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क्या मोदी का हिंदुत्व-कॉरपोरेट गठजोड़ दरक रहा है?
मोदी की भूमिका एक ऐसे शख़्स की है, जिसने कॉरपोरेट पूंजी और आरएसएस के बीच रिश्ता बनवाया और कॉरपोरेट-हिंदुत्व गठजोड़ को पुख्ता किया। गंभीर संकट के दौर में बड़ा पूंजीपति वर्ग आम तौर पर फ़ासीवादी तत्वों के साथ गठजोड़ कर लेता है ताकि अपनी हैसियत को पुख़्ता कर सके।
प्रभात पटनायक
20 Sep 2021
Translated by राजेंद्र शर्मा
Narendra Modi

उदारपंथी टिप्पणीकार मोदी के उदय को, सिर्फ हिंदुत्व के उभार का ही नतीजा मानते हैं। लेकिन, वे कभी यह नहीं बताते हैं कि अचानक हिंदुत्व का ऐसा उभार कैसे आ गया? अगर हिंदुत्व के इस उभार को बाबरी मस्जिद के ध्वंस से जोड़ कर देखा जाए तो, इसकी व्याख्या करने की दरकार होगी कि हिंदुत्व को सत्ता में आने में, बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद दो दशक क्यों लग गए? इसी तरह, इसकी व्याख्या की भी जरूरत होगी कि भाजपा अचानक सबसे धनवान पार्टी और ऐसी पार्टी कैसे बन गयी, जिसे भारत की पत्र-पत्रिकाओं और इलैक्ट्रोनिक मीडिया के, प्रचंड बहुमत का समर्थन हासिल है। बहरहाल, अगर हम वर्गीय तत्व को व्याख्या में लाएं तो इस गुत्थी को एक हद तक सुलझाया जा सकता है।

हिंदुत्ववादी ताकतों के भारत के राजनीतिक परिदृश्य पर सबसे ताकतवर तत्व के रूप में अचानक उभरकर सामने आने में, बड़े पूंजीपति वर्ग के रुख में आए उस बदलाव ने एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है, जो 1990 के दशक के आरंभ में नहीं बल्कि इस सदी के पहले दशक के बाद ही देखने को मिला। और यह तब हुआ जब नवउदारवादी पूंजीवाद का आर्थिक संकट उस मुकाम पर पहुंच गया जहां उस पर, उसकी रोक-थाम के उपायों से काबू पाना असंभव हो गया। इसके बाद ही वह कॉरपोरेट हिंदुत्व गठजोड़ कायम हुआ, जिसने समूचे परिदृश्य में बुनियादी बदलाव कर दिया।

वास्तव में इस प्रक्रिया में मोदी की भूमिका एक केंद्रीयता हासिल कर लेती है। यह भूमिका ऐसे शख़्स की है, जिसने एक ओर कॉरपोरेट पूंजी और दूसरी ओर आरएसएस के बीच रिश्ता बनवाया और कॉरपोरेट-हिंदुत्व गठजोड़ को पुख्ता किया। गंभीर संकट के दौर में बड़ा पूंजीपति वर्ग आम तौर पर फासीवादी तत्वों के साथ गठजोड़ कर लेता है ताकि अपनी हैसियत को पुख्ता कर सके और अपने बोलबाले की हिफाजत कर सके, जिसके लिए आर्थिक संकट खतरा पैदा कर रहा होता है। भारत के बड़े पूंजीपति वर्ग ने ठीक यही रास्ता अपनाया और उसने मोदी को एक मध्यस्थ बनाकर, कॉरपोरेट हिंदुत्व गठजोड़ को कायम कराया।

1990 के दशक के आरंभ और 2014 के बीच, बड़े पूंजीपति वर्ग के रुख में हुए इस बदलाव को, दो आंखें खोलने वाली घटनाओं से समझा जा सकता है। 1990 के दशक के आरंभ में, टाटा ग्रुप के शीर्ष अधिकारी, धर्मनिरपेक्षता की हिमायत में, मुंबई में सडक़ों पर उतरे थे। लेकिन, वर्तमान सदी के आरंभ में उसी टाटा उद्योग साम्राज्य का मुखिया, गुजरात की इन्वेस्टर्स समिट में, प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी के नाम का अनुमोदन कर रहा था। यह अनुमोदन, गोधरा की घटना के बाद मुसलमानों का नरसंहार होने देने के लिए, उनके जिम्मेदार होने के बावजूद किया जा रहा था। यह दिलचस्प है कि टाटा साम्राज्य के उसी मुखिया ने आगे चलकर, नागपुर की यात्रा की थी और अनेक विषयों पर आरएसएस के सुप्रीमो से विचार-विमर्श किया था।

