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मज़दूर-किसान
स्वास्थ्य
भारत
कोरोना संकट, दुआर चाय बागानों में कार्यरत श्रमिकों के लिए किसी दु:स्वप्न से कम नहीं है
भूख, तालाबंदी और सामाजिक भेदभाव इन 3.5 लाख श्रमिकों के लिए कभी अजनबी नहीं रहा, लेकिन लॉकडाउन आज इन्हें मज़दूरी या सुरक्षात्मक उपायों के बगैर काम करते रहने के लिए मजबूर कर रहा है।
बनज्योत्सना लाहिरी
05 May 2020
labors
फाइल फोटो

हाल फिलहाल दुनियाभर में गैर-बराबरी और स्वास्थ्य सेवाओं की जो सीमाएं नजर आ रही हैं, वे विभिन्न देशों के आम लोगों पर अपने कठिन पदचिह्न छोड़ती नजर आ रही हैं। इस बेहद घातक नवीनतम कोरोना वायरस ने जिस प्रकार का वैश्विक कोहराम मचा रखा है, उसने अचानक से हम सभी को जैसे झटके से नींद से जगा डाला है। बाकी जीवन के सभी ऐशोआराम पर खर्च, जिनका आज कोई मोल नहीं रहा की तुलना में बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति आज हम बेहद सजग हो रहे हैं। लेकिन इस परिदृश्य के पीछे से कहीं ज्यादा भयावह तस्वीर तेजी से बढ़ती भुखमरी और भूख की निकल कर आ रही है। ऐसा प्रतीत होता है कि वायरस से उत्पन्न होने वाली इस महामारी की तुलना में भूख से पैदा हो रही महामारी  कहीं कई अधिक जिंदगियों को अपनी आगोश में  न ले ले।

अगर भारत में देखें तो भूख ने तो काफी पहले से ही महामारी का रूप अख्तियार कर लिया था। 2019 के ग्लोबल हंगर इंडेक्स (GHI) में कुल 117 देशों के बीच भारत 102वें स्थान पर बना हुआ है। जबकि 2018 में यह 103वें स्थान पर और 2017 में भारत की रैंकिंग 100वें स्थान पर थी। भूख और भुखमरी को तो सर्पिल गति से उपर बढ़ना ही है, यदि असंख्य श्रमिकों को उनकी न्यूनतम मजदूरी ना मिले और सस्ती दरों पर गुणवत्तायुक्त आवश्यक सेवाएं जैसे स्वास्थ्य सुरक्षा और शिक्षा उपलब्ध न कराई जाए।

उन क्षेत्रों और इलाकों में जो पहले से ही गरीबी की चपेट में जी रहे थे, में कोरोनावायरस के कारण काम-काज और गतिशीलता पर लॉकडाउन अलग से एक अभिशाप बन कर सामने आया है। भारत के अंदर भी ऐसा ही एक क्षेत्र पश्चिम बंगाल का चाय बागान है।

चाय बागानों और उनके भूख का इतिहास:

पश्चिम बंगाल के चाय बागानों में भूख, तालाबंदी और यहां तक कि सामाजिक भेद-भाव की बातें कोई नई नहीं है। इस वैश्विक महामारी ने उसे सिर्फ नए अर्थ दिए हैं। असम और पश्चिम बंगाल के हरे-भरे चाय बागानों ने सदियों से श्रमिकों के अधिकारों के मामले में गंभीर उल्लंघन किये हैं। भूख और भुखमरी का जीवन पश्चिम बंगाल के दुआर क्षेत्र में चल रहे 294 चाय बागानों में काम करने वाले तकरीबन 3,50,000 मजदूर जी रहे हैं। इन्हें अपने काम के हिसाब से बहुत कम मजदूरी मिलती है। ये लोग बहुत अधिक काम के बोझ तले कुपोषण से जूझते हुए अपनी दैनिक जिंदगी जीते हैं।  

