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मज़दूरों पर दोहरी मार: “मालिक कह रहा है यहां से जाओ, लेकिन मैं कहां जाऊं?”
फैक्ट्री मालिकों को भी डर है की ये मज़दूर यहाँ रहे तो इनका खर्च भी उन्हें ही उठाना पड़ेगा। इसके साथ ही पुलिसिया कार्रवाई का भी डर है। इन्ही कारणों से मालिक मज़दूरों को भगाना चाहता है।
मुकुंद झा
27 Mar 2020
मज़दूरों पर दोहरी मार
Image courtesy: India Speaks Daily

दिल्ली के मादीपुर के जूता चप्पल फैक्ट्री में कई मज़दूर फंसे हैं। इन फैक्ट्रियों में काम करने वाले ठेका मज़दूर बिलाल अहमद समेत करीब उनके लगभग दस साथी यहां हैं। उन्होंने बताया, "वो लोग जिस फैक्ट्री में हैं, वहां का मालिक उनसे जाने के लिए कह रहा है, जबकि बाहर पूरी तरह लॉकडाउन है। ऐसे में हम कहाँ जाए?"

यह सब बताते हुए बिलाल की आवाज में अजीब सी घबराहट थी। ये सभी मज़दूर जूता फैक्ट्री में ही काम करते थे और उसी फैक्ट्री में रात को सो भी जाया करते थे। इनका न दिल्ली में कोई घर है न कोई जानकर, ऐसे में अब इन लोगों के लिए संकट है कि जाएं तो जाएं कहाँ। ये मज़दूर अपने घर जाना चाहते हैं लेकिन इनके पास कोई साधन नहीं हैं। इसके लिए इन्होंने पुलिस से भी मदद मांगी लेकिन वहां से भी निराशा मिली।

दिल्ली की तमाम छोटी बड़ी फैक्ट्रियों में इसी तरह के मज़दूर रहते हैं, जो किसी अन्य राज्य से पलायन करके आते  है, रूम का किराया बचाने के लिए वो लोग इस तरह की फैक्ट्रियो में रहते हैं। मज़दूरों ने बताया कि मादीपुर में ही करीब सौ से अधिक मज़दूर इस तरह की फैक्ट्रियों में फंसे हुए हैं। इनमे अधिकतर बिहार ,बंगाल और उत्तर प्रदेश से आये मज़दूर हैं।

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ये मज़दूर ठेके पे काम करते थे, इनकी औसतन कमाई 200 से लेकर 600 रुपये प्रतिदिन है। लेकिन इस कोरोना वायरस के चलते पिछले कई महीनो से काम भी बहुत मंदा था, क्योंकि इनका कच्चा माला चीन से ही आता था। जिस कारण इन मज़दूरों की हालत पहले से ही काफी बुरी थी। ऐसे में अचानक इस तरह का फैसला इन लोगों के लिए दोहरी मार लेकर आया है, एक तरफ इनके पास खाने के लिए पैसा नहीं है, न रहने को छत तो दूसरी तरफ इस माहमारी का डर।

 ये लोग जिस तरह की स्थिति में रहते इसमें सबसे अधिक संभवना है की ये किसी भी संक्रमण की चपेट में आ जाएं। इसके साथ मज़दूरों को अपने घर की भी चिंता सता रही है।  

फैक्ट्री मालिकों को भी डर है की ये मज़दूर यहाँ रहे तो इनका खर्च भी उन्हें ही उठाना पड़ेगा। इसके साथ ही पुलिसिया कार्रवाई का भी डर है। इन्ही कारणों से मालिक मज़दूरों को भगाना चाहता है।

इस महामारी से पहले भी इन मज़दूरों की स्थति बहुत अच्छी नहीं थी। मज़दूरों ने हमें दिखाया था कि कैसे वो आमनवीय स्थिति में रहते हैं और काम भी करते हैं।

