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अजब ग़ज़ब मध्यप्रदेश: ज़िंदगी में कभी शुमार नहीं हुये, अब मौत में भी गिनती में नहीं
मौतें और उनमें अचानक इतनी ज़्यादा बढ़त सिर्फ़ संख्या के इधर उधर होने या तात्कालिक रूप से झांसा देकर "पॉजिटिविटी अनलिमिटेड" का स्वांग रचाने भर का मामला नहीं है। इसका बची हुई ज़िंदगियों की सलामती के साथ गहरा रिश्ता है।
बादल सरोज
18 Jun 2021
कोरोना
तस्वीर केवल प्रतीकात्मक प्रयोग के लिए। साभार : National Herald

भाजपा और उसकी सरकारों का सचमुच में कोई सानी नहीं है। आप एकदम अति पर जाकर इनके द्वारा किये जाने वाले खराब से खराब काम की कल्पना कीजिये वे अगले ही पल उससे भी ज्यादा बुरा कुछ करते हुए नजर आएंगे। आप उनके आचरण की निम्नतर से निम्नतम सीमा तय कीजिये वे पूरी ढिठाई  के साथ उससे भी मीलों नीचे का बर्ताव करते पाए जायेंगे। लगता है जैसे इस पार्टी ने  झूठ, फरेब और छल की सारी सीमाएं लांघना और  इस मामले में अपने ही रिकार्ड्स को तोड़ना अपना लक्ष्य बनाकर रखा हुआ है। संसदीय लोकतंत्र या सूचित, लोकतांत्रिक, सभ्य समाज के हर नियम, हर परम्परा को तोड़ना जैसे इनका सबसे प्राथमिक मिशन है। यह सिर्फ एक तरह की लत भर नहीं है, वह तो है ही, सैडिस्ट - परपीड़क - सिंड्रोम भी है;  इन्हे जनता को दुखाने में ही सुख मिलता है। इस मामले में वे अखाड़े में पूर्णतः आश्वस्त होकर उतरते है। क्योंकि फ़िल्मी खलनायक जगीरा की तरह उन्हें पक्के से पता है कि उसका मुकाबला करने वाले बाकी चाहें जितनी बल, साहस, ताकत और शक्ति जुटा लें; उसकी ये वाली विशेषताएं कहाँ से लायेंगे।

कोरोना की दूसरी लहर में मोदी की अगुआई वाली केंद्र तथा भाजपा की राज्य सरकारों की विषाणु-प्रियता की जो कारगुजारियां सामने आयीं उन्हें देश और दुनिया ने देखा भी, इसके दोषियों को दुत्कारा भी। मगर अपनी नरसंहारी असफलताओं पर पर्दा डालने के लिए भाजपा सरकारों ने जो किया वह पिछले महीने सम्मानजनक अंतिम संस्कार के इंसानी अधिकार से वंचित रहे भारतीयों की लाशों से पटी गंगा और उसके रेत में दबी मृत देहों की फसल ने अपनी जुगुप्सा पैदा करती तादाद से सार्वजनिक रूप से उजागर कर दिया था। मगर जैसा कि ऊपर कहा गया है कि वे खुद की नीचाई को भी चुनौती मानते हैं और जल्द से जल्द खुद ही उसे तोड़ देते हैं।  यही हुआ भी। भाजपा नीत सरकारों ने महामारी से निपटने में अपनी नाकामियों पर पर्दा डालने के लिए मौतों की वास्तविक संख्या को छुपाने का एक नया ही कारनामा कर दिखाया।

जन्म मृत्यु का हिसाब रखने वाले सरकारी पंजीकरण विभाग सीआरएस के मुताबिक इस साल के केवल मई महीने में मध्यप्रदेश में करीब 1 लाख 64 हजार 348 लोगों की मौत हुई है। अप्रैल-मई 2021 में कोविड-19 से हुई मौतों के सरकारी आंकड़ों से 40 गुना अधिक मौतें दर्ज हुई हैं। इसी कालावधि के पिछली दो वर्षों के आंकड़ों के मुताबिक़ मई 2019 में मध्यप्रदेश में 31 हजार और मई 2020 में 34 हजार जानें गईं थीं। जबकि राज्य सरकार  के मुताबिक जनवरी से मई 2021 के बीच सिर्फ 4,461 कोविड मौतें हुई है।

सीआरएस - सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम - के तहत ऑफिस ऑफ रजिस्ट्रार जनरल इंडिया देशभर में हुई जन्म और मृत्यु का हिसाब रखता है। इसके लिए सभी राज्य सरकारों को खुद सीआरएस पर जन्म और मृत्यु का डेटा जमा करना होता है।

अब तक के औसत के हिसाब से  भारत में 86 फ़ीसदी और मध्य प्रदेश में 80 फ़ीसदी मौतें यहां दर्ज की जाती हैं। सिर्फ सीआरएस का डाटा ही औसत मौतों की संख्या और उसमे आये बदलावों का सही अनुमान देता है। यह हर मौत का रिकॉर्ड रखता है। चाहे मौत कहीं भी और किसी भी कारण से मौत हुई हो।

