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आंदोलन
भारत
आंगनवाड़ी की महिलाएं बार-बार सड़कों पर उतरने को क्यों हैं मजबूर?
प्रदर्शनकारी कार्यकर्ताओं का कहना है कि केंद्र और राज्य दोनों सरकारों द्वारा घोषणाओं और आश्वासनों के बावजूद उन्हें अभी तक उनका सही बकाया नहीं मिला है। एक ओर दिल्ली सरकार ने उनका मानदेय घटा दिया है तो वहीं दूसरी ओर उनके काम का बोझ भी बढ़ा दिया है।
सोनिया यादव
23 Feb 2022
protest
image credit- Social media

दिल्ली में सैकड़ों आंगनवाड़ी कार्यकर्ता बीते 23 दिनों से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर हैं। मानदेय में वृद्धि, पेंशन, बीमा जैसी सुविधाओं और सरकारी कर्मचारी के दर्जे की मांग को लेकर धरने पर बैठी इन कार्यकर्ताओं का कहना है कि केंद्र और राज्य दोनों सरकारों द्वारा घोषणाओं और आश्वासनों के बावजूद उन्हें अभी तक उनका सही बकाया नहीं मिला है। एक ओर उन्हें 2018 में घोषित वेतन वृद्धि अभी तक नहीं मिली है, तो वहीं दिल्ली सरकार ने उनका मानदेय घटा दिया और उनके काम का बोझ भी बढ़ा दिया।

बता दें कि यह पहली बार नहीं है जब इन आंगनवाड़ी कार्यकत्रियों और सहायिकाओं ने विरोध प्रदर्शन किया है। अपने कम वेतन और बढ़ते काम के बोझ से परेशान होकर बीते साल सितंबर 2021 में भी हजारों आंगनवाड़ी कार्यकत्रियां राष्ट्रीय राजधानी की सड़कों पर उतर आयी थीं। तब दिल्ली के महिला एवं बाल विकास मंत्री राजेंद्र पाल गौतम ने आश्वासन दिया था कि उनकी मांगों पर एक सप्ताह के भीतर अमल किया जाएगा। हालांकि, तब से चार महीने बीत चुके हैं और अब तक कुछ भी नहीं हुआ है। जिसके चलते अब एक बार फिर 31 जनवरी से लाल झंडा थामे ये हज़ारों आंगनबाड़ी कार्यकत्रियां और सहायिकाएं सीएम आवास के पास धरना देने को मज़बूर हैं।

क्या है पूरा मामला?

दिल्ली राज्य आंगनवाड़ी कार्यकर्ता एवं सहायिका संघ के अनुसार 58 दिनों की हड़ताल के बाद दिल्ली में मानदेय पिछली बार अगस्त 2017 में बढ़ाया गया था। तो वहीं केंद्र सरकार की ओर से वेतन वृद्धि की अंतिम घोषणा 11 सितंबर 2018 को की गई थी। लेकिन यह घोषणा जुमला साबित हुई और आज तक इन कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं को घोषित राशि नहीं मिली।

संघ के लिखित बयान में कहा गया है कि दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने मानदेय वृद्धि के बजाय सितंबर 2019 में एक अधिसूचना जारी कर इसमें कटौती का ऐलान कर दिया। सरकार ने श्रमिकों और सहायकों के मानदेय में अपने हिस्से से क्रमशः 900 और 450 रुपये की कटौती कर दी, जो उनके बढ़के काम के बोझ को और बोझिल बना रहा है।

प्रदर्शन में शामिल एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता रजनी ने न्यूज़क्लिक को बताया कि अभी दिल्ली मेें आंगनवाड़ी कार्यकर्ता को मासिक मानदेय केवल 9,678 रुपये मिलते हैं और सहायिका को 4,839 रुपये का भुगतान किया जाता है। साल 2018 में पीएम मोदी ने खुद घोषणा की थी कि 1 अक्टूबर से आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को 1500 रुपये अतिरिक्त और सहायिकाओं को 750 रुपये अतिरिक्त भुगतान किया जाएगा लेकिन अब तक हमें कोई बढ़ा हुआ पैसा नहीं मिला है, उल्टा महामारी काल में हमारा कम बढ़ गया है।

