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दिल्ली : क्या सांप्रदायिक क़त्लेआम के शिकार पीड़ितों के साथ न्याय किया जा रहा है?
एक अनिच्छुक न्यायपालिका और राष्ट्र की उदासीन एवं पक्षपाती मशीनरी पीड़ितों को न्याय दिलाने के मामले में आश्वस्त नहीं कर पा रही है।
सुबोध वर्मा
11 Mar 2020
Translated by महेश कुमार
दिल्ली

नवीनतम रिपोर्टों के अनुसार 23 से 26 फ़रवरी तक पूर्वोत्तर दिल्ली में चले क्रूर और सांप्रदायिक नरसंहार में कम से कम 53 लोग मारे गए हैं, 200 से अधिक लोग घायल हुए और सैकड़ों घरों, दुकानों, वाहनों और यहां तक कि कुछ स्कूल और धार्मिक स्थलों को जला दिया गया या फिर नष्ट कर दिया गया है। अंतिम रिपोर्टों के अनुसार, मारे गए 48 मृतकों में से 39 मुस्लिम और नौ हिंदू थे। घायलों में दोनों समुदायों के सदस्य शामिल हैं।

26 फ़रवरी को केंद्रीय गृह मंत्रालय की उच्च कमान और पुलिस की कार्रवाई के तहत, जांच करने और कानूनी कार्रवाई करने के लिए दो विशेष जांच दल (SIT) गठित किए गए हैं। उनके द्वारा दिए गए निर्देशों के तहत, पुलिस ने कुछ 690 मामले दर्ज किए हैं और 7 मार्च तक 2,193 लोगों को गिरफ़्तार किया या हिरासत में लिया है। इस बीच, दिल्ली की ‘आप’ सरकार ने कुछ राहत शिविर स्थापित किए हैं और पीड़ितों के नुकसान के दावों को सत्यापित करने के लिए दो दिन का खास ड्राइव चलाने के आदेश दिए है, ताकि उचित  मुआवजा सुनिश्चित किया जा सके।

यह घटनाओं का आधिकारिक सारांश है। लेकिन यह सतह के नीचे की पीड़ा की जांच करने और वास्तविकता का पता लगाने का खास प्रयास नहीं करता है, जो दुख की बात है और जो ख़तरे से कहीं अधिक कड़वा और भयावह है। आइए इस पर नज़र डालें।

अनिच्छुक अदालतें 

26 फ़रवरी को, सुप्रीम कोर्ट ने उन भाजपा नेताओं के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज न कर पाने के लिए दिल्ली पुलिस की खिंचाई की थी, जिन्होंने भड़काऊ भाषण दिए थे, जिससे सांप्रदायिक लपटों को फैलाने में मदद मिली थी। लेकिन फिर अगले ही दिन, न्यायालय ने पुलिस को मामले पर विचार करने के लिए चार सप्ताह का समय दे दिया, क्योंकि सॉलिसिटर जनरल साहब ने तर्क दिया कि ऐसी कार्रवाई के लिए स्थिति "अनुकूल नहीं" थी। बाद में, शीर्ष अदालत ने अन्य याचिकाओं पर फ़ैसला सुनाया कि दिल्ली उच्च न्यायालय को हिंसा से संबंधित मामलों की  सुनवाई जल्दी करनी चाहिए और यहां तक कि एफ़आईआर का विवरण भी जारी करना चाहिए और हिंसा की जांच करनी चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि दिल्ली उच्च न्यायालय ने अगली सुनवाई की तारीख़ 13 अप्रैल तय की थी! अब दिल्ली उच्च न्यायालय 12 मार्च को इन दलीलों को सुनने जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश होने के नाते हाल ही में एक टिप्पणी की गई कि अगर "न्यायपालिका सक्रिय होती तो दिल्ली में हुई हिंसा में काफ़ी जानें बचाई जा सकती थी"।

