NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
दिल्ली चुनाव : क्या कोई नौकरी और वेतन के बारे में बात कर रहा है?
बेरोज़गारी लगातार बढ़ रही है, लेकिन इस पर कोई चर्चा नहीं हो रही कि आख़िर नौकरियां कैसे पैदा होंगी।
सुबोध वर्मा
24 Jan 2020
Translated by महेश कुमार
Delhi Election

दिल्ली को अक्सर सपनों का शहर कहा जाता है। लोग नौकरियों की तलाश में राजधानी की तरफ़ रुख करते हैं, ताकि वे ग्रामीण भारत में जीवन में आए ठहराव को तोड़ सकें और दुख से बच सकें और अपने जीवन को एक बेहतर रास्ते पर ला सकें। और, यह भी कहा जा सकता है कि महानगर और उसके आस-पास के इलाक़े हमेशा लाखों लोगों को रोज़गार प्रदान करते हैं। लेकिन इस ख़ूबसूरत बहाने के पीछे एक कठोर, अदृश्य वास्तविकता भी है जो अक्सर छिपी रहती है। इस पर मुख्यधारा का मीडिया, प्रमुख राजनीतिक दल और राज्य और केंद्र सरकार अक्सर चुप ही रहना पसंद करते हैं।

जबकि वास्तविकता यह है कि न केवल बेरोज़गारी बढ़ रही है, बल्कि विशाल छिपी या प्रच्छन्न बेरोज़गारी भी मौजूद है जो ज़हरीली हवा की तरह लोगों का दम घोंटने का काम कर रही है।

कुल 11 प्रतिशत से अधिक बेरोज़गार, महिलाओं में 46 प्रतिशत बेरोज़गारी

पहले बेरोज़गारी के आंकड़ों पर एक नज़र डालते है। नवीनतम सीएमआईई के अनुमानों के अनुसार, केवल पिछले दो वर्षों में, जनवरी 2018 से बेरोज़गारी दर बढ़कर दिसंबर 2019 में 11.2 प्रतिशत हो गई है। [नीचे चार्ट देखें] याद रखें, दिल्ली में व्यावहारिक रूप से कोई खेती नहीं होती है। इसलिए इस उच्च दर के मामले में सीधे खेती का कोई सामान्य संकट नहीं है, हालाँकि बड़े शहरों में नौकरी चाहने वाले हताश लोगों की बढ़ती भीड़ जो बाक़ी हिस्सों से शहरों में आती है, ऐसा अनुमान है कि उन्होंने इस बेरोज़गारी की संख्या को बढ़ाने में योगदान दिया हो।

graph 1_4.JPG

यदि आप इसकी गहराई में जाते हैं, तो चीज़ें साफ़ और भयानक दिखेंगी। सितंबर-दिसंबर 2019 के नए सीएमआईई अनुमान के अनुसार, 10-12 वीं कक्षा तक पढ़ाई करने वाले युवाओं में बेरोज़गारी की दर एक चौंकाने वाली रफ़्तार से बढ़ी है, यह 23 प्रतिशत पर है। इसका मतलब है कि चार में से हर एक व्यक्ति इस विशेष समूह में बेरोज़गार है। वे कौन लोग हैं जिन्होंने केवल इस स्तर तक की पढ़ाई की होगी? निश्चित रूप से वे मध्यम और उच्च वर्ग से तो नहीं होंगे। ये  मुख्य रूप से कामकाजी लोग, मज़दूर और निम्न मध्यम वर्ग के लोग हैं जो इस संकट का सामना कर रहे हैं। स्नातकों के बीच भी, बेरोज़गारी की दर लगभग 17 प्रतिशत है।

इससे भी ज़्यादा चौंकाने वाली बात तो यह है कि उन महिलाओं में बेरोज़गारी की दर अधिक है जो काम करने की इच्छुक हैं और सक्रिय रूप से नौकरी की तलाश में रहती हैं। इसका स्तर  46 प्रतिशत है जो काफ़ी ऊंचा स्तर है! यानी हर दो महिला में लगभग एक महिला बेरोज़गार है। याद रखें: हम उन महिलाओं के बारे में बात नहीं कर रहे हैं जो घरेलू काम-काज/कर्तव्यों की वजह से घर में रहना पसंद करती हैं। यह काम की तलाश में रहने वाली महिलाओं के बारे में है।

