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राजनीति
दिल्ली हिंसा: क्या उमर ख़ालिद के रूप में मिला एक और कफ़ील ख़ान?
उमर ख़ालिद की गिरफ़्तारी के बाद एक बार फिर से दिल्ली पुलिस की जांच पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं। छात्रों, बुद्धिजीवियों ने ट्विटर पर हैशटैग #StandWithUmarKhalid के साथ यह भी लिखा है कि मौजूदा सरकार और उसके इशारे पर दिल्ली पुलिस लगातार प्रतिरोध की आवाज़ों को दबाने का काम कर रही है।
सत्यम् तिवारी
14 Sep 2020
उमर ख़ालिद
Image courtesy: India Today

फ़रवरी के महीने में उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुई सांप्रदायिक हिंसा क़रीब 3 दिन तक चली थी, जिसमें 50 से ज़्यादा लोगों की जान चली गई थी और क़रीब 400 से ज़्यादा लोग घायल हुए थे। उस हिंसा के नतीजे हमारे सामने आज भी मौजूद हैं, जिसमें हमें दिखता है कि आम लोगों के घर, दुकानें नष्ट हो गई हैं। वह लोग जिन्होंने अपने परिवार वालों को खो दिया वो आज भी इंसाफ़ के इंतज़ार में हैं। इस मामले की जांच में दिल्ली पुलिस के कई रंग देखने को मिले हैं। ताहिर हुसैन की गिरफ़्तारी से शुरू हुआ सिलसिला आज पूर्व जेएनयू छात्र उमर ख़ालिद तक पहुँच गया है। 13 सितम्बर को क़रीब 10 घंटे की लंबी पूछताछ के बाद दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया है।

दिल्ली पुलिस ने इससे पहले कोरोना वायरस महामारी के दौरान दंगे से जुड़ी तमाम गिरफ़्तारियां की हैं, जिनमें छात्र, सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षक और राजनेता शामिल हैं। यहाँ इस बात पर अत्यंत ज़ोर देना ज़रूरी है कि पुलिस ने बीजेपी नेता कपिल मिश्रा से एक बार भी पूछताछ तक नहीं की है, जिन पर इल्ज़ाम था कि उन्होंने यह दंगे भड़काए थे। उनकी वीडियो भी मौजूद है जिसमें वह पुलिस अधिकारी के साथ खड़े हो कर नफ़रत भरी और हिंसक टिप्पणी कर रहे हैं।

दिल्ली और देश भर में पिछले साल की सर्दियों से नागरिकता संशोधन क़ानून और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर यानी सीएए-एनआरसी के ख़िलाफ़ आंदोलन शूरू हुआ था, जिसमें मुस्लिम महिलाओं के नेतृत्व में देश भर के छात्र, सामाजिक कार्यकर्ता, अभिनेता, राजनेता, कलाकार शामिल हुए थे। उमर ख़ालिद पर इल्ज़ाम है कि उन्होंने भड़काऊ भाषण देकर देंगे भड़काने का काम किया। इससे पहले उमर पर यूएपीए यानी ग़ैर क़ानूनी गतिविधियाँ रोकथाम क़ानून के तहत मामला दर्ज हो चुका है। 

दिल्ली पुलिस ने इससे पहले 1 अगस्त को उमर से इस सिलसिले में पूछताछ की थी। उनके जिन भाषणों का ज़िक्र है, उनका एक क्लिप उन दिनों टीवी चैनलों पर ख़ूब चलाया गया था। उमर ने अमरावती में दिए उस भाषण में कहा था,

"हम हिंसा का जवाब हिंसा से नहीं देंगे। हम नफ़रत की जगह नफ़रत नहीं फैलाएंगे। अगर वो नफ़रत फैलाएंगे हम उसका जवाब प्यार से देंगे। अगर वो हमें लाठी से मारेंगे, हम तिरंगा फहराते रहेंगे।"

