NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
इस्मत आपा को सिर्फ़ ‘लिहाफ़’ के लिए याद करना उनके दायरे को बहुत छोटा करना है
पुण्यतिथि विशेष: चुग़ताई की कहानियाँ स्त्री केंद्रित बेशक रहीं, इन कहानियों में यौनिकता, स्त्री का शारीरिक अधिकार और स्त्री-इच्छा के बारे बातें भी हुई लेकिन उनके प्रगतिशील सहित्य की परिसीमा यहीं तक खींच देना, चुग़ताई के स्त्रीवाद और उनके साहित्य को समझने में हमारी कमी सामने रखता है।
सोनम कुमारी
24 Oct 2020
Ismat Chughtai

आज इस्मत चुग़ताई की पुण्यतिथि है। 24 अक्टूबर, 1991 को मुंबई में उनका निधन हुआ। इस्मत चुग़ताई को ज़्यादातर लोग उनके कहानी 'लिहाफ़' से जानते है। यह वही कहानी है जिसने उन्हें अश्लीलता के इल्ज़ाम में लाहौर कोर्ट में पेश होने के लिए मजबूर कर दिया। लेकिन इसी कहानी ने उनके कहानियों के विशाल संग्रह को एक दायरे में भी समेट दिया। इस्मत चुग़ताई, जिसको दुनिया 'इस्मत आपा' भी कहती है, जो खुद के कलम और खुद के सोच को किसी भी दायरे से मुक्त, आज़ाद ख़्याल समझती थीं, को एक दायरे में बांध देता है। चुग़ताई की कहानियाँ स्त्री केंद्रित बेशक रहीं, इन कहानियों में यौनिकता, स्त्री का शारीरिक अधिकार और स्त्री-इच्छा के बारे बातें भी हुई लेकिन उनके प्रगतिशील सहित्य की परिसीमा यहीं तक खींच देना, चुग़ताई के स्त्रीवाद और उनके साहित्य को समझने में हमारी कमी सामने रखता है।

अभी हाल ही में, मैं हंस पत्रिका का एक अंक पढ़ रही थी, जिसके पाठक पत्र में एक जनाब फ़रमाते है कि विमर्शवाद दो वर्गों के बीच एक का हिमायती बन फर्क डालने का प्रयास करता है। इस विमर्श के चपेटे में वह स्त्री-विमर्श को भी ले लेते है और कहते है कि स्त्री पर लेखनी तो पहले से होती आयी है, इसलिए अभी का वो स्त्री साहित्य जो औरतों के शोषण और स्वतंत्रता पर बात कर रहा है, वह नया नहीं है। लेकिन यौनिकता, अनैतिकता, समलैंगिकता का परचम स्त्रीवादी विमर्श ने बुलंद किया है। यह बात स्त्रीवादी के दूसरे लहर के परिणामस्वरूप हमें भारतीय स्तर पर दिखता है, लेकिन स्त्रीवादी लेखन को चंद चार बातों में समेट कर रख देना लोगों के स्त्रीवाद को लेकर, समझ में कमी को दिखाता है। स्त्रीवादी रचना को अक्सर स्त्री की यौनिकता के आधार पर आंका जाता है लेकिन चुग़ताई अपनी रचनाओं में यौनिकता के साथ-साथ, औरतों का आर्थिकी संबंध, जातीय आधार पर उनके हाशियेकरण एवं प्रतिरोध के स्वर को मुखर करती हैं।

इसे भी पढ़ें : जन्मदिन विशेष : अमृता प्रीतम के साहित्य का नारीवाद

चुग़ताई की कहानियाँ में उत्तर भारतीय मध्यवर्गीय मुसलमान परिवार का ज़्यादा अंश दिखता है। जिसमें वह सभी स्त्रियों एक श्रेणी में न रखते हुए कई श्रेणियों में बाँटती हैं। इस्मत हर स्त्री के किरदार को भौतिक यथार्थ के आधार पर, समाज में उसकी स्थिति को आंकने और पाठकों तक ले जाने का काम करती हैं। इस्मत ने अपनी कई कहानियों में निचले तबके की स्त्री को अपनी नायिका गढ़ा और उसके तुलना में मध्यमवर्गीय स्त्री एवं मध्यमवर्गीय समाज को सवाल के कठघरे में ला खड़ा किया।

