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भारत
राजनीति
न्याय की गुहार
सरकार की तरफ़ से बातचीत/संचार की कोई व्यवस्था न होने और सूचना की कमी के कारण, कई राजनीतिक क़ैदियों के स्वास्थ्य की स्थिति एक रहस्य बन कर रह गई है।
मेघा कथेरिया
15 Jul 2020
Translated by महेश कुमार
राजनीतिक क़ैदियों के स्वास्थ्य की स्थिति

वरिष्ठ एक्टिविस्ट्स और वकीलों से लेकर युवा एक्टिविस्ट् सफ़ूरा ज़रगर जैसे कार्यकर्ताओं की  ज़मानत की सुनवाई में और यहां तक कि महामारी के दौरान राजनीतिक कैदियों के स्वास्थ्य की रक्षा करने के लिए प्रशासन कछुए की चाल चल रहा है। हमारी जेलों की स्थिति और उनमें भीड़ कम करने की जरूरत से हम सब वाकिफ़ है। लेखिका, इस लेख के माध्यम से महामारी के दौरान राजनीतिक क़ैदियों को बंद रखने के  लोकतांत्रिक और संवैधानिक निहितार्थों की जांच कर रही हैं।

बीती रात, 81 वर्षीय बीमार कवि और एक्टिविस्ट वरवरा राव के बिगड़ते स्वास्थ्य के प्रति जेल अधिकारियों के उदासीन रवैये की सार्वजनिक आलोचना के बाद उन्हे सर जे जे अस्पताल में भर्ती कर दिया गया है। उनके परिवार ने बॉम्बे हाईकोर्ट में एक रिट याचिका दायर कर मेडिकल आधार पर तत्काल जमानत की मांग की है। परिवार ने 12 जुलाई को जारी एक प्रेस बयान में अपील की थी कि, "वरवरा राव को जेल में मत मारो"।

कवि को आखिरी बार 28 मई को तलोजा जेल से बेहोशी की हालत में सर जे जे अस्पताल ले जाया गया था। परिवार को इस घटना के बारे में अगले दिन पता चला जब स्थानीय पुलिस ने उनकी स्वास्थ्य पर कोई जानकारी दिए बिना उनके अस्पताल में भर्ती होने की खबर दी। उन्हें यह भी पता चला कि 26 मई को, वे खुद को सँभाल नहीं पाए और जेल के बाथरूम में गिर गए थे। उन्हे यूरिनरी ट्रेक इन्फेक्शन हो गया था जिससे उनके शरीर में सूजन आ गई थी।  उनके प्रति सहानुभूति रखने वाले कैदियों ने यह जानकारी परिवार को दी और यह भी बताया कि उन्होंने भोजन का सेवन बंद कर दिया है और उनके बिगड़ते स्वास्थ्य के कारण उन्हें तरल आहार दिया जा रहा है।

2 जून को उनकी जमानत की अर्जी राष्ट्रीय जांच एजेंसी की खास अदालत में सुनवाई के लिए आई थी। जे जे अस्पताल ने अदालत को सूचित किया कि उनका इलाज कर दिया गया है और अब उनकी हालत बेहतर है। बाद में, इस बाबत कोई और जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई। उन्हें छुट्टी दे दी गई और तलोजा जेल वापस भेज दिया गया।

लॉकडाउन के बाद से, परिवार कवि के साथ बातचीत करने में असमर्थ रहा है। अदालत के निर्देशों का पालन करते हुए, वे एक पखवाड़े में एक या दो बार अपने परिवार को ठीक दो मिनट के लिए कॉल कर सकते है। राव के एक ऐसे ही संक्षिप्त फोन के दौरान एक दिन परिवार काफी चिंतित हो गया था, क्योंकि बात करते वक़्त राव बेसुध लगे और उन्हे स्पष्ट रूप से बात करने में तकलीफ हो रही थी।

बातचीत की कोई व्यवस्था न होने और प्रशासन द्वारा प्रदान की गई जानकारी की कमी के कारण, कई राजनीतिक कैदियों की स्वास्थ्य की स्थिति एक रहस्य बन कर रह गई है।

एल्गर परिषद मामले के सह-अभियुक्तों में राव सबसे पुराने है। 70 वर्षीय आनंद तेलतुम्बडे जो उनके सह-अभियुक्त है को सांस लेने संबंधी समस्याएं हैं, जबकि 67 वर्षीय गौतम नवलखा उच्च रक्तचाप से पीड़ित हैं, 61 वर्षीय शोमा सेन गठिया रोगी हैं और 58 वर्षीय सुधा भारद्वाज उच्च रक्तचाप और मधुमेह से पीड़ित हैं।

सुधा भारद्वाज ने अदालत को दिए अपने आवेदन में तर्क दिया कि बायकुला जेल की भीड़भाड़ वाली बैरक में सामाजिक दूरी रखना असंभव है। आनंद तेलतुंबडे की जमानत को कोर्ट द्वारा रद्द करने के बाद कोर्ट ने उन्हे कोविड़ हॉटस्पॉट आर्थर रोड जेल भेज दिया था। कथित तौर पर, असम के जन नेता अखिल गोगोई जेल में कोविड़ पॉज़िटिव पाए गए हैं, लेकिन अभी तक उन्हे भी अस्पताल नहीं भेजा गया है। फिर, सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि जेल परिसर के भीतर उनके स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है। कई अन्य लोग भी होंगे जो इस दर्द से गुजर रहे होंगे क्योंकि वे जाने-माने लोग नहीं हैं।

