NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
स्वास्थ्य
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
कोरोना वायरस लॉकडाउन से हो सकता है अकाल पड़ने का ख़तरा
साफ़ है कि भारत की आधे से ज़्यादा आबादी घर पर नहीं बैठ पाएगी। उन्हें मुआवज़ा देने के लिए सरकार को तीन लाख करोड़ रुपये ख़र्च करने होंगे, जो जीडीपी का 1.5 फ़ीसदी हिस्सा होगा। क्या सरकार में ऐसा करने की इच्छाशक्ति है?
सुरजीत दास
26 Mar 2020
कोरोना वायरस लॉकडाउन से हो सकता है अकाल पड़ने का ख़तरा
Image Courtesy: Telegraph

घर पर रहना उन लोगों के लिए आसान है, जिनकी आय बाहर जाकर काम करने पर निर्भर नहीं है। स्वरोज़गार से जुड़े और दैनिक मज़दूरी करने वाले अनौपचारिक मज़दूर लंबे वक़्त तक घर पर खुद को क्वारंटाइन नहीं कर पाएंगे। अगर वे बाहर नहीं जाएंगे, तो कमा नहीं पाएंगे। वह लोग एक हफ़्ते या दस दिन के लिए कोशिश कर सकते हैं। लेकिन अगर उन्हें 15 दिन या एक महीने के लिए काम नहीं मिलता, तो उनके भूखे मरने की स्थिति आ जाएगी। अगर सरकार तुरंत कुछ नहीं करती तो आने वाले दिनों में अनाज को लेकर दंगे हो सकते हैं।

लेबर फ़ोर्स सर्वे (2017-18) के मुताबिक़, 2017-18 में भारत में 37.2 करोड़ लोगों की श्रमशक्ति है। इनमें से 22.8 फ़ीसदी वैतनिक कर्मचारी, 24.9 फ़ीसदी अनौपचारिक मज़दूर और बचे हुए 52.2 फ़ीसदी लोग स्वरोजगार से जुड़े हैं। अगर संख्या की बात करें 8.5 करोड़ वैतनिक कर्मचारी, 9.3 करोड़ अनौपचारिक मज़दूर और 19.4 करोड़ लोग स्वरोजगार से जुड़े हैं।

स्वरोज़गार वर्ग में 11.6 करोड़ ग्रामीण पुरूष और 3.7 करोड़ ग्रामीण महिलाएं हैं। इनकी औसत मासिक आय क्रमश: 8,955 रुपये और 4,122 रुपये है। शहरी क्षेत्रों में स्वरोजगार में लगी श्रमशक्ति में 3.3 करोड़ लोग पुरूष और 76 लाख महिलाएं हैं। इनकी औसत मासिक आय क्रमश: 16,067 रुपये और 6,994 रुपये है।

वैतनिक वर्ग में ग्रामीण क्षेत्र में 2.8 करोड़ पुरूष और 68 लाख महिलाएं हैं। इनकी औसत मासिक आय 13,533 रुपये और 8,939 रुपये है। वहीं शहरी क्षेत्र में 3.9 करोड़ पुरूष और 1.1 करोड़ महिलाएं हैं। इनकी औसत आय क्रमश: 17,999 रुपये और 14,560 रुपये है।

अगर अनौपचारिक मज़दूरों की बात करें तो ग्रामीण क्षेत्र में पुरूषों की संख्या 5.6 करोड़ और महिलाओं की संख्या 2 करोड़ है। इनकी प्रतिदिन की औसत मज़दूरी क्रमश: 268 रुपये और 173 रुपये है। शहरी क्षेत्रों में 1.3 करोड़ पुरूष और 29 लाख महिलाएं अनौपचारिक मज़दूरी करती हैं, जिनकी प्रतिदिन की औसत मज़दूरी क्रमश: 324 रुपये और 194 रुपये है।