इसके साथ ही बागान मजदूरों को प्रबंधन की और से मजबूर किया जाता रहा है कि वे सामाजिक भेद-भाव को बनाए रखें, जिससे कि चाय बागानों के भीतर ही श्रम शक्ति के प्रजनन को सुनिश्चित किया जा सके। यहाँ पर मजदूर नौकरी छोड़ने या पलायन करने के लिए स्वतंत्र नहीं है, जब तक कि प्रबन्धन को उसकी छंटनी की जरूरत न पड़े या बागान को ही बंद करने की नौबत न आ जाए। लेकिन श्रमिक परिवारों की घोर गरीबी को देखते हुए परिवार के अन्य सदस्यों का मजबूरन पलायन करना और बच्चों की मानव तस्करी, खासतौर पर लड़कियों की यहाँ पर आम बात है। स्वच्छ और पर्याप्त पीने के पानी की कमी चाय बागानों में हर तरफ बनी हुई है। इन बागानों में मौजूद अस्पतालों और स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति बेहद ख़राब है। यहाँ पर न तो पर्याप्त स्वास्थ्य कर्मी ही हैं और न ही दवाओं की ही उपलब्धता है। वायरल महामारी का प्रकोप इन स्थानों में मानवीय तबाही की वजह बन सकती है।

कोरोना वायरस के प्रकोप के तत्पश्चात पश्चिम बंगाल के चाय बागानों में लॉकडाउन का असर:

भारत में लॉकडाउन पूर्ण रूप से 23 मार्च के दिन से शुरू हुई जब इसके एक दिन पहले प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने इसकी घोषणा की थी। हालांकि इसके बावजूद पश्चिम बंगाल और असम के कई चाय बागान तत्काल प्रभाव से बंद नहीं किये गए, और लॉकडाउन के आदेशों की धज्जियां उड़ाते हुए 25 मार्च तक खुले रहे। लेकिन जब कोरोना वायरस के फैलने की आशंका लगातार बढने लगी, तब जाकर कहीं चाय बागान बंद किये गए। इस सम्बन्ध में 19 ट्रेड यूनियनों और संगठनों के एक संयुक्त प्रतिनिधिमंडल ने राज्य के मुख्य सचिव से चाय बागानों में पूर्ण लॉकडाउन और इस लॉकडाउन के दौरान श्रमिकों को मजदूरी के भुगतान को सुनिश्चित करने की मांग की थी। इस बीच 30 मार्च को कालिम्पोंग मेडिकल कॉलेज में 44 वर्षीय एक महिला की कोरोना वायरस से हुई पहली मौत ने पूर्ण तालाबंदी और श्रमिकों को एकमुश्त मजदूरी के भुगतान की मांग को ही मजबूती प्रदान की।

लेकिन जहाँ तक श्रमिक अधिकारों की बात आती है तो ऐसे में बागान मालिकों के भयानक इतिहास को भी ध्यान में रखने की आवश्यकता है। और सबसे बड़ी बात तो ये थी कि ये सीजन ही पहली कोमल चाय की पत्तियों की छंटाई और चुनने का वक्त था और इस सीजन में ही सबसे कीमती पत्तियों की पैदावार निकलती है, विशेषकर दार्जिलिंग चाय वाली वैरायटी। उन्होंने आपस में मिलकर बड़ी फुर्ती से जोड़ घटाव कर हिसाब बनाया और उद्योग को इस बंदी से होने वाले नुकसान का अंदाजा लगा डाला।

29 मार्च तक बागान मालिकों की और से सरकार के समक्ष 1,455 करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग रख दी गई थी।अब सरकार के अंदर उनका कितना प्रभाव है इसका अंदाजा तो इसी बात से लगाया जा सकता है कि चाय उद्योग ने खुद के लिए लॉकडाउन से अपवाद की गुंजाईश हथिया ली है। केंद्र सरकार की और से 3 अप्रैल के दिन एक निर्देश जारी कर दिया गया कि चाय बागानों में 50% श्रमशक्ति को काम पर लगाया जा सकता है, बशर्ते स्वच्छता सम्बंधी समुचित उपाय अपनाए जाएँ और सामाजिक दूरी का ध्यान रखा जाए। चाय बागानों को दी गई यह छूट लॉकडाउन के नियम विरुद्ध थी और इसके साथ ही बहु प्रचारित ‘स्टे होम, स्टे सेफ’ भावना के भी विपरीत थी। साफ़-साफ़ देखा जा सकता है कि सरकार के लिए चाय बागानों के श्रमिकों के जीवन से कहीं अधिक उन्हें चाय की पैदावार मूल्यवान लग रही थी, जो कि वैसे भी कई दशकों से उनके लिए कोई मायने नहीं रखती।