आम तौर पर मोदी के संबंध में यह माना जाता है कि वह अपने दरबारी पूंजीपतियों के ही हित साधते हैं। बेशक, यह सच है और ऐसी सभी स्थितियों में यही चीज देखने में आती है। बड़े पूंजीपति वर्ग और फासीवादी ताकतों के बीच गठजोड़ की एक विशेषता, बड़े पूंजीपति वर्ग के बीच, नये तत्वों का उदय भी है। 

1930 के दशक में जर्मनी और जापान, दोनों देशों में ठीक यही हुआ था। लेकिन, इन नये तत्वों के प्रमुखता पाकर सामने आने का अर्थ यह नहीं समझना चाहिए कि इस स्थिति में बड़े पूंजीपति वर्ग के बीच के पुराने तत्वों को किनारे कर दिया जाता है या उनको अनदेखा किया जा रहा होता है। बड़े पूंजीपति वर्ग के सक्रिय समर्थन व सहायता से बनी फासिस्टी तत्वों की सरकार, समग्रता में बड़े पूंजीपति वर्ग के हितों के लिए काम करती है, हालांकि उसके बीच के नये तत्वों पर वह अपनी विशेष कृपा बरसाती रहती है। मजदूरों को कुचलने वाले नये श्रम कानून, कृषि के दरवाजे कॉरपोरेट पूंजी द्वारा अतिक्रमण के लिए खोलने के लिए बनाए गए नये कृषि कानून, आदि इसी सच्चाई को दिखाते हैं।

लेकिन, मोदी के उदय की जमीन बनाने वाली यह पूरी व्यवस्था, अब उखड़ती नजर आती है। लेकिन, इसका अर्थ यह नहीं है कि मोदी सरकार, सत्ता से बाहर होने वाली है। इसका अर्थ यही है कि मोदी सरकार को सत्ता में बने रहने के लिए मनमाने, असंवैधानिक, विभाजनकारी और नफरत फैलाने वाले कदमों का सहारा लेना पड़ेगा। और इसलिए होगा क्योंकि जिस तरह की व्यवस्था पर यह उभार टिका हुआ था और जिससे इस उभार को एक हद तक स्थिरता जैसी मिल रही थी, वह अब बिखर रही है।

ऐसा होने के दो स्वत: स्पष्ट कारण हैं। बेशक, पहला कारण तो इस सरकार के तीन कुख्यात कृषि कानूनों के खिलाफ उभरा विराट किसान आंदोलन ही है। जैसा कि हम पहले देख आए हैं, ये कानून कॉरपोरेट-हिंदुत्व गठजोड़ के कार्यक्रम के अनुरूप हैं और इसलिए, उनके पेश किए जाने में कोई अचरज की बात नहीं है। बहरहाल, इन कानूनों के खिलाफ जिस पैमाने पर विरोध सामने आया है, उसने जरूर इस सरकार को हैरत में डाल दिया है। भाजपा के तरकश में कपट-कुचालों के जितने भी तीर हैं, उन सब को आजमाने के बावजूद वह किसानों के प्रतिरोध को तोड़ने में बुरी तरह से विफल रही है।

यह कॉरपोरेट-हिंदुत्व गठजोड़ के लिए एक जबर्दस्त झटका है। दूसरा कारण है, कुछ कार्पोरेट घरानों के प्रति कुछ हिंदुत्ववादी तत्वों द्वारा प्रदर्शित की जाती खुली शत्रुता, जो कि इस गठजोड़ टिकाऊपन की उम्मीदों की खास गुंजाइश नहीं छोड़ती है।

