NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
उत्पीड़न
कानून
भारत
राजनीति
एक साल के संघर्ष के बाद जेल से रिहा आसिफ़, देवांगना और नताशा; कहा संघर्ष जारी रहेगा
पिछले एक साल से 'बिना सबूत' के तिहाड़ जेल में बंद जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्र आसिफ़ इकबाल तन्हा और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की छात्रा देवांगना कालिता और नताशा नरवाल को गुरुवार शाम को रिहा कर दिया गया। उच्च न्यायालय ने 15 जून को दी थी ज़मानत।
मुकुंद झा
17 Jun 2021
NATASHA NARWAL, DEVANGANA KALITA

पिछले एक साल से 'बिना सबूत' के  तिहाड़ जेल में बंद जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्र आसिफ इकबाल तनहा और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की छात्रा देवांगना कालिता और नताशा नरवाल  को गुरुवार शाम को रिहा कर दिया गया।  रिहाई इतनी भी आसन नहीं  थी। उच्च न्यायालय ने 15 जून को ही इन्हें ज़मानत  दी थी, लेकिन पुलिस औपचतरिकताओं का बहाना बनाकर इन्हें रिहा नहीं कर रही थी।  इसलिए आज यानि गुरुवार को न्यायालय ने पुलिस को फ़टकार लगाई और कहा ज़मानत मिलने के बाद उन्हें जेल में रखना गौर क़ानूनी है।  इसके बाद आनन -फानन में उन्हें शाम को अंततः रिहा कर दिया गया। उनकी रिहाई के बाद स्वागत के लिए जेएनयू ,जामिया और डीयू से बड़ी संख्या में छात्र और कई सामजिक कार्यकर्ता आए थे। उनकी रिहाई के समय वहां छात्र इंकलाब जिंदाबाद, सारे पिंजड़े तोड़ेंगे, इतिहास की धारा मोड़ेंगे और दिल्ली दंगे की कथित साज़िश में जेल में बंदा अन्य छात्र और युवा नेता जिन्हें दिल्ली पुलिस ने आतंकरोधी कानूनों के तहत जेल में कैद  कर रखा है, उनकी रिहाई के लिए भी नारे बुलंद किए।  इन सब के बीच जब नताशा नरवाल और देवांगना कलिता बाहर आईं तो वो भी मुठ्ठी तानकार नारे लगाने लगीं। हालांकि आसिफ इक़बाल तन्हा सबसे देरी से बाहर आए, लेकिन वो भी पूरे जोश से नारे लगा रहे थे। उनकी जो तस्वीर दिख रही थीं उनसे साफ है कि पुलिस ने उन्हें जेल में एक साल से अधिक रखा तो जरूर, लेकिन उनके संघर्ष के जूनून को कम न कर सकी।  

जेल से निकलने के बाद क्या कुछ कहा

तिहाड़ जेल से बाहर आने के बाद आसिफ इकबाल तन्हा ने कहा उन्हें आतंकवादी, जिहादी कहा गया और कई तरह के ग़लत व झूठे आरोप लगाए गए। उन्होंने सब कुछ बर्दाश्त किया और लड़ाई जारी रखी। उन्होंने अदालत में आस्था जताई और कहा कि अदालत में वे आरोपों का जवाब देंगे। आगे उन्होंने कहा,”उम्मीद थी कि एक दिन मुझे रिहा कर दिया जाएगा। सीएए, एनआरसी और एनपीआर के खिलाफ लड़ाई जारी रखूंगा।”

देवांगना कालिता ने जेल से बाहर निकलते ही सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि वह अस्वीकृति और लोगों की आवाज को दबाने की कोशिश कर रही है।

जेल से बाहर आने के बाद छात्र कार्यकर्ता नताशा नरवाल ने कहा, “जेल में हमें जबरदस्त सहयोग मिला। अपना संघर्ष जारी रखेंगे।”

नरवाल ने आगे कहा, “जमानत के आदेश को लेकर बेहद खुश हूं। कई महीने तक हम यह यकीन नहीं कर पाए कि हम इन आरोपों में जेल में हैं। नरवाल ने यह भी  कहा कि तिहाड़ जेल में अभी भी बहुत से लोग अलग-अलग मामलों में बंद हैं, उनकी रिहाई होनी चाहिए।”