इसके साथ ही पश्चिम बंगाल सरकार ने 9 अप्रैल को घोषणा कर दी थी कि पहली कोमल पत्तियों की छंटाई और चुनने के लिए 15% श्रमशक्ति को उपयोग में लाया जा सकता है, और 11 अप्रैल को एक बार फिर से अपने नए नोटिस में बागानों में सभी काम-काज के लिए 25% श्रमशक्ति को इस्तेमाल में लाने की अनुमति, आवश्यक सावधानी बरतते हुए लाने की मंजूरी दे डाली। ये फैसला हुआ कि श्रमिकों को रोटेशन के तहत रोजगार दिया जाए। नतीजे के तौर पर देखने को मिला है कि ज्यादातर बागानों में जो स्थायी श्रमिक थे, अधिकतर उन्हें ही इसमें काम मिल सका था।

ऐसे में जिन मजदूरों को काम पर रखा भी जा रहा है, सामाजिक दूरी को बनाये रख पाना उनके लिए एक टेढ़ी खीर साबित हो रही है। रोज सुबह ये सभी श्रमिक चाय बागान के गेटों पर एक हुजूम के रूप में जमा हो जाते हैं या दोपहर के भोजन के समय इनका मजमा लग जाता है। रूपम देब एक सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं जो चाय बागानों में कार्यरत मजदूरों के अधिकारों के लिए कार्यरत हैं। उनका कहना है कि "कुछ बागानों ने अपने श्रमिकों को हाथ धोने के लिए मात्र साबुन ही दिया है, जबकि कुछ बागान तो ऐसे हैं, जिन्होंने इसके लिए भी परेशान होने की जरूरत नहीं समझी है।" बागान प्रबंधन को इस बात की कोई फ़िक्र नहीं कि मजदूरों की जान जोखिम में डाली जा रही है, उसे तो सिर्फ अपने काम से मतलब है।

फिर धीरे-धीरे चाय बागानों ने श्रमिकों के अनुपात को एक-चौथाई की तय सीमा से आगे बढ़ा डाला। एक बार फिर मजदूर इस स्थिति में नहीं थे कि वे इसका विरोध कर सकें। सोनाली टी एस्टेट में कार्यरत एक श्रमिक बिट्टू जिनकी उम्र 39 है और वे नहीं चाहते कि उनका असली नाम सार्वजनिक तौर पर सामने आये, का कहना है कि चाय बागानों का काम आम दिनों की ही तरह बदस्तूर जारी है। वे कहते हैं कि "शुरू-शुरू में तो कुल 358 स्थायी श्रमिकों में से 70-80 लोगों को ही काम पर रखा गया था, लेकिन धीरे-धीरे यह संख्या बढ़ती चली गई" .  लेकिन काम जहाँ एक बार फिर से शुरू हो चुका है, लॉकडाउन के चलते मजदूरों को उनका पारिश्रमिक नहीं दिया जा रहा है।

बिट्टू का कहना है कि प्रबंधन ने अभी तक मजदूरों की पिछली तीन किस्तों का भुगतान नहीं किया है। यदि मजदूरों के सामने भूख से मौत और कोरोना वायरस की चपेट में आने के बीच में चुनाव करना हो तो वे बाद वाले को ही चुनेंगे। आख़िरकार वायरस से संक्रमण तो एक किस्मत की बात हो सकती है, लेकिन भूख से मौत तो निश्चित और सामने खड़ी नजर आती है।

