NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
कॉर्पोरेट-हिंदुत्व गठजोड़ और किसान
राष्ट्रीय हितों का कॉर्पोरेट हितों के साथ एकाकार किया जाना मोदी सरकार की निशानी रही है और यह उस कॉर्पोरेट-हिंदुत्व गठजोड़ की विशेषता ही है जिसे मोदी ने गढ़ा है और जो उन्हें सत्ता में बनाए रखा है।
प्रभात पटनायक
15 Mar 2021
कॉर्पोरेट-हिंदुत्व गठजोड़ और किसान

हम अजीबो-गरीब हालात से दो-चार हो रहे हैं। कई बार ऐसे मामले देखने का मिलते हैं, जहां उपभोक्ता चाहते हैं कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली की जरूरतों की भरपाई करने के लिए, कहीं ज्यादा खाद्य फसलें उगाई जाएं, जबकि पहली नज़र में कृषि उत्पादक ही नकदी फसलों को अपनाने से होने वाले लाभों के लालच में आ जाते हैं और ज्यादा खाद्य फसलें उगाने के प्रति अनिच्छुक होते हैं। ऐसे हालात में इन विरोधी हितों के बीच, सरकार को मध्यस्थता कर के रास्ता निकालना पड़ता है।

सरकार बनाम जनता

लेकिन, भारत में फिलहाल तो किसानों की खाद्य फसलों को छोडक़र दूसरी फसलों की ओर जाने की कोई इच्छा नहीं है, जबकि उपभोक्ता तो जाहिर है कि यह चाहते ही हैं कि काफी खाद्यान्न पैदावार हो ताकि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए खाद्यान्नों की आपूर्ति हो सके। इस तरह, उनके हितों के बीच कोई ऐसा टकराव है ही नहीं, जिसमें सरकार के मध्यस्थ बनने की जरूरत हो। इसके बावजूद, हमारे देश की सरकार किसानों को खाद्य फसलों को छोडक़र, नकदी फसलों की ओर धकेलने के लिए उन्हें ऐसा बदलाव करने के लिए मजबूर कर रही है जो सार्वजनिक वितरण प्रणाली को नष्ट कर देगा।

सरकार के कृषि कानून ठीक ऐसा ही बदलाव लाना चाहते हैं। इन कानूनों की हिमायत करते हुए सरकारी अर्थशास्त्री, इसी तरह के बदलाव के लाभों पर जोर देते हुए, इन विधेयकों की हिमायत कर रहे हैं। इस तरह, इस मामले में सरकार कोई जनता के दो तबकों के हितों के बीच के टकराव में मध्यस्थता नहीं कर रही है। साफ तौर पर वह तो खुद अपने ही हित में जनता पर यानी किसानों तथा उपभोक्ताओं, दोनों पर समान रूप से इस तरह का बदलाव थोप रही है, जिसके खिलाफ किसान दिल्ली की कड़ाके की सर्दी में आंदोलन में डटे रहे हैं। यह अजीबो-गरीब मामला जनता बनाम जनता का नहीं है बल्कि सरकार बनाम आमतौर पर समूची जनता का है।

इसी प्रकार, किसान एकराय से ठेका खेती को ठुकरा रहे हैं। इसके बावजूद सरकार, इसके किसानों के हित में होने के नाम पर, इन कानूनों के जरिए किसानों पर ठेका खेती थोप रही है। पुन: यह कोई ऐसा मामला नहीं है कि जनता के किसी तबके के मांग करने पर सरकार ने ये कदम उठाए हों। ये कदम तो प्रकटत: वह अपने ही हितों में, जनता पर थोप रही है।

कार्पोरेटों के स्वार्थ को बनाया राष्ट्रहित

लेकिन, इन कदमों में इस सरकार का अपना स्वार्थ क्या हो सकता है? यह तो स्वत: स्पष्ट ही है कि इस मामले में सरकार का अपना हित, कार्पोरेटों तथा अंतर्राष्ट्रीय एग्रीबिजनस के स्वार्थों से पूरी तरह से मेल खाता है। फिर भी सरकार का जवाब तो यही होगा कि वह तो ‘राष्ट्रीय हित’ में ऐसा कर रही है। इस तरह, ‘राष्ट्रीय हित’ को कॉर्पोरेट हित के साथ एकरूप कर दिया जाता है। राष्ट्रीय हितों का कॉर्पोरेट हितों के साथ एकाकार किया जाना मोदी सरकार की निशानी रही है और यह उस कॉर्पोरेट-हिंदुत्व गठजोड़ की विशेषता ही है जिसे मोदी ने गढ़ा है और जो उन्हें सत्ता में बनाए रखा है।