महाराष्ट्र की जेलों में कोविड़ के मामले बढ़ रहे हैं। 596 कैदी और 167 जेल कर्मचारी कोविड़ पॉज़िटिव पाए गए है। महामारी के दौरान जेलों में भीड़ को कम करने के सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद गठित हाई पावर कमेटी ने विशेष कानून के तहत आरोपित कैदियों को रिहाई की पात्रता से बाहर कर दिया है। दिशानिर्देश यह भी कहते हैं कि 65 वर्ष से अधिक उम्र के कैदियों को कम आयु वर्ग के कैदियों से अलग रखना है। हालाँकि, 65 वर्ष से अधिक उम्र के कैदियों में आपसी सामाजिक दूरी को संबोधित किया जाना बाकी है।

इसके अलावा, सह-रुग्णता वाले रोगियों की नियमित रूप से निगरानी की जानी चाहिए। लेकिन इसे लागू किया जा रहा है या नहीं इसकी भी कोई खास जानकारी उपलब्ध नहीं है, और इसे प्रभावी ढंग से करने के लिए योग्यता और अवसंरचनात्मक क्षमता में विश्वास भी कम है।

कारवां से बात करते हुए, जेल अधीक्षक ने कहा कि राव की स्थिति सामान्य थी, प्रेस सम्मेलन के माध्यम से परिवार द्वारा दी जाने वाली जानकारी गलत है। यकीनन, इसे आसानी से हल किया जा सकता था यदि परिवार और उसके वकीलों को सही जानकारी ’दी जाती। जेल प्रशासन अदालत में जमानत की सुनवाई के दौरान स्वास्थ्य पर बार-बार अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने में विफल रहा। जब आखिर में रिपोर्ट प्रस्तुत की गई तो उसे उनके वकीलों को नहीं दिया गया। अदालत ने राव के वकीलों की याचिका को सुने बिना जमानत अर्जी खारिज कर दी।

महामारी के कारण कैदियों के स्वास्थ्य के संबंध में जेल अधिकारियों के आचरण की जांच लगभग न के बराबर है।

वरवरा राव की रिट याचिका में जेल अस्पताल की अपमानजनक स्थिति पर ज़ोर दिया गया है, जिसकी दया पर हजारों अन्य कैदी निर्भर रहते हैं। उनके वकीलों ने बताया कि जेल के अस्पताल में लगभग 3000 कैदियों के लिए केवल दस बेड हैं, और उपलब्ध अवसंरचनात्मक सुविधाएं के नाम पर एक क्लिनिक है जो क्लिनिक की शर्तों को पूरा नहीं करता हैं। जेल अधिकारियों की  ‘सतर्कता’ इस बात से पता चलती है कि एक कैदी की मौत के बाद पता चला कि वह कोविड़ पॉज़िटिव था।

वकीलों ने रिट पेटीशन/याचिका में जे जे अस्पताल की मेडिकल रिपोर्ट और जेल अस्पताल की रिपोर्ट के बीच प्रमुख गलतियों या अंतर को रेखांकित किया है, एक ही रोगी की दोनों रिपोर्ट केवल आठ दिनों के अंतराल में आई हैं। याचिका में आगे कहा गया है कि राव को यरवदा जेल में कैद किया गया था, ट्रायल जज की देखरेख में उन्हें नियमित रूप से चिकित्सा हासिल हुई। हालांकि, चिकित्सा की ऐसी सुविधा तलोजा जेल में उपलब्ध नहीं है और महामारी के कारण, उनके उपचार की देखरेख का कोई सहारा या तरीका नहीं है।

बॉम्बे हाईकोर्ट में सुधा भारद्वाज की जमानत याचिका का विरोध करते हुए एनआईए ने तर्क दिया है कि वे महामारी का अनुचित लाभ उठाने की कोशिश कर रही है। किसी भी को यह आश्चर्य होगा कि एक भीड़ भरे जेल में एक महामारी में किसी के स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने को “फायदे” का नाम कैसे दिया जा सकता है।

आरोपियों में किसी के भी देश छोडकर भागने का जोखिम नहीं है, जो गैर-महामारी की परिस्थितियों में भी जमानत देने केमामले में प्राथमिक विचार होता है। इसलिए, राजनैतिक सत्ता, एनएसए और यूएपीए जैसे कठोर कानूनों का सहारा लेते है ताकि महामारी और लॉकडाउन के दौरान एक्टिविस्ट्स को उनके मानवीय और मौलिक अधिकारों से वंचित रखा जा सके। आरोपित कैदियों को न तो अदालत में पेश किया जा रहा है और न ही वीडियो के माध्यम से अदालत की सुनवाई की अनुमति दी जा रही है। ऐसा ज्यादातर इसलिए है क्योंकि विशेष क़ानून होने के बावजूद, इन कानूनों के तहत किए गए उपाय तब भी अलग नहीं होते जब उनके जीवन के संवैधानिक अधिकार की बात आती है।

(लेखिका सामाजिक-क़ानूनी विषयों की शोधकर्ता हैं। व्यक्त किए गए विचार व्यक्तिगत हैं।)

Courtesy: The Leaflet
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Sudha Bharadwaj
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Vara Vara Rao
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