़ तर्कों की ख़ातिर कोई यह मानता हो कि इस तरह के सख़्त लॉकडाउन की आवश्यकता थी, तब तो वह यह भी कल्पना कर सकता था कि प्रधानमंत्री मोदी अभी तक फिर से इसे चर्चा का विषय बना चुके होंगे ?

यदि आप 2016 की नोटबंदी की आपदा को याद करें, तो किसी को यह मानने के लिए मजबूर किया जा सकेगा कि हां, यह सरकार भारी, आपराधिक कुप्रबंधन में सक्षम है। इसकी जड़ में शायद  आम भारतीयों को लेकर एक तिरस्कार की भावना है, जिन्हें हमेशा की तरह बड़े उद्देश्यों में त्याग-बलिदान देने के पात्र माने जाते हैं, और मोदी द्वारा अपने पसंदीदा प्रतिभाशाली लोगों की सलाह के तहत जिन्हें हमेशा परिभाषित किया जाता हैं। लेकिन इसकी चर्चा बाद में की जा सकती है, आइए, सबसे पहले तो हम उस त्रासदी को देखें, जो इस समय हमारी आंखों के सामने है।

प्रवासी कामगारों की त्रासदी

दुबले-पतले राम आसरे कहते हैं, “हमारे कारखाने में काम-काज बंद है। हम कारखाने में ही रहा करते थे। वापसी के अलावे कोई चारा नहीं है, लेकिन हमारे पास पैसे नहीं हैं, खाना नहीं है, कोई आने-जाने की सुविधा नहीं है...हम करें, तो क्या करें ?” राम आसरे चिंतित है और वह पूर्वी दिल्ली के सीमापुरी की सीमा पर अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के एक समूह के साथ इंतजार कर रहे हैं। पूर्वी यूपी के सुल्तानपुर में अपने पैतृक गांव तक पैदल जाने को लेकर उनके विचार में उलझन है। ये लोग तब भी भाग्यशाली ठहरे, क्योंकि सीटू (सेंटर ऑफ़ इंडियन ट्रेड यूनियन) के कार्यकर्ता उनसे मिले थे और उन्हें चावल, दाल, और कुछ दूसरी आवश्यक चीज़ें दे गये थे, इन सभी सामान पास के ही एक स्टोर से ख़रीदकर लाये गये थे।

देश भर के लाखों प्रवासी कामगार सड़कों पर हैं, पुलिस कर्मियों और स्थानीय निवासियों के शिकार भी हो रहे हैं, क्योंकि वे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़ जैसे उन राज्यों में जाने को लेकर अपने लंबे सफ़र का लेखा-जोखा लेने की कोशिश कर रहे हैं, जो अपनी ग़रीबी के लिए जाने जाते हैं और यहां से लोग अपनी रोज़ी-रोटी की तलाश में बाहर का रुख़ कर जाते हैं। क्या मोदी सरकार इस हक़ीक़त से अनजान थी, अपनी जड़ों से उखड़ उखड़े जा चुके इन मज़दूरों के होने का उन्हें पता नहीं था ? ऐसा भला कैसे मुमकिन है। भारत में हर जनगणना में प्रवासियों को लेकर डेटा तालिकाओं की एक श्रृंखला होती है। नवीनतम, 2011 की जनगणना से पता चलता है कि 2001 और 2011 के बीच 13.9 करोड़ भारतीय पलायन कर गये थे, जिनमें से 10% ने "रोज़गार" के लिए ऐसा किया था। सिर्फ़ उस दशक में ही लगभग 1.4 करोड़ प्रवासी पलायन करके दूसरी जगह का रुख़ कर लिया था।

इन प्रवासियों का एक बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र में बिना किसी क़ानूनी संरक्षण के काम करता है। इसका मतलब तो यही है कि इन्हें कोई सामाजिक सुरक्षा लाभ नहीं मिलता हैं, इनकी कोई बचत नहीं है, इनके लिए कोई सुरक्षा योजना भी नहीं है। अंतर्राज्यीय प्रवासी श्रमिकों के संरक्षण के लिए कभी एक क़ानून हुआ करता था, लेकिन, हाल ही में किसी श्रम संहिता में इसका भी विलय कर दिया गया है। प्रवासी श्रमिकों के बारे में शिक्षाविदों, कार्यकर्ताओं और यहां तक कि सरकारी रिपोर्टों में बहुत कुछ लिखा जा चुका है।

