NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
वर्तमान किसान आंदोलन: एक नयी राजनीति की अंगड़ाई
किसान आंदोलन का योगदान इससे तय नहीं होगा की उन्होंने क्या हासिल किया, अपितु उन्होंने लोकतंत्र में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए जो बहादुरी दिखाई उससे होगा।
सुधीर कुमार सुथार
11 Dec 2020
किसान आंदोलन

एक बार फिर से किसान आंदोलन सुर्ख़ियों में है। पिछले पांच वर्षों में ये पांचवां ऐसा दौर है जब किसान अपने मुद्दों पर सरकार का ध्यान आकर्षित करने के लिए सड़कों पर हैं, वो वहीं खा रहे हैं, वहीं पका रहे हैं, वहीं कड़कड़ाती सर्दी में बैठे अपने नारों से नीति निर्माताओं का ध्यान आकर्षित करने के लिए गुहार कर रहे हैं। किसान आंदोलन का ये स्वरूप देश में 1980 दशक में भी इसी प्रकार उभरा था। उस समय भी दिल्ली में केवल किसान आंदोलन के चर्चे थे। आज   पुनः वही राजनीतिक माहौल देखने को मिल रहा है।

पर इस बार के किसान आंदोलन अलग हैं। ये आंदोलन देश की राजनीति में आये गुणात्मक परिवर्तन का भी संकेत हैं। सबसे बड़ा अंतर तो ये है की ये आंदोलन अपने आपको केवल आंदोलन की तरह देखना चाहते हैं, किसी राजनीतिक दल से वो अपने संघर्ष को सम्बंधित दिखाना नहीं चाहते। हर बार किसान संगठन ये स्पष्टीकरण देते हुए दिखाई देते हैं की वे केवल किसान हितों को बचाने के लिए संघर्षरत हैं और उनका कोई चुनावों से सम्बंधित “राजनीतिक एजेंडा”  नहीं है। इसे किसान आंदोलनों का दलीय राजनीति से अलग दिखने का प्रयास भी कहा  जा सकता है। साथ ही इसका उद्देश्य किसान आंदोलनों को एक अलग प्रकार के दबाव समूह के रूप में अपने आप को स्थापित करना भी हो सकता है। ये न तो केवल वामपंथी राजनीति का एक स्वरूप है और न ही क्षेत्रीय किसान संगठनों की दबाव की राजनीति की अभिव्यक्ति। ये प्रदर्शन किसान आंदोलन का हिस्सा हैं क्योंकि वे किसानों द्वारा संचालित है। शहरी पढ़े लिखे वर्ग द्वारा नियंत्रित और निर्देशित वामपंथी किसान आंदोलनों से ये आंदोलन इन्हीं मायनों में अलग हैं।

ये तथ्य तब और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब हम इन किसान आंदोलनों को अलग अलग किसान  संगठनों के सामूहिक प्रयास के रूप में देखते हैं। 1980 के किसान आंदोलन जहाँ किसी क्षेत्र विशेष में किसी एक संगठन या फिर एक व्यक्ति विशेष द्वारा संचालित थे, आज के किसान आंदोलन एक संचालक समिति द्वारा निर्देशित और नियंत्रित हैं। इस समिति में अलग अलग किसान संगठनों का प्रतिनिधित्व है। प्रदर्शन और उसके नियंत्रण में समिति को अन्य वर्गों यथा विद्यार्थियों और अन्य गैर सरकारी संगठनों और अन्य आंदोलनों से जुड़े व्यक्तियों का भी समर्थन हासिल है। अन्य शब्दों में, इस दौर में किसान आंदोलनों में अधिक लोकतान्त्रिक समन्वयन और कार्य पद्धति देखने को मिलती है। इतने सारे अलग अलग संगठनों और घटकों के बीच समन्वय निश्चित तौर पर चुनौतीपूर्ण है परन्तु किसान संगठन लगातार इस कार्य प्रणाली से सीखकर अपने आंदोलनों और प्रदर्शनों को अधिक बेहतर ढंग से नियमित करते आये हैं।

