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नज़रिया
भारत
राजनीति
हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व का फ़र्क़
अगर कॉरपोरेट्स का साथ ना मिले तो हिंदुत्व की बगिया हिंदू धर्म के मर्म से उजड़ जाएगी।
अजय कुमार
16 Dec 2021
Modi

भारतीय राजनीति के केंद्र में भाजपा के होने की वजह से पहचान की राजनीति इतनी खतरनाक हुई है कि बढ़ती गरीबी, बेरोजगारी महंगी शिक्षा, महंगी जिंदगी पर चर्चा होने की बजाए भारतीय राजनीति में गाहे-बगाहे चर्चा हिंदू धर्म और हिंदुत्व पर होने लगती है। एक गरीब मुल्क की राजनीति में होने वाली यह सारी चर्चाएं उसे बहुत पीछे ले जाती हैं। लेकिन फिर भी राजनीति अगर हमारे सामने यह प्रस्तुत कर रही है तो चलिए यह समझने की कोशिश करें कि हिंदू धर्म और हिंदुत्व क्या है?

हिंदुत्व का नाम सुनते ही ऐसा लगता है जैसे हिंदू धर्म के मूल भावना और मर्म पर बात की जा रही है। अफसोस की बात यह है कि ऐसा नहीं है। राजनीतिक चिंतक कहते हैं कि हिंदुत्व, हिंदू धर्म से बिल्कुल विपरीत विचारधारा है। अभय कुमार दुबे जैसे राजनीतिक और सामाजिक चिंतक जिन्होंने हिंदुत्व पर जमकर काम किया है, उनका मानना है कि हिंदुत्व एक ऐसी राजनीतिक विचारधारा है जिसका पूरा जोर हिंदुओं की राजनीतिक एकता बनाने पर रहता है। वैसी राजनीतिक एकता जो उन्हें सत्ता तक पहुंचा सके। हिंदुत्व कोई सामाजिक विचारधारा नहीं है। इसका विश्वास हिंदू धर्म के भीतर मौजूद जाति प्रथा को खत्म करने में नहीं है। यह हिंदू धर्म के भीतर मौजूद खामियों को सुधारना नहीं चाहती। इसकी सारी कोशिश केवल इतनी है कि हिंदू पहचान के सहारे राजनीति की जाए और सत्ता तक पहुंचा जाए।

जमीन पर काम कर रहे राजनीतिक कार्यकर्ता विनयशील कहते हैं, "हिंदुत्व एक राजनीतिक विचारधारा है, जो हिंदू धर्म के भीतर मौजूद आस्था और भावनाओं का इस्तेमाल कर सत्ता तक पहुंचने का रास्ता बनाती है। चूंकि प्रगति के मानक जैसे कि शिक्षा स्वास्थ्य और जीवन स्तर में सुधार की बात कर गोलबंदी करना बहुत मुश्किल काम है, इसलिए यह विचारधारा आस्थाओं और भावनाओं के सहारे सत्ता हथियाने की जुगाड़ करती रहती है।"

हिंदुत्व का सारा खेल सत्ता हथियाने तक सीमित है और सत्ता अपनी तरफ बड़ी गोलबंदी बनाने पर मिलती है, इसलिए दूसरे समुदायों के प्रति खासकर मुस्लिमों के प्रति दंगा, हत्या सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ कर, नफरत का जहर घोलकर गोलबंदी बनाने का प्रयास हमेशा जारी रहता है। इसके ढेर सारे उदाहरण मौजूद हैं।

जैसे कि जो लोग हिंदू भावनाओं का सहारा लेकर जहर घोलने का काम करते हैं, उन्हें हिंदुत्व सहज तौर पर स्वीकार करता है। मॉब लिंचिंग की ढेर सारी घटनाओं में जब दोषी जेल से बाहर निकले तो भाजपा के नामी-गिरामी मंत्रियों ने उन्हें फूलों की माला पहनाई। यह भी इसी का उदाहरण है। जबकि हिंदू धर्म से बिल्कुल विपरीत है। मेरी मां रोज सुबह उठकर तुलसी के पौधे में पानी डालती है। इसका प्रचार नहीं करतीं। इसकी तस्वीर नहीं फैलातीं। सार्वजनिक जीवन को छोड़कर निजी जीवन में इस तरह की हस्तक्षेप करने की प्रवृत्ति हिंदू धर्म है।

काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का उद्घाटन करते समय जो बनारस में हुआ वह हिंदुत्व था। हिंदू धर्म नहीं था। विश्वनाथ कॉरिडोर के उद्घाटन से जुड़ा पूरा तामझाम देश और दुनिया में फैले हिंदुओं तक पहुंचने की कोशिश थी। स्टेज की सजावट से लेकर संगीत तक और संगीत से लेकर नरेंद्र मोदी के भाषण तक सब कुछ एक तरह के राजनीतिक परियोजना का हिस्सा था, जिसकी पूरी कवायद हिंदू पहचान को ललचाकर अपनी तरफ आकर्षित करने की थी। उद्घाटन के समय औरंगजेब का जिक्र कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साफ तौर पर स्पष्ट कर दिया कि वह राजनीति गोलबंदी के लिए विश्वनाथ कॉरिडोर का इस्तेमाल कर रहे हैं। उनकी सारी कवायद हिंदुत्व से जुड़ी हुई है ना कि हिंदू धर्म से।

अगर विश्वनाथ कॉरिडोर की पूरी संकल्पना हिंदू धर्म से जुड़ी होती तो हिंदू धर्म के मर्म और संस्कृति के तहत काम होता। विश्वनाथ कॉरिडोर का जिक्र मीडिया में केवल एक और दो दिन नहीं होता। तब से होता जब से इस परियोजना की संकल्पना आई। उन तमाम विरोधों का जिक्र होता, जो विश्वनाथ कॉरिडोर बनाने के खिलाफ हुए। विस्थापित हो रहे उन लोगों का दुख सारे लोगों के सामने पेश किया जाता जिनके घर और आराध्य देवालय  विश्वनाथ कॉरिडोर बनाने में टूट गए। अगर विश्वनाथ कॉरिडोर हिंदू धर्म की नुमाइंदगी करता तो वह विध्वंस पर आधारित ना होता। पहले से मौजूद लोगों के घर और छोटे छोटे मंदिरों को साथ में लेकर नवीनता की रचना की जाती।

अतीत को कुंठा और निराशा की तरह मान कर फेंक नहीं दिया जाता बल्कि अतीत का सुंदर स्वरूप लेकर नवीन को रचा जाता। पीड़ा और कष्ट को कम से कम करने की कोशिश की जाती। शंकर के साथ शंकर की नगरी में पनपी भौतिक संस्कृति भी साथ में होती। लेखक भी होते और संस्कृति कर्मी भी होते। कबीर तुलसीदास रैदास पंडित बिस्मिल्लाह खान, मुंशी प्रेमचंद, भारतेंदु हरिश्चंद्र जैसे उन तमाम नामों के मर्म को विकसित करने की कोशिश की जाती जो बनारस की पहचान का अहम हिस्सा है। यह सब होता और इसकी अगवाई भारत का प्रधानमंत्री न करता तब यह हिंदू धर्म का मर्म होता।

प्रधानमंत्री ने विश्वनाथ कॉरिडोर की अगुवाई की। यह भारत के संविधान में निहित राज्य के धर्मनिरपेक्ष आचरण के खिलाफ तो था ही साथ में राजनीति में धर्म का जोर शोर से खुल्लम खुल्ला इस्तेमाल किया जाने वाला उदाहरण भी था।  मीडिया के पन्नों और कैमरों ने विश्वनाथ कॉरिडोर से जुड़े दुख दर्द को दरकिनार कर केवल विश्वनाथ कॉरिडोर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महिमामंडन करने का काम किया। इस तरह से यह हिंदू धर्म का नहीं बल्कि हिंदुत्व का प्रोजेक्ट बन गया। इससे हिंदू धर्म का मर्म नहीं साधा गया बल्कि लोगों के रोजाना के दुख दर्द को दरकिनार कर उनके सामने  ऐसा भेंट प्रस्तुत किया गया जिसका मकसद महज राजनीतिक सत्ता हथियाने से जुड़ा था। विश्वनाथ कॉरिडोर बनाने से जुड़ी पूरी कवायद हिंदू धर्म और हिंदुत्व के बीच अंतर दर्शाने का सबसे शानदार उदाहरण है।