बहरहाल, इस मामले का अजीबो-गरीबपन इस बात में छुपा हुआ है कि दक्षिणपंथी सरकारें भी, अपनी कॉर्पोरेटपरस्त नीतियों को जनता के किसी न किसी तबके के हितों की हिफाजत करने की दुहाई देकर सही ठहराती हैं। मिसाल के तौर पर मार्गरेट थैचर ने ट्रेड यूनियनों पर अपने हमले को इस दलील के सहारे सही ठहराने की कोशिश की थी कि ये कदम मुद्रास्फीति पर काबू पाने के लिए जरूरी थे, जो कथित रूप से ट्रेड यूनियनों की वजह से पैदा हो रही थी और जिसकी चोट आम जनता पर पड़ रही थी। लेकिन, भारत में हम बिल्कुल इकतरफा तथा मनमाने तरीके से ऐसे कदमों के थोपे जाना देख रहे हैं। जिनकी जनता के किसी भी तबके ने कभी मांग की ही नहीं थी, जो सार्वजनिक वितरण प्रणाली को ध्वस्त करने के आसार बनाते हैं, जिनका व्यापक जनता द्वारा विरोध किया जा रहा है और जिनके खिलाफ विशाल संख्या में जनता जोर-शोर से विरोध कर रही है। और यह सब किया जा रहा है सिर्फ कॉर्पोरेट हितों को आगे बढ़ाने के लिए। यह किसी भी जनतांत्रिक व्यवस्था के लिए अभूतपूर्व है।

जनादेश का झूठा दावा

सरकार यह दावा करेगी कि चूंकि 2019 के चुनाव में उसकी जीत हुई थी, उसे अपनी मर्जी के ‘सुधार’ करने का जनादेश प्राप्त हैं। लेकिन, इस तरह का दावा गलत होगा और इसके कारण अनेक हैं। पहला तो यही इस तरह का दावा सिद्धांत के रूप में ही गलत है। किसी चुनाव में जीतना किसी भी सरकार को अपनी मर्जी से कुछ भी करने का जनादेश नहीं दे देता है। दूसरे, ऐसा इसलिए और भी ज्यादा है कि 2019 का चुनाव कोई ‘कृषि सुधारों’ के मुद्दे पर तो लड़ा नहीं गया था। वास्तव में ये कथित सुधार तो सत्ताधारी पार्टी के चुनावी नारों में कहीं आए तक नहीं थे। उसके चुनावी नारे तो पुलवामा हमले और बालाकोट हवाई हमलों पर ही केंद्रित थे। तीसरे, अब तो बड़े पैमाने पर राजनीतिक को ही एक माल में तब्दील किया जा चुका है, जहां विधायिका में बहुमत होने का भी कोई खास महत्व नहीं रह गया है।

चुनाव लडऩा अपने आप में असाधारण रूप से महंगा हो गया है। चुनाव से पहले, विरोधियों के बीच से अपने पक्ष में दलबदल कराना, अब आम-फहम हो गया है और बहुत महंगा भी। और चुनाव में कोई भी जीते, चुनाव के बाद पैसा बहाकर दूसरी पार्टियों से दलबदल कराए जाते हैं और इस तरह सरकार बनाने के लिए, आवश्यक बहुमत जुगाड़ लिया जाता है। इन सभी कारणों से जिस पार्टी की तिजोरियां सबसे भारी हों, उसे दूसरी पार्टियों के मुकाबले स्पष्ट बढ़त हासिल होती है और चूंकि ऐसा पैसा मुख्यत: कार्पोरेटों से ही आ सकता है, उनके साथ गठबंधन करना सत्ता में आने के लिए जरूरी हो जाता है। जाहिर है कि इसके लिए उन्हें बदले में भी कुछ चाहिए होता है। माल में तब्दील कर दी गयी राजनीति की ऐसी दुनिया में, अपने सांप्रदायिक रूप से ध्रुवीकरणकारी एजेंडा तथा कॉर्पोरेट वित्तीय अनुमोदन के साथ, हिंदुत्ववादी ताकतें वर्चस्व कायम करने में कामयाब हो जाती हैं। बदले में उनकी ओर से कार्पोरेटों को दिए जा रहे प्रतिदान में, निहितार्थत: किसानी खेती पर नियंत्रण दिलाया जाना शामिल है।