दंगे के दौरान पुलिस की पक्षपाती भूमिका 

पहले दिन, जब दोनों समुदायों के दो बड़े समूह आपस में भिड़ गए, और महिलाएं जिन स्थलों पर नागरिकता क़ानून का विरोध कर रही थीं, उन पर भाजपा के नेतृत्व वाले लोगों ने हमला किया, तब पुलिस मुकदर्शक बन तमाशा देखती रही। बाद में हुए खुलासे से पता चलता है कि पुलिस के पास पर्याप्त खुफ़िया रिपोर्टें थीं कि हालत हिंसक होने वाले हैं और उन चार दिनों के भीतर पुलिस के पास मदद के लिए 13,000 से अधिक फ़ोन कॉल आए थे। फिर भी, ऊपर बैठे अफ़सरान से कोई मार्गदर्शन नहीं मिला।

साथ ही रिकॉर्ड किए गए विभिन्न वीडियो में पुलिस को दिखाया गया कि वह वास्तव में हिंसक भीड़ की मदद कर रही है, जो एक जानलेवा हमलों पर उतारू थी और अल्पसंख्यक समुदाय के घरों, दुकानों और अन्य स्थानों पर हमला कर रही थी। ऐसे कई वीडियो रिकॉर्डिंग सामने आए हैं, और जिन्हें विधिवत रूप से प्रमाणित किया गया है।

सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि पुलिस बल या अन्य सुरक्षा बलों को पर्याप्त रूप से तैनात क्यों नहीं किया गया था? यह तो अमित शाह के अधीन गृह मंत्रालय की ज़िम्मेदारी थी। यह वह सवाल है जो अल्पसंख्यक समुदाय के गहरे अविश्वास और असुरक्षा की भावना को महसूस करने के पीछे छिपा है। उन्होंने महसूस किया कि भाजपा उनके प्रति शत्रुता की भावना रखती है, जैसा कि दिल्ली चुनाव अभियान में घृणा फैलाने वाले भाषणों और मोदी सरकार द्वारा अपनाई गई नीतियों के मद्देनज़र पता चलता है जिसमें भेदभावपूर्ण नागरिकता क़ानून भी शामिल है। सांप्रदायिक नरसंहार के मद्देनज़र यह अलगाव कई गुना बढ़ गया है। इसके समुदाय के लोगों को अल्पसंख्यक कट्टरता की शरण में धकेलने की आशंका है।

पक्षपाती जांच

दो विशेष जांच दल का नेतृत्व उन पुलिस अधिकारियों के हाथ में हैं जो पहले से ही समुदाय के ख़िलाफ़ एवं सरकार की तरफ़ पक्षपातपूर्ण होने का दंश झेल रहे हैं। एक दल दिसंबर में जामिया में हुई हिंसा पर जांच का नेतृत्व कर रहा है जहां पुलिस ने परिसर में प्रवेश किया और छात्रों को अंधाधुंध पीटा था। इसकी जांच में अब तक कुछ नहीं निकला है क्योंकि पुलिस या जांच दल ने जो आरोप पत्र दायर किया है उसमें उसने कहा की पुलिस ने छात्रों की सुरक्षा के लिए परिसर में प्रवेश किया था! एसआईटी का दूसरा दस्ता आरएसएस के छात्र संगठन एबीवीपी के सदस्यों द्वारा कथित सशस्त्र गिरोह के माध्यम से जेएनयू पर किए हमले की जांच कर रहा है। वहां भी वीडियोग्राफी के सबूतों के बावजूद कुछ नहीं किया है।