वहां सुरक्षा के भी कोई इंतजाम नहीं थे अगर रात को कहीं कोई घटना घट जाए तो शायद ही कोई मज़दूर जिंदा बचे। हमने यह पहले भी देखा कि चाहे वो बवाना अग्निकांड हो या फिर अनाज मंडी अग्निकांड जहाँ कई मज़दूरों की जान चली गई थी। क्योंकि वहां भी किसी तरह कि कोई सुरक्षा नहीं थी। दिल्ली में ऐसी अवैध सैकड़ो फैक्ट्रियां है जहाँ इस तरह हज़ारों मज़दूर काम कर रह थे। पिछले दो साल में ही सैकड़ों मज़दूरों की मौत हो चुकी है।

इस महामारी के बाद हुए लॉक डाउन के बाद तो उनका जीवन और भी बदतर हो गया है। ऐसे ही एक मज़दूर सुमित कहते है कि "पहले किसी तरह से काम करके ज़िन्दा तो थे लेकिन अब लग रहा शायद वो भी मुश्किल हो गया हैं, मेरे पास मात्र 150 रुपये हैं, मालिक कह रहा है यहां से जाओ लेकिन मै कहाँ जाऊं? हमारे पास खाने को भी कुछ नहीं हैं। क्योंकि हम लोगों के पास सामान रखने की न तो जगह होती और न ही पैसे, इसलिए हम रोज लाते हैं और रोज खाते हैं।

मज़दूरों ने यह भी बताया कि अभी तक इन लोगों के पास किसी तरह की कोई सरकारी मदद नहीं पहुंची है। जबकि सरकार लगातार दावे कर रही है कि वो किसी भी मज़दूर को भूखा नहीं सोने देगी। सरकार ने इन लोगों के लिए शेल्टर होम में खाने की व्यवस्था की है लेकिन एक तो इन लोगों को इस बात की जानकारी नहीं हैं, दूसरा इनमें से कई मज़दूरों ने वहां जाने से मना किया और कहा बस सरकार हमें हमारे घर भिजवा दे।  

भारत की कुल आबादी का अधिकांश हिस्सा असंगठित क्षेत्र के दिहाड़ी मजदूरों, संगठित क्षेत्र के ठेका, कैजुअल, ट्रेनी एवं फिक्स्ड टर्म के मजदूरों एवं गरीब तबके के लोगों रिक्शा-तांगे, रेहडी वाले, टुकटुक-टैम्पो, चलकर अपना जीवनयापन करते हैं।  इनमें से अधिकांश लोग एवं उनके बच्चे सरकारों की गलत नीतियों के कारण पहले से ही कुपोषित हैं। इनमें से असंख्य लोग स्लम बस्तियों में एवं फुटपाथों, रेलवे स्टेशनों आदि में खुले आसमान के नीचे जीवन-बसर करने को मज़बूर हैं।

इनमें अधिकांश मजदूर ऐसे हैं जिन्हें हाथों हाथ दिहाड़ी दी जाती है। इनमें से गरीब तबके के अधिकांश लोग ऐसे हैं कि वो रोज कुआं खोदते हैं और पानी पीते हैं। 23 मार्च ‘लॉक डाउन’ करने का इनपर प्रतिकूल असर पड़ा है। इसी कारण यह मज़दूर किसी तरह से भागकर अपने घर पहुंचना चाहते हैं। क्योंकि उन्हें भरोसा है वहां कम से कम खाना और छत तो मिल ही जाएगा।

इसे भी पढ़ें : कोरोना वायरस: दिहाड़ी मजदूरों के सामने संकट कितना बड़ा है?

मज़दूर संगठन एक्टू के दिल्ली राज्य सचिव अभिषेक ने न्यूज़क्लिक से बात करते हुए कहा कि "सरकार को चहिए की इन मज़दूरों के लिए खाने, रहने की और स्वास्थ्य की जिम्मेदारी ले। एक आदेश पारित करे जिसमे साफ साफ लिखा हो कोई भी मालिक फैक्ट्रियों में रहने वाले मज़दूरों को बाहर नहीं निकाल सकता है या फिर उनके लिए सुरक्षित घर पहुंचने की व्यवस्था करे।"

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