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कोविड-19 रोकथाम में विफल ट्रंप ने अब ईरान को दी धमकी
ट्रंप की युद्ध की भाषा पूरी तरह से खोखली है। क्योंकि वह कोविड-19 संकट से निपटने में अपनी असफलता को छिपाने और उससे ध्यान हटाने की कोशिश कर रहे हैं।
एम. के. भद्रकुमार
25 Apr 2020
Translated by महेश कुमार
 ट्रंप ने अब ईरान को दी धमकी
अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति असरफ गनी (सी) ने राष्ट्रपति के महल, काबुल में 20 अप्रैल, 2020 को ईरान के विशेष दूत मोहम्मद अब्राहिम ताहेरियन की अगवानी की।

22 अप्रैल को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी एक ट्वीट के जरिए कहा कि, "मैंने संयुक्त राज्य अमेरिका की नौसेना को निर्देश दे दिया है कि यदि समुद्र में हमारे जहाजों को कोई भी या ईरानी परेशान करते हैं तो उन सभी ईरानी गनबोट्स नष्ट कर दें।" इस पर एपी की रिपोर्ट में कहा गया है कि, “व्हाइट हाउस ने फिलहाल इस पर कोई टिप्पणी नहीं की है। अमेरिकी नौसेना की बहरीन स्थित 5 वीं फ्लीट ने पेंटागन से ट्रंप की इस ट्वीट के बारे में सवाल किए, और पेंटागन ने ये सब सवाल जवाब के लिए व्हाइट हाउस भेज दिए हैं।"

ट्रंप अलग तरीके की राजनीति का इस्तेमाल कराते हुए युद्ध की भाषा बोल रहे हैं। इमीग्रेशन पर लगाए अपने प्रतिबंध की तरह, ट्रंप कोविड-19 संकट से निपटने में अपनी अक्षमता को छिपाने और उससे  ध्यान हटाने के लिए जनता को विचलित करने का सहारा ले रहे है।

तेहरान ने ट्रंप की इस धमकी को सिरे से खारिज कर दिया है। ईरानी सशस्त्र बलों के प्रवक्ता ब्रिगेडियर जनरल अबॉल्फज़ल शकरची ने तिरस्कारपूर्वक शब्दों में कहा कि, "दूसरों को धमकाने के बजाय, अमेरिकियों को अपने सुरक्षा बलों को बचाने का प्रयास करना चाहिए, जिनमें कोरोनोवायरस ने सेंघ लगा ली है।"

ट्रंप 15 अप्रैल को अमेरिकी नौसेना द्वारा लगाए गए उस आरोप पर प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे थे जिसमें ग्यारह ईरानी जहाजों ने "अंतरराष्ट्रीय जल में परिचालन करने वाले कई अमेरिकी नौसैनिक जहाजों के खिलाफ बार-बार खतरनाक और हमलावर रुख किया था।" ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) से संबंधित स्पीडबोट जाहिरा तौर पर अमेरिकी युद्धपोतों के एक स्क्वाड्रन के करीब आ गई थी जो ईरानी समुन्द्र के करीब नौकायन कर रहे थे।

इन अमरीकी युद्धपोतों में युद्धरत मोबाइल बेस पोत लुईस बी॰ पुलर है- एक ऐसा जहाज जिसे अमेरिकी आक्रमण के लिए बनाया गया है - पॉल हैमिल्टन, एक निर्देशित मिसाइल विध्वंसक, जिसमें दो तटीय गश्ती नौका और दो तटरक्षक जहाज शामिल हैं।

अमेरिकी नौसेना के बयान में कहा गया है कि, "आईआरजीसीएन की खतरनाक और उत्तेजक कार्रवाइयों ने गलत अंदाजे और टकराव के जोखिम को बढ़ा दिया है... और वे इस क्षेत्र में अन्य जहाजों की सुरक्षा के संबंध में कार्रवाई करने के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत दायित्व नहीं निभा रहे थे।" 

ईरानियों ने 19 अप्रैल को एक वीडियो जारी किया है जिसमें उन्हौने दिखाया है कि आईआरजीसी नौसेना फ़ारस की खाड़ी में अमेरिकी युद्धपोतों के नावों के बेड़े को चेतावनी दे रहे है क्योंकि वे ईरानी क्षेत्रीय जल की तरफ रुख करने की कोशिश कर रहे थे। ईरानी चेतावनी के बाद ही अमेरिकी जहाजों ने वापसी का रुख किया।

