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दिल्ली : हवा की गुणवत्ता ‘गंभीर’ लेकिन नीति-नियंता 'अगंभीर'
सुप्रीम कोर्ट, केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार की तमाम सक्रियता के बावजूद हवा की गुणवत्ता खराब ही बनी हुई है। इससे इतर स्थिति यह है कि गौतम गंभीर जैसे नेता वायु प्रदूषण से जुड़ी बैठक में भाग नहीं ले रहे हैं तो दूसरी ओर अमीरों के लिए ऑक्‍सीजन बार खुल रहे हैं।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
16 Nov 2019
delhi pollution

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में शनिवार सुबह भी हवा की गुणवत्ता ‘गंभीर’ श्रेणी में बनी हुई है। दिल्ली में शनिवार सुबह आठ बजकर 40 मिनट पर वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 412 दर्ज किया गया, जबकि शुक्रवार सुबह 10 बजे एक्यूआई 467 था। फरीदाबाद में एक्यूआई 427, गाजियाबाद में 424, ग्रेटर नोएडा 377, नोएडा में 411 और गुड़गांव में एक्यूआई 420 रहा।

201 और 300 के बीच एक्यूआई को ‘खराब’ और 301-400 के बीच एक्यूआई ‘बेहद खराब’ तथा 401-500 के बीच एक्यूआई ‘गंभीर’ माना जाता है। दिल्ली में लगातार चौथे दिन शुक्रवार को भी धुआं-कोहरे (स्मॉग) की मोटी परत छायी रही और प्रतिकूल मौसम के कारण प्रदूषक कण नहीं छंटे।

राष्ट्रीय राजधानी में वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) शुक्रवार शाम चार बजे 463 था और द्वारका सेक्टर आठ सबसे अधिक प्रदूषित क्षेत्र रहा, जहां एक्यूआई 495 था। वायु गुणवत्ता की निगरानी करने वाले अधिकतर स्टेशनों ने एक्यूआई 450 से अधिक दर्ज किया। छिटपुट बारिश से प्रदूषण से निजात मिलने की संभावना कम है और इसलिए हवा की गुणवत्ता में 17 नवंबर तक सुधार होने की उम्मीद है।

'अगंभीर' नेता

दिल्ली सरकार ने हालांकि शुक्रवार को कहा कि सम-विषम योजना की अवधि को बढ़ाने पर सोमवार सुबह फैसला लिया जायेगा क्योंकि अगले दो-तीन दिनों में हवा की गुणवत्ता में सुधार होने की उम्मीद है।

प्रदूषण की इसी गंभीर समस्या पर चर्चा करने के लिए शुक्रवार को शहरी विकास मंत्रालय से जुड़ी संसद की स्थायी समिति की एक बैठक बुलाई गई थी। इस बैठक में दिल्ली-एनसीआर में फैले वायु प्रदूषण के मुद्दे पर चर्चा होनी थी, लेकिन इस बैठक को टालना पड़ा। ज्यादातर सांसद और कई अधिकारी इस बैठक में पहुंचे ही नहीं।

बैठक में शामिल न होने वाले नेताओं में से एक हैं बीजेपी सांसद गौतम गंभीर। पूर्व क्रिकेटर गंभीर पूर्वी दिल्ली से लोकसभा सांसद हैं। प्रदूषण पर होने वाली इस अहम बैठक में गंभीर की गैर-मौजूदगी पर सोशल मीडिया पर उनकी काफी आलोचना हुई। बताया गया कि वो बैठक में न जाकर इंदौर में जलेबी खा रहे थे।

सोशल मीडिया पर एक सरकारी नोटिस भी शेयर किया जा रहा है जिसमें इस बैठक से जुड़ी जानकारियां हैं। यह नोटिस आठ नवंबर को जारी किया गया था। इस नोटिस में प्रस्तावित बैठक की तारीख 15 नवंबर लिखी हुई है।

वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने भी इसे लेकर गौतम गंभीर पर निशाना साधा है। उन्होंने व्यंग्य करते हुए फेसबुक पर लिखा, 'पर्यावरण को लेकर शहरी विकास मंत्रालय की संसदीय समिति की बैठक में न जाकर आपने एक गंभीर कार्य किया है। जब प्रधानमंत्री, पर्यावरण मंत्री, मुख्यमंत्री और सुप्रीम कोर्ट से हवा साफ़ नहीं हुई तो यह बेहद हल्की बात है कि संसदीय समिति की बैठक में जाने से हवा साफ़ हो जाती।

वहाँ भी चाय समोसा ही चलना था तो क्यों न इंदौर की जलेबी खाकर उपभोक्ता सूचकांक में वृद्धि की जाए जिसकी रिपोर्ट सरकार ने जारी होने पर रोक लगा दी। आप और आपके तीन साथियों को जलेबी खाता देख पूरी रिपोर्ट ही ग़लत हो जाती है कि चालीस साल में उपभोक्ताओं का मासिक ख़र्च सबसे नीचे आ गया है। आपने सही काम किया इंदौर जाकर और मीटिंग छोड़ कर।'

ऑक्‍सीजन बार

वायु प्रदूषण से जूझ रही दिल्‍ली में अब एक अनोखा और नया कॉन्‍सेप्‍ट आया है। यहां इसी साल मई से ऑक्‍सी बार खोला गया है। इस बार में आप 15 मिनट तक शुद्ध ऑक्‍सीजन ले सकते हैं। यही नहीं आप सात अलग-अलग फ्लेवर्स में शुद्ध ऑक्‍सीजन ऑर्डर कर सकते हैं। इन फ्लेवर्स में शामिल हैं- स्‍पियरमिंट, पेपरमिंट, दालचीनी, संतरा, लेमनग्रास, यूकेलिप्‍टिस और लैवेंडर।

फाइनेंशियल एक्सप्रेस की खबर के अनुसार, बार वातावरण के दबाव को नियंत्रित कर ग्राहकों को शुद्ध ऑक्‍सीजन देता है। ग्राहकों को एक ट्यूब दी जाती है जिसके जरिए वे फ्लेवर्ड ऑक्‍सीजन में सांस लेते हैं। एक आदमी दिन में एक ही बार इस तरह ऑक्‍सीजन ले सकता है। यहां पर कोई भी जरूरतमंद व्यक्ति 299 रुपये चुकाकर 15 मिनट तक ऑक्सीजन ले सकता है।

यानी अमीर आदमी ही दिल्ली में अब ऑक्‍सीजन ले सकता है। आम छात्र, गरीब, बूढ़े और बच्चों की चिंता करने वाला कोई नहीं है। गौरतलब है कि दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते प्रदूषण के स्तर को देखते हुए राजधानी के छात्रों ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर स्वच्छ हवा सुनिश्चित करने का आग्रह किया था। पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण प्राधिकरण ने खतरनाक वायु गुणवत्ता का हवाला देते हुए स्कूलों को बंद करने की सिफारिश की थी।

जिसके चलते गुरुवार और शुक्रवार को स्कूल बंद रखे गए है। वहीं, गुरुवार को बाल दिवस था, लेकिन बढ़ते प्रदूषण को देखते हुए छात्रों ने बाल दिवस को नहीं मनाया। ऐसा पहली बार हुआ है, जब प्रदूषण के कारण बाल दिवस पर स्कूल बंद किए गए।

एक छात्र ने पत्र में लिखा कि मैं पहले फुटबॉल खेलता था, लेकिन प्रदूषण को देखते हुए अब बाहर नहीं खेल सकता क्योंकि बाहर खेलते समय सांस लेने में दिक्कत आ रही है। अगर चले भी जाएं तो ज्यादा देर तक खेल नहीं सकते।

एक अन्य छात्र ने लिखा, भारत सरकार और राज्यों की सरकारों को इस गंभीर स्थिति को नियंत्रित करने के लिए एक मजबूत निर्देश की आवश्यकता है। हमें अपने प्रधानमंत्री पर विश्वास है कि वह निश्चित रूप से इस पर कड़ा निर्णय लेंगे।