अपने अन्य भाषणों में भी उमर लगातार साझी विरासत की बात करते रहे हैं।

यह भाषण भी उन्होंने दिल्ली में सीएए-एनआरसी विरोधी प्रदर्शन में दिया था

उमर ख़ालिद की गिरफ़्तारी के बाद एक बार फिर से दिल्ली पुलिस की जांच पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं। छात्रों, बुद्धिजीवियों ने ट्विटर पर हैशटैग #StandWithUmarKhalid के साथ उमर के समर्थन में लिखते हुए यह भी लिखा है कि मौजूदा सरकार और उसके इशारे पर दिल्ली पुलिस लगातार प्रतिरोध की आवाज़ों को दबाने का काम कर रही है। उमर ख़ालिद के पिता ने भी ट्वीट कर अपने बेटे की गिरफ़्तारी की जानकारी दी।

My son Umar Khalid has been arrested tonight at 11:00 pm by Special Cell, Delhi Police under UAPA. Police was questioning him since 1:00 pm. He has been implicated in Delhi Riots. #StandWithUmarKhalid

— Ilyas SQR (@sqrIlyas1) September 13, 2020

उमर यूनाइटेड अगेंस्ट हेट नामक संगठन के सदस्य हैं, जिसके ख़ालिद सैफ़ी को भी दिल्ली पुलिस पहले गिरफ़्तार कर चुकी है।

यूनाइटेड अगेंस्ट हेट ने एक बयान जारी करते हुए कहा, "11 घंटे की पूछताछ के बाद दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल ने उमर ख़ालिद को दिल्ली दंगे में एक 'साज़िशकर्ता' क़रार दे कर गिरफ़्तार किया है। दिल्ली पुलिस की यह कहानी जांच के नाम पर प्रदर्शनों को अपराध बताने पर तुली हुई हैं, और उन्हें अब उमर के रूप में एक और शिकार मिल गया है। सीएए-एनआरसी के ख़िलाफ़ लड़ाई जारी रहेगी। हम फ़िलहाल यह मांग करते हैं कि उमर की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।"

इससे पहले शनिवार को दिल्ली पुलिस ने सीपीएम नेता सीताराम येचुरी, स्वराज अभियान के नेता योगेंद्र यादव, मशहूर इकोनॉमिस्ट जयति घोष, फ़िल्ममेकर राहुल रॉय और डीयू प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद को भी दिल्ली दंगों में साज़िशकर्ता क़रार दिया है।

क्या उमर के रूप में एक और कफ़ील ख़ान तैयार किया जा रहा है?

सीएए-एनआरसी के ख़िलाफ़ हुए प्रदर्शनों में ही दिसंबर के महीने में 'भड़काऊ भाषण' देने के आरोप में गोरखपुर के डॉ. कफ़ील ख़ान को यूपी पुलिस ने गिरफ़्तार किया था। हाल ही में उन्हें रिहा किया गया, क्योंकि कोर्ट ने कहा कि 'उनके भाषण हिंसा भड़काने वाले नहीं थे बल्कि वह एकता की बात कर रहे थे।' कफ़ील ख़ान ने जेल में उनके साथ हुए बदतर व्यवहार की भी बात बताई।

इसके अलावा हाल ही में 2 महीने की जेल से रिहा हुए एएमयू छात्र शरजील उस्मानी ने भी बताया कि उन्हें जेल में सब 'शाहीन बाग़ का आतंकवादी' कहते थे और एटीएस की जांच में उनसे एएमयू से जुड़े सवाल पूछे ही नहीं गए थे। और जिन मामलों में उनकी रिहाई हुई, उससे जुड़े सवाल भी उनसे पूछे नहीं गए थे।

ऐसे में सवाल यही उठता है कि उमर की गिरफ़्तारी भी क्या उसी ओर संकेत कर रही है? क्या उन्हें भी जेल में रह कर उसी तरह के कथित शोषण से जूझना पड़ेगा, जिसके बात शरजील और कफ़ील ने की है?

बीजेपी और उसके नियंत्रण में आने वाली पुलिस पर यह भी इल्ज़ाम हैं कि वह ऐसी गिरफ़्तारियां कर के एक संदेश दे रही है, कि जो भी आवाज़ उठाएगा उसका यही हश्र किया जाएगा। देखना यह है कि दिल्ली पुलिस की यह जांच कहाँ जा कर रुकती है, और जिनकी जानें गई हैं उन्हें इंसाफ़ कब मिलता है।

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