इस्मत की कहानी 'दो हाथ' ऐसे ही सामाजिक वर्ग आधार पर समाज और व्यक्ति के आपसी संबंधों को दिखाती है। यह कहानी एक मेहतरानी की दास्तान बयां करती है। जिसका पति आर्मी के ख़ेमे में सफाई का काम करता है और उसकी बीवी और माँ दोनों मैला ढोने का काम करती है। उसकी बहू को गाँव की सारी औरतें 'छिनाल' और 'रंडी' समझती है, और आदमियों के लिए उसका शरीर महज एक वस्तु है। जब गांव की औरतें उससे उसकी बहू के 'रंडी' होने की शिकायत करती हैं तो उसकी बुढ़िया सास का मज़बूत किरदार सामने आता है। उसकी सास उल्टा उन सबसे कहती है कि 'सबके घर की गंदगी को वह बहुत अच्छे से जानती है।' बहू का पति सरहद पर होता है और बहू पेट से हो जाती है लेकिन मेहतरानी के परिवार को इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता। वह बच्चे के जन्म पर खुश होते हैं। पति के लौटने के बाद उसको मध्यमवर्गीय समाज द्वारा बहुत भड़काया जाता है कि बच्चा उसका नहीं है लेकिन उसका जवाब लोगों को चुप कर देता है।

कहानी पितृसत्तामक, कुलीन समाज के सामने एक सवाल खड़ा करता है कि जिस घर में कमाने को दो हाथ ज़रूरी हैं, क्या वह इस सवाल के पीछे भाग सकता कि वो 'दो हाथ' औरत ने किस मर्द से जने है? वहाँ सवाल रोज़ी चलाने का है, खून में मिलावट न हो इसपे चौकसी रखने का नहीं है। और फिर 'कुलीन' समाज के मर्द भी तो छिप कर गैर वैवाहिक संबंध स्थापित करते हैं, उसपे सवाल उठना निचले जाती के लोगों के लिए इतना मुश्किल क्यों? कहानी पितृसत्ता और जाति के सवाल को एक साथ उठाती है। यहां सत्ता का संचालक सिर्फ मर्द नहीं औरत खुद भी है, जो खुद अपने पतियों के व्यवहार पर सवाल नहीं कर सकती लेकिन कुंठा से ग्रस्त हो कर 'औरत' को ही अपना दोषी समझती है।

उस समय तक उर्दू साहित्य में सिर्फ दो कहानियाँ मेहत्तर समुदाय के विषय पर लिखी गयी थी, जिनमें से यह एक थी। 'मुट्ठी की मालिश' एक अलग प्रकार की औरत का चरित्र हमारे सामने रखती है, जो समाज के निचले तबके से आती है और हाथ से बच्चा गिराने का काम करती है। बड़े घर की औरतें उसके काम के बारे में सुन कर सन्न रह जाती हैं और एक अजीब सा घिन मन में लिए दो किरदारों के बारे में सोचती हैं। दो वर्गों के बीच का द्वंद कहानी में सामने आता है। एक ओर मजबूरी में किया जा रहा 'गंदगी' वाला काम होता है जिसके बगैर दुनिया का चलना मुश्किल है, वही दूसरी ओर 'सफाई' का प्रश्न मन में लिए एक अन्य महिला दोनों दाई रमा बाई और गंगा बाई के बातों में अपने सवाल ढूंढती है। और अपने विशेष अधिकार एवं ऐशों आराम के ज़िन्दगी पर संदेह खड़े करती है। चुग़ताई के कई पात्र ऐसे असहज़ कामकाज़ का हमारे सामने वर्णन करते हैं, जिससे मन बेचैन हो जाता है और उसी बेचैनी से इस्मत अपने पाठकों के लिए सवाल छोड़ती हैं। इन पात्रों का वर्णन समाज का दोगलापन, उनके मन में भरी घृणा, और वर्ग विशेष के प्रति असमानता की भावना का उल्लेख करती है। एक निचले तबक़े से आने वाली महिला को उच्च वर्गीय समाज (पुरुष औरत दोनों) किस नज़र से देखता है, उसका दोगलापन हमारे सामने आता है और स्त्रीवादी दायरे को और विस्तृत करता है।