जांच में कई तरह के पूर्वाग्रह के संकेत देखने को मिले हैं। हालांकि आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 41C पुलिस को निर्देश देती है कि वह गिरफ़्तार व्यक्तियों के नाम नियंत्रण कक्ष के  नोटिस बोर्डों पर प्रदर्शित करे, लेकिन ऐसा नहीं किया गया है। इस बारे में माकपा नेता बृंदा करात ने एक याचिका के जरिए उच्च न्यायालय से निर्देश जारी करने की गुहार लगाई है। यह चूक - या तो जानबूझकर की गई चूक है, जैसा कि कई लोग मानते हैं – क्योंकि पुलिस ने जिन आरोपों में लोगो को हिरासत में लिया है उसकी पूरी जानकारी को ब्लैकआउट कर दिया है।  इसकी भी जानकारी उपलब्ध नहीं है कि किस तरह के आरोप लगाए जा रहे हैं। गिरफ़्तार या हिरासत में लिए गए लोगों के बारे में जांच के परिणाम की भी कोई जानकारी नहीं हैं। यह फिर से दोनों समुदायों के बीच विभाजन को बढ़ा रहा है क्योंकि सूचना के अभाव में पूर्वाग्रह और उत्पीड़न का संदेह व्याप्त है। वास्तव में, आरोपों और दर्ज नामों के बारे में क़ानूनी रूप से अनिवार्य जानकारी न देना ही अपने आप में गंभीर मामला है और सभी संदेहों की जड़ है, जैसा कि पहले पुलिस की पक्षपातपूर्ण भूमिका के मद्देनज़र हुआ है।

राहत कार्य 

जिन अस्पतालों में ज़्यादातर पीड़ितों का इलाज किया जा रहा है, या शव रखे गए हैं, वे भारी दबाव में हैं। पोस्टमार्टम करवाने की प्रक्रिया दर्द भरी है, साथ ही परिजनों को शव मिलने में भी देरी हो रही है। लोग फॉर्म भरने के लिए ख़ासी जद्दोजहद कर रहे हैं और विभिन्न कमियों को  झेल रहे हैं। घायल लोगों के साथ शोक संतप्त परिवारों या अन्य लोगों की देखभाल और उनके प्रति कर्तव्य निभाना इस खाई को पाटने का पहला कदम हो सकता है।

केंद्र सरकार ने राहत कार्य के लिए दिल्ली सरकार को अभी तक एक भी पैसे की मदद नहीं दी है। वास्तव में, मोदी सरकार पूरे नरसनहार के बारे में चुप है, इसलिए उन्हौने प्रभावितों को आश्वासन या सांत्वना के बारे में एक भी शब्द नहीं कहा है। स्थानीय भाजपा नेता भी मुख्य रूप से केवल एक समुदाय के लोगों के घरों का दौरा कर रहे हैं। अमित शाह ने दूर ओड़ीशा की एक सभा में कहा कि यह नरसनहार विपक्षी दलों द्वारा इंजीनियर किया गया है। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि इस नरसंहार में सबसे बड़ा योगदान देने वाले अभद्र भाषणों की कोई निंदा नहीं की गई है।

राज्य सरकार द्वारा किए गए राहत कार्यों में भी असंवेदनशीलता के संकेत मिले हैं। राहत शिविरों की स्थापना अल्पसंख्यक समुदाय के इलाकों से दूर की गई है। इसके चलते वे शिविर खाली पड़े रहे जबकि अधिकांश पीड़ित ईदगाह मैदान में एकत्र हुए। ऐसे शिविरों में स्थितियां दयनीय बनी हुई हैं, जबकि नरसंहार के 10 से अधिक समय बीत चुका है। दोनों समुदायों के पीड़ितों का कहना है कि पूरी कवायद नौकरशाही से प्रभावित है।

एकजुटता और दोस्ती फिर भी पनप रही है

इलाकों में, विभिन्न समुदायों द्वारा एक-दूसरे की मदद करने के असंख्य उदाहरण मिल रहे हैं। उन्होंने उन काले और हिंसक दिनों के दौरान भी परिवारों या उनकी संपत्ति की रक्षा की, और वे अभी भी सहायता करना जारी रखे हुए हैं। लोगों के बीच एक-दूसरे के प्रति ऐसा सद्भाव और प्यार ही आम लोगों के विश्वास को ज़िंदा रखता है। नहीं तो सत्ता में बैठे शासक और उनकी संस्थाएं लोगों की नज़र में अधिक से अधिक संदिग्ध होती जा रही हैं।

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