NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कोविड-19
स्वास्थ्य
भारत
अंतरराष्ट्रीय
सरकार का सुपरमॉडल एक उदाहरण है कि कैसे किसी महामारी का आंकलन नहीं किया जाना चाहिए?
‘इंडियन जर्नल मेडिकल रिसर्च द्वारा जल्दबाजी में प्रकाशित किए गए DST सुपरमॉडल पेपर में लेखकों ने वर्तनी की तक गलतियां ठीक नहीं की, ना ही जर्नल ने इसका गंभीरता से परीक्षण किया।’
प्रबीर पुरकायस्थ
31 Oct 2020
कोरोना वायरस

सरकार के विज्ञान और तकनीकी विभाग (DST) ने "सुपर मॉडल" नाम के एक मॉडल को प्रायोजित किया है। सरकार के जोर-शोर से किए जा रहे दावों के मुताबिक़, भारत का लॉकडाउन बहुत सफल रहा था और अब हमारी आबादी "हर्ड इम्यूनिटी" पा चुकी है।

जैसा मीडिया ने बड़े पैमाने पर बताया कि DST सुपर मॉडल के मुताबिक़, लॉकडाउन ने भारत में बीस लाख से ज़्यादा जान बचाईं और बिना वैक्सीन के ही फरवरी, 2021 तक कोरोना महामारी खत्म हो जाएगी। एकमात्र अच्छी बात यह रही है कि इस मॉडल में मास्क, सोशल डिस्टेंसिंग, हाथ धोने और दूसरे सावधानी से बचाव वाले तरीकों को खत्म करने की बात नहीं की गई।

कोरोना से निपटने के लिए बड़ी संख्या में अलग-अलग तरह के मॉडल का उपयोग किया गया है। लेकिन यह मॉडल कम वक़्त के लिए ही कारगर हुए हैं। इनमें से कोई लंबे वक़्त तक समाधान नहीं दे पाए। महामारियां जटिल होती हैं। यह जटिलताएं, महामारियों की वास्तविक दुनिया की जटिलताओं के चलते उपजती हैं, क्योंकि महामारी का फैलाव इंसान से इंसान के संपर्क, हमारे आवागमन, आबादी के घनत्व और दूसरे तत्वों पर निर्भर होता है।

मॉडल्स को सबसे बुरी स्थिति में उपयोग किया जाता है। इनमें हमें बताया जाता है कि वायरस के फैलाव को रोकने के लिए क्या करना चाहिए, लेकिन जब वास्तविक आंकड़ों के अनुमान लगाए जाने की बात होती है, तो यह दो से तीन हफ़्तों से ज़्यादा की संख्या नहीं बता पाते। सारे मॉडल्स के साथ यही समस्या है। SEIR मॉडल के साथ भी यही दिक्कत है, DST सुपर मॉडल इसी का एक हिस्सा है। यह आंकड़ों से चलने वाला मॉडल है, जो केवल आंकड़ों से ही व्यवहार करता है। इससे ज़्यादा उन्नत और जटिल मॉडल, “एजेंट से चलने वाले मॉडल” होते हैं। यह मानवीय व्यवहार पर अपने नतीजे गणने की की कोशिश करते हैं।

अगर आप किसी परिकल्पना को साबित करना चाहते हैं, तो किसी मॉडल में "पैरामीटर" नाम की हुक होती हैं, जिन्हें मरोड़ कर आप अपने मनमुताबिक़ नतीज़ों पर पहुंच सकते हैं। मॉडल में जितनी ज़्यादा संख्या में पैरामीटर होते हैं, उतनी ही प्रबलता के साथ मॉडल को हमारे मनमुताबिक़ नतीज़े बताने के लिए "प्रताड़ित" किया जा सकता है। DST सुपर मॉडल को चलाने वाले सुनना चाहते थे कि महामारी में मोदी सरकार ने शानदार काम किया है और कुछ महीने में सब ठीक हो जाएगा। इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च द्वारा प्रकाशित और मीडिया से बड़े पैमाने पर प्रसारित "द सुपर मॉडल पेपर" "साबित" करता है कि बिना लॉकडाउन के देश में 26 लाख मौतें हो जातीं और यह महामारी फरवरी, 2021 तक खत्म हो जाएगी। आपको याद होगा कि बोस्टन कंसलटिंग मॉडल, जिसका सरकार ने खूब प्रचार किया था, उसमें भी ऐसी ही अच्छी-अच्छी चीजें कही गई थीं।