एक और बात जो वर्तमान किसान आंदोलनों को अन्य किसान आंदोलनों और अन्य सामाजिक आंदोलनों से अलग करता है वो है इस आंदोलन द्वारा ग्रामीण समाज और अर्थव्यवस्था के दूसरों वर्गों से समर्थन हासिल करने का प्रयास। पिछले कुछ समय से किसान आंदोलन लगातार इस बात के लिए प्रयासरत हैं कि वे केवल खेती से सम्बंधित मुद्दों और जुड़े लोगों को साथ लेने के समानांतर  एक वृहत्तर आर्थिक गठबंधन के रूप में अपने आपको स्थापित करें। इसमें न केवल छोटे मध्यम किसान सम्मिलित हैं बल्कि आढ़तिया, साहूकार, मजदूर वर्ग और साथ ही किसान जीवन से जुड़े, ग्रामीण व्यवस्था से जुड़े छोटे कारोबारी, नौकरीपेशा वर्ग इत्यादि भी शामिल हैं। इन अन्य वर्गों की किसान आंदोलन के प्रति संवेदनशीलता जहाँ प्रदर्शनों में सम्मिलित अलग अलग वर्गों के लोग है वहीं वे चाहे किसान आंदलनों के नारे हों, उनके नेताओं के भाषण हों, जारी प्रेस विज्ञप्तियां हों या फिर उनके कार्य प्रणाली,  इनमें किसान आंदोलन की भी समाज के अन्य वर्गों के प्रति संवेदनशीलता दिखाई देती है।

इसके अतिरिक्त किसान आंदोलन लगातार अपने आपको देश के अलग अलग क्षेत्रों के किसानों की मांगों को उठाते आये हैं। तीन वर्ष पहले वो मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के किसानों से सम्बंधित था, फिर महाराष्ट्र के जनजातीय समाज की भूमि सम्बन्धी मांगों में, राजस्थान में कर्ज और किसानी की समस्या के बारे में, फिर पश्चिमी उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाणा के किसानों की दिल्ली में रैली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों का दिल्लीं में प्रवेश का प्रयास, और अब पुनः पंजाब और देश के अन्य  किसानों का आंदोलन, इन आंदोलनों में भारतीय   राजनीतिक व्यवस्था का संघवादी ढांचा स्पष्ट दिखाई पड़ता है।

आंदोलन की ये राजनीति किसी संगठित राजनीतिक गतिविधि का परिणाम नहीं है। ये विरोध प्रदर्शन अचानक से किन्हीं मुद्दों पर हो जाने वाली राजनीतिक लामबंदी को दर्शाते हैं। अन्य शब्दों में, ये प्रदर्शन वास्तव में किसी विचारधारा और संगठनात्मक गतिविधियों को लेकर खड़े हुए जन आंदोलन जैसे नहीं हैं। ये भारतीय राजनीति में तत्क्षण राजनीति के अभ्युदय का परिचायक हैं जिसमें ये पहले से बता पाना अत्यंत कठिन होता है की कब किस मुद्दे पर कहाँ जन-आक्रोश भड़क उठेगा और उसका चरित्र क्या होगा।

अक्सर इस बात को लेकर सवाल उठाये जाते है कि ये आंदोलन किस हद तक अपनी मांगों को मनवाने में समर्थ होंगे। या फिर क्या किसान प्रदर्शनों का स्वरूप क्षण भंगुर है? वास्तव में इन विरोध प्रदर्शनों को भारतीय राजनीति के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने आवश्यकता है। आज जब शहरी राजनीति का स्वरूप मध्यमवर्गीय आर्थिक व्यक्तिगत लाभ के मुद्दों तक सीमित हो चुका है जिसे प्रोपेगंडा आधारित एजेंडा निर्धारित करता है, जब धर्मनिरपेक्ष राज्य व्यवस्था की अवधारणा केवल किताबी शब्दावली की तरह प्रतीत होती है, और राज्य के तंत्र और उसकी एजेंसियों का मकड़जाल हर प्रकार के राजनीतिक सक्रिय प्रतिभागिता को कमजोर कर रहा है, किसानों द्वारा किये जाने वाले प्रदर्शन राजनीति में लोकतंत्र की एकमात्र उम्मीद की किरण प्रतीत होते हैं।