नारीवाद की दूसरी लहर का असर चुग़ताई के कई कहानियों में नज़र आता है। "आधी औरत आधा ख़्वाब" पूरी तरह से हमारे सामने यह प्रश्न खड़ा कर देता है कि क्या औरत सच में आदमियों से अलग है या फिर सत्ता में मौजूद आदमी उस अपना हक़ जमा कर, अपना अधिपत्य साबित करना चाहते है। अपने इसी अधिपत्य के खोने के डर से औरतों पर शोषण करते है और उन पर अटपटे सवाल खड़े करते हैं। उनकी कहानी 'लिहाफ़' और 'गैंदा' यौनिकता और स्त्री के शारीरिक शोषण और अधिकार की बात करते हैं। एक ओर लिहाफ़ समलैंगिक संबंध पर फोकस करती है । वहीं दूसरी ओर "गैंदा" बड़े मार्मिक तरह से दो बच्चों के मनोस्थिति और उनके मानसिक विचलन को दर्शाती है। बाल मन में यौनिकता, प्रेम, शादी को लेकर कैसे-कैसे सवाल एक लड़की के मन में खड़े होते हैं, जिनका जवाब हमें कहीं से नहीं मिलता। मिलती है तो सिर्फ डाँट और मार जिसको समझ पाने में हम अक्षम होते हैं। और बाद में जिज्ञासावश हम कुछ ऐसे काम करते है, जिसके लिए समाज जवाबदेह बेशक न हो लेकिन सज़ा ज़रूर सुनाता है। इन कहानियों से इस्मत समाज की खोखली जड़ों, किशोर आयु में यौनिकता को लेकर जानकारी, उसकी बुनियादी सोच और पितृसात्त्मक मूल्यों पर परामर्श करती है।

स्त्रीविमर्श और साहित्य को आगे करने में कहीं न कहीं भाषा भी एक भूमिका निभाती है। स्त्रीवादी भाषा विशेषज्ञ कहते हैं कि साहित्य में स्त्री की भाषा मौजूदा साहित्यिक संस्थानों की ऐतिहासिक अहमियत को विखंडित करने की ताकत रखती है। स्त्री अपने अनुभवों के आधार पर नई भाषा और प्रतीक गढ़ती है। चुग़ताई की लेखनी स्त्रीवादी प्रतीक गढ़ती है, जो साहित्य में मौजूद शासक वर्गीय भाषा को चुनौती देती है। यह भाषा सिर्फ आदमी के द्वारा दिये भाषा को नहीं चुनौती देती, बल्कि वर्गीय और जातीय प्रतीकों को भी उर्दू साहित्य में स्थान देती है। चुग़ताई अपनी कहानियों में अपनी 'अनुभूति' और 'अनुभव' को जगह देती हैं, जो शब्दों के रूप में भी बयान होता है। जैसे गुस्से से कसमसा जाना और 'उँह उँह' की आवाज़ निकलना, 'धम्म' से गिर पड़ना। अनुभूति के साथ चुग़ताई 'रंडी' जैसे वर्जित शब्द को बार-बार अपनी कहानियों में इस्तेमाल कर उनकी समाज में मौजूदगी को ज़ाहिर करती रहती है। 'लिहाफ़' समाज के समझ पर पड़े पर्दे के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल होता है। वहीं 'छुईमुई' शीर्षक विशेष अधिकार प्राप्त लोगों के लिए कटाक्ष की तरह इस्तेमाल होता है।

इस्मत चुग़ताई के साहित्य ने पश्चिमी स्त्रीवाद का असर ज़रूर देखा लेकिन भारत के परिप्रेक्ष्य में यह विस्तृत हुआ। जहाँ सवाल सिर्फ स्त्री को केंद्र में रख कर नहीं बल्कि पिछड़े वर्ग के लोगों को केंद्र में रख कर भी किया गया है। चुग़ताई ने पूंजीवादी व्यवस्था और इस्लाम के रूढ़िवादी विचारधारा की भी आलोचना की। वह अपने आप को प्रगतिशील लेखिका मानती हैं। चुग़ताई तरक़्क़ीपसंद यानी प्रगतिशील लेखक संघ की सदस्या भी रहीं लेकिन  कुछ मतभेदों के कारण उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ छोड़ दिया। लेकिन उन्होंने खुद की समझ और पितृसत्ता को लेकर बनी समझ का श्रेय तरक़्क़ीपसंद लेखक संघ को दिया। वह कहती हैं कि " उन्होंने वहाँ से सीखा कि उनकी 'खुशी की दुश्मन उनकी दादी नहीं, यह व्यवस्था है"। यह बात आज के नारीवादी विमर्श में कहीं खो सी गयी है, जहां हम अपने दमन का कारण किसी एक समूह, एक व्यक्ति या एक वर्ग विशेष को समझते हैं। कहीं न कहीं नारीवादी आंदोलन और स्त्री विशषज्ञों यह समझने की ज़रूरत है कि यह किसी एक का किसी एक पर वार नहीं है। यह एक संगठित वार है, जो मौजूदा व्यवस्था द्वारा हम पर किया जा रहा है।