DST सुपरमॉडल कमेटी के अध्यक्ष प्रोफ़ेसर विद्यासागर की मीडिया के सामने पेश की गई स्लाइड्स के मुताबिक़, इस कमेटी में 10 सदस्य हैं। केवल तीन, प्रोफ़ेसर मनिंद्रा अग्रवाल, लेफ्टिनेंट जनरल माधुरी कानितकर और प्रोफ़ेसर एम विद्यासागर सुपर मॉडल पेपर के लेखक हैं। जैसा प्रोफ़ेसर गौतम मेनन ने ध्यान दिलाया, इनमें से कोई भी एपिडेमियोलॉजिस्ट नहीं है और यह चीज महामारी को लेकर इनकी समझ दिखाती है।

अब हम पेपर में और गहराई में जाते हैं। इसी तरह के दूसरे मॉडल से “सुपर मॉडल” का अंतर, संक्रमित लोगों को दो भागों में विभाजित करने की विशेषता है। सुपर मॉडल में दो वर्ग बनाए गए हैं। इनमें एक वर्ग में वह लोग शामिल हैं, जिनमें कोरोना संक्रमण के लक्षण सामने नहीं आए, लेकिन वे दूसरे लोगों को संक्रमित कर सकते हैं। दूसरे वर्ग में वह लोग शामिल हैं, जो संक्रमित भी हैं और उनमें लक्षण भी स्पष्ट हैं। 
इस बात की कोई व्याख्या नहीं की गई कि संक्रमितों को दो वर्गों में क्यों विभाजित किया गया है या इस विभाजन का आधार क्या है? इसके बजाए पेपर में कहा गया कि सामान्य मॉडल बिना लक्षण वाले मरीज़ों को शामिल नहीं करता। जबकि कई संक्रमित लोगों में लक्षण नज़र ना आना इस नए कोरोनावायरस की विशेषता है। यह बेहद अनोखा दावा है। किसी भी संक्रमित बीमारी को देखें, तो आप पाएँगे कि कई लोग संक्रमित लोगों के संपर्क में आएंगे, लेकिन उनमें से कुछ ही लोगों में संक्रमण फैलेगा। संक्रमित होना कई तत्वों पर निर्भर करता है, जिसमें कितनी मात्रा में वायरस का निक्षेपण हुआ, कितने वक्त तक कोई शख़्स किसी संक्रमित के संपर्क में रहा, संबंधित शख्स की रोगप्रतिरोधक क्षमता जैसी कई चीजें इसमें शामिल होती हैं। किसी संक्रमण के फैलाव और संक्रिमत द्वारा लक्षण दर्शाने के लिए यह सारी चीजें जिम्मेदार होती हैं। 

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इम्यूनोलॉजी में काम कर चुके डॉ सत्यजीत रथ और प्रोफ़ेसर गौतम मेनन ने द हिंदू में बताया है कि स्पष्ट लक्षण और लक्षण ना दर्शाने वाले मरीज़ों का इस तरह का वर्गीकरण कोविड-19 पर शोध कर रहे किसी भी दूसरे समूह ने नहीं किया। ना ही इस विभाजन के लिए कमेटी ने कोई आधार बताया है।