सीआरएस रिपोर्ट के मुताबिक अकेले राजधानी भोपाल में अप्रैल-मई 2019 में 528 मौतें हुई थी, 2020 में इसकी संख्या 1204 थी, लेकिन साल 2021 में कोरोना की दूसरी लहर के बीच कुल 11045 लोगों की मौतें हुई हैं। सामान्य दिनों में होने वाली मौतों से यह दो हजार फीसदी ज्यादा है। पूरे प्रदेश में सबसे ज्यादा मौत इंदौर में हुई है। यहां अप्रैल-मई 2021 में 19 हजार लोगों की जान गई है। भोपाल, इंदौर के श्मशानों में लम्बी लम्बी प्रतीक्षा सूची और कतारबद्ध शवों की सचित्र ख़बरों से वे अखबार भी पटे हुए थे जो सरकार की निगाह में काफी सज्जन, सुशील और गोद में ही सुखी रहने वाले अबोध माने जाते हैं। कुल मिलाकर यह कि पिछले साल की तुलना में इस साल जनवरी से मई के बीच 1.9 लाख ज्यादा मौतें हुई हैं। हालांकि असली संख्या इससे कहीं ज्यादा ही है। क्योंकि दूरदराज के गाँवों की मौतों का इंदराज सीआरएस के आंकड़ों में शामिल हुआ होगा इस पर यकीन करने की कोई वजह नजर नहीं आती। 

इन पंक्तियों के लेखक ने पिछले सप्ताह अमरकंटक की पहाड़ियों के बीच बसे गाँवों के आदिवासियों के साथ चर्चा में पाया था कि ऐसा कोई गाँव या टोला नहीं था जहां अप्रैल-मई में लगभग हर सप्ताह कोई न कोई मौत न हुयी हो। 

मरने वालों की गिनती में गड़बड़ी करने वाला मध्यप्रदेश अकेला नहीं है। लाख छुपाने के बावजूद सामने आये तथ्यों और प्रमाणों से यह साबित हो गया है कि समूचे गुजरात में जितनी मौतों - करीब साढ़े तीन हजार - का दावा मोदी के गुजरात की मोदी की पार्टी की सरकार कर रही थी लगभग उतनी - 3100 से ज्यादा - मौतें तो अहमदाबाद के सिर्फ एक अस्पताल में ही हुयी थीं। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के शहर उत्तर प्रदेश के कानपुर में अकेले एक दिन में सामान्य दिनों की तुलना में पांच गुना से ज्यादा दाहसंस्कार हुए - औसत संख्या से कोई 400 ज्यादा शव जलाये गए जबकि सरकारी आंकड़ों में इस दिन कोविड-19 से मरने वालों की संख्या सिर्फ 3 बताई गयी। इसी तरह के झूठों के उजागर होने पर हरियाणा के संघी मुख्यमंत्री खट्टर, "जाने वाले कभी नहीं आते" का तत्वज्ञान बघार चुके हैं। कर्नाटक, असम से बिहार तक मौतों की वास्तविक संख्या छुपाने की यह चतुराई एक जैसी है। इस कदर दक्षता और भक्ति भाव के साथ अमल में लाई गयी है जैसे सबको ऐसा करने के लिए शिक्षित, दीक्षित और निर्देशित किया गया हो।

मौतें और उनमें अचानक इतनी ज्यादा बढ़त सिर्फ संख्या के इधर उधर होने या तात्कालिक रूप से झांसा देकर "पॉजिटिविटी अनलिमिटेड" का स्वांग रचाने भर का मामला नहीं है। इसका बची हुयी जिंदगियों की सलामती के साथ गहरा रिश्ता है। चिकित्सा विज्ञान के हिसाब से यह इसलिए महत्वपूर्ण है ताकि वे जान समझ सकें कि इनका कारण क्या है और उसके आधार पर भविष्य में इनकी पुनरावृत्ति रोकने के लिए समुचित कदम और इलाज ढूंढा जा सके।  यदि सरकारे इन मौतों को कोविड 19 की महामारी से हुयी मौत नहीं मानती तब तो यह पता लगाना और भी जरूरी हो जाता है कि आखिर ऐसी कौन सी अदृश्य और अब तक अनचीन्ही बीमारी थी  जो इस महामारी का कारण बनी।  मगर यह काम शुरू तो तब होगा न जब उन मौतों को मौत माना जाएगा।

शुरू में कुछ  धीरे धीरे - कोरोना की दोनों लहरों के बीच कुछ ज्यादा तेजी के साथ लोगों ने समझना शुरू कर दिया है कि ज्यादा मारक और संहारक कारपोरेटी हिंदुत्व का वह विषाणु है जो बाकी महामारियों के विषाणुओं की आमद निर्बाध और निर्विघ्न सुनिश्चित करने के लिए द्वारपाल बना डटा है। जो सिर्फ आज के भारतीयों की जान के लिए ख़तरा भर नहीं है - अगर उसकी चली तो - अगली पीढ़ियों का जीना मुहाल करने के लिए तत्पर और तैयार बैठा है। जैसा कि कहा जाता है ; जानकारी बचाव की शुरुआत होती है। बाकी का काम इसके बाद शुरू होता है। जिसमें यही जानकारी एक हथियार बन जाती है। क्यूँकि दर्द जब हद से गुजरता है तो दवा हो जाता है।

(बादल सरोज वरिष्ठ लेखक और पत्रकार हैं। आप लोकजतन के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव भी हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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