किसानों के मुद्दे पर बहस जारी रह सकती है, और उस पर सवाल भी उठाये जा सकते हैं, परन्तु देश के राजमार्गों पर खड़े ये किसान वास्तव में भारतीय लोकतंत्र और मानवता के पहरेदारों से कम नहीं हैं। उनका योगदान इससे तय नहीं होगा की उन्होंने क्या हासिल किया, अपितु उन्होंने लोकतंत्र में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए जो बहादुरी दिखाई उससे होगा।

(लेखक सेंटर फॉर पोलिटिकल स्टडीज़, जेएनयू में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

farmers protest
Farm bills 2020
democracy
farmers movement
agrarian crises
BJP
Narendra modi
Amit Shah
Modi government

Related Stories

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"

मूसेवाला की हत्या को लेकर ग्रामीणों ने किया प्रदर्शन, कांग्रेस ने इसे ‘राजनीतिक हत्या’ बताया

दलितों पर बढ़ते अत्याचार, मोदी सरकार का न्यू नॉर्मल!

बिहार : नीतीश सरकार के ‘बुलडोज़र राज’ के खिलाफ गरीबों ने खोला मोर्चा!   

जन-संगठनों और नागरिक समाज का उभरता प्रतिरोध लोकतन्त्र के लिये शुभ है

आशा कार्यकर्ताओं को मिला 'ग्लोबल हेल्थ लीडर्स अवार्ड’  लेकिन उचित वेतन कब मिलेगा?

दिल्ली : पांच महीने से वेतन व पेंशन न मिलने से आर्थिक तंगी से जूझ रहे शिक्षकों ने किया प्रदर्शन

राम सेना और बजरंग दल को आतंकी संगठन घोषित करने की किसान संगठनों की मांग

विशाखापट्टनम इस्पात संयंत्र के निजीकरण के खिलाफ़ श्रमिकों का संघर्ष जारी, 15 महीने से कर रहे प्रदर्शन


बाकी खबरें

  • modi
    अनिल जैन
    खरी-खरी: मोदी बोलते वक्त भूल जाते हैं कि वे प्रधानमंत्री भी हैं!
    22 Feb 2022
    दरअसल प्रधानमंत्री के ये निम्न स्तरीय बयान एक तरह से उनकी बौखलाहट की झलक दिखा रहे हैं। उन्हें एहसास हो गया है कि पांचों राज्यों में जनता उनकी पार्टी को बुरी तरह नकार रही है।
  • Rajasthan
    सोनिया यादव
    राजस्थान: अलग कृषि बजट किसानों के संघर्ष की जीत है या फिर चुनावी हथियार?
    22 Feb 2022
    किसानों पर कर्ज़ का बढ़ता बोझ और उसकी वसूली के लिए बैंकों का नोटिस, जमीनों की नीलामी इस वक्त राज्य में एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। ऐसे में गहलोत सरकार 2023 केे विधानसभा चुनावों को देखते हुए कोई जोखिम…
  • up elections
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव, चौथा चरण: केंद्रीय मंत्री समेत दांव पर कई नेताओं की प्रतिष्ठा
    22 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश चुनाव के चौथे चरण में 624 प्रत्याशियों का भाग्य तय होगा, साथ ही भारतीय जनता पार्टी समेत समाजवादी पार्टी की प्रतिष्ठा भी दांव पर है। एक ओर जहां भाजपा अपना पुराना प्रदर्शन दोहराना चाहेगी,…
  • uttar pradesh
    एम.ओबैद
    यूपी चुनाव : योगी काल में नहीं थमा 'इलाज के अभाव में मौत' का सिलसिला
    22 Feb 2022
    पिछले साल इलाहाबाद हाईकोर्ट ने योगी सरकार को फटकार लगाते हुए कहा था कि "वर्तमान में प्रदेश में चिकित्सा सुविधा बेहद नाज़ुक और कमज़ोर है। यह आम दिनों में भी जनता की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त…
  • covid
    टी ललिता
    महामारी के मद्देनजर कामगार वर्ग की ज़रूरतों के अनुरूप शहरों की योजना में बदलाव की आवश्यकता  
    22 Feb 2022
    दूसरे कोविड-19 लहर के दौरान सरकार के कुप्रबंधन ने शहरी नियोजन की खामियों को उजागर करके रख दिया है, जिसने हमेशा ही श्रमिकों की जरूरतों की अनदेखी की है। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License