इसके बाद सुपर मॉडल के लेखकों ने चार पैरामीटर वाला मॉडल बनाया और इनका इस्तेमाल अतीत को “ढालने” में किया, ताकि भविष्य का अंदाजा लगाया जा सके। लेकिन अगर हम कुछ भीतर जाएं, तो देखेंगे कि इन चार पैरामीटर की 6 चरणों में अलग-अलग गणना है, हर चरण दो हफ़्ते का है। इस तरह कुल 24 पैरामीटर होते हैं, जबकि पेपर में दावा किया गया है कि कुल चार पैरामीटर हैं! एक सामान्य आदमी के लिए किसी पैरामीटर के चार या चौबीस होने से क्या फर्क पड़ता है? इसे अहमियत देने की वज़ह यह है कि जितनी ज़्यादा संख्या में पैरामीटर होंगे, उतनी ही ताकत से इन्हें मनमुताबिक़ नतीज़े हासिल करने के लिए “जबरदस्ती ढाला” जा सकता है। इसकी व्याख्या करने वाला मूल्य जितना कम होगा, मनमुताबिक़ नतीजों को हासिल करने के लिए इनका दुरुपयोग करना उतना ही आसान होता है। 24 पैरामीटर वाला मॉडल हास्यास्पद है और यह अतीत व भविष्य को समझने के लिए मॉडलिंग के तरीके का मजाक बनाता है।

इस मामले में तो और भी बुरा हुआ है, इसमें मॉडल पर काम करने वालों ने ‘ε’ को एक पैमाने के तौर पर शामिल किया है। यह कुल संक्रमित लोगों का, बिना लक्षण वाले लोगों से अनुपात होता है। यह पैरामीटर 12 हफ़्तों की अवधि में 7000 बार बदल गया। हालांकि लेखकों ने समझाया है कि एक पैरामीटर जिसे स्थिर रहना चाहिए, वह 12 हफ़्तों के दौरान इतना ज़्यादा क्यों बदला। उन्होंने यह दर्शाने की कोशिश की कि पैरामीटर तो स्थिर है, लेकिन सटीक आंकड़ों की कमी के चलते इतनी बड़ी मात्रा में बदलाव आता है। अगर पैरामीटर में बदलाव छोटा होता, तो समझा भी जा सकता था, लेकिन 7000 बार बदला गया पैरामीटर मॉडलिंग के सारे पैमानों को ध्वस्त कर देता है। 

मॉडल्स में पैरामीटर की बात करें, तो वॉन न्यूमैन ने खूब कहा है, “चार पैरामीटर के साथ, मैं एक हाथी को ढाल सकता हूं, पांच पैरामीटर से मैं उसकी सूंड़ को हिला सकता हूं।” साधारण शब्दों में कहें तो अगर हमारे पास जरूरी पैरामीटर हों, तो हम जैसा नतीज़ा चाहते हैं, हम “मॉडल” से वैसा हासिल कर सकते हैं। या जैसा DST सुपर मॉडल के मामले में हुआ, इसमें ε का आंकलन 6 चरणों करने को कहा गया ताकि “मॉडल” यह दिखा सके कि अगर लॉकडाउन ना लगाया गया होता, तो 25 लाख लोगों की मौत हुई होती और फरवरी, 2021 तक महामारी खत्म हो जाएगी!

DST सुपरमॉडल में एक और हैरान करने वाला दावा किया गया है। कहा गया, “अगर मॉडल सही है, तो 38 करोड़ लोगों के संक्रमित होने के चलते हम हर्ड इम्यूनिटी को पा चुके हैं।” ICMR द्वारा जो सीरोसर्वे करवाए गए हैं, जिनमें हमारे खून में एंटीबॉडी की जांच की जाती है, उसमें कहीं पर भी नहीं बताया गया कि अब तक भारत में 38 करोड़ लोग या देश की 30 फ़ीसदी आबादी संक्रमित हो चुकी है। सीरोसर्वे से जो आंकड़े मिले हैं, वे मॉडल के नतीज़ों से मेल नहीं खाते। अगस्त के आखिर तक आए आंकड़ों के मुताबिक़ भारत में 6 से 8 फ़ीसदी आबादी में ही सीरोपॉजिटिविटी हासिल हुई है। धारावी जैसे कुछ क्षेत्रों में ही बड़ी मात्रा में सीरोपॉजिटिविटी मिली है। सुपर मॉडल में इस संख्या को दोगुना कर दिया गया है। यहां तक कि बाद के सीरोसर्वे में भी कोई आंकड़ा 30 फ़ीसदी के आसपास नहीं है। वैश्विक आंकड़ों का संकलन करने वाले WHO ने भी कहा है कि दुनिया की 10 फ़ीसदी आबादी में ही एंटीबॉडीज़ मौजूद हैं।

