NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कानून
भारत
राजनीति
दिल्ली उच्च न्यायालय की महिला वकीलों के मंच ने 2020 पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है
युवा पीढ़ी की वकीलों को इस नेक पेशे में न्याय के प्रति प्रेरित करने के लिए मंच ने सुप्रसिद्ध क़ानूनी जानकारों द्वारा वेबिनार की एक श्रृंखला खड़ी करने का काम किया।
मेघा कठेरिया
03 Jan 2021
दिल्ली उच्च न्यायालय की महिला वकीलों के मंच ने 2020 पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है

मेघा कठेरिया का कहना है कि दिल्ली उच्च न्यायालय की वीमेन लायर्स फोरम द्वारा ली गई छोटी पहल, जिसे उन्होंने वर्चुअल कैंटीन नाम दिया है, यह महिलाओं को क़ानूनी पेशे में मदद पहुँचाने के लिए एक बेहतरीन मददगार प्रणाली के तौर पर उभरी है।

एक ऐसे वर्ष में जब देश राज्य द्वारा लॉकडाउन और अधिकारों पर हमलों से घिरा हो, ऐसे दौर में दिल्ली उच्च न्यायालय वीमेन लायर्स फोरम अपने साथी वकीलों एवं नागरिकों को मदद पहुँचाने के लिए आगे आया है।

अपनी इस पहल जिसका रचनात्मक नामकरण वर्चुअल कैंटीन रखा गया था, जिसने क़ानूनी पेशेवरों की कामकाजी जीवन में भाईचारे की समर्थन प्रणाली के आधार को फिर से ताज़ा करने का काम किया है। लीफलेट से बात करते हुए अधिवक्ता सुरुचि सूरी का कहना था “हममें से हर कोई कैंटीन के साथ जुडी खुशमिजाजी की कमी को महसूस करता है, जो कि हमारी क़ानूनी लड़ाई वाली जिंदगी में एक अहम रोल अदा करता है। हम वहाँ मंडराते रहते थे, वहाँ से हम बोर्ड पर नजर बनाए रखते थे और निजी एवं पेशेवर दोनों ही मामलों पर राय-मशविरा लिया करते थे। यह केवल एक समोसे का सवाल नहीं है, बल्कि यह चाय या कॉफ़ी और अपने दोपहर के भोजन को साझा करने से बने रिश्ते पर आधारित था।”

ऐसा करने के दौरान मंच के पहले वेबिनार ने महामारी और इसके परिणामस्वरूप लागू किए गए लॉकडाउन के कारण उत्पन्न हुई व्यापक निराशा एवं चिंता से निपटने के लिए मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे पर पहला वेबिनार को आयोजित किए जाने की मांग की गई थी।

सूरी कहती हैं “पहले हम महिलाओं के प्रतिनिधित्व के बारे में बातें किया करते थे, लेकिन लॉकडाउन में हम उन मुद्दों पर कहीं अधिक केन्द्रित रहे जिनसे कामकाजी लोगों को घर से काम करते हुए दो चार होना पड़ता है। भावनात्मक समर्थन के साथ-साथ हम महिला वकीलों के वास्तविक मुद्दों से निपट रहे हैं, उन्हें घरेलू मांगों के आगे उपभोग करने के बजाय अपनी ही खोल में रखा जा रहा है। महिलाओं के लिए यह हमेशा से एक चुनौती रही है, जहाँ वे अपने लक्ष्य से भटक जाती हैं, और यह महामारी इस प्रकार का एक सटीक अवसर है जहाँ महिलाएं आसानी से अपने लक्ष्य से भटक सकती हैं।”

ऐसा करने के लिए मंच द्वारा पहले वेबिनार में महामारी और इसके परिणामस्वरूप लाये गए लॉकडाउन की वजह से व्यापक स्तर पर निराशा और चिंता के दिनों में उत्पन्न हुए मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे से निपटने की माँग की गई थी।

इस माँग पर खड़े होते हुए मंच द्वारा दिग्गज क़ानूनी पेशेवरों के वेबिनार की एक क्रमबद्ध श्रृंखला को युवा पीढ़ी के वकीलों के बीच में न्याय की तलाश में प्रेरित करने के लिए आयोजित किया गया था।