इस तरह की घटनाएं असामान्य नहीं हैं और यह बात वर्षों से दोनों पक्ष जानते हैं कि टकराव को कम  कैसे किया जाता है। ट्रंप के पास इस तरह की भाषा के इस्तेमाल का कोई कारण नहीं था। यह वास्तव में ट्रंप की मूर्खता है कि इन हालात में वह मध्य पूर्व में सैन्य संघर्ष को शुरू करने की बात का रहे हैं, जब अमेरिका खुद और उसके सहयोगी खाड़ी देश कोविड-19 से मुक़ाबले में व्यस्त हैं।

वास्तव में, अमेरिकी नाविकों के बीच कोरोनोवायरस का व्यापक प्रसार अमेरिकी नौसेना के लिए गहरी चिंता का विषय हैं। अमेरिकी विमानवाहक पोत थियोडोर रूजवेल्ट को गुआम में रोक लिया गया है, और इसके चालक दल द्वारा अपने सैकड़ों नाविकों पर की गई जांच से कोविड-19 के पॉज़िटिव केस मिले हैं।

नाविकों की जांच पॉज़िटिव पाए जाने के बाद तीन अन्य विमान वाहक, निमित्ज़, रोनाल्ड रीगन और कार्ल विंसन को भी जांच के लिए बंदरगाह पर रोक लिया गया हैं, जबकि चौथे ट्रूमैन को इस डर से समुद्र में रखा जा रहा है कि उसे वापस बंदरगाह बुलाने पर उनका चालक दल भी संक्रमित हो जाएगा। 

स्थिति बहुत ही भयावह है। नौसेना के एक पूर्व सचिव रे माबूस, जो 2009 से 2017 तक इस पद पर रहे थे, ने कहा, "मुझे लगता है कि उन्हें हर जहाज को बन्दरगाह पर लाने की जरूरत है। चालक दल के अधिकांश लोगों को उतारना चाहिए ... जहाज पर नाविकों की बहुत ही कम संख्या को छोड़ा जाए, जहाज को सेनीटाइज़ किया जाए और दो सप्ताह तक यह सुनिश्चित किया जाए कि कोई भी कोविड-19 से ग्रस्त नहीं है।" वे आगे कहते हैं कि इसके बाद, जब तक महामारी को खत्म नहीं किया जाता, तब तक चालक दल को जहाजों पर अनिश्चित काल तक रखा जाए।

तर्क है कि ईरान युद्ध के लिए खराब स्थिति में नहीं है, क्योंकि वह महामारी से बाहर आ गया है। महामारी के इस संघर्ष में बड़ी तादाद हताहत हुई है जिसमें 5000 से अधिक लोग मारे गए। हकीकत में, जो वाशिंगटन को परेशान करने वाली बार है, वह यह कि ईरान पर अमेरिका के "अधिकतम दबाव" के बावजूद वह तूफान का सामना कर बाहर आ गया है।

ट्रंप प्रशासन ने कोविड-19 से लड़ने के लिए ईरान द्वारा आईएमएफ से मांगे गए 5 बिलियन डॉलर ऋण के अनुरोध में बाधा डाली, हालांकि ईरान इस महामारी का क्षेत्रीय केंद्र था और मोर्चे पर काम कर रहे दर्जनों स्वास्थ्य कर्मी और स्वास्थ्य पेशेवर सुरक्षा उपकरण, और श्वासयंत्र सहित दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की कमी की गैर-उपलब्धता के कारण मृत्यु का शिकार हो गए थे।

संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ, रूस और चीन ने प्रतिबंधों को कम करने या हटाने के लिए अमेरिका का  आह्वान किया था। अमेरिका के भीतर, डेमोक्रेटिक राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जोए बिडेन ने भी कांग्रेस के सदस्यों के साथ मिलकर ईरान से प्रतिबंधों को निलंबित करने के लिए ट्रंप प्रशासन से आग्रह किया था। लेकिन कठोर दिल ट्रंप पर इसका कोई असर नहीं हुआ। सेक्रेटरी ऑफ स्टेट पोम्पेओ ने हास्यास्पद तर्क दिया कि ईरान आईएमएफ के फंड को कोरोनोवायरस से लड़ने के बजाय सामूहिक विनाश कार्यक्रमों के हथियारों में लगा देगा।