ठोस उपाय नहीं

सुप्रीम कोर्ट, केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार की तमाम सक्रियता के बावजूद हवा की गुणवत्ता खराब ही बनी हुई है। इसका सीधा मतलब है कि सेहत के लिए घातक साबित होते प्रदूषण से बचने के लिए ठोस उपाय नहीं किए जा रहे हैं।

यदि हमारे नीति-नियंता यह समझ रहे हैं कि प्रदूषण के गंभीर हो जाने के बाद उससे निजात पाने के आधे-अधूरे कदम उठाने से समस्या का समाधान हो जाएगा तो ऐसा होने वाला नहीं है।

इसमें हैरानी वाली बात नहीं है कि सम-विषम जैसी योजना के लागू होने के बाद भी हवा की गुणवत्ता में उल्लेखनीय बदलाव नहीं हो रहा है। खुद सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि यह योजना प्रदूषण नियंत्रण का प्रभावी उपाय नहीं। यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि सरकारें वायु प्रदूषण के मूल कारणों को समझने और उनका निवारण करने के लिए तैयार नहीं।

यह समझा जाना चाहिए कि केवल आदेश-निर्देश देने, बैठकें करने और चिंता जताने से वायु प्रदूषण से छुटकारा मिलने वाला नहीं है। बीते करीब एक दशक से अक्टूबर-नवंबर में वायु प्रदूषण उत्तर भारत के लिए एक आपदा जैसा साबित हो रहा है, लेकिन न तो पंजाब और हरियाणा की सरकारें पराली दहन की समस्या से निपटने के ठोस कदम उठा सकी हैं और न ही दिल्ली सरकार उन कारणों का निवारण कर सकी है जो प्रदूषण बढ़ाने का काम करते हैं। यह सरकारी तंत्र के गैर जिम्मेदाराना रवैये की पराकाष्ठा है।

बदतर हैं हालात

हालात यह है कि दुनिया के सबसे जाने-माने मेडिकल जर्नल लांसेट से जुड़े संगठन लांसेट काउंटडाउन की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक अगर युद्धस्तर और हर स्तर पर कुछ नहीं किया गया तो अगली पीढ़ी सिर्फ जहरीली सांस लेगी और हर रोज एक नई बीमारी का शिकार बनेगी। इससे उनमें फेफड़ों और दिल की बीमारियां बढ़ेंगी।

सत्याग्रह की एक रिपोर्ट के मुताबिक, लांसेट काउंटडाउन- 2019 में कहा गया है कि 2016 से 2018 के बीच जहां पूरी दुनिया में फॉसिल फ्यूल का प्रयोग 2.6 फासदी बढ़ा वहीं भारत में कोयले से मिलने वाली बिजली 11 फीसदी बढ़ गई। इसका नतीजा यह हुआ पीएम 2.5 जैसे खतरनाक कणों के कारण 2016 में हमारे यहां 5.3 लाख लोगों की मौत हुई।

बदलती जलवायु का सबसे अधिक ख़तरा बच्चों को ही होता है। उनका शरीर और इम्यून सिस्टम बीमारियों से लड़ने के लिये पूरी तरह से तैयार नहीं होता। अपनी भौगोलिक स्थित के कारण भारत पर क्लाइमेट चेंज का खतरा कई अन्य देशों से वैसे भी अधिक है।

2017 में हुए एक अध्ययन में भारत को क्लाइमेट चेंज के खतरे के लिहाज से दुनिया का छठा सबसे अधिक संकटग्रस्त देश बताया गया था। इसी साल जनवरी में एचएसबीसी की एक रिपोर्ट में भी कहा गया कि 67 देशों में भारत की इकॉनोमी को जलवायु परिवर्तन से सबसे बड़ा खतरा है।इससे समझा जा सकता है कि हम किस मुहाने पर खड़े हैं।

(समाचार एजेंसी भाषा के इनपुट के साथ)

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