लेकिन जो चाय बागान बंद पड़े थे, उनके मजदूरों के लिए तो मुसीबतों का पहाड़ सा टूट पड़ा है। 42 वर्षीय सुषमा बंदापानी चाय बागान में काम करती थीं, जो पिछले आठ सालों से बंद है। लेकिन बंद होने के बाद भी इसके श्रमिक गैरकानूनी तौर पर कच्ची चाय की पत्तियों को इकट्ठा करना जारी रखे हुये थे, जिसे वे स्थानीय एजेंटों के माध्यम से खुले बाजार में बेच दिया करते थे। इस प्रथा से जबसे तालाबंदी हुई थी, उन्हें पहले कोमल पत्तियों के चुनने के सीजन के दौरान लगभग 130 रुपये प्रति दिन के मिल जाते थे। लेकिन लॉकडाउन के कारण इसका बाजार भी अब नहीं रहा, और इस प्रकार उनके सालभर की आय का मुख्य स्रोत भी एक तरह से सूख चुका है।

इसके अलावा बंद पड़े चायबागानो के पूर्व श्रमिकों को बतौर हर्जाने के रूप में राज्य सरकार की और से जो नाममात्र 1,500 रूपये प्रति माह की धनराशि  प्रदान की जाती थी, लॉकडाउन के बाद से वह भी ठप पड़ी है। सुषमा इस बात से बेहद डरी हुई है कि जबतक लॉकडाउन हटने का समय आएगा, उस समय तक उसके पास शायद कुछ भी नकद हाथ में न बचे। फिलहाल ये लोग सरकार द्वारा मुहैय्या कराये जा रहे राशन पर ही पूरी तरह से निर्भर हैं।

दुआर क्षेत्र में जो राशन वितरण का काम किया जा रहा है वह पूरी तरह से हर परिवार के आधार किया जा रहा है। किसी परिवार में सदस्यों की क्या संख्या क्या है इसकी परवाह किये बिना हर पंजीकृत परिवार को 20 किलो चावल, 15 किलो आटा और 3 किलो चीनी का मासिक राशन वितरित किया जा रहा है। जिन परिवारों में सदस्य संख्या अधिक है, उनके लिए इस पर गुजारा चला पाना मुश्किल हो रहा है लेकिन अब तो यही राशन की मात्रा उन सबका एकमात्र आसरा है। बिट्टू और सुषमा इन दोनों ने ही सूचित किया है कि सरकार ने अब चीनी पर 13 रूपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से वसूलना शुरू कर दिया है और ऐसा लगता है कि जल्द ही वे लोग इस हालत में होंगे कि इसे चुका पाने की स्थिति नहीं रहेगी। जहाँ तक दूध, तेल, नमक और सब्जी जैसी अन्य आवश्यक वस्तुओं की खरीद का सवाल है तो इसकी व्यवस्था उन्हें खुद से करनी पड़ती है। उन्होंने पहले से ही इन सभी चीजों में कटौती कर रखी थी, और बेहद सादे और बेस्वाद भोजन पर किसी तरह खुद को जिन्दा रखे हुए हैं।

दुआर क्षेत्र में मजदूरों की भीड़भाड़ वाली बस्तियों में सामाजिक दूरी को कायम रख पाना काफी कठिन काम है। यदि गलती से भी महामारी इन बस्तियों में प्रवेश पा जाती है तो स्थिति बेहद भयावह होगी। यहाँ पर मौजूद चिकित्सा केंद्रों जिस बदहाल स्थिति में काम कर रहे हैं, वे इस महामारी को रोक पाने में पूरी तरह से नाकाम साबित होंगे और चाय बागानों में इसका भय करीब-करीब भुखमरी से होने वाली मौत के डर के साथ साफ़ नजर आ रहा है।

दुआर में रह रहे चाय बागान श्रमिकों के लिए आय का अन्य प्रमुख स्रोत परिवार के उन सदस्यों की आय से आता है जो काम के लिए बाहर चले गए हैं। लेकिन देशव्यापी लॉकडाउन की वजह से कहीं भी कोई आर्थिक गतिविधि नहीं चल रही है, इसलिए आय के वे स्रोत भी पूरी तरह से सूख चुके हैं। दुआर के प्रवासी श्रमिक बिना काम के देश के विभिन्न हिस्सों में फंसे हुए हैं। वहाँ पर वे खुद सरकारी या गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा वितरित की जा रही राहत सामग्री या भोजन पर निर्भर हैं।

