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भारत
राजनीति
दून घाटी को हरित घाटी बनाने पर ध्यान देना चाहिए न कि औद्योगिक नगर
केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने उत्तराखंड सरकार के आग्रह पर दून घाटी उद्योग नोटिफिकेशन में बदलाव कर नए उद्योगों के प्रवेश की राह खोल दी है।
वर्षा सिंह
18 Jan 2020
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पिछले कुछ समय में विकास से जुड़ी गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए केंद्र और राज्य सरकार पर्यावरणीय नियमों को लगातार लचीला बना रहे हैं। ईज ऑफ डूइंग बिजनेस में शीर्ष देशों में शामिल होने की होड़ में केंद्र सरकार पर्यावरण से जुड़े मुद्दों को दरकिनार कर रही है। उत्तराखंड में भी लगातार यही स्थिति बनी हुई है। ऑल वेदर रोड इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। डीम्ड फॉरेस्ट की परिभाषा बदलने की कोशिश इसी दिशा में उठाया कदम था। पिछले वर्ष भूमि-कानून में संशोधन कर पर्वतीय क्षेत्रों में ज़मीन खरीद की प्रक्रिया आसान की गई। अब केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने उत्तराखंड सरकार के आग्रह पर दून घाटी उद्योग नोटिफिकेशन में बदलाव कर नए उद्योगों के प्रवेश की राह खोल दी है। पर्यावरणविद् कहते हैं कि हिमालयी राज्य की संवेदनशीलता को देखते हुए ही उद्योग लगाए जाने चाहिए।

वर्ष 1989 दून घाटी उद्योग नोटिफिकेशन में बदलाव

वर्ष 1989 में दून घाटी के लिए लागू नोटिफिकेशन में बदलाव करते हुए केंद्र सरकार ने ग्रीन, औरेंज के साथ व्हाइट श्रेणी के उद्योग लगाने की इजाजत दे दी है। व्हाइट श्रेणी के उद्योग में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से अनुमति लेने की जरूरत नहीं पड़ेगी। जबकि रेड श्रेणी के उद्योग को लेकर पहले से लागू प्रतिबंध जारी रहेंगे। कोयले के इस्तेमाल से चलने वाले सभी उद्यम से दून घाटी में 8 टन प्रति दिन सल्फ़र डाई ऑक्साइड की लिमिट लगाई गई है। यानी 400 टन कोयला प्रति दिन जलाया जा सकता है। औरेंज कैटेगरी के वे उद्योग जो रेड केटेगरी में शामिल कर लिए गए हैं, वे दून घाटी में चलते रहेंगे लेकिन उनका विस्तार नहीं हो सकता।

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देहरादून को दिल्ली नहीं बना सकते

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर ऑल वेदर रोड के पर्यावरणीय प्रभाव का आंकलन कर रहे पीपुल्स साइंस इंस्टीट्यूट के रवि चोपड़ा कहते हैं कि इस नोटिफिकेशन में पारदर्शिता दिखाई नहीं देती। इससे सिर्फ ये पता चलता है कि सरकार दून घाटी में उद्योग को बढ़ावा देना चाहती है। जबकि पूरी दुनिया में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन और जलवायु परिवर्तन का खतरा मंडरा रहा है। 31% बिजली और हीट, 12% मैन्यूफैक्चरिंग और 15% ट्रांसपोर्टेशन ग्रीन हाउस गैसों के बनने में हिस्सेदारी रखते हैं। वर्ष 2013 की आपदा में हम देख चुके हैं कि देहरादून भी इस पर्यावरणीय संकट से नहीं बचा है।

दून घाटी को हरित घाटी बनाने पर ध्यान देना चाहिए न कि औद्योगिक घाटी। ताकि दिल्ली जैसे महानगरों की गर्मी से परेशान पर्यटक यहां आकर कुदरती खूबसूरती का आनंद ले सकें। राज्य सरकार दून घाटी में पिछले आठ वर्षों में जब विदेश मंत्रालय का पासपोर्ट ऑफिस बनाने की जगह नहीं खोज पाई तो नए उद्यम के लिए जगह कहां से लाएगी। वह बताते हैं कि इससे पहले दून घाटी के छरबा गांव में कोकोकोला प्लांट लगाने की कवायद की गई थी, जो लोगों के विरोध के बाद नहीं लगी। यहां सॉलिड वेस्ट ट्रीटमेंट प्लांट को लेकर बहुत विरोध हुआ। रवि चोपड़ा कहते हैं कि यहां रोजगार पैदा करने के लिए इनोवेटिव आइडिया पर काम करना होगा। सस्टेनेबल टूरिज़्म पर काम करना होगा।