पुलिस ने  इन सभी को दंगों के षड़यंत्र के मामले में गिरफ्तार किया था।

अदालत ने  फटकार लगाते हुए तीनों छात्र कार्यकर्ताओं को तत्काल रिहा करने का दिया था आदेश

दिल्ली की एक अदालत ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगे से जुड़े मामले में आसिफ इकबाल तनहा औ देवांगना कालिता और नताशा नरवाल को तत्काल जेल से तुरंत रिहा करने का बृहस्पतिवार को आदेश दिया था।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने इन छात्र कार्यकर्ताओं को मंगलवार को ही जमानतदे  दी थी। उच्च नयायालय के इस फैसले के दो दिन बाद अदालत ने यह आदेश दिया। इन्हें पिछले साल फरवरी में दंगों से जुड़े एक मामले में गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) कानून के तहत मई 2020 में गिरफ्तार किया गया था। इन्हें उनके पते और जमानतदारों से जुड़ी जानकारी पूर्ण ना होने का हवाला देते हुए समय पर जेल से रिहा नहीं किया गया था।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश रविंदर बेदी ने पते और जमानतदारों के सत्यापन में देरी को लेकर पुलिस को फटकार लगाते हुए कहा, ‘‘मैं कहूंगी कि यह अपने आप में एक उचित कारण नहीं हो सकता है कि जब तक इस तरह की रिपोर्ट दाखिल नहीं हो जाती, तब तक आरोपी को जेल में रखा जाए।’’

अभियुक्तों के वकील द्वारा दाखिल हलफनामे को ध्यान में रखते हुए अदालत ने तिहाड़ जेल के अधीक्षक को उनकी तत्काल रिहाई के लिए वारंट भेजा। इस हलफनामे कहा गया था कि उनका मुवक्किल राष्ट्रीय राजधानी के अधिकार क्षेत्र को नहीं छोड़ेगा।

दिल्ली पुलिस ने 16 जून को आरोपियों को जमानत पर रिहा करने से पहले उनके पते, जमानतदारों तथा आधार कार्ड के सत्यापन के लिए अदालत से और समय मांगा। पुलिस के इस आवेदन को खारिज करते हुए न्यायाधीश ने उन्हें दिल्ली में आरोपियों के पते को सत्यापित करने और बृहस्पतिवार शाम पांच बजे रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया। वहीं, अन्य राज्य में उनके पते के सत्यापन पर अदालत ने उन्हें 23 जून को रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया।

इसके अलावा, अदालत ने उच्च न्यायालय की उस टिप्पणी का हवाला दिया, जिसमें उसने कहा था कि एक बार जब कैद में रखे गए लोगों को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया गया है और मुचलके के साथ जमानतदारों को प्रस्तुत किया गया है, तो उन्हें ‘‘एक मिनट के लिए भी’’ सलाखों के पीछे नहीं रहना चाहिए।

न्यायाधीश ने कहा, ‘‘ यह देखा गया कि राज्य को न्यूनतम संभव समय के भीतर इस तरह की सत्यापन प्रक्रिया के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे को सुनिश्चित करना चाहिए और ऐसा कोई कारण नहीं हो सकता है, जो ऐसे व्यक्ति को उसकी स्वतंत्रता से वंचित करने के लिए पर्याप्त हो।’’

उच्च न्यायालय से जमानत मिलने के बाद कार्यकर्ताओं ने तत्काल जेल से रिहाई के लिए अदालत का रुख किया था, जिसने मामले पर बुधवार को अपना आदेश बृहस्पतिवार तक के लिए टाल दिया था। इसके बाद बृहस्पतिवार को तीनों छात्र कायकर्ताओं ने उच्च न्यायालय का रुख, जिसने निचली अदालत को इनकी जेल से रिहाई के मामले पर ‘‘तत्परता’’ से गौर करने को कहा।