अगर यह लोग महीने के 25 दिन भी काम करते हैं, तो भी ग्रामीण इलाकों में पुरुषों के लिए प्रति व्यक्ति मासिक आय 6,688 रुपये और महिलाओं के लिए 4,325 रुपये से ऊपर नहीं जाती। शहरी क्षेत्रों में पुरुषों के लिए यह आंकड़ा 8,094 रुपये और महिलाओं के लिए 4,856 रुपये है। 

इसलिए PLFS 2017-18 के मुताबिक़, भारत का एक आम आदमी हर महीने का दस हजार रुपये से कम कमाता है (नीचे दी गई तालिका पर नज़र डालें)।

table new.JPG

भारत में ''जनसंख्या:कर्मचारी'' का अनुपात 3:1 है। इसलिए प्रति व्यक्ति मासिक आय 3,300 रुपये या 110 रुपये प्रतिदिन बैठती है। ज़ाहिर है हम में से कुछ लोग मासिक तौर पर 3,300 रुपये से ज़्यादा कमाते हैं। लेकिन आय वितरण में गहरी असमानताएं हैं।

भारत में तीन फ़ीसदी आबादी से भी कम लोग टैक्स दायरे में आते हैं। अगर हम कृषि से जुड़े अमीरों, पूरी तरह कर से बचने वाले लोगों समेत दूसरे लोगों को भी कर देने वालों के दायरे में जोड़ लें और औसत परिवार का आकार 4.2 सदस्यों का लें, जिसमें हर परिवार में एक कमाऊ व्यक्ति मानें, तो भी हमारी प्रत्यक्ष कर देने वाली आबादी 15 फ़ीसदी से ज़्यादा नहीं पहुंचती। यह वह लोग हैं जो 20,000 रुपये महीने से ज़्यादा कमाते हैं। इसलिए भारत की 85 फ़ीसदी आबादी ग़रीब है। औसत तौर पर एक परिवार की महीने की कमाई 10,000 रुपये से भी कम है। इनमें से ज़्यादातर या तो स्वरोज़गार में संलग्न हैं या फिर अनौपचारिक मज़दूर और दैनिक मज़दूरी करने वाले हैं।

साफ है कि भारत की आधे से ज़्यादा आबादी ज़्यादा वक़्त तक घर पर नहीं बैठ पाएगी। अगर सरकार क्वारंटाइन के ज़रिए कोरोनावायरस के संक्रमण को रोकना चाहती है, तो उसे इन वंचित तबकों के लोगों को पैसा देना होगा, ताकि उनकी कमाई की भरपाई की जा सके। यह कोई मजाक नहीं है। इसका मतलब है कि 30 करोड़ अनौपचारिक मज़दूरों और स्वरोजगार में संलग्न लोगों को महीने का दस हजार रुपये देना होगा। कुलमिलाकर यह राशि तीन लाख करोड़ रुपये पहुंचेगी, जो जीडीपी का 1.5 फ़ीसद हिस्सा होगा।

अगर केंद्र अपनी राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाए, तो इस पैसे की भरपाई की जा सकती है। एक और समस्या इतने बड़े पैसे के 30 करोड़ मज़दूरों को ट्रांसफर की है। वो भी महज़ एक महीने में। मेरे हिसाब से इसका सबसे बेहतर तरीका ''महात्मा गांधी NREGA'' का ढांचा है। सरकार को यह योजना शहरी क्षेत्रों में भी पहुंचानी चाहिए। लोगों के जॉब कॉर्ड बनाकर प्रतिदिन मज़दूरी की दर को 180 रुपये से बढ़ाकर 350 रुपये प्रतिदिन कर देना चाहिए।

शहरी और ग्रामीण निकाय, लोगों से फोन के ज़रिए काम मांगने को कह सकते हैं और बदले में काम के बजाए मुआवज़ा दे सकते हैं। कानून में इस बात के प्रावधान भी हैं। बस स्थानीय निकायों को पर्याप्त पैसा दिया जाना है। यह केंद्र प्रायोजित योजना है, जिसमें 90 फ़ीसदी से ज़्यादा खर्च केंद्र सरकार का है। ऐसी आपात स्थित में राज्य भी दस फ़ीसदी हिस्सा दिए जाने से इंकार नहीं करेंगे।