पहले पीयूष गोयल ने, जो मोदी सरकार के काफी वरिष्ठ मंत्री हैं और जिन्होंने कुछ अर्से तक वित्त मंत्रालय का कार्यभार भी संभाला था, टाटा घराने पर करीब-करीब खुला हमला किया था। और उसके बाद अब आरएसएस के मुखपत्र, पांचजन्य ने इन्फोसिस पर जहर भरा हमला बोल दिया, क्योंकि उसके द्वारा स्थापित किए गए आयकर के पोर्टल में, कुछ दिक्कतें आ रही थीं। इन्फोसिस से वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 15 सितंबर तक इन दिक्कतों को दूर करने के लिए कहा था। लेकिन, इस समय सीमा के पूरा होने से पहले ही, आरएसएस के मुखपत्र ने यह हमला बोल दिया। पांचजन्य ने इन्फोसिस को बाकायदा ‘‘एंटीनेशनल’’ करार दे दिया और साफ-साफ शब्दों में उसे वामपंथियों तथा टुकड़े-टुकड़े गेंग के साथ खड़ा कर दिया! माना कि आरएसएस के महारथियों के पास बहुत सीमित सी शब्दावली होती है। फिर भी एक ऐसी कंपनी के लिए, जिसने विश्व प्रतिष्ठा अर्जित कर ली है, इस तरह की भाषा का उपयोग बेशक अति है। बेशक, बाद में आरएसएस के एक प्रवक्ता ने अपने संगठन को इस हमले से अलग करने की कोशिश भी की थी, लेकिन यह कोशिश कोई भरोसा नहीं जगा सकी। इसके अलावा आगे चलकर आरएसएस के दूसरे भी कई महारथी, इस हमले के साथ खड़े हो गए।

इसलिए, कॉरपोरेट हिंदुत्व गठजोड़ में एक दरार दिखाई देने लगी है और आने वाले महीनों में यह दरार और चौड़ी हो जाने वाली है। इसकी वजह यह है कि हिंदुत्ववादी तत्व, जो अर्थशास्त्र से बिल्कुल ही अनजान हैं, उनके कॉर्पोरेटी दोस्त तथा ब्रेटन वुड्स संस्थाओं की कही हरेक बात को ज्यादा ही गंभीरता से ले लेते हैं। और अब उन्हें यह समझ में आ रहा है कि उन्हें जो भी बताया गया था, वह तो काम ही नहीं कर रहा है। लेकिन, उसके काम न करने के लिए वे, अपने कान में फूंके गए सिद्धांतों के ही खोखलेपन को जिम्मेदार न मानकर, कुछ कार्पोरेट घरानों के कुटिल इरादों को ही दोषी ठहराते हैं।

मिसाल के तौर पर उन्हें बताया गया है कि सरकार भले ही राजकोषीय अनुदारतावाद के रास्ते पर चलती रहे, अर्थव्यवस्था में नयी जान आ जाएगी, बशर्ते कॉरपोरेट पूंजी को रियायतें दी जाएं। अगर कर रियायतों के जरिए और किसान विरोधी तथा मजदूर विरोधी कानूनों के जरिए, पूंजीपतियों की ‘पशु भावनाओं’ या सहज भावनाओं को सहलाया जाता है, तो निवेश की बहार आना तय है। लेकिन, उन्हें यह बताया ही नहीं गया है कि पूंजी को सरकार की ओर से चाहे कितनी ही रियायतें क्यों न दे दी जाएं, अगर सकल मांग बढ़ नहीं रही है तो पूंजी, कोई नये निवेश करने वाली ही नहीं है। और अगर कोई नये निवेश नहीं किए जाएंगे, तो अर्थव्यवस्था में नयी जान कैसे पड़ेगी? और अगर सरकार अपने खर्चों का विस्तार नहीं करती है, उसके लिए संसाधन चाहे राजकोषीय घाटे के जरिए जुटाए जाएं या फिर पूंजीपतियों पर कर लगाकर, सकल मांग में कोई विस्तार होने वाला नहीं है।

इसका नतीजा यह है कि मोदी सरकार, आर्थिक मामलों का जितना ज्ञान उसके पास है उसके हिसाब से तो बेहतरीन कोशिशें कर रही है, फिर भी अर्थव्यवस्था तो पस्त ही पड़ी हुई है। और हिंदुत्ववादी तत्व इसके लिए (अपने मुट्ठीभर चहेतों को छोडक़र) भारतीय कॉरपोरेट क्षेत्र की कुटिलता को जिम्मेदार ठहराते हैं। वह दूसरी हरेक जगह (जहां मांग बढ़ रही हो) तो निवेश कर रहा है, बस भारत में ही नहीं कर रहा है। यानी वह एंटी-नेशनल है! जो पूंजी का सामान्य आचरण है, जो उसकी सामान्य कार्य पद्धति है, उसे उसकी कुटिलता बना दिया जाता है।