फिर भी, ऐसा लगता है कि लॉकडाउन पर विचार करते हुए मोदी सरकार ने इस मुद्दे पर विचार नहीं किया था: एक पूर्ण लॉकडाउन का मतलब ही यही था कि इन श्रमिकों को अपने-अपने गांव वापस जाना होता। इस तरह की आवाजाही, सोशल डिस्टेंसिंग और आने-जाने पर प्रतिबंध लगाने के उद्देश्य पर ही ग्रहण लगा देता, इससे संभवतः वायरस का दूर-दूर तक और व्यापक रूप से संचरण होता, ऐसा लगता नहीं है कि मोदी और उनके प्रतिभाशाली लोगों ने इस पर अपना दिमाग़ खपाया भी है।

आख़िर सरकार कर क्या सकती थी ?

शुरुआत में  लॉकडाउन को लेकर भविष्य की तारीख़ की घोषणा की जा सकती थी। मोदी ने लोगों को ‘जनता कर्फ्यू’ की तैयारी के लिए चार दिन दिये थे और लाखों लोगों, ख़ासकर ग़रीब प्रवासी श्रमिकों को केवल चार घंटे मिले? आख़िरकार, इस बात की आशंका जताते हुए दो महीने से अधिक समय बीत चुका है कि महामारी आ रही है, और इससे निपटने के लिए सख़्त कदम उठाने की ज़रूरत होगी। उनके पास जो डेटाबेस मौजूद है, उसके आधार पर भी सभी श्रमिकों को एक मुश्त राशि हस्तांतरित की जा सकती थी। इस समस्या पर क़ाबू पाने के लिए प्रत्येक श्रमिक को महज़ 4,000  रुपये की राशि देनी थी।

सरकार, श्रमिकों की सुरक्षा और संरक्षण की व्यवस्था भी कर सकती थी और विशेष ट्रेन और बस चलाने जैसे परिवहन तंत्र भी स्थापित कर सकती थी। या फिर भी यदि ज़रूरत होती, तो सरकारी देखभाल के तहत उनके रहने की व्यवस्था की जाती, जिसके लिए राज्यों को लूप में रखा जाना चाहिए था। ऐसी सौ चीज़ें थीं,जो समय रहते की जा सकती थी। केरल सरकार ने पहले ही इनमें से अनेक क़दम उठाये हुए हैं, इसी तरह, दिल्ली, ओडिशा, पंजाब जैसे कुछ अन्य राज्यों ने भी अनेक पहल की हुई हैं।

लेकिन, मोदी सरकार के लिए, श्रमिक और आम तौर पर ग़रीब उनके रडार पर है ही नहीं।

अर्थव्यवस्था सुधार के जैसे-तैसे प्रयास

शायद, मोदी सरकार ने लॉकडाउन के दौरान और उसके बाद अर्थव्यवस्था को स्थापित करने वाली अपनी दृष्टि को पहले से ही तय कर रखी है। यह उनके पहले से ही इस तयशुदा दर्शन के साथ फिट बैठेगा कि पहले "पैसे बनाने वालों" का ध्यान रखने की ज़रूरत है, इसके बाद बाकी सभी का ध्यान रखा जायेगा। ऐसे में सवाल उठता है कि मोदी सरकार ने अर्थव्यवस्था के लिए किस तरह की घोषणा की है? सबसे पहले, लोगों के कल्याण के लिए 1.7 लाख करोड़ रुपये के कथित प्रोत्साहन पैकेज की घोषणा की गयी है। ऐसा माना जाता है कि इससे अर्थव्यवस्था में पैसे को पंप किया जायेगा, ताकि लोग पैसे ख़र्च करें और मांग पैदा हो।