मंगलवार को ज़मानत देते हुए आदलत की महत्वपूर्ण टिप्पणियां

इससे पहले 15 जून को जामनत देते हुए भी कुछ महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ की थी। दिल्ली उच्च न्यायालय ने तीनों को जमानत देते हुए कहा था कि राज्य ने प्रदर्शन के अधिकार और आतंकी गतिविधि के बीच की रेखा को धुंधला कर दिया है तथा यदि इस तरह की मानसिकता मजबूत होती है तो यह ‘‘लोकतंत्र के लिए एक दुखद दिन होगा।’’

इसने यूएपीए के तहत “आतंकवादी गतिविधि” की परिभाषा को ‘‘कुछ न कुछ अस्पष्ट’’ करार दिया और इसके ‘‘लापरवाह तरीके’’ से इस्तेमाल के खिलाफ चेतावनी देते हुए छात्र कार्यकर्ताओं को जमानत देने से इनकार करने के निचली अदालत के आदेशों को निरस्त कर दिया था।

उच्च न्यायालय ने 113, 83 और 72 पृष्ठों के तीन अलग-अलग फैसलों में कहा था कि यूएपीए की धारा 15 में ‘आतंकवादी गतिविधि’ की परिभाषा व्यापक है और कुछ न कुछ अस्पष्ट है, ऐसे में आतंकवाद की मूल विशेषता को सम्मिलित करना होगा तथा ‘आतंकवादी गतिविधि’ मुहावरे को उन आपराधिक गतिविधियों पर ‘‘लापरवाह तरीके से’’ इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं दी जा सकती जो भारतीय दंड संहिता के तहत आते हैं।

अदालत ने कहा था, ‘‘ऐसा लगता है कि असहमति को दबाने की अपनी बेताबी में सरकार के दिमाग में प्रदर्शन करने के लिए संविधान प्रदत्त अधिकार और आतंकवादी गतिविधि के बीच की रेखा कुछ न कुछ धुंधली होती हुई प्रतीत होती है। यदि यह मानसकिता प्रबल होती है, तो यह लोकतंत्र के लिए एक दुखद दिन होगा...।’’

पुलिस ने हाई कोर्ट के आदेश को उच्चतम न्यायालय में दी चुनौती

दिल्ली हाई कोर्ट के ज़मानत के फ़ैसले के अगले ही दिन दिल्ली पुलिस ने इस आदेश के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर कर दी।

पुलिस ने विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर कर हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी  है। पुलिस का कहना है कि हाई कोर्ट का जमानत देने का फैसले बिना किसी आधार के था।

क्या थे आरोप

24 फरवरी 2020 को उत्तर-पूर्व दिल्ली में संशोधित नागरिकता कानून के समर्थकों और विरोधियों के बीच हिंसा भड़क गई थी, जिसने सांप्रदायिक टकराव का रूप ले लिया था। हिंसा में कम से कम 53 लोगों की मौत हो गई थी तथा करीब 200 लोग घायल हो गए थे। इन तीनों पर इनका मुख्य ‘‘साजिशकर्ता’’ होने का आरोप है।

दिल्ली पुलिस द्वारा दिल्ली दंगों की साजिश के मामले में दर्ज प्राथमिकी 59/2020 में कुल 15 लोगों को नामजद किया गया था। इनमें तन्हा, नरवाल और कलिता, गुलफिशा फातिमा, इशरत जहां, सफूर ज़रगर, मीरन हैदर, खालिद सैफी, शिफू-उर-रहमान और कई अन्य कार्यकर्ता भी शामिल है। पुलिस ने दावा किया कि तन्हा ने नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों को अंजाम देने में सक्रिय भूमिका निभाई थी। हालाँकि अदलात में पुलिस के सारे तर्क धराशाही हो गए हैं।

