NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
कब मिलेगी प्रवासी मजदूरों को सामाजिक सुरक्षा?
‘परिवार को इस बारे में जानकारी नहीं थी कि उन्हें मृतिका के शव के साथ पहले पुलिस के पास जाना चाहिए था और पोस्टमार्टम करवाना था। जब उनसे पूछा गया कि क्या वे उसकी मौत के बाद पुलिस या डाक्टरों के पास गए थे, तो वे सभी असमंजस की स्थिति में नजर आ रहे थे...’
वर्षा तोरगालकर 
13 Nov 2020
चंद्राबाई थानेकर का 16 वर्षीय बेटा रमेश उनकी फोटो को हाथ में लिए हुए।
चंद्राबाई थानेकर का 16 वर्षीय बेटा रमेश उनकी फोटो को हाथ में लिए हुए।

पालघर: वैसे तो अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत प्रवासी मजदूरों के कल्याण के संरक्षण को लेकर कई कानून मौजूद हैं, लेकिन वे शायद ही कभी अमल में लाये जाते हैं। एक आदिवासी प्रवासी महिला की मौत ने जो कि भिवंडी के नजदीक धान के खेतों में काम करती थी, की मौत ने प्रवासी मजदूरों की सामजिक सुरक्षा की जरूरत को एक बार फिर से रेखांकित किया है।

चालीस वर्षीया चन्द्राबाई थालेकर, जिनके तीन अवयस्क बच्चे थे और जो कटकरी आदिवासी समुदाय से सम्बद्ध थीं, का देहांत उनके नियोक्ता द्वारा मुहैय्या कराये गए इमारत में हो गया था। चन्द्राबाई पालघर में भूरीटेक की रहने वाली थीं, जो कि अपनी मौत से 12 दिन पहले से ठाणे जिले में भिवंडी के समीप लोनाड में राजू पाटिल के खेत में धान काटने के काम में लगी थीं। कटकरी आदिवासी समुदाय के सदस्य महाराष्ट्र में तीन विशेष तौर पर कमजोर जनजातीय समूहों में आते हैं।

सोनी ने पारंपरिक तौर पर लपेट कर पहनी जाने वाली साड़ी से अपने आँसू पोंछे। शोक मनाने के लिए इकट्ठा हो रखे अपने अन्य रिश्तेदारों के साथ ही वह बैठी हुई थी। उसने बताया कि “हम लोग 30 अक्टूबर की शाम को इमारत की तीसरी मंजिल पर आपस में बातें कर रहे थे। उसने कहा था कि उसे ठण्ड सी लगने लगी है। राजू पाटिल किसान ने, जिसने हमें काम पर रखा था, उसे एक डॉक्टर के पास ले गया था। मुझे हालाँकि नहीं पता कि कहाँ। जब वह लौटकर आई तो उसके पास डॉक्टर द्वारा सुझाई गई दवाइयाँ थीं।”

“आधी रात के वक्त उसे सीने में और पसलियों में दर्द की शिकायत हुई। उसके बाद उसे खून की उल्टियाँ होने लगीं। मेरी बेटी इसके कुछ ही मिनटों बाद मर गई। राजू पाटिल ने उसी रात हम सबको मेरी बेटी के शव के साथ एक वाहन से भूरीटेक वापस भिजवा दिया था। 31 अक्टूबर की सुबह हमने उसका अंतिम संस्कार कर दिया था” उसकी माँ ने बताया। 

चन्द्रबाई का 16 वर्षीय बेटा रमेश, जिसके बाल रंगे हुए थे और उसने जीन्स और एक शर्ट पहने हुए थी। वह परेशान नजर आ रहा था और उसकी बात करने की इच्छा नहीं हो रही थी। पड़ोसी और रिश्तेदार जयराम वाघ ने उससे पूछा कि परिवार को कुल कितना रुपया मिला। चन्द्राबाई, उनकी माँ, उनका बेटा रमेश, उनके पति एकनाथ और उनकी सास मिलकर पिछले 12 दिनों से पाटिल के खेत में 400 रूपये प्रतिदिन की दर पर धान की कटाई में लगे थे।

रमेश ने बताया “भिवंडी छोड़ने से पहले पाटिल ने 10,000 रूपये दिए थे। उसने मेरी माँ को कुछ रूपये दिए थे, जिसे उसने साबुन और तेल खरीदने में खर्च कर दिया था।” उसे इस बारे में कोई अंदाजा नहीं था कि उसके परिवार को कुल कितना रुपया मिलना चाहिए था। एकनाथ जो घर पर ही मौजूद थे, उनसे दो-तीन बार बात करने का अनुरोध करने के बावजूद वे बात नहीं करना चाहते थे।