हिंदुत्व की पूरी बिसात और चालबाजी कॉरपोरेट के गठजोड़ पर निर्भर है। कॉरपोरेट को खुद को अमीर से अमीर बनाने की कवायद हिंदुत्व के सहारे मिली राजनीतिक सत्ता के भ्रष्ट आचरण पर निर्भर है। यह दोनों एक दूसरे के लिए खाद पानी का काम करते हैं। मीडिया जगत का ही उदाहरण देख लीजिए। भाजपा की अनंत खामियां छिपाकर केवल उसकी ब्रांडिंग मीडिया के जरिए की जाती है। विश्वनाथ कॉरिडोर से जुड़े तमाम खामियों को छुपाकर केवल विश्वनाथ कॉरिडोर को दिखाया गया। कैमरे की नजर हमेशा बदहाली से हटाकर चमक दमक पर रखी जाती है। इसके सहारे बदहाली कभी विमर्श का हिस्सा नहीं बनता। भाजपा के बार बार बोले जाने वाले झूठ की शिनाख्त नहीं होती। इसलिए जिस हिंदुत्व की पोल एक ईमानदार दुनिया में चंद दिनों में खुल कर डर जाए वह हिंदुत्व सत्ता तक पहुंच कर बार-बार सत्ता की दावेदारी कर रहा है।

देश के जाने-माने अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक न्यूज़क्लिक पर लिखते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका ऐसे शख़्स की है, जिसने एक ओर कॉरपोरेट पूंजी और दूसरी ओर आरएसएस के बीच रिश्ता बनवाया। कॉरपोरेट-हिंदुत्व गठजोड़ को पुख्ता किया। गंभीर संकट के दौर में बड़ा पूंजीपति वर्ग आम तौर पर फासीवादी तत्वों के साथ गठजोड़ कर लेता है ताकि अपनी हैसियत को पुख्ता कर सके। अपने बोलबाले की हिफाजत कर सके, जिसके लिए आर्थिक संकट खतरा पैदा कर रहा होता है। भारत के बड़े पूंजीपति वर्ग ने ठीक यही रास्ता अपनाया और उसने मोदी को एक मध्यस्थ बनाकर, कॉरपोरेट हिंदुत्व गठजोड़ को कायम कराया। इस गठजोड़ में हिंदुत्व की सत्ता तक पहुंच आसान बनी रहती है। कॉरपोरेट संसद से ऐसे नियम कानून बनवाता है जिससे उसे फायदा मिले। हिंदुत्व अपने खिलाफ उठने वाली आवाज को दबाने का काम करता है। कॉरपोरेट हिंदुत्ववादी सरकार के सहारे उन नियम कानून को तोड़ने का काम करती है जो उस पर लगाम लगाने का काम करें। इस तरह से कॉरपोरेट और हिंदुत्व दोनों एक दूसरे को मुनाफा देते रहते हैं। मानवता से जुड़े हर मूल्य बर्बाद होते रहते हैं। ईमानदारी नैतिकता पारदर्शिता जवाबदेही सत्य निष्ठा जैसे मूल्यों का समाज में कोई मोल नहीं रह जाता। चंद लोगों के सिवाय बाकी सब बर्बाद होते रहते है।

