NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
एक दशक बाद भी नागरिकता से इंकार की सूरत में पाक-मूल की महिलाएं निर्वासित किए जाने की मांग कर रही हैं
जम्मू कश्मीर में सैकड़ों की तादाद में ऐसी महिलाएं हैं, जिनमें से कई पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के इलाके से पूर्व में मिलिटेंट रहे अपने पतियों – जो पुनर्वासन की उम्मीद में वापस लौट रहे थे, के साथ आ गई थीं। लेकिन वे आज भी नागरिकता के अधिकार के बगैर यहाँ पर रह रही हैं।
अनीस ज़रगर
05 Jan 2021
जम्मू कश्मीर
तस्वीर: कामरान यूसुफ़

श्रीनगर: सोमवार को पाकिस्तानी मूल की महिलाओं के एक समूह ने जिन्होंने कश्मीरियों के साथ शादी की थी, ने कहा कि सरकार को चाहिए वह उनपर “अवैध प्रवासियों” का आरोप मढ़ उन्हें यहाँ से निष्कासित कर उनके मूल देश में भिजवा दे, क्योंकि एक दशक से भी अधिक समय से इस क्षेत्र में समय बिताने के बाद अब वे नागरिकता के अधिकार हासिल कर पाने की उम्मीद खो चुकी हैं।

350 से अधिक की संख्या में ये महिलाएँ, जिनमें से अधिकतर का पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर से ताल्लुक है, वे तत्कालीन उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली सरकार के समय राज्य द्वारा 2010 में पूर्व उग्रवादियों के पुनर्वास नीति की घोषणा के बाद से जम्मू-कश्मीर में ‘राज्यविहीन’ नागरिकों के तौर पर रह रही हैं। इनके पतियों ने कभी अपनी युवावस्था में खुद को मिलिटेंट के तौर पर प्रशिक्षित करने के इरादे से नियन्त्रण रेखा (एलओसी) को लाँघने का काम किया था। बाद में इन युवाओं ने खुद के पुनर्वासन की उम्मीद में बच्चों सहित अपने परिवारों के साथ घर-वापसी कर ली थी, लेकिन उनका यह सपना अधूरा ही रहा।

सायरा जावेद जो अपने कश्मीरी पति और चार बच्चों के साथ उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा शहर में रहती हैं, ने न्यूज़क्लिक के साथ अपनी बातचीत में बताया कि उनके बच्चों को प्रशासन द्वारा सिर्फ इसलिए प्रताड़ित किया जा रहा है क्योंकि उन्होंने एक कश्मीरी से शादी की, जिसे वे एक ‘भूल’ करार देती हैं।

सायरा का कहना था “अब हम यहाँ पर बिल्कुल भी नहीं रहना चाहते हैं। मैं यहाँ मेरे पति द्वारा लाई गई थी, जब सरकार की पुनर्वास नीति में उन्हें उम्मीद नज़र आई थी। उन्होंने अपने परिवार, दोस्तों और रिश्तेदारों की खातिर वापस लौटने की जिद की थी, लेकिन कुलमिलाकर यह एक बुरे सपने सरीखा साबित हुआ है।”

सायरा के साथ कई अन्य महिलाएँ भी थीं जो घाटी के विभिन्न हिस्सों में रह रही हैं और उन्होंने मीडिया के समक्ष कश्मीर में अपनी दुर्दशा के बारे में बातें रखीं। उनका दावा था कि प्रशासनिक प्रतिबंधों के चलते उनकी जिंदगी बेहद दुश्वारियों में कट रही है और वे खुद को यहाँ पर महफूज नहीं पा रही हैं।

पत्तन की रहने वाली तैबह अजाज़ का कहना था कि चूँकि सरकार ने उनके कश्मीर में एक दशक से भी अधिक समय से आने के बाद भी उन्हें नागरिक अधिकारों से वंचित रखा है, तो ऐसे में उन्हें अब उनके साथ “अवैध घुसपैठियों” के तौर पर बर्ताव करना चाहिए। उन्होंने कहा “हमारा मामला मानवीयता से संबंधित है और अगर सरकार यदि हमें स्वीकारने की इक्छुक नहीं है तो उसे हमें निर्वासित कर देना चाहिए या हमारे साथ आव्रजन कानूनों के मुताबिक व्यवहार करना चाहिए।”
 
इस समूह के अनुसार इस श्रेणी में आने वाली कई महिलाओं की मौत हो चुकी है और कम से कम उनमें से एक सायरा बेगम ने तो 2014 में आत्महत्या तक कर ली थी। इनमें से कई महिलाएँ तलाकशुदा जीवन बिता रही हैं, और दो विधवाएं हैं जो सायरा जावेद के पास काम करती हैं, जिनका कुपवाड़ा में अपना बुटीक का काम है। सायरा के अनुसार “इन बहनों की यहाँ पर कोई जिंदगी नहीं है, क्योंकि इनके ससुराल वालों ने इनका परित्याग कर दिया है। कई और महिलाएँ हैं जो आत्महत्या करने की कगार पर हैं, जिसके चलते ही हम सरकार से हस्तक्षेप करने की गुजारिश कर रही हैं।”