दिल्ली के तीनों तीन प्रमुख दलों में से किसी ने भी अभी तक इस भयानक स्थिति के बारे में कुछ नहीं कहा है। हालांकि अभी चुनाव की शुरुआत है, लेकिन इनके पिछले रिकॉर्ड के अनुसार, इसकी संभावना कम है कि आने वाले चुनाव अभियान में बेरोज़गारी पर सक्रिय रूप से चर्चा की जाएगी।

कम वेतन/मज़दूरी = छिपी हुई बेरोज़गारी

बेरोज़गारी की कोई भी परिभाषा केवल शुद्ध बेरोज़गारी को गिनने से पूरी नहीं होगी, अर्थात्, जिनके पास किसी भी तरह का कोई काम नहीं है और इसलिए, उनकी कोई आय नहीं है। वे निश्चित रूप से आर्थिक समर्थन के लिए अपने परिवारों पर निर्भर रहते हैं।

लेकिन ऐसे लोगों की एक विशाल सेना है जो तकनीकी रूप से ‘बेरोज़गार’ नहीं है, लेकिन ऐसे लोग कम वेतन पर काम करते हैं, ताकि उनकी जीवन की नांव बहती रहे। ये केवल औद्योगिक श्रमिक,  रिक्शा चालक या ढुलाई वाले या उस तरह के अन्य मज़दूर नहीं हैं। निम्न बेरोज़गारों में लाखों लोग शामिल हैं जो निजी क्षेत्रों में जैसे मीडिया कार्यालयों से लेकर कंपनियों के कार्यालयों, सेल्स, दुकान के कर्मचारियों, सुरक्षा कर्मचारी आदि की हैसियत से काम करते हैं।

हाल ही में राष्ट्रीय सांख्यिकी संगठन (एनएसओ) की तरफ़ से किए गए आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफ़एस) के आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली में एक ग़ैर-स्थायी मज़दूर को 2018 की पहली छमाही में लगभग 376 रुपये प्रति दिन वेतन मिला। इस हिसाब से मज़दूर का वेतन प्रति माह लगभग 9500 रुपए बैठता है। इसकी तुलना करें कि केंद्र सरकार ने घोषित न्यूनतम वेतन को सातवें वेतन आयोग के बाद एक कर्मचारी को 18,000 रुपए प्रति माह की सिफ़ारिश की है। और, यह 2016 के सिफ़ारिश है।

नियमित या वेतनभोगी कर्मचारियों के मामले में आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफ़एस) का अनुमान वास्तव में लगभग 18,760 रुपये है। लेकिन यह अनुमान से अधिक प्रतीत होता है क्योंकि दिल्ली सरकार द्वारा अधिसूचित न्यूनतम वेतन भी मात्र 13,600 रुपए है। ट्रेड यूनियनों द्वारा किए गए सर्वेक्षण से पता चला है कि लगभग 20 प्रतिशत से अधिक श्रमिकों/कर्मचारियों को यह वैधानिक वेतन भी नहीं मिल रहा है। इतने कम वेतन को पाने के लिए बहुत से लोग 10 घंटे काम करते हैं, जो कि ग़ैर-क़ानूनी बात है। लेकिन वे ऐसे ही जीवित रहते हैं।

दिल्ली में नौकरियों की अनिश्चित प्रकृति की ख़बर पीएलएफ़एस रिपोर्ट में मिली अन्य जानकारी से स्पष्ट हो जाती है। दिल्ली में दो तिहाई से अधिक नियमित कर्मचारियों के पास नौकरी का कोई भी लिखित अनुबंध नहीं है। वे पलक झपकते ही अपनी आजीविका खो सकते हैं। उनमें से लगभग 45 प्रतिशत को किसी भी तरह की कमाई वाली छुट्टी (Paid Leave) नहीं मिलती है। इसका मतलब है कि अगर वे एक दिन की भी छुट्टी लेते हैं तो वे अपनी दिन की कमाई खो देंगे। नियमित श्रमिकों के 57 प्रतिशत मज़दूरों को पीएफ़, ईएसआई (चिकित्सा बीमा), ग्रेच्युटी, पेंशन, आदि जैसे सामाजिक सुरक्षा के लाभों का कोई प्रावधान नहीं है। और सभी नियमित श्रमिकों के तिहाई हिस्से के पास - नौकरी अनुबंध, कमाई वाली छुट्टी या  सामाजिक सुरक्षा नहीं है।