जहां तक मुस्लिम धर्म और हिंदुत्व की बात है तो अभय कुमार दुबे " हिंदू एकता बनाम ज्ञान की राजनीति " नामक अपनी किताब की परिचर्चा पर कहते हैं कि अगर ध्यान से देखा जाए तो पता चलेगा कि मुस्लिम धर्म ने भारत में आकर के हिंदू धर्म की संस्कृति को अपना लिया। हिंदू धर्म के सांचे में ढल गया। धर्म अलग-अलग रहा। लेकिन जीवन शैलियों में काफी समानता है। हिंदू धर्म की जाति प्रथा मुस्लिम धर्म में भी है। भारतीयता का जितना कबाड़ा अंग्रेजों ने निकाला उससे ज्यादा किसी ने नहीं निकाला। पूरे भारतीय मानस पर अंग्रेजी की अलौकिक दुनिया का अब तक साम्राज्य कायम है। लेकिन मुस्लिम धर्म हिंदुत्व की बिसात के लिए सबसे अधिक मुफी काम करता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि समुदाय के आधार पर देखा जाए तो हिंदुओं के बाद भारत में दूसरी सबसे बड़ी आबादी मुस्लिमों की है। अगर हिंदू कमोबेश 80% होंगे तो मुस्लिम भी कमोबेश 15% के आसपास है। एक यही ऐसा समुदाय है जो अपने दम पर सत्ता में ठीक ठाक भागीदारी की दावेदारी प्रस्तुत कर सकता है। हिंदुत्व यही नहीं चाहता है। हिंदुत्व की पूरी विचारधारा इसी पर है कि सत्ता के सभी खंबे हिंदुओं के पास रहे। ऐसा करने के लिए वह बार-बार मुस्लिमों को दुश्मन की तौर पर पेश करता है। चूंकि अंतिम तौर पर चुनावी राजनीति जिसकी जितनी बड़ी गोलबंदी उतनी बड़ी उसकी चुनावी हिस्सेदारी पर टिकी है। इसलिए मुस्लिमों को दुश्मन की तौर पर पेश करते रहने पर हिंदुत्व के पीछे वह गोलबंदी का काम करता रहता है। हिंदुत्व को पता है कि अगर वह 80 फ़ीसदी हिंदुओं में से तकरीबन 30 फ़ीसदी हिंदुओं को अपनी तरफ खड़ा कर लेगा तो वह सत्ता तक आसानी से पहुंच जाएगा। इसलिए मुस्लिम नफरत का प्रोजेक्ट पर वह लागातार काम करता रहता है। हर वक्त हर कोशिश करता है कि हिंदू और मुस्लिम के बीच राजनीतिक तौर पर बनी दीवार कभी गिरे नहीं।

निष्कर्ष के तौर पर कहा जाए तो इन सारी बहसों का कहीं से लिया मतलब नहीं है कि सार्वजनिक जीवन हिंदुत्व से नहीं बल्कि हिंदू धर्म से संचालित होना चाहिए। हिंदुत्व की कोई जरूरत नहीं है और हिंदू धर्म या किसी भी दूसरे धर्म में सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों के आधार पर सुधार जरूरी है। हम गांधी को सच्चा हिंदू इसीलिए कहते हैं क्योंकि वह अपने हिंदू धर्म को सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों से परिभाषित करते थे। मूल में सार्वभौमिक मानवीय मूल्य है। यह सार्वभौमिक मानवीय मूल्य ही संविधान की आत्मा है जिसके आधार पर राज्य सत्ता चलनी चाहिए। हमारे प्रधानमंत्री विश्वनाथ कॉरिडोर का प्रधानमंत्री होने के नाते जब उद्घाटन कर रहे होते हैं तो संविधान की धर्मनिरपेक्ष मूल भावना को खारिज कर रहे होते हैं।

इसलिए हिंदुत्व को त्याग कर हिंदू धर्म को मानवीय बनाने की बहस तो जरूरी है लेकिन इसे भारत जैसे विविधता वाले देश में सत्ता के लिए प्रतियोगिता करने वाले व्यक्तियों को सार्वजनिक मंच से नहीं अपनाना चाहिए। कई राजनीतिक चिंतक कहते हैं कि हिंदू धर्म और हिंदुत्व में पारिभाषिक तौर पर तो अलगाव किया जा सकता है लेकिन जब इसका राजनीतिक इस्तेमाल होगा तो हिंदू धर्म के बरक्स सांप्रदायिकता को ही बढ़ावा देगा। अगर यह स्थापित बात हो चली है कि भाजपा हिंदुत्व की पार्टी है। तो हिंदू धर्म की बात करते हुए बैटिंग करने की कोशिश अंत में भाजपा को ही फायदा पहुंचाएगी। इसलिए जो हिंदुत्व की मुखालफत कर रहे हैं उन्हें कड़े तौर पर हिंदुत्व की मुखालफत करनी चाहिए। रोजाना की परेशानियों से जूझ रहे मुद्दों को जनता के बीच नैरेटिव बनाने की कोशिश करनी चाहिए। किसी भी धर्म के मर्म पर बात करते हुए उसे कभी भी संविधान से ऊंचा दर्जा नहीं देना चाहिए।

भारत में अगर केवल जाति और धर्म के पहचान के आधार पर राजनीति करने की कोशिश की जाएगी जो सबसे ताकतवर पहचान के अंतर्गत गोलबंदी करने वाली पार्टी होगी वही जीतेगी।  इसलिए जो पहचान की राजनीति की मुखालफत करते हैं उन्हें अपनी अलग राजनीतिक जमीन बनाने की जरूरत है।

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