संक्रमित लोगों की संख्या बड़े पैमाने पर बढ़ाचढ़ाकर बताने के अलावा, विद्यासागर और उनके सहयोगी क्यों यह दावा कर रहे हैं कि भारत में 30 फ़ीसदी लोगों के संक्रमित होने के बाद ही हर्ड इम्यूनिटी आ चुकी है? एपिडेमियोलॉजिस्ट में आम सहमति है कि किसी आबादी में हर्ड इम्यूनिटी आने के लिए उसके 60 से 70 फ़ीसदी हिस्से को संक्रमित होना पड़ता है। यहीं “सुपर मॉडलर्स” द्वारा लाया गया हमारा ख्यात या कुख्यात ε तस्वीर में आता है। यह कुल संक्रमित लोगों का बिना-लक्षण वाले संक्रमितों से अनुपात होता है। यह ε हर्ड इम्यूनिटी तक पहुंचने के प्रतिशत को नीचे कर देता है। यह इसके कई फायदों में से एक है!

इंडियन जर्नल मेडिकल रिसर्च द्वारा जल्दबाजी में प्रकाशित किए गए DST सुपर मॉडल पेपर में लेखकों ने वर्तनी की गलतियां तक नहीं सुधारीं गई हैं, मतलब जर्नल ने इसका गंभीरता से परीक्षण नहीं किया। “भारत में महामारी का विकास” के आखिरी पैराग्राफ में एक बड़ी गलती में बताया गया है कि “चरण 6 के 1/ε मूल्य (=67) का उपयोग करते हुए मॉडल अनुमान लगाता है कि भारत में कुल 35 लाख लोगों में एंटीबॉडीज़ मौजूद हैं।” वहीं पैराग्राफ 5 में यही वाक्य ज्यों का त्यों लिखा है। लेकिन वहां एंटीबॉडीज़ वाले लोगों की संख्या 35 करोड़ बताई गई है। लिखा गया, “चरण 6 के 1/ε मूल्य (=67) का उपयोग करते हुए मॉडल अनुमान लगाता है कि भारत में कुल 35 लाख लोगों में एंटीबॉडीज़ मौजूद हैं।” यह सीधे-सीधे पहले बताई गई संख्या से 100 गुना ज्यादा है!

यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि तीनों ख्यात लेखकों ने अपने नाम को इस कालिख में खराब किया। यह बताता है कि महानता लोगों को फ़ैसले लेने में गलतियों से नहीं रोकती। इस मामले में यह महज एक सामान्य गलती नहीं है, बल्कि लोगों के लिए इसके गंभीर नतीज़े होंगे। भले ही लेखकों ने सोशल डिस्टेंसिंग की बात कही हो, लेकिन पेपर में हर्ड इम्यूनिटी के झूठे दावे से सरकार में सुरक्षा का झूठा भाव उमड़ेगा और वास्तविक दुनिया में इसके गंभीर नतीज़े होंगे। इस खोखले “वैज्ञानिक” पेपर को उत्पादित कर लेखकों ने अपना और देश का कुछ भला नहीं किया।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

DST’s Super Model: Or How not to Model an Epidemic

COVID-19
Lockdown
COVID-19 Model
Super Model COVID-19
WHO
ICMR
Serosurveys
Herd immunity

Related Stories

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना ने फिर पकड़ी रफ़्तार, 24 घंटों में 4,518 दर्ज़ किए गए 