हिंदुत्व और कॉरपोरेट पूंजी के बीच की यह दरार आगे-आगे और चौड़ी ही होती जाने वाली है। पूंजी किसी के कहासुनी करने से निवेश नहीं किया करती है। उल्टे ऐसा होने पर तो वह और भी ज्यादा जोरों से इसकी तलाश में लग जाएगी कि क्या दुनिया में और कहीं निवेश के और मुनाफादेह मौके हैं। और यह जितना ज्यादा होगा, उतना ही ज्यादा आरएसएस और भाजपा की ओर से, राष्ट्र विरोधी होने के लिए कॉरपोरेट पूंजी पर हमला किया जाएगा। संक्षेप में यह कि आगे-आगे कथित टुकड़े-टुकड़े गैंग की सूची में नये से नये नाम जुडऩे जा रहे हैं।

इस समूची परिघटना में खासतौर पर ध्यान खींचने वाली बात यह है कि मोदी ने, परोक्ष रूप से भी इन हमलों के खिलाफ एक शब्द तक नहीं कहा है, न तो पीयूष गोयल के मामले में और न ही पांचजन्य के लेख के मामले में। इसकी तुलना जरा जर्मनी से कर के देखिए जहां बड़ी पूंजी और फासीवादी तत्वों के बीच गठजोड़ को पुख्ता करने के लिए, फासिस्टों ने अपने ही समर्थकों के बीच खूनी सफाई को अंजाम दिया था। इस कार्रवाई को ‘‘नाइट ऑफ लांग नाइव्स’’ के नाम से जाना जाता है।

दूसरी तरह से कहें तो फासीवादी तत्वों और कॉरपोरेट पूंजी के बीच सफल गठजोड़ के लिए, दो शर्तें पूरी होना जरूरी है। पहली यह कि  इस तरह के गठजोड़ के जरिए जो निजाम कायम होता है, उसे ऐसे गठजोड़ की परिस्थितियां बनाने वाले संकट पर पार पाने में समर्थ होना चाहिए। दूसरी शर्त यह कि जमीनी स्तर पर, फासीवादी तत्वों के हिस्सों और कॉरपोरेट पूंजी के बीच कोई टकराहट नहीं होनी चाहिए, जैसे पूंजीवाद विरोधी लफ्फाजी का खुमार, आदि। लेकिन, भारत में भाजपा तथा आरएसएस कभी भी बड़ी पूंजी के खिलाफ रहे ही नहीं हैं और इसलिए पुराने विचारधारात्मक विरोध के किसी खुमार के गठजोड़ की सफलता में बाधक बनने का कोई सवाल ही नहीं उठता है।

फिर भी, यहां पहली शर्त पूरी नहीं हो रही है। एक ओर वैश्वीकृत पूंजी है और दूसरी ओर राज्य है, जो कि अब भी राष्ट्र-राज्य ही है। इन दोनों के बीच का अंतर्विरोध, राज्य द्वारा खर्चा किए जाने के जरिए, अर्थव्यवस्था में नयी जान फूंका जाना मुश्किल बना देता है। इसके चलते, इस गठजोड़ के सफल होने की पहली शर्त पूरी नहीं हो सकती है।

लेकिन, तब मुद्रीकरण के जरिए जुटाए जाने वाले वित्त से, शासन द्वारा किए जाने वाले प्रस्तावित खर्चें का क्या? क्या उससे अर्थव्यवस्था में जान नहीं पड़ेगी और उससे क्या कॉरपोरेट हिंदुत्व गठजोड़ में पड़ी दरार फिर से भरी नहीं जा सकती है? लेकिन, यह न सिर्फ आंखों में खटकने वाला कदम है बल्कि यह पूरी योजना भी चार साल की अवधि में, कुल 6 लाख करोड़ रुपए के निवेश की है। अगर इसे यथार्थ में उतार भी दिया जाता तब भी, यह जीडीपी में सालाना 1 फीसद से कम निवेश का ही मामला होगा। इतने से खर्चे से अर्थव्यवस्था में कोई फर्क पडऩे वाला नहीं है।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें—

Cracks Showing in Arrangement that led to Modi’s Rise

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