हालांकि, इस पैसे का अधिकांश हिस्सा सिस्टम में पहले से ही था। बिल्डिंग एंड कंस्ट्रक्शन वर्कर्स सेस में लगभग 31,000 करोड़ रुपये की हिस्सेदारी थी, दूसरा 25,000 करोड़ रुपये डिस्ट्रिक्ट मिनिरल फ़ंड में था, प्रधानमंत्री-किसन का पैसा पहले ही बजट में दिया गया था, और इसी तरह के बाक़ी पैसे भी सिस्टम में पहले से मौजूद थे। इस प्रकार, वास्तव में यह कोई प्रोत्साहन पैकेज नहीं है, इसका मतलब तो यही होगा कि जब अर्थव्यवस्था को सकल घरेलू उत्पाद के 4% के रूप में अनुमानित किया गया है, तो इन विकट परिस्थितियों में एक अतिरिक्त राशि डाल दी जाये।

दूसरी बात कि रिज़र्व बैंक ने भी ऐसे उपायों की घोषणा की है, जिसमें बैंकों को ऋण देना और (रेपो और रिवर्स रेपो दरों) से ब्याज़ दरों में कटौती करना, बैंकों के कैश रिजर्व अनुपात (सीआरआर) में कमी शामिल है, जिससे उन्हें ऋण, वैधानिक रिज़र्व अनुपात (एसआरआर) में बदलाव, तीन महीने के लिए ईएमआई को कम करने आदि के ज़रिये अधिक नक़दी जारी करने में मदद मिलेगी, इसके अलावे उन्हें उधार क्षमता और ऐसे अन्य मौद्रिक नीति उपायों को बढ़ाने में भी मदद मिलेगी। सहज-सरल भाषा में इसका क्या मतलब है? इसका मतलब इतना ही है कि उधार लेने के लिए अधिक पैसे उपलब्ध हैं। इसका अर्थ है कि उद्योगपति और दूसरे व्यवसाय अधिक उधार ले सकते हैं, इसलिए, यह उम्मीद की जाती है कि वे अपनी उत्पादक क्षमता के विस्तार करने के लिए अधिक निवेश करेंगे और इस प्रकार,अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा।

यह कल्पना लोक वाली सोच, साफ़ और सरल है। COVID-19 वैश्विक स्तर पर मांग और आपूर्ति दोनों के लिए एक ज़बरदस्त झटका दे रहा है। उनके दिमाग में कौन सा व्यवसाय इस समय नये कार्य शुरू करने के लिए होगा? श्रम तो है नहीं ?  मांग भी कहां है? यह क़दम आमतौर पर वित्तीय संकटों के समय में उठाया जाता है,लेकिन इसकी नक़ल बिना सोचे विचारे की गयी है। यह उन लोगों के संपूर्ण दिवालियेपन को दर्शाता है,जो इस समय देश के शीर्ष पर विराजमान हैं। यह सब कथित पैकेज,बट्टे खाते में जाने वाले ऋणों को ही बढ़ायेगा, जो बदले में नुक़सान ही पहुंचायेगा, और सार्वजनिक धन बट्टे खाते में चले जायेंगे, जबकि कॉर्पोरेट के मुखिया बैंकों पर ही बेतरह हंसेंगे, और शायद वे कैरिबियन देशों, या दूसरे टैक्स हैवेन देशों का रुख़ कर जायेंगे।

ज़ाहिर है, मोदी सरकार का सही मायने में चल रहे घटनाक्रमों पर कोई नियंत्रण ही नहीं है। महामारी से इस तरह निपटने की कोशिश चल रही है, मानो यह कोई क़ानून और व्यवस्था का मसला हो, और यह अर्थव्यवस्था के साथ यह सरकार ऐसा व्यवहार कर रही है, मानो यह कोई सामान्य प्रकार का वित्तीय संकट हो। इस बीच, स्वास्थ्य कर्मी घर पर बने मास्क में COVID-19 मरीज़ों की देखरेख कर रहे हैं, आइसोलेशन बेड मुख्य रूप से कागज पर हैं, और उन लोगों का परीक्षण किया जा रहा है, जो वज़नदार, विदेशी यात्री, या फिर उनसे जुड़े हुए लोग हैं। ऐसा लगता है, मानो भारत को किसी बवंडर का इंतज़ार है।