अधिवक्ता नंदिता राव ने द लीफलेट से बात करते हुए बताया “वकीलों के तौर पर हमारी जीविषा युवाओं के बीच में आपसी कलह और वरिष्ठ वकीलों की सनक की चूहा दौड़ में खो जाती है। हमें इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि हम यहाँ पर क्यों हैं। हमें अपना मूल्यांकन इस आधार पर करना चाहिए कि हमने न्याय की खातिर क्या किया है।”

राव ने आगे कहा “नारीवाद पदानुक्रम को चुनौती देने का काम करता है और समानता एवं करुणा की चाहत रखता है। नारीवादियों के तौर पर हमें सफलता को अलग तरीके से परिभाषित किये जाने की आवश्यकता है।”

महिला अधिवक्ताओं को किस हद तक शीशे की दीवार का सामना करना पड़ता है, इस पर प्रकाश डालते हुए अधिवक्ता सुनीता ओझा ने द लीफलेट को बताया “हम यह नहीं कह रहे हैं कि महिलाओं के साथ खास ढंग से पेश आना चाहिए। यह सिर्फ उनके लिए क्रेच जैसी बुनियादी सुविधाओं को उपलब्ध कराए जाने के बारे में है। बार ने कभी भी इसे एक महत्वपूर्ण मुद्दे के तौर पर नहीं देखा है, जबकि इसी के चलते अधिकतर महिलाएं इस पेशे को छोड़ चुकी हैं। यह शीशे की दीवार कहीं न कहीं बीच में है, यह दीवार कोई छत नहीं है।”

इस माँग पर खरे उतरते हुए फोरम ने दिग्गज क़ानून के जानकारों की वेबिनार की एक श्रृंखला तैयार की जिसने युवा पीढ़ी के वकीलों को इस नेक पेशे में न्याय की तलाश के लिए प्रेरित करने का काम किया है।

शायद इसके निर्विवाद प्रभाव के सबसे बड़े सबूत के तौर पर इस “नारीवादी वकालत के काम’ पर वेबिनार के आयोजन के खिलाफ ट्रोल्स द्वारा किये गए साइबर हमलों में देखा जा सकता है।

ट्रोल्स के हमलों से प्रभावित हुए बिना इसे जारी रखते हुए अधिवक्ता मरियम फोजिया रहमान का कहना था “मैं दिल से यकीन करती हूँ कि हमारे पास आज नारीवादी क़ानूनी कामकाज के बारे में बात करने की मज़बूत वजहें हैं। इस अद्भुत मंच के ज़रिए  हमारे द्वारा कई ढेर सारे वेबिनारों को आयोजित किये जाने के पीछे कई मजबूत वजहें हैं।”

वेबिनर में वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने मंच की सराहना करते हुए कहा “इस वेबिनार को नुकसान पहुँचाने के उद्देश्य से कुछ लोगों द्वारा एक सुस्पष्ट एवं सचेतन कोशिशें जारी हैं, और इसे हमें एक प्रशंसा के तौर पर लेने की जरूरत है, कि हम उनके लिए मायने रखते हैं।”

राव ने कहा “नारीवाद, पदानुक्रम को चुनौती देने का काम करता है और समानता एवं करुणा की चाहत रखता है। नारीवादियों के तौर पर हमें सफलता को भिन्न तरीके से परिभाषित करने की आवश्यकता है।”

इस मंच ने बारम्बार जो कहा उसे ज़मीन पर उतारने का काम किया है। मंच की ओर से कहा गया कि “एक नागरिक और कानून के अधिकारी के तौर पर हमारा मानना है कि राज्य मशीनरी को कहीं ज्यादा कुशल, रणनीतिक तौर पर सक्षम एवं मानवीय बनाये जाने की जरूरत है, बजाय कि जिस प्रकार की छवि दुःखद रूप से उभर कर आ रही है।” 