तन्हा, कालिता और नरवाल कौन हैं

आपको बता दें कि तन्हा जामिया मिलिया इस्लामिया में बीए (ऑनर्स) (फारसी) के अंतिम वर्ष के छात्र हैं। उन्हें मई 2020 में यूएपीए के तहत दिल्ली दंगों के मामले में गिरफ्तार किया गया था और तब से लगातार हिरासत में थे। जबकि देवांगना कलिता सेंटर ऑफ़ वीमेन स्टडियज़ में एमफिल की छात्रा हैं, वहीं नताशा नरवाल सेंटर फॉर हिस्टोरिकल स्टडीज में पीएचडी की छात्रा हैं। वे दोनों पिंजरा तोड़ की संस्थापक सदस्य हैं। ‘पिंजरा तोड़’ की स्थापना साल 2015 में हॉस्टल और पेइंग गेस्ट में छात्राओं की सुविधा और अधिकारों के मकसद से की गई थी। कालिता और नरवाल ने क्रमशः डीयू के मिरांडा हाउस और हिंदू कॉलेज से ग्रेज्युशन किया है। ये दोनों भी मई 2020 से ही जेल में थीं।

(समाचार एजेंसी भाषा इनपुट के साथ)

Devangana kalita
Natasha Narwal
Asif Iqbal Tanha

Related Stories

समान नागरिकता की मांग पर देवांगना कलिता, नताशा नरवाल को गिरफ्तार किया गया: पिंजरा तोड़

नताशा और महावीर नरवाल: इंसाफ़ एक दूर की कौड़ी

नताशा नरवाल को अपने पिता के अंतिम संस्कार के लिए मिली ज़मानत

दिल्ली दंगे: ज़मानत के आदेश ‘संदिग्ध’ साक्ष्यों, ‘झूठे’ सुबूतों की कहानी बयां करते हैं


बाकी खबरें

  • Hemant Soren
    अनिल अंशुमन
    झारखंड-बिहार: स्थानीय भाषा को लेकर विवाद कहीं महज़ कुर्सी की राजनीति तो नहीं?
    22 Sep 2021
    “किसी भी प्रदेश में वहां की स्थानीय भाषाओं को प्राथमिकता मिलना संविधान सम्मत है। लेकिन अब इस पर भी राजनीति होना संदेह पैदा करता है कि कहीं ये विवाद भी कोई सांप्रदायिक ध्रुविकरण करा कर बुनियादी सवालों…
  • Varanasi
    विजय विनीत
    बदहाली: रेशमी साड़ियां बुनने वाले हाथ कर रहे हैं ईंट-पत्थरों की ढुलाई, तल रहे हैं पकौड़े, बेच रहे हैं सब्ज़ी
    22 Sep 2021
    बनारस से ग्राउंड रिपोर्ट: विश्वविख्यात बनारस की रेशमी साड़ियों का ताना-बाना बिखर रहा है। इसी ताने-बाने में सिसक रही है बुनकरों की जिंदगी। जानने के लिए आपको लिए चलते हैं बनारस की संकरी गलियों में..
  • school
    सौम्या गुप्ता, सी. सरतचंद
    स्कूलों को वक़्त से पहले खोलने की अनुमति क्यों नहीं दी जानी चाहिए
    22 Sep 2021
    केवल स्कूलों को फिर से खोलने से असमान शिक्षा प्रणाली अधिक समान नहीं हो जाएगी जब तक कि सरकारें शिक्षा पर अपने ख़र्च को नहीं बढ़ाती हैं स्थिति में बदलाव लाना असंभव है। स्कूल खोलने से कोविड म्यूटेशन का…
  • SCO
    एम. के. भद्रकुमार
    ईरान की एससीओ सदस्यता एक बेहद बड़ी बात है
    22 Sep 2021
    तेहरान का एससीओ में ज़ोरदार स्वागत के साथ शामिल किया जाना और इस संगठन का जल्दबाज़ी के साथ विस्तार किया जाना दिखाता है कि बीजिंग और मॉस्को के बीच ज़बरदस्त तालमेल है।
  • यूपी: योगी सरकार का "विकासोत्सव" बर्बादी का जश्न है
    लाल बहादुर सिंह
    यूपी: योगी सरकार का "विकासोत्सव" बर्बादी का जश्न है
    22 Sep 2021
    योगी जी का विकास का सारा जश्न दरअसल अर्थव्यवस्था के ध्वंस और कोविड से हलकान, हैरान-परेशान जनता को मुंह चिढ़ाने और उसके जले पर नमक छिड़कने जैसा है। कुछ विश्लेषकों ने ठीक नोट किया है कि "यूपी विकासोत्सव…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License