कार्पोरेटों, खासकर, उनके नौसिखिया गुट का ज़्यादा मुनाफ़ा

वैसे तो ऐसी ताकतों के उभार से समग्र रूप से कार्पोरेटों को फायदा होता है। फिर भी उनके बीच से भी एक घटक- नौसिखिया घटक को- कहीं ज्यादा स्थापित घटकों के मुकाबले अक्सर कहीं ज्यादा फायदा मिलता है। देनिएल गुएरिन ने (‘फासिज्म एंड बिग बिजनस’) में दिखाया था कि 1930 के दशक में जर्मनी में, इजारेदार पूंजी का एक घटक, जो हथियारों के उत्पादन तथा उत्पादक मालों के काम में लगा हुआ था, नाजियों के साथ कार्पोरेटों के गठजोड़ के विशेष लाभार्थी बन गए थे, जबकि कपड़े तथा उपभोक्ता मालों के उत्पादन में लगे कार्पोरेटों के पुराने स्थापित घटक उतने लाभान्वित नहीं हुए थे। जापान में भी 1931 में सत्ता में आए फासिस्ट निजाम में, जिसके साथ कार्पोरेटों के घनिष्ठ रिश्ते थे, जापान के नये कारोबारी घरानों, शिंको जेईबत्सु को कहीं ज्यादा फायदा मिला था, जबकि मित्सुई जैसे पुराने घरानों को उतना फायदा नहीं मिला था। बेशक, आज का भारत, 1930 के दशक के जर्मनी या जापान से अलग है, फिर भी नये बने कॉर्पोरेट घरानों के एक घटक का उसी प्रकार विशेष रूप से लाभान्वित होना तो यहां भी देखा ही जा सकता है। यह किसानों के बीच और भी नाराजगी पैदा कर रहा है।

कार्पोरेटों को ‘संपदा निर्माता’ करार देकर मोदी, कॉर्पोरेट हितों को, खासतौर पर कार्पोरेटों के इस नौसिखिया हिस्से के हितों को, राष्ट्रीय हितों के समानार्थी बनाने की जमीन तैयार करते हैं। उनका आशय राष्ट्र की सम्पदा से था। इस तरह, इस प्रस्तुति के जरिए ही वह, निजी संपदा बटोरने को राष्ट्र की सेवा के स्तर पर पहुंचा देते हैं और और ऐसी संपदा बटोरने वालों को ‘राष्ट्र’ के विशेषाधिकार प्राप्त’ सदस्य बना देते हैं, जिनके हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दिए जाने की जरूरत है। इसका अर्थ यह होता है कि जनता के सभी तबकों से, इन नौसिखिया कार्पोरेटों की मांगें मनवायी जानी चाहिए। ऐसा करना खुद देश की जनता के हित में होगा क्योंकि, इन कार्पोरेटों द्वारा संपदा बटोरा जाना तो कथित रूप से सभी के फायदे के लिए है।

इस तरह मोदी सरकार ने ‘राष्ट्रवाद की अवधारणा को ही सिर के बल पर खड़ा कर दिया है। कहां तो उसकी पहचान जनता से होती थी, उससे बदलकर उसकी पहचान को कार्पोरेटों, खासतौर पर नये कार्पोरेटों के साथ जोड़ दिया गया है। कृषि कानून, राष्ट्रवाद के इसी शीर्षासन में खड़े किए जाने को दिखाते हैं।

उपनिवेशविरोधी संघर्ष से विश्वासघात

बहरहाल, यह हमारे उपनिवेशविरोधी संघर्ष के साथ विश्वासघात है। सत्रहवीं सदी में यूरोप में वैस्टफेलियाई शांति संधियों की पृष्ठभूमि में जो ‘राष्ट्रवाद की अवधारणा विकसित हुई थी, साम्राज्यवादी थी, गैर-समावेशी थी (उसने एक ‘अंदरूनी शत्रु’ खोज लिया था) और कथित रूप से जनता द्वारा सम्मान की हकदार थी, जिसके लिए जनता से कुर्बानियां देने की अपेक्षा थी। इसके विपरीत, भारत जैसे देशों में उपनिवेशविरोधी राष्ट्रवाद, इससे बिल्कुल भिन्न था। वह तो अपने आप में अनोखी परिघटना ही था। वह राष्ट्रवाद को समावेशी नजर से देखता था, जिसका धमनिरपेक्षता एक अभिन्न हिस्सा थी। और राष्ट्रवाद की प्रणाली का तर्क ही यह मानता था कि वह अपने जनगण की जिंदगियां बेहतर बनाने की कोशिश होनी चाहिए। मोदी सरकार की समझदारी में छिपी राष्ट्रवाद की अवधारणा, उक्त उपनिवेशविरोधी धारणा से बिल्कुल उल्टी है और यूरोप की ही उस विस्तारकारी अवधारणा के ज्यादा नजदीक है, जिसका तार्किक उत्कर्ष फासीवाद में हुआ था।

