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दिल्ली हिंसा : उनकी कहानी जिन्होंने अपनों को खोया...
उत्तर-पूर्वी दिल्ली के दंगाग्रस्त इलाकों में हिंसा में किसी की जान गई, किसी का कोई अपना हमेशा के लिए चला गया, किसी का रोजगार छिना तो कोई बेघर हो गया। यहां ख़ौफ़ज़दा लोगों की अपनी-अपनी आपबीती है।
अमित सिंह, तारिक अनवर, मुकुंद झा
28 Feb 2020
Delhi violence

उत्तरी पूर्वी दिल्ली में बीते दिनों हुई हिंसा में मरने वालों की संख्या 42 तक पहुंच गई है। वे इलाके जो हिंसा से प्रभावित थे, वहां अब भी मुर्दनी छाई हुई है। सड़कों पर पुलिस, रैपिड ऐक्शन फोर्स और अर्धसैनिक बलों के जवान बड़ी संख्या में नजर आ रहे हैं। इन इलाकों में गाड़ियां जलाई गईं, दुकाने लूटी गईं और घर भी जला दिए हैं। नफ़रत की आग से उठे धुएं ने कई लोगों की जान भी ली है।

हिंसा प्रभावित खजूरी खास के श्रीराम कालोनी की गली नंबर 18 में रहने वाले 30 साल के बब्बू की मौत दंगों में हो गई है। बब्बू आटो ड्राइवर थे और उनके तीन बच्चे हैं। बब्बू अपने घर में इकलौते कमाने वाले थे। वो किराए के मकान में रहते थे। बब्बू की मौत तीन दिन तक जीटीबी हॉस्पिटल में भर्ती रहने के बाद हुई।

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उनके बीमार पिता सलीम कहते हैं, 'मुझे नहीं पता है कि उसके साथ क्या हुआ है और कब हुआ। वह घर से आटो लेकर निकला था उसके बाद वापस नहीं लौटकर आया। बाद में घर के बगल वाले खजूरी चौक पर उसकी गाड़ी मिली। कुछ देर बाद सबने बताया कि उसके साथ मारपीट की गई है वह घायल नाले के किनारे पड़ा है। फिर मेरे कुछ रिश्तेदार यहां से उसे हॉस्पिटल लेकर गए। हॉस्पिटल में तीन दिन रहने के बाद खबर आई कि उसकी मौत हो गई है।'

सलीम इतना बताते बताते भावुक हो जाते हैं। वो आगे कहते हैं, 'हमने दंगा करने वालों का क्या बिगाड़ा है। मैंने किसी हिंदू का क्या बिगाड़ा है। या उन्होंने हमारा क्या बिगाड़ा है। कुछ भी तो नहीं...फिर हम एक दूसरे को क्यों मार रहे हैं। फिर वो हमें क्यों मार दे रहे हैं। यह जो कुछ भी हो रहा है वह गलत हो रहा है। यह ठीक नहीं हो रहा है। मेरे बच्चे का परिवार अब कैसे चलेगा। मुझे दंगा करने वालों से बस यही कहना है कि वो जो कर रहे हैं वह सही नहीं है। इसे बंद कर दें।'

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इसी तरह हिंसा प्रभावित कर्दमपुरी में रहने वाले 22 वर्षीय फैजान की मौत हिंसा के दौरान हो गई। फैजान के परिवार का दावा है कि सोशल मीडिया पर वायरल जिस वीडियो में पुलिस पांच लड़कों को कथित रूप से सड़क पर लिटा कर पीट रही है और ‘जन गण मन’ गवा रही है, उसमें एक फैजान भी है। फैजान सिलाई का काम करता था और उसके पिता की मौत कई साल पहले हो चुकी थी।

फैजान की मां अस्तमुल के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। वह रोती जाती हैं और बताती जाती हैं, ‘मैं सोमवार को धरने पर बैठी हुई थी, मेरा बेटा घर में था। उसे पता चला कि बाहर झगड़ा हो गया है। वह मुझे लेने के लिए कर्दमपुरी पुलिया पर गया था। लेकिन पुलिस ने प्रदर्शन स्थल पर आंसू गैस के गोले छोड़ दिए और वहां धुआं छा गया और वह सड़क की तरफ चला गया, जहां पुलिस ने उसे पकड़ लिया।’