एक बड़ी आबादी को जबरदस्ती घर पर बिठाकर, उन्हें रोज़गार से वंचित करने वाला कदम भारत जैसे कम विकसित देश में अकाल की स्थिति पैदा कर देगा। ध्यान रहे कि भारत में बहुसंख्यक आबादी केवल अपने गुज़ारे लायक ही कमा पाती है, जबकि उनके पास किसी भी तरह की सामाजिक सुरक्षा नहीं होती। अगर श्रमशक्ति के बड़े हिस्से को एक महीने तक कोई आय नहीं होती है, तो भारत में अनाज के लिए दंगे शुरू हो जाएंगे। अब वह वक़्त आ गया है कि सरकार ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए योजना बनाए।

लेखक ''सेंटर फ़ॉर इकनॉमिक स्टडीज़ एंड प्लानिंग'', जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में असिसटेंट प्रोफ़ेसर हैं। यह उनके निजी विचार हैं।

अंग्रेजी में लिखा मूल आलेख आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

Coronavirus Lockdown Could Lead to Famine, Possibly Worse

Coronavirus India
Covid 19 India
India coronavirus lockdown
fallout of indias lockdown
india food riots coronavirus

Related Stories

कोरोना के ख़िलाफ़ लड़ाई वैज्ञानिक चेतना के बिना नहीं जीती जा सकती

कोविड 19 : तब्लीग़ की आड़ में यूपी में मुसलमानों के उत्पीड़न के शिकायतें!

कोरोना वायरस से बच कर भी ‘घृणित सोच’ से कैसे बचेगा भारत?

कोविड-19 संकट : सुरक्षा उपकरणों की कमी से स्वास्थ्य कर्मियों के जीवन को ख़तरा


बाकी खबरें

  • Sitaram Yechury
    संदीप चक्रवर्ती
    स्वतंत्रता दिवस को कमज़ोर करने एवं हिंदू राष्ट्र को नए सिरे से आगे बढ़ाने की संघ परिवार की योजना को विफल करें: येचुरी 
    25 Feb 2022
    माकपा महासचिव ने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार का “फोकस 5 अगस्त को देश की वास्तविक स्वतंत्रता की तारीख के रूप में बढ़ावा देने पर है।"  
  • russia ukrain
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    यूक्रेन पर रूस के हमले से जुड़ा अहम घटनाक्रम
    25 Feb 2022
    यूरोपीय संघ रूस पर और आर्थिक एवं वित्तीय प्रतिबंध लगाने को सहमत। तो वहीं संयुक्त राष्ट्र ने यूक्रेन में मानवीय सहायता के लिए दो करोड़ डॉलर देने की घोषणा की।
  • ASHA Workers
    अनिल अंशुमन
    बिहार : आशा वर्कर्स 11 मार्च को विधानसभा के बाहर करेंगी प्रदर्शन
    25 Feb 2022
    आशा कार्यकर्ताओं का कहना है कि बिहार सरकार हाई कोर्ट के आदेश का पालन करने में भी टाल मटोल कर रही है। कार्यकर्ताओं ने ‘भूखे रहकर अब और नहीं करेंगी बेगारी’ का ऐलान किया है।
  • covid
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 13 हज़ार से ज़्यादा नए मामले, 302 मरीज़ों की मौत
    25 Feb 2022
    देश में कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 4 करोड़ 28 लाख 94 हज़ार 345 हो गयी है।
  • up elections
    तारिक़ अनवर
    यूपी चुनाव : अयोध्या के प्रस्तावित  सौंदर्यीकरण में छोटे व्यापारियों की नहीं है कोई जगह
    25 Feb 2022
    अयोध्या के व्यापारियों ने आरोप लगाया है कि प्रस्तावित लेआउट के परिणामस्वरूप दुकानों और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को बड़े पैमाने पर ध्वस्त या उन दुकानों का ज़्यादातर हिस्सा तोड़ दिया जाएगा।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License