सायरा का दिल टूट गया है क्योंकि वे अपने पिता को नहीं देख पाई, जिनकी दो महीने पहले मौत हो गई थी। जब से वे यहाँ आईं हैं, वे वापस नहीं जा सकी हैं। उनका कहना था “मैं पूरी तरह से टूट चुकी हूँ, क्योंकि मैं आखिरी बार अपने पिता को नहीं देख सकी; अब पीछे अपने घर के सभी सदस्यों की कमी मुझे सालती रहती है।”

खास बात यह है कि सोमिया सादाफ़ और साज़िया असलम नाम की दो महिलाओं ने हाल ही में जिला विकास परिषद (डीडीसी) के चुनावों में क्रमशः उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा के दरुगमुल्ला क्षेत्र और बांदीपोरा के हाजिन क्षेत्र से चुनाव लड़ा था। लेकिन जैसे ही चुनाव सम्पन्न हुए, इन दोनों ही निर्वाचन क्षेत्रों के चुनाव परिणामों पर रोक लगा दी गई, क्योंकि इन दो उम्मीदवारों की नागरिकता का मुद्दा आड़े आ रहा है।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

Denied Citizenship for a Decade, ‘Stateless’ Pak-origin Women in J&K Ask to be Deported

Jammu and Kashmir
Wives of Ex Militants
Kashmir Immigrants
PoK Immigrants in Kashmir
Citizenship
Women’s Citizenship
Kupwara
Pakistan

Related Stories

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

कश्मीर में हिंसा का नया दौर, शासकीय नीति की विफलता

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

भारत में धार्मिक असहिष्णुता और पूजा-स्थलों पर हमले को लेकर अमेरिकी रिपोर्ट में फिर उठे सवाल

कश्मीरी पंडितों के लिए पीएम जॉब पैकेज में कोई सुरक्षित आवास, पदोन्नति नहीं 

यासीन मलिक को उम्रक़ैद : कश्मीरियों का अलगाव और बढ़ेगा

आतंकवाद के वित्तपोषण मामले में कश्मीर के अलगाववादी नेता यासीन मलिक को उम्रक़ैद

जम्मू-कश्मीर के भीतर आरक्षित सीटों का एक संक्षिप्त इतिहास

जम्मू में आप ने मचाई हलचल, लेकिन कश्मीर उसके लिए अब भी चुनौती


बाकी खबरें

  • उपेंद्र स्वामी
    दुनिया भर की: गर्मी व सूखे से मचेगा हाहाकार
    29 Apr 2022
    जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया के कई इलाके इस समय भीषण सूखे की चपेट में हैं। सूखे के कारण लोगों के पलायन में 200 फीसदी वृद्धि होने का अनुमान है।
  • भाषा
    दिल्ली दंगा : अदालत ने ख़ालिद की ज़मानत पर सुनवाई टाली, इमाम की याचिका पर पुलिस का रुख़ पूछा
    29 Apr 2022
    दिल्ली उच्च न्यायालय ने देशद्रोह के कानून की संवैधानिक वैधता पर उच्चतम न्यायालय के समक्ष आगामी सुनवाई के मद्देनजर सुनवाई टाल दी और इसी मामले में शरजील इमाम की जमानत अर्जी पर दिल्ली पुलिस का रुख पूछा।
  • विजय विनीत
    इफ़्तार को मुद्दा बनाने वाले बीएचयू को क्यों बनाना चाहते हैं सांप्रदायिकता की फैक्ट्री?
    29 Apr 2022
    "बवाल उस समय नहीं मचा जब बीएचयू के कुलपति ने परिसर स्थित विश्वनाथ मंदिर में दर्शन-पूजन और अनुष्ठान किया। उस समय उन पर हिन्दूवाद के आरोप चस्पा नहीं हुए। आज वो सामाजिक समरसता के लिए आयोजित इफ़्तार…
  • अब्दुल अलीम जाफ़री
    उत्तर प्रदेश: बुद्धिजीवियों का आरोप राज्य में धार्मिक स्थलों से लाउडस्पीकर हटाने का फ़ैसला मुसलमानों पर हमला है
    29 Apr 2022
    राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि भाजपा के नेतृत्व वाली सरकारों द्वारा धार्मिक उत्सवों का राजनीतिकरण देश के सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर देगा।
  • कुमुदिनी पति
    नई शिक्षा नीति से सधेगा काॅरपोरेट हित
    29 Apr 2022
    दरअसल शिक्षा के क्षेत्र में जिस तरह से सरकार द्वारा बिना संसद में बहस कराए ताबड़तोड़ काॅरपोरेटाइज़ेशन और निजीकरण किया जा रहा है, उससे पूरे शैक्षणिक जगत में असंतोष व्याप्त है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License