उन्होंने आरोप लगाया, ‘पुलिस ने फैजान को बहुत पीटा। उसका चार और लड़कों के साथ सड़क पर पड़े वीडियो वायरल है, जिसमें पुलिस पांच लड़कों को पीट रही है और राष्ट्रगान गवा रही है।’

आपको बता दें कि कर्दमपुरी पुलिया पर संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) और एनआरसी के खिलाफ महिलाओं का एक महीने से ज्यादा समय से शांतिपूर्ण धरना चल रहा था।

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अस्मतुल बताती हैं, इसके बाद पुलिस उनके बेटे को पकड़ कर ज्योति नगर थाने ले गई और वहां भी उसे पीटा और इलाज नहीं कराया। वह बताती हैं, ‘मैं उसकी तलाश में जीटीबी अस्पताल गई और हर कमरे में अपने बेटे को ढूंढा, लेकिन वह नहीं मिला, इसके बाद मैं थाने गई और उसकी फोटो दिखाकर पूछा तो पुलिसकर्मी ने बताया कि वह यहीं है। मैंने कहा, उससे मिलवा दो। लेकिन पुलिस ने न तो मिलवाया और न ही दिखाया। मैं रात एक बजे तक थाने में बैठी रही। मैं बुधवार सुबह फिर थाने गई जहां पुलिस वाले कहने लगे कि इसे भी बंद करो। बाद में मंगलवार रात पुलिस ने मेरे बेटे को छोड़ा।’

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फैजान के पड़ोसी इमरान भारती ने बताया कि पुलिस के छोड़ने के बाद फैजान को घर ले आए तो उसकी तबीयत बिगड़ने लगी। सड़क पर दंगे भड़के होने के कारण उसे अस्पताल नहीं ले जा पा रहे थे तो बड़ी मुश्किल से किसी तरह लोक नायक जयप्रकाश अस्पताल ले जा पाए, जहां उसकी तबीयत और बिगड़ गई और डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। अभी घरवालों को फैजान की लाश भी नहीं मिली है और अस्मतुल रो रोकर बेहाल हो रही हैं।

इसके अलावा, धरना स्थल पर 32 साल के मोहम्मद फुरकान की भी मौत हो गई। इस मामले में भी परिजन दावा कर रहे हैं कि फुरकान पुलिस की गोलीबारी का शिकार हुआ। फुरकान के भाई इमरान ने बताया, ‘24 फरवरी को शाम करीब साढ़े पांच बजे मुझे कॉल आई कि मेरे भाई को गोली मार दी गई , लेकिन मुझे इस पर यकीन नहीं हुआ क्योंकि मैं एक घंटा पहले उससे घर पर मिलकर गया था।’

वह बताते हैं, ‘मैंने उसे कॉल की पर उसने फोन नहीं उठाया तो मुझे शक हुआ। इसके बाद कुछ लोगों का मेरे पास फिर कॉल आया कि मेरे भाई को ऑटो में डालकर अस्पताल लेकर गए हैं। मैं जीटीबी अस्पताल भागा जहां आपातकाल वार्ड में मैंने अपने भाई को तलाश किया। मुझे वहां फुरकान नहीं उसकी लाश मिली।’

इमरान ने बताया कि 32 साल के फुरकान शादीशुदा थे और उनके दो बच्चे है। चार साल की एक लड़की है और दो साल का बेटा है। उनकी शादी 2014 में हुई थी। उन्होंने बताया, ‘कर्दमपुरी में महिलाओं के प्रदर्शन स्थल पर सामने की तरफ से पुलिस या अर्द्धसैनिक बलों ने हमारे टैंट पर आंसू गैस के गोले छोड़े और गोलियां चलाईं। इसी गोलीबारी में मेरे भाई फुरकान के पैर में गोली लग गई। उनके अलावा तीन-चार लोगों को गोली लगी थी। बाकी लोग बच गए लेकिन मेरे भाई की मौत हो गई। बताया जा रहा है कि पुलिस की कार्रवाई में कई महिलाएं भी जख्मी हुई हैं।’

आपको बता दें कि उत्तरपूर्व दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा भड़कने के बाद कम से कम अब तक 42 लोगों की मौत हो चुकी है और 200 से अधिक लोग घायल हुए हैं। दिल्ली पुलिस ने 27 फरवरी यानी गुरुवार देर शाम मारे गए 25 लोगों के नामों की लिस्ट जारी की थी। इसमें दोनों समुदाय के लोग शामिल थे।

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