परिवार इस बारे में अनभिज्ञ था कि उन्हें शव के साथ सबसे पहले पुलिस के पास जाना चाहिए था और शव का पोस्टमार्टम करवाना था। जब उनसे पूछा गया कि क्या उनकी मौत के बाद वे पुलिस या डाक्टरों के पास गये थे तो वे सभी असमंजस में नजर आये। उसके पड़ोसी जयराम ने कहा कि उन्हें नहीं पता कि ऐसे में क्या करना चाहिए था।

चंद्रा के छोटे बच्चों रविन्द्र (7 और सुरेखा (12) इस बारे में बेखबर थे कि उन्होंने क्या खो दिया है, वे घर में खेल रहे थे।

अनौपचारिक क्षेत्र के मजदूरों के लिए कोई सुरक्षा नहीं 

स्थानीय कार्यकर्त्ता सीता घटाल का इस बारे में कहना है कि “जवहर और मोखादा इलाके में अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले सीजनल मजदूरों की मौत का यह पाँचवा मामला है। समुदाय में से किसी सदस्य की मौत हो जाना एक गंभीर मामला है। वे अशिक्षित हैं, ठेकेदारों से बहस नहीं कर सकते हैं या हम जैसे स्थानीय लोगों तक से बहस करने से कतराते हैं। ठेकेदार या नियोक्ता कभी भी उन्हें पूरी रकम का भुगतान नहीं करते हैं, और वे इस बात को नहीं समझ पाते हैं कि उनका शोषण हो रहा है।”

श्रम और रोजगार मंत्रालय के अनुसार, भारत में कुल श्रमशक्ति का करीब 90% हिस्सा आज भी अनौपचारिक क्षेत्र में काम करता है। वे ईंट भट्टों, दुकानों, निर्माण स्थलों और खेती के काम-काज में बिना किसी क़ानूनी संरक्षण के काम करते हैं। लगभग 69% के आस-पास मजदूरों को सशुल्क छुट्टियों जैसे सामाजिक सुरक्षा का लाभ नहीं मिलता है।

आजीविका ब्यूरो, नामक संगठन जो कि अनौपचारिक क्षेत्र में श्रमिकों के कल्याण के लिए कार्यरत है, से जुड़े एक कार्यकर्त्ता दीपक पराधर के अनुसार “न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, मुआवजा अधिनियम एवं असंगठित श्रमिक सामाजिक सुरक्षा अधिनियम जैसे अधिनियम उनकी सुरक्षा एवं कल्याण हेतु लागू होते हैं। लेकिन ना तो नियोक्ता ही उनके नामों को पंजीकृत करने का काम करते हैं और न ही मजदूर इस बारे में कोई माँग उठाते हैं।”

आँकड़ों के मुताबिक 648 से अधिक प्रवासी मजदूरों की इस बीच जबसे लॉकडाउन की घोषणा हुई है, गैर-कोविड-19 वजहों से मौत हो चुकी है, जिसमें चिकित्सा सेवाओं का अभाव, दुर्घटनाओं, अपराध और आत्महत्या इसकी मुख्य वजहें पाई गई हैं। समय पर चिकित्सा सेवा न मिल पाने की वजह से तकरीबन 75 मजदूरों की मौत हो चुकी है। लॉकडाउन के दौरान श्रमिकों की मौतों को दर्ज करने को लेकर भारत सरकार ने कोई डेटाबेस तैयार करने का काम नहीं किया है। इसके नतीजे के तौर पर इन परिवारों को सरकार की तरफ से कोई मुआवजा नहीं मिला है।

10 करोड़ से अधिक ऐसे लोग हैं जो अल्पकालिक प्रवासन कार्यों को अपनाते हैं, और उनमें से अधिसंख्य अनुसूचित जातियों (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदायों से आते हैं। वे ऐसे कार्यस्थलों पर जोखिम भरे और शारीरिक तौर पर श्रम साध्य कार्यों को करने के लिए मजबूर हैं जहाँ मजदूरी, काम के घंटों और रहने की स्थितियां ऐसी होती हैं जो श्रम कानूनों की खुलेआम धज्जियाँ उड़ाते हैं। यह उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर डालता है लेकिन शायद ही इस पर किसी का ध्यान जाता है।