हाथरस वाले जघन्य मामले में राज्य की मिलीभगत से पूरी तरह से हैरान इस मंच ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखा, जिसमें राज्य के अधिकारियों के खिलाफ तत्काल कार्यवाही करने और एक विशेष जाँच दल के गठन की माँग की गई थी।

इस पत्र में कहा गया है कि लोगों को ऐसी घटनाओं की रिपोर्ट करने के लिए आगे आने का साहस नहीं होगा, जब वे यह देख रहे हैं कि परिवार के सदस्यों को अंतिम संस्कार तक नहीं करने दिया जा रहा है। 

अधिवक्ता नंदिता राव की मदद से, मंच की तरफ से उपस्थित होते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने कोर्ट अनुरोध किया कि वह पीड़ित के परिवार और इस मामले के गवाहों को सीआरपीएफ की सुरक्षा मुहैय्या कराये।

वकीलों ने हाथरस पर सर्वोच्च न्यायालय में सत्यमा दुबे की मार्फत मुकदमे में एक हस्तक्षेप याचिका दायर की है।

अधिवक्ता नंदिता राव की मदद से, मंच की तरफ से उपस्थित होते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने कोर्ट अनुरोध किया कि वह पीड़ित के परिवार और इस मामले के गवाहों को सीआरपीएफ की सुरक्षा मुहैय्या कराये। यह तर्क रखते हुए कि उच्च न्यायालय भी इस मामले को देख सकता है, उन्होंने निवेदन किया है कि कोर्ट उत्तर प्रदेश से इस मुकदमे को दिल्ली स्थानांतरित कर सकती है और इस मामले पर अदालत की निगरानी में जाँच को गठित कर सकती है। 

वहीं 23 दिसंबर के दिन मंच ने उन वकीलों के समूह का नेतृत्व किया, उन्होंने किसानों के साथ अपनी एकजुटता का इजहार करने के लिए दिन भर का उपवास रखा था।

27 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने पीड़ित परिवार और गवाहों के लिए सीआरपीएफ की सुरक्षा के निर्देश दिए। इसने इलाहाबाद उच्च न्यायालय को इस मामले के सभी पहलुओं के साथ केन्द्रीय जांच ब्यूरो द्वारा चलाई जा रही जांच की निगरानी रखने का काम भी सौंप दिया है।  इस जांच के तहत ही है कि सीबीआई ने एक आरोप पत्र दाखिल किया है, जिसमें पीड़िता के साथ बलात्कार की पुष्टि की गई है, जो राज्य सरकार के दावे के विपरीत है। आरोप पत्र  में सरकार का दावा था कि राज्य को बदनाम करने की यह एक साजिश है।

अपने उद्येश्य पर दृढ रहते हुए मंच ने एक बार फिर से आगे बढ़कर इस वर्ष के पूर्व में संसद द्वारा पारित किये गए कृषि कानूनों का विरोध कर रहे किसानों के साथ अपनी एकजुटता को ज़ाहिर किया है। 23 दिसंबर के दिन मंच की ओर से वकीलों के एक समूह का नेतृत्व किया गया था, जिन्होंने किसानों के समर्थन में दिन भर का उपवास रखा था। 

इस अवसर पर अधिवक्ता नंदिता राव ने कहा “मेरे पास सिर्फ दो शब्द हैं: ‘जय जवान, जय किसान’. यह हमारे देश की नींव है। कुछ लोगों के लिए फटाफट मुनाफे की खातिर यदि इस नींव को झकझोरा जाता है तो हमारी खाद्य सुरक्षा और दीर्घकालिक विकास प्रभावित होने जा रहा है। यदि हम किसानों के साथ न खड़े हुए, तो हम सभी को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी।”

अब जबकि यह साल अपनी समाप्ति के अंतिम दौर पर है, द लीफलेट दिल्ली उच्च न्यायालय की महिला वकीलों के मंच के उत्कृष्ट कार्य की सराहना करता है, और उम्मीद करता है कि आने वाले वर्षों में भी यह युवा पीढ़ी की वकीलों के साथ हमें भी प्रेरित करता रहेगा।

यह लेख मूल रूप से द लीफलेट में प्रकाशित हुआ था। 

(मेघा कठेरिया द लीफलेट में उप-संपादिका के तौर पर कार्यरत हैं।)

इस लेख को मूल अंग्रेजी में पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

Delhi High Court Women Lawyers Forum’s Indelible Mark on 2020

Delhi High court
Delhi High Court Women Lawyers Forum
Mental health
feminism

Related Stories

मैरिटल रेप : दिल्ली हाई कोर्ट के बंटे हुए फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, क्या अब ख़त्म होगा न्याय का इंतज़ार!