अंग्रेजी में लिखे गए मूल आलेख को आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं

How a Badly Planned Lockdown is Turning into Full Scale Disaster

Modi Govt
Coronavirus Pandemic
COVID-19
Corona Package Migrant workers
Unplanned Lockdown
Healthcare workers

Related Stories

मनरेगा: ग्रामीण विकास मंत्रालय की उदासीनता का दंश झेलते मज़दूर, रुकी 4060 करोड़ की मज़दूरी

यूपी चुनाव: बग़ैर किसी सरकारी मदद के अपने वजूद के लिए लड़तीं कोविड विधवाएं

यूपी चुनावों को लेकर चूड़ी बनाने वालों में क्यों नहीं है उत्साह!

लखनऊ: साढ़ामऊ अस्पताल को बना दिया कोविड अस्पताल, इलाज के लिए भटकते सामान्य मरीज़

किसानों ने देश को संघर्ष करना सिखाया - अशोक धवले

कटाक्ष: किसानो, कुछ तो रहम करो...लिहाज करो!

किसान आंदोलन@378 : कब, क्या और कैसे… पूरे 13 महीने का ब्योरा

किसानों की ऐतिहासिक जीत के मायने

सरकार ने फिर कहा, नहीं है आंदोलन के दौरान मारे गए किसानों का 'आंकड़ा'

पश्चिम बंगाल में मनरेगा का क्रियान्वयन खराब, केंद्र के रवैये पर भी सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उठाए सवाल


बाकी खबरें

  • up elections
    न्यूज़क्लिक टीम
    यूपी में न Modi magic न Yogi magic
    06 Mar 2022
    Point of View के इस एपिसोड में पत्रकार Neelu Vyas ने experts से यूपी में छठे चरण के मतदान के बाद की चुनावी स्थिति का जायज़ा लिया। जनता किसके साथ है? प्रदेश में जनता ने किन मुद्दों को ध्यान में रखते…
  • poetry
    न्यूज़क्लिक डेस्क
    इतवार की कविता : 'टीवी में भी हम जीते हैं, दुश्मन हारा...'
    06 Mar 2022
    पाकिस्तान के पेशावर में मस्जिद पर हमला, यूक्रेन में भारतीय छात्र की मौत को ध्यान में रखते हुए पढ़िये अजमल सिद्दीक़ी की यह नज़्म...
  • yogi-akhilesh
    प्रेम कुमार
    कम मतदान बीजेपी को नुक़सान : छत्तीसगढ़, झारखण्ड या राजस्थान- कैसे होंगे यूपी के नतीजे?
    06 Mar 2022
    बीते कई चुनावों में बीजेपी को इस प्रवृत्ति का सामना करना पड़ा है कि मतदान प्रतिशत घटते ही वह सत्ता से बाहर हो जाती है या फिर उसके लिए सत्ता से बाहर होने का खतरा पैदा हो जाता है।
  • modi
    डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    तिरछी नज़र: धन भाग हमारे जो हमें ऐसे सरकार-जी मिले
    06 Mar 2022
    हालांकि सरकार-जी का देश को मिलना देश का सौभाग्य है पर सरकार-जी का दुर्भाग्य है कि उन्हें यह कैसा देश मिला है। देश है कि सरकार-जी के सामने मुसीबत पर मुसीबत पैदा करता रहता है।
  • 7th phase
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव आख़िरी चरण : ग़ायब हुईं सड़क, बिजली-पानी की बातें, अब डमरू बजाकर मांगे जा रहे वोट
    06 Mar 2022
    उत्तर प्रदेश में अब सिर्फ़ आख़िरी दौर के चुनाव होने हैं, जिसमें 9 ज़िलों की 54 सीटों पर मतदान होगा। इसमें नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी समेत अखिलेश का गढ़ आज़मगढ़ भी शामिल है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License