2_16.JPG

ऐसी परिस्थितियों में कौन काम करना चाहेगा? केवल वे लोग जिन्हें काम नहीं मिल रहा है उन्हें वास्तविक समर्थन की ज़रूरत है। चूंकि वे नौकरी पाने के लिए बेताब हैं इसलिए वे एक दुलाम जैसी स्थिति में काम करने पर मजबूर हो जाते हैं। यह देश की प्रच्छन्न (छिपी) बेरोज़गारी है

अरब डॉलर का प्रश्न यह है कि: देश की राजधानी में लोगों की ऐसी स्थिति, विशेष रूप से युवाओं की इस दुखद स्थिति का चुनावी निहितार्थ क्या है? यह एक जटिल मुद्दा है जिसका  कोई भी आसान जवाब नहीं है। लेकिन संकेत यह हैं कि मोदी सरकार मुख्य रूप से इसके लिए ज़िम्मेदार है क्योंकि इसने पूरे देश को प्रभावित करने वाले आर्थिक संकट को थोप दिया है। दिल्लीवासी राज्य स्तर के मुद्दों और राष्ट्रीय मुद्दों के बीच के अंतर को जानते हैं। उन्होंने 2014 में और 2019 में दो बार मोदी को वोट दिया। इसलिए - यह संभावना है कि यह ग़ुस्सा  उन लोगों के ख़िलाफ़ उतरेगा जिन्होंने 2014 में हर साल एक करोड़ नौकरी पैदा करने का वादा किया था।

अंग्रेजी में लिखा मूल आलेख आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

Delhi Elections: Who Is Talking About Jobs and Wages?

Delhi Assembly 2020
BJP
AAP
Congress
Narendra modi
sonia gandhi
Arvind Kejriwal

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति


बाकी खबरें

  • punjab
    भाषा सिंह
    पंजाब चुनावः परदे के पीछे के खेल पर चर्चा
    19 Feb 2022
    पंजाब में जिस तरह से चुनावी लड़ाई फंसी है वह अपने-आप में कई ज़ाहिर और गुप्त समझौतों की आशंका को बलवती कर रही है। पंजाब विधानसभा चुनावों में इतने दांव चले जाएंगे, इसका अंदाजा—कॉरपोरेट मीडिया घरानों…
  • Biden and Boris
    जॉन पिलगर
    युद्ध के प्रचारक क्यों बनते रहे हैं पश्चिमी लोकतांत्रिक देश?
    19 Feb 2022
    हाल के हफ्तों और महीनों में युद्ध उन्माद का ज्वार जिस तरह से उठा है वह इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है
  • youth
    असद रिज़वी
    भाजपा से क्यों नाराज़ हैं छात्र-नौजवान? क्या चाहते हैं उत्तर प्रदेश के युवा
    19 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश के नौजवान संगठनों का कहना है कि भाजपा ने उनसे नौकरियों के वादे पर वोट लिया और सरकार बनने के बाद, उनको रोज़गार का सवाल करने पर लाठियों से मारा गया। 
  • Bahubali in UP politics
    विजय विनीत
    यूपी चुनाव: सियासी दलों के लिए क्यों ज़रूरी हो गए हैं बाहुबली और माफ़िया?
    19 Feb 2022
    चुनाव में माफ़िया और बाहुबलियों की अहमियत इसलिए ज्यादा होती है कि वो वोट देने और वोट न देने,  दोनों चीज़ों के लिए पैसा बंटवाते हैं। इनका सीधा सा फंडा होता है कि आप घर पर ही उनसे पैसे ले लीजिए और…
  • Lingering Colonial Legacies
    क्लेयर रॉथ
    साम्राज्यवादी विरासत अब भी मौजूद: त्वचा के अध्ययन का श्वेतवादी चरित्र बरकरार
    19 Feb 2022
    त्वचा रोग विज्ञान की किताबों में नस्लीय प्रतिनिधित्व की ऐतिहासिक कमी ना केवल श्वेत बहुल देशों में है, बल्कि यह पूरी दुनिया में मौजूद है
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License