क्या दून घाटी के औद्योगिक विस्तार पर कोई पर्यावरणीय अध्ययन किया गया

देहरादून में सोशल डेवलपमेंट फॉर कम्युनिटीज फाडंडेशन के अनूप नौटियाल कहते हैं कि नोटिफिकेशन में किए गए बदलाव पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं। फिर हम इसे औद्योगिक नज़रिये से देख रहे हैं लेकिन यदि दून घाटी में उद्मियों के लिए खुल जाती है तो इसका पर्यावरणीय असर क्या पड़ेगा, इस पर बात की गई। क्या देहरादून देश के दूसरे शहरों की तरह ही है। जो शर्तें अहमदाबाद या नोएडा पर लागू हैं, क्या वही शर्तें देहरादून के लिए भी लागू होंगी। यहां की घाटी पर जो प्रभाव पड़ेगा ये सवाल है। इस पर अभी कोई रिसर्च या स्टडी नहीं है। घाटी की संवेदनशीलता हम सभी को पता है। लेकिन सरकार ने इसके पर्यावरणीय असर का आंकलन कराया होता तो बेहतर होता। देहरादून में वायू प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड पर इसके आंकड़े उपलब्ध हैं।

वर्ष 1989 में दून घाटी में क्यों लगी थी पाबंदी

देहरादून की गैर सरकारी संस्था रूरल लिटिगेशन एंड एंटाइटलमेंट केन्द्र (रुलक) के संस्थापक अवधेश कौशल को दून घाटी में प्रदूषण फैलाने वाली इंडस्ट्री को बाहर का रास्ता दिखाने का श्रेय जाता है। वह कहते हैं कि बड़ी छोटी सी बात से समझिए कि उत्तराखंड में पहले ही बिजली की किल्लत है। सभी ने डीज़ल से चलने वाले जनरेटर लगाए हैं। उद्योग तो बड़े जनरेटर सेट लगाएंगे।

अवधेश बताते हैं कि आदित्य बिड़ला कैमिकल, यूपी कार्बाइड कैमिकल लिमिटेड, आत्माराम चड्ढा सीमेंट फैक्ट्री थी। आदित्य बिड़ला कैमिकल पर पब्लिक न्यूसेंस (सार्वजनिक मुश्किल) खड़ी करने का मुकदमा दायर किया। जिसके बाद आदित्य बिड़ला कैमिकल ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। ये मामला सुप्रीम कोर्ट में गया। तब अदालत ने तीनों फैक्ट्री बंद कर दी थी।

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क्योंकि वे प्रदूषण कर रहे थे। इसके बाद उस समय के बहुत सारे चूने भट्टे भी बंद कराए गए। उनका कहना है कि ये बताना ही मुश्किल होगा कि कौन सी फैक्ट्री प्रदूषण वाली है, कौन सी गैर-प्रदूषण वाली। पैसों के दम पर आज सबकुछ बदला जा सकता है। जो सरकार पांच लोगों को भला करने के लिए (मुख्यमंत्री सुविधा अध्यादेश-2019) कानून बना सकती है, वो किसका भला सोचेगी। उनका सुझाव है कि राज्य को अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए पर्यटन पर फोकस करना चाहिए। अच्छी सड़क, बिजली, अस्पताल जैसी सुविधाएं देनी होंगी।

करीब 30 वर्ष बाद अधिसूचना में बदलाव से अवधेश कौशल नाख़ुशी जताते हैं और अपनी संस्था रुलक के माध्यम से इस मामले को दोबारा अदालत में चुनौती देने की बात कहते हैं।

जीडीपी पर ध्यान, प्राकृतिक संसाधनो की अनदेखी

इकोलॉजिस्ट माधव गाडगिल अपने एक लेख में पर्यावरण के संदर्भ में पूछते हैं कि स्थायित्व की अर्थव्यवस्था होनी चाहिए या हिंसा (बाढ़, तूफान, प्राकृतिक आपदा) की? वह कहते हैं कि हम पश्चिमी देशों के पूंजीवाद ने पूंजी पर आधारित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दिया है जो प्राकृतिक स्रोतों की बर्बादी पर हमें हासिल होता है। वह कहते हैं कि बाढ़, भूस्खलन, बादल फटने जैसी आपदाओं का शिकार आम आदमी होता है। हम जीडीपी बढ़ाने पर तो ध्यान देते हैं लेकिन अपने प्राकृतिक संसाधन, मनुष्य और सामाजिक पूंजी की अनदेखी करते हैं।