फादर स्टेन की मौत के मामले में कोर्ट की भूमिका का स्वतंत्र परीक्षण जरूरी

विरोध प्रदर्शन को आतंकवाद ठहराने की प्रवृति पर दिल्ली उच्च न्यायालय का सख्त ज़मानती आदेश

UAPA के सेक्शन 43(5) (D) की ख़ामियां उजागर कर दिल्ली हाईकोर्ट ने कमाल कर दिया!

समलैंगिक शादियों की कानूनी मान्यता क्यों ज़रूरी है?

अकेले ड्राइविंग करते हुए भी मास्क पहनना अनिवार्य है : दिल्ली उच्च न्यायालय

काम की स्थिति और शर्तों पर नया कोड  : क्या कार्य सप्ताह में चार या छह दिन होने चाहिए?


बाकी खबरें

  • Nishads
    अब्दुल अलीम जाफ़री
    यूपी चुनाव: आजीविका के संकट के बीच, निषाद इस बार किस पार्टी पर भरोसा जताएंगे?
    07 Mar 2022
    निषाद समुदाय का कहना है कि उनके लोगों को अब मछली पकड़ने और रेत खनन के ठेके नहीं दिए जा रहे हैं, जिसके चलते उनकी पारंपरिक आजीविका के लिए एक बड़ा खतरा उत्पन्न हो गया है।
  • Nitish Kumar
    शशि शेखर
    मणिपुर के बहाने: आख़िर नीतीश कुमार की पॉलिटिक्स क्या है...
    07 Mar 2022
    यूपी के संभावित परिणाम और मणिपुर में गठबंधन तोड़ कर चुनावी मैदान में हुई लड़ाई को एक साथ मिला दे तो बहुत हद तक इस बात के संकेत मिलते है कि नीतीश कुमार एक बार फिर अपने निर्णय से लोगों को चौंका सकते हैं।
  • Sonbhadra District
    तारिक अनवर
    यूपी चुनाव: सोनभद्र के गांवों में घातक मलेरिया से 40 से ज़्यादा लोगों की मौत, मगर यहां के चुनाव में स्वास्थ्य सेवा कोई मुद्दा नहीं
    07 Mar 2022
    हाल ही में हुई इन मौतों और बेबसी की यह गाथा भी सरकार की अंतरात्मा को नहीं झकझोर पा रही है।
  • Russia Ukraine war
    एपी/भाषा
    रूस-यूक्रेन अपडेट: जेलेंस्की ने कहा रूस पर लगे प्रतिबंध पर्याप्त नहीं, पुतिन बोले रूस की मांगें पूरी होने तक मिलट्री ऑपरेशन जारी रहेगा
    07 Mar 2022
    एक तरफ रूस पर कड़े होते प्रतिबंधों के बीच नेटफ्लिक्स और अमेरिकन एक्सप्रेस ने रूस-बेलारूस में अपनी सेवाएं निलंबित कीं। दूसरी तरफ यूरोपीय संघ (ईयू) के नेता चार्ल्स मिशेल ने कहा कि यूक्रेन के हवाई…
  • International Women's Day
    नाइश हसन
    जंग और महिला दिवस : कुछ और कंफ़र्ट वुमेन सुनाएंगी अपनी दास्तान...
    07 Mar 2022
    जब भी जंग लड़ी जाती है हमेशा दो जंगें एक साथ लड़ी जाती है, एक किसी मुल्क की सरहद पर और दूसरी औरत की छाती पर। दोनो ही जंगें अपने गहरे निशान छोड़ जाती हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License