दिल्ली के गिर्द जमा हुए किसान, हरेक पहलू से मोदी की विश्वदृष्टिकोण का विरोध कर रहे हैं। वे धर्मनिरपेक्षता को बुलंद कर रहे हैं, जो कि हिंदू, सिख तथा मुस्लिम किसानों का कंधे से कंधा मिलाकर साथ आना खुद ब खुद इस बात को स्पष्ट करता है। खेती पर कॉर्पोरेट अतिक्रमण के अपने विरोध के जरिए वे, मुट्ठीभर कॉर्पोरेट घरानों के साथ ‘राष्ट्रवाद’ के एकरूप किए जाने को नकार रहे हैं। और सार्वजनिक वितरण व्यवस्था के पक्ष में खड़े होकर वे, राष्ट्रवाद के अस्तित्व के तर्क के रूप में, जनता की सेवा करने को स्थापित कर रहे हैं। मोदी सरकार ने राष्ट्रवाद की अवधारणा का अपहरण कर उसे जहां पहुंचा दिया है, किसान आंदोलन वहां से इस अवधारणा को जनता के पाले में वापस ला रहा है।              

(लेखक प्रसिद्ध अर्थशास्त्री हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Corporate-Hindutva Alliances
corporate and Farmers
farmers crises
Modi government
Narendra modi
corporate
Hindutva
farmers

Related Stories

किसानों और सत्ता-प्रतिष्ठान के बीच जंग जारी है

हिसारः फसल के नुक़सान के मुआवज़े को लेकर किसानों का धरना

ज़रूरी है दलित आदिवासी मज़दूरों के हालात पर भी ग़ौर करना

मई दिवस: मज़दूर—किसान एकता का संदेश

ब्लैक राइस की खेती से तबाह चंदौली के किसानों के ज़ख़्म पर बार-बार क्यों नमक छिड़क रहे मोदी?

आख़िर किसानों की जायज़ मांगों के आगे झुकी शिवराज सरकार

किसान-आंदोलन के पुनर्जीवन की तैयारियां तेज़

ग्राउंड रिपोर्टः डीज़ल-पेट्रोल की महंगी डोज से मुश्किल में पूर्वांचल के किसानों की ज़िंदगी

MSP पर लड़ने के सिवा किसानों के पास रास्ता ही क्या है?

सार्वजनिक संपदा को बचाने के लिए पूर्वांचल में दूसरे दिन भी सड़क पर उतरे श्रमिक और बैंक-बीमा कर्मचारी


बाकी खबरें

  • poonam
    सरोजिनी बिष्ट
    यूपी पुलिस की पिटाई की शिकार ‘आशा’ पूनम पांडे की कहानी
    16 Nov 2021
    आख़िर पूनम ने ऐसा क्या अपराध कर दिया था कि पुलिस ने न केवल उन्हें इतनी बेहरमी से पीटा, बल्कि उनपर मुकदमा भी दर्ज कर दिया।
  • UP
    लाल बहादुर सिंह
    यूपी : जनता बदलाव का मन बना चुकी, बनावटी भीड़ और मेगा-इवेंट अब उसे बदल नहीं पाएंगे
    16 Nov 2021
    उत्तर-प्रदेश में चुनाव की हलचल तेज होती जा रही है। पिछले 15 दिन के अंदर यूपी में मोदी-शाह के आधे दर्जन कार्यक्रम हो चुके हैं। आज 16 नवम्बर को प्रधानमंत्री पूर्वांचल एक्सप्रेस वे का उद्घाटन करने…
  • Ramraj government's indifference towards farmers
    ओंकार सिंह
    लड़ाई अंधेरे से, लेकिन उजाला से वास्ता नहीं: रामराज वाली सरकार की किसानों के प्रति उदासीनता
    16 Nov 2021
    इस रामराज में अंधियारे और उजाले के मायने बहुत साफ हैं। उजाला मतलब हुक्मरानों और रईसों के हिस्से की चीज। अंधेरा मतलब महंगे तेल, राशन-सब्जी और ईंधन के लिए बिलबिलाते आम किसान-मजदूर के हिस्से की चीज।   
  • दित्सा भट्टाचार्य
    एबीवीपी सदस्यों के कथित हमले के ख़िलाफ़ जेएनयू छात्रों ने निकाली विरोध रैली
    16 Nov 2021
    जेएनयूएसयू सदस्यों का कहना है कि एक संगठन द्वारा रीडिंग सत्र आयोजित करने के लिए बुक किए गए यूनियन रूम पर एबीवीपी के सदस्यों ने क़ब्ज़ा कर लिया था। एबीवीपी सदस्यों पर यह भी आरोप है कि उन्होंने कार्यक्रम…
  • Amid rising tide of labor actions, Starbucks workers set to vote on unionizing
    मोनिका क्रूज़
    श्रमिकों के तीव्र होते संघर्ष के बीच स्टारबक्स के कर्मचारी यूनियन बनाने को लेकर मतदान करेंगे
    16 Nov 2021
    न्यूयॉर्क में स्टारबक्स के कामगार इस कंपनी के कॉर्पोरेट-स्वामित्व वाले स्टोर में संभावित रूप से  बनने वाले पहले यूनियन के लिए वोट करेंगे। कामगारों ने न्यूयॉर्क के ऊपर के तीन और स्टोरों में यूनियन का…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License