29 वर्षीय राहुल ओरांव बेंगलुरु के एक रेस्तरां में हेल्पर का काम करते हैं। वे सोनाली चाय बागान से पलायन कर यहाँ आये हैं, जहाँ आज भी उनकी माँ काम करती है। बेंगलुरु में वह और उसके साथ चार अन्य लोग फंसे हुए हैं। स्थानीय पुलिस स्टेशन से उन्हें 7 और 18 अप्रैल को राशन मिला था जिसे वे बेहद सोच-समझकर इस्तेमाल में ला रहे हैं, अर्थात दिन में एक ही बार भोजन कर रहे हैं। ये लोग न तो अपने घरों के लिए पैसे भेज पा रहे हैं बल्कि खुद को जिन्दा रख पाने में भी उन्हें बेहद कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।

इसी तरह दुआर के भातखावा चाय बागान के 31 वर्षीय सुनील ओरांव की कहानी है जो जोधपुर, राजस्थान में लकड़ी की लाइन में काम के सिलसिले में यहाँ प्रवासी के तौर पर रह रहे हैं। वे अपने साथ अलीपुरदुआर के 12 अन्य लोगों के साथ बिना किसी रोजगार के फंसे हुए हैं। उनको यहाँ पर सरकार की और से कोई राशन भी नहीं मिला है। जोधपुर से फोन पर सुनील ने बताया है कि “हमने फोन पर मदद की गुहार लगाई तो एक स्थानीय धर्मार्थ संगठन ने हमें भोजन लाकर दिया। उन्होंने हमें आश्वस्त भी किया कि जब कभी हम उन्हें फोन करेंगे तो वे लोग हमारी मदद के लिए आ जायेंगे। करीब एक सप्ताह तक हमने उनसे भोजन मँगाकर खाया। लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे हम भीख माँग रहे हों। हम मजदूर लोग हैं और रोज सुबह सुबह उठकर भोजन के लिए गुहार लगाना हमारे सम्मान को ठेस पहुँचाने जैसा था। हम चाहते थे कि हमें एक बार में राशन मिल जाए और हम खुद पका कर खा लें, लेकिन हमें नहीं मिला। हमारे पास जितना पैसा बचा था अब हम उसी से बेहद कम राशन की खरीद कर भोजन बना रहे हैं, और एक बार जब हमारे पास कुछ भी खर्च करने के लिए नहीं रह जायेगा तो फिर से हम भीख माँगकर गुजारा करने की सोचेंगे।”

सुनील की पत्नी सपना ओरांव भातखवा चाय बगान में एक अस्थाई मजदूर के तौर पर कार्यरत है। चूँकि चाय बागान में सिर्फ स्थाई मजदूरों को ही अभी काम मिला है, इसलिए उसके पास कमाई का कोई जरिया नहीं है। “वह अपनी व्यवस्था अपने दम पर कर रही है। आजकल मुझे उससे बात करने में घबराहट होती है। हम दोनों एक दूसरे से मीलों दूर पड़े हैं, और दोनों ही भूखे-प्यासे जिन्दगी गुजार रहे हैं।”

दुआर के सारे चाय बागानों के मजदूरों के यही हालात हैं। भूखों मरने का डर एक प्रेत के समान है जो ताजिंदगी उन्हें सताता रहा है। उनकी इस असुरक्षा में संक्रमित होने के डर ने इसमें अपने दाँत जोड़ दिए हैं, जो अब लगातार उन्हें चबा डालने को आतुर है। जैसे-जैसे हर भोजन के निवाले के साथ उनकी रही सही जमा-पूंजी खत्म होती जा रही है, वैसे-वैसे गहराता वर्तमान संकट उनके जीवन को रह-रहकर सोखता जा रहा है।

(लेखिका अंबेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली, जामिया मिलिया इस्लामिया, लेडी श्री राम कॉलेज और आईपी कॉलेज फॉर वुमन, दिल्ली विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र की अध्यापिका के तौर पर कार्यरत रही हैं। आप आजकल सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज में वरिष्ठ शोधार्थी हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल लेख को नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके पढ़ा जा सकता है।

Covid-19: A Nightmarish Lockdown for Dooars Tea Workers

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