रेड श्रेणी के उद्योग औरेंज और ग्रीन केटेग्री में डाले गए

दिल्ली ही नहीं देहरादून तक प्रदूषण की स्थिति गंभीर है। इसके बावजूद वर्ष 2016में केंद्र सरकार ने उद्योगों की श्रेणी में भी बदलाव किए। ताकि प्रदूषण के मानक उनके फलने-फूलने में बाधा न बनें। तब रेड कैटेगरी में रखे गए 85 उद्योगों में से 26 को औरेंज कैटेगरी में डाल दिया गया, 3 को ग्रीन कैटेगरी में। इस तरह रेड कैटेगरी के उद्यम 85 से घटकर 60 हो गए। यानी 25 उद्योगों को प्रदूषण मानकों में अच्छी-खासी छूट मिल गई। इससे औरेंज कैटेगरी के उद्योग 73 से बढ़कर 83 हो गए।

पहले से औरेंज में शामिल 19 उद्योगों को ग्रीन कैटेगरी में डाल दिया गया और 2 को व्हाइट में। जबकि ग्रीन कैटेगरी के उद्योग 86 से घटकर 63 हो गए। इनमें 6 औरेंज कैटेगरी में डाले गए और 34 व्हाइट कैटेगरी में। बड़े उद्यमियों की मांग पर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने ये बदलाव किए। उत्तराखंड में दून घाटी को छोड़कर सभी जगह ये बदलाव लागू हुए। लेकिन यहां भी उद्यमी लगातार सभी श्रेणी के उद्योग शुरू करने की मांग कर रही थी।

जिन उद्योगों को रेड से औरेंज कैटेगरी में किया गया उनमें स्टोन क्रशर, हॉट मिक्स प्लांट्स, लाइम मैन्यूफैक्चरिंग जैसे उद्योग शामिल हैं। इसी तरह फ्लाई ऐश एक्सपोर्ट, ट्रांसपोर्ट-डिस्पोज़ल, ऑयल-गैस पाइपलाइस जैसे उद्योग को रेड से ग्रीन कैटेगरी में डाल दिया गया।

पर्यावरण की कीमत पर कारोबारी सुगमता के प्रयास!

इसी तरह वर्ष 2017में केंद्र सरकार ने ग्रीन कैटेगरी के उद्योगों को पर्यावरण निरीक्षण से बाहर करने और औरेंज कैटेगरी के उद्योगों का पर्यावरण ऑडिट थर्ड पार्टी से भी कराये जाने को मंजूरी दी गई। इंडस्ट्रियल रिफॉर्म के तहत उद्योगों को पांच वर्ष और उससे अधिक तक के लिए पर्यावरणीय पंजीकरण की बात कही गई। पर्यावरण के लिए सेल्फ सर्टिफिकेशन और थर्ड पार्टी सर्टिफिकेशन को मंजूरी दी गई।

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उत्तराखंड को ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस यानी कारोबार में सुगमता के लिए देश में 11वां स्थान दिया गया। इसका मतलब राज्य में उद्योग को बढ़ावा देने के लिए आप किस तरह का सुधार कर रहे हैं। इसमें पर्यावरणीय मानकों में सुधार, ज़मीन की उपलब्धता, पर्यावरणीय अनुमतियां और मॉनीटरिंग जैसे कई बिंदू शामिल हैं। वर्ष 2019 में भारत 14 रैकिंग की सुधार कर 63वें रैंक पर आ गया। 2014 में देश की रैंकिंग 190 देशों में 142 थी। वहीं उत्तराखंड 2018 में देश में कारोबारी सुगमता के लिहाज से 11वें स्थान पर रहा।

नोटिफिकेशन में बदलाव से उद्मी ख़ुश

इंडस्ट्रीज़ एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड के अध्यक्ष पंकज गुप्ता इस बदलाव का स्वागत करते हुए कहते हैं कि इससे नए उद्योगों के निवेश की राह खुलेगी। उनका कहना है कि औरेंज केटेगरी की बड़ी यूनिट के लिए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से क्लीयरेंस सर्टिफिकेट हासिल नहीं हो पा रहे थे। इसके साथ ही हर छठे महीने या एक साल में प्रदूषण सर्टिफिकेट रिन्यू कराए जाने से भी उद्यमियों के लिए मुश्किल बनी रहती है थी और कई विभागों के चक्कर काटने पड़ते हैं। उनके मुताबिक रेड-औरेंज किसी भी कैटेगरी के उद्यम के लिए कम से कम पांच वर्ष के लिए प्रदूषण सर्टिफिकेट दिया जाना चाहिए।

(वर्षा सिंह स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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