इस प्रकार, ट्रंप प्रशासन को उस वक़्त करारा झटका लगा जब उसने खौफ के साथ वह नज़ारा देखा जब 22 अप्रैल को, मध्य ईरान में मार्काज़ी रेगिस्तान से दो-चरण कासड रॉकेट को उड़ाया और पृथ्वी की सतह से 425 किमी ऊपर की कक्षा में एक सैन्य टोही उपग्रह को सफलतापूर्वक पहुंचा दिया गया। ऐसा करके, ईरान उपग्रह वाहक में संयुक्त ईंधन का इस्तेमाल करके एक सैन्य उपग्रह लॉन्च करने की क्षमता के साथ महाशक्तियों के कुलीन क्लब में शामिल हो गया है।

इस्लामिक रेवोल्यूशन गार्ड कॉर्प्स के कमांडर मेजर जनरल होसैन सलामी ने कहा है कि, "आज, हम दुनिया को अंतरिक्ष से देख सकते हैं और इसका अर्थ है कि आईआरजीसी की शक्तिशाली रक्षा बल की रणनीतिक खुफिया जानकारी और उसका विस्तार होना।" सभी वाहक और उपग्रह सहित उपग्रह के सभी हिस्सों का निर्माण ईरानी वैज्ञानिकों द्वारा किया गया है और इस महत्वपूर्ण उपलब्धि के पीछे संदेश यह है कि प्रतिबंध ईरान की प्रगति के रास्ते में कोई बाधा नहीं हैं।

जाहिर है, ट्रंप के पास अब कोई विकल्प नहीं हैं। अगर पीछे देखें तो उन्होंने जनवरी में कुद के फोर्स कमांडर जनरल कासिम सोलेमानी की हत्या का आदेश देने की बड़ी गलती की थी। सौ दिनों के बाद पता चलता है कि ट्रंप का निर्णय एक बड़ी रणनीतिक गलती थी।

सोलीमनी की हत्या ने नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप की संभावनाओं को बिल्कुल भी मजबूत नहीं किया है; इसने सीरिया और इराक में "प्रतिरोध की धुरी" का नेतृत्व करने में ईरान के संकल्प को कमज़ोर नहीं किया है; लेकिन, इसने इराक में अमेरिका की जड़ों को कमजोर कर दिया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ट्रंप प्रशासन के प्रति ईरान का रवैया कठोर हो गया है।

ईरानी कूटनीति जो पिछले कुछ महीनों में कम महत्वपूर्ण रही है, देश के कोविड-19 संकट से बाहर निकलते ही उसने अपना गियर बदल दिया है। विदेश मंत्री जवाद ज़रीफ़ ने पिछले सप्ताह दमिश्क का दौरा किया; उसी वक़्त सोलीमनी के उत्तराधिकारी इस्माइल घानी बगदाद में थे। सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद के साथ अपनी बैठक में, ज़रीफ़ ने कहा कि ईरान का सिरिया के "प्रतिरोध को समर्थन का रास्ता" अटूट है।

“ईरान के प्रयास स्वतंत्र हैं और अफ़ग़ान सरकार और राष्ट्र के हितों के ढांचे के भीतर हैं। हमें उम्मीद है कि हमारे प्रयासों के परिणाम बेहतर निकलेंगे, और अफ़ग़ानिस्तान में एक समावेशी सरकार का गठन होगा, अफ़ग़ानिस्तान में स्थिरता और शांति वापस आएगी, और फिर अफ़ग़ान की भीतरी वार्ता शुरू की जाएगी।”

तेहरान ने अब तक वाशिंगटन को पूरी छुट दी हुई थी, लेकिन अब वह अफ़ग़ान राष्ट्रवादी ताकतों को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है, जो अमेरिका के पहले से तय दृष्टिकोण से नाराज हैं। पिछले पखवाड़े के दौरान, ज़रीफ़ ने काबुल, अंकारा, बीजिंग, नई दिल्ली, मास्को और दोहा में अपने समकक्षों के साथ अफ़ग़ानिस्तान के संबंध में विचार-विमर्श किया है।

तेहरान अमरीका की अफ़ग़ानिस्तान में नेविगेट करने की वाशिंगटन की स्व-नियोजित भूमिका को चुनौती देने जा रहा है। इराक और अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी सेना की उपस्थिति को हटाना तेहरान की क्षेत्रीय रणनीतियों में सर्वोच्च प्राथमिकता बन गया है।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल लेख को नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके पढ़ा जा सकता है।

Trump’s Threat to Iran Betrays Angst

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