नारीवाद को यौनिकता, शारीरिक अधिकार, आत्म चुनाव के अधिकार के साथ व्यवस्था के इस आक्रमण को भी समझने की ज़रूरत है। प्रगतिशील लेखक संघ छोड़ने के बाद जब यह बात चारों तरफ फ़ैली कि तरक़्क़ीपसंद आंदोलन बिखरने लगा है, तब उन्होंने जवाब में खुल कर कहा कि "आंदोलन हज़ारों साल से ज़िंदा है और तब तक ज़िंदा रहेगा जब तक मनुष्य की तरक़्क़ी की राह ज़िंदा है। तरक़्क़ीपसंद आंदोलन को चंद लोगों के नाम से नहीं पहचाना जाना चाहिए। तरक़्क़ीपसंदीयत जीवन के उस ख़्वाब का नाम है जो संवेदनशील मनुष्य की चेतना से पोषित होता है।"

(सोनम कुमारी छात्र-एक्टिविस्ट हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

इसे भी पढ़ें : जयंती विशेष : हमारी सच्चाइयों से हमें रूबरू कराते प्रेमचंद

Ismat Chughtai
Ismat Chughtai Death anniversary
Death anniversary

Related Stories

पुण्यतिथि पर विशेष : रेणु ने पद्मश्री को लौटाते हुए कहा था, 'पापश्री'

क्या आज गाँधी और अम्बेडकर के धर्मनिरपेक्ष देश के सपने को ख़तरा है?


बाकी खबरें

  • अजय कुमार
    मोदी जी की नोटबंदी को ग़लत साबित करती है पीयूष जैन के घर से मिली बक्सा भर रक़म!
    29 Dec 2021
    मोदी जी ग़लत हैं। पीयूष जैन के घर से मिला बक्से भर पैसा समाजवादी पार्टी के भ्रष्टाचार का इत्र नहीं बल्कि नोटबंदी के फ़ैसले को ग़लत साबित करने वाला एक और उदाहरण है।
  • 2021ः कोरोना का तांडव, किसानों ने थमाई मशाल, नफ़रत ने किया लहूलुहान
    न्यूज़क्लिक प्रोडक्शन
    2021ः कोरोना का तांडव, किसानों ने थमाई मशाल, नफ़रत ने किया लहूलुहान
    29 Dec 2021
    खोज ख़बर में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने साल 2021 के उन उजले-स्याह पलों का सफ़र तय किया, जिनसे बनती-खुलती है भारतीय लोकतंत्र के भविष्य की राह।
  • जानिए: अस्पताल छोड़कर सड़कों पर क्यों उतर आए भारतीय डॉक्टर्स?
    रवि शंकर दुबे
    जानिए: अस्पताल छोड़कर सड़कों पर क्यों उतर आए भारतीय डॉक्टर्स?
    29 Dec 2021
    यह हड़ताली रेजिडेंट डॉक्टर्स क्या चाहते हैं, क्यों चाहते हैं, अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरना इनके लिए क्यों ज़रूरी है। आइए, क्रमवार जानते हैं-
  • सोनिया यादव
    जेएनयू: ICC का नया फ़रमान पीड़ितों पर ही दोष मढ़ने जैसा क्यों लगता है?
    29 Dec 2021
    नए सर्कुलर में कहा गया कि यौन उत्पीड़न के मामले में महिलाओं को खुद ही अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी। महिलाओं को यह पता होना चाहिए किए इस तरह के उत्पीड़न से बचने के लिए उन्हें अपने पुरुष दोस्तों के…
  • कश्मीरी अख़बारों के आर्काइव्ज को नष्ट करने वालों को पटखनी कैसे दें
    एजाज़ अशरफ़
    कश्मीरी अख़बारों के आर्काइव्ज को नष्ट करने वालों को पटखनी कैसे दें
    29 Dec 2021
    सेंसरशिप अतीत की हमारी स्मृतियों को नष्ट कर देता है और जिस भविष्य की हम कामना करते हैं उसके साथ समझौता करने के लिए विवश कर देता है। प्रलयकारी घटनाओं से घिरे हुए कश्मीर में, लुप्त होती जा रही खबरें…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License