कार्यकर्त्ता लक्ष्मण हाके, जो कि महाराष्ट्र में गन्ना मजदूरों के लिए काम करते हैं, का कहना है “खेतिहर मजदूर जो खेतों में काम के लिए आसपास के जिलों में प्रवासन करते हैं वे अक्सर मौत के शिकार हो जाते हैं या दुर्घटना में मारे जाते हैं। लेकिन ऐसा कोई कानून नहीं है जो इस सबके लिए ठेकेदार या खेत मालिक के उपर जवाबदेही तय कर सके। ज्यादातर मौकों पर वे मजदूरों को किसी भी प्रकार की चिकत्सीय सुविधा नहीं मुहैय्या कराते हैं।”

लेखक महाराष्ट्र से एक स्वतंत्र पत्रकार हैं। 

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Death of a Tribal Labourer Highlights Need for Social Security for Migrant Workers

Migrant workers
Migrant labourers
tribal communities
Labour Laws
Labour Codes
social security

Related Stories

वृद्धावस्था पेंशन: राशि में ठहराव की स्थिति एवं लैंगिक आधार पर भेद

किसकी मीडिया आज़ादी?  किसका मीडिया फ़रमान?

गुजरात: पार-नर्मदा-तापी लिंक प्रोजेक्ट के नाम पर आदिवासियों को उजाड़ने की तैयारी!

जनवादी साहित्य-संस्कृति सम्मेलन: वंचित तबकों की मुक्ति के लिए एक सांस्कृतिक हस्तक्षेप

तमिलनाडु: छोटे बागानों के श्रमिकों को न्यूनतम मज़दूरी और कल्याणकारी योजनाओं से वंचित रखा जा रहा है

एनआईए स्टेन स्वामी की प्रतिष्ठा या लोगों के दिलों में उनकी जगह को धूमिल नहीं कर सकती

कोरोना लॉकडाउन के दो वर्ष, बिहार के प्रवासी मज़दूरों के बच्चे और उम्मीदों के स्कूल

कर्नाटक: मलूर में दो-तरफा पलायन बन रही है मज़दूरों की बेबसी की वजह

देशव्यापी हड़ताल: दिल्ली में भी देखने को मिला व्यापक असर

देशव्यापी हड़ताल : दिल्ली एनसीआर के औद्योगिक क्षेत्रों में दिखा हड़ताल का असर


बाकी खबरें

  • Ayodhya
    रवि शंकर दुबे
    अयोध्या : 10 हज़ार से ज़्यादा मंदिर, मगर एक भी ढंग का अस्पताल नहीं
    24 Jan 2022
    दरअसल अयोध्या को जिस तरह से दुनिया के सामने पेश किया जा रहा है वो सच नहीं है। यहां लोगों के पास ख़ुश होने के लिए मंदिर के अलावा कोई दूसरा ज़रिया नहीं है। अस्पताल से लेकर स्कूल तक सबकी हालत ख़राब है।
  • BHU
    विजय विनीत
    EXCLUSIVE: ‘भूत-विद्या’ के बाद अब ‘हिंदू-स्टडीज़’ कोर्स, फिर सवालों के घेरे में आया बीएचयू
    24 Jan 2022
    किसी भी राष्ट्र को आगे ले जाने के लिए धर्म की नहीं, विज्ञान और संविधान की जरूरत पड़ती है। बेहतर होता बीएचयू में आधुनिक पद्धति के नए पाठ्यक्रम शुरू किए जाते। हमारा पड़ोसी देश चीन बिजली की मुश्किलों से…
  • cartoon
    आज का कार्टून
    कार्टून क्लिक: एक वीरता पुरस्कार तो ग़रीब जनता का भी बनता है
    24 Jan 2022
    बेरोज़गारी, महंगाई और कोविड आदि की मार सहने के बाद भी भारत की आम जनता ज़िंदा है और मुस्कुरा कर पांच राज्यों में फिर मतदान की लाइन में लगने जा रही है, तो एक वीरता पुरस्कार तो उसका भी बनता है...बनता है…
  • genocide
    पार्थ एस घोष
    घर वापसी से नरसंहार तक भारत का सफ़र
    24 Jan 2022
    भारत में अब मुस्लिम विरोधी उन्माद चरम पर है। 2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से इसमें लगातार वृद्धि हुई है।
  • bulli bai
    डॉ. राजू पाण्डेय
    नफ़रत का डिजिटलीकरण
    24 Jan 2022
    सुल्ली डील्स, बुल्ली बाई, क्लबहाउस और अब ट्रैड्स के ज़रिये अल्पसंख्यक समुदाय के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाने का काम लगातार सोशल मीडिया पर हो रहा है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License