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 3,962 नए मामले, 26 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 84 दिन बाद 4 हज़ार से ज़्यादा नए मामले दर्ज 

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना के मामलों में 35 फ़ीसदी की बढ़ोतरी, 24 घंटों में दर्ज हुए 3,712 मामले 

कोरोना अपडेट: देश में नए मामलों में करीब 16 फ़ीसदी की गिरावट

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 2,706 नए मामले, 25 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 2,685 नए मामले दर्ज

कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में कोरोना के 2,710 नए मामले, 14 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: केरल, महाराष्ट्र और दिल्ली में फिर से बढ़ रहा कोरोना का ख़तरा

महामारी में लोग झेल रहे थे दर्द, बंपर कमाई करती रहीं- फार्मा, ऑयल और टेक्नोलोजी की कंपनियां


बाकी खबरें

  • AIADMK सरकार के दौरान नागरिक आपूर्ति ठेकों में हुई अनियमित्ताओं से राजकोष को हुआ 2000 करोड़ रुपये का घाटा
    नीलाम्बरन ए
    AIADMK सरकार के दौरान नागरिक आपूर्ति ठेकों में हुई अनियमित्ताओं से राजकोष को हुआ 2000 करोड़ रुपये का घाटा
    10 Jun 2021
    दाल, ताड़ के तेल और चीनी के उपार्जन के लिए जारी हुए ठेकों से राज्य सरकार को अनुमानित तौर पर 2,028 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। चेन्नई स्थित भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ काम करने वाले संगठन अरप्पर इयक्कम (API…
  • सीटू ने 13 सूत्री मांगपत्र जारी कर देशभर में मनाया 'मांग दिवस'
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    सीटू ने 13 सूत्री मांगपत्र जारी कर देशभर में मनाया 'मांग दिवस'
    10 Jun 2021
    देश भर में हज़ारों मज़दूरों ने अलग-अलग जगह कोविड नियमों का पालन करते हुए यह प्रदर्शन किए। इस दौरान नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के अब तक महामारी से निपटने के तरीक़ों के ख़िलाफ़ नारे भी बुलंद…
  • हरियाणा: आसिफ़ हत्याकांड के पीड़ित परिवार से मिला वामदलों का प्रतिनिधि मंडल
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    हरियाणा: आसिफ़ हत्याकांड के पीड़ित परिवार से मिला वामदलों का प्रतिनिधि मंडल
    10 Jun 2021
    इस जघन्य हत्याकांड में लगभग 30 लोगों पर एफआईआर दर्ज है जिनमें से 14 लोग नामजद हैं। अब तक 12 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया था जिनमें से चार को रिहा कर दिया गया। जबकि अन्य आरोपी अभी फरार हैं।…
  • यूपी: क्या जितिन प्रसाद के जाने से वाकई कांग्रेस को नुकसान होगा?
    सोनिया यादव
    यूपी: क्या जितिन प्रसाद के जाने से वाकई कांग्रेस को नुकसान होगा?
    10 Jun 2021
    यूपी में फिलहाल जितिन का राजनीतिक ज़मीन पर कोई खास असर नहीं दिखता। उनका प्रभाव पिछले कुछ सालों में सिमटता चला गया है। यहां तक कि बीते चुनावों में वह अपने इलाके और अपनी सीट भी नहीं संभाल सके। वे…
  • यूपी में कोरोनावायरस की दूसरी लहर प्रवासी मजदूरों पर कहर बनकर टूटी
    अब्दुल अलीम जाफ़री
    यूपी में कोरोनावायरस की दूसरी लहर प्रवासी मजदूरों पर कहर बनकर टूटी
    10 Jun 2021
    यूनियन नेताओं के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में अप्रैल से मई तक पंचायत चुनावों के कारण मनरेगा से जुड़े काम स्थगित पड़े थे, और इसके तुरंत बाद हुए संपूर्ण लॉकडाउन के कारण श्रमिकों के लिए मांग में और गिरावट आ…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License