एक अन्य प्रदर्शनकारी सहायिका ने कहा कि इस साल 6 जनवरी को एक दिन की हड़ताल की घोषणा की गई थी, लेकिन कोविड की तीसरी लहर के अलर्ट के कारण यूनियन के सदस्यों ने 6 जनवरी के बाद हड़ताल जारी नहीं रखी। लेकिन तब भी सरकार ने हमारी मांगों को अनसुना कर दिया था और अब भी वही कर रही है।

दिल्ली राज्य आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिका संघ के मुताबिक दिल्ली सरकार महिला सशक्तिकरण की बात तो करती है, लेकिन एकीकृत बाल विकास परियोजना जैसी महत्वपूर्ण योजनाओं में काम करने वाली महिला श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी तो दूर 'कर्मचारी' का दर्जा भी नहीं देती है।

मालूम हो कि दिल्ली सरकार ने अपनी हालिया जारी अधिसूचना में आंगनवाड़ी केंद्रों में महिला कार्यकर्ताओं के कार्य दिवसों को बढ़ाने और सहेली क्वार्डिनेटर सेंटर में भी उनसे काम लेने का निर्णय लिया था। ये उनके काम का विस्तार है, जो घटते मानदेय के साथ उन्हें कतई मंजूर नहीं है।

देशभर के कई राज्यों में आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं का प्रदर्शन

गौरतलब है कि सिर्फ दिल्ली ही नहीं देशभर के कई राज्यों में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिका अपने मानदेय बढ़ोत्तरी और अन्य मांगों को लेकर समय-समय पर हड़ताल और प्रदर्शन करती रही हैं। ये कार्यकर्ता और सहायिका जाति, नवजात शिशुओं, गर्भवती महिलाओं से संबंधित सभी प्रकार के डेटा इकट्ठा करती हैं और घर-घर को जागरूक करने के काम भी करती हैं। महामारी काल के दौरान भी इनकी सेवाएं निरंतर जारी रहीं, जिसके चलते कई कार्यकत्रियों की मौत की खबर भी सामने आई। मुआवजे और मौत के बाद परिवार की अन्य महिला सदस्यों को नौकरी की मांग को लेकर भी इन कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किया, हालांकि इन्हें तब भी कोई खास सफलता नहीं मिली।

हालांकि ये हमारी सरकारों की नाकामी ही थी कि महामारी के पहले दौर में इन महिलाओं को घर-घर राशन बांटने सहित तमाम अन्य कामों में बिना तैयारी यानी सैनिटाइज़र, मास्क या किट उपलब्ध कराए ही लगा दिया गया। जो कहीं न कहीं इनके साथ-साथ इनके परिवारों की जान को भी जोखिम में डालने जैसा था। इसके अलावा पोषण ट्रैकर ऐप, जिसे 2018 में पोषण संबंधी परिणामों की वास्तविक समय की निगरानी के लिए एक शासन उपकरण के रूप में लॉन्च किया गया था, उसकी खामियां भी इन कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं के लिए किसी मुसीबत से कम नही है।

लोकसभा में प्रस्तुत नवीनतम आंकड़ों के अनुसार देश में लगभग 14 लाख आंगनबाड़ी केंद्र हैं। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, इन केंद्रों का संचालन 13 लाख 25 हजार आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और 11 लाख 81 हजार सहायिकाओं के जरिए किया जाता है। ये कार्यकर्ता मुख्यतः देश के ग्रामीण इलाकों में काम करती हैं, ऐसे में पोषण ट्रैकर ऐप का उपयोग करने के बारे में कोई उचित प्रशिक्षण नहीं दिया जाना भी इनके लिए एक सिरदर्दी है।

बहरहाल, कुल मिलाकर देखें तो राष्ट्रीय स्तर पर 2016-17 में आंगनबाड़ियों के लिए 15,000 करोड़ रुपये का बजटीय प्रावधान किया गया था। इसके बाद के कुछ सालों में मामूली इजाफे के अलावा 2018-19 में यह बढ़कर 16,882 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। वर्ष 2019-20 में इसमें 3000 करोड़ रुपये से अधिक का उछाल देखा गया और यह बढ़ कर 20,000 करोड़ रुपये हो गया। आंकड़ों के मुताबिक यह आंकड़ा 2022-23 के ताजा बजट में भी इसके आसपास ही है। ऐसे में ये सोचने वाली बात है कि आखिर बजट का ये पैसा इन कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं के काम कैसे नहीं आ रहा और ये बार-बार सड़कों पर उतरने को मजबूर क्यों हो रही हैं।

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