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EIA 2020 : पर्यावरणीय हितों की अनदेखी औद्योगिक हितों को तरज़ीह
आज आवश्यकता पर्यावरण सम्बन्धी नियम-क़ानूनों को मज़बूत बनाने और उन्हें प्रभावी रूप से लागू करने की है। लेकिन अब ‘पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना 2020’ का मसौदा लाया है जिसे कहने को तो परियोजनाओं द्वारा पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन से रोकने के लिए लाया गया है लेकिन ये एक प्रकार से उन उल्लंघनों को वैधता प्रदान करेगा।
नेसार अहमद
07 Jul 2020
EIA 2020
image courtesy : Conserve Energy Future

दिल्ली उच्च न्यायलय ने 29 जून को एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए, भारत सरकार के पर्यावरण, वन एवं मौसम बदलाव मंत्रालय द्वारा जारी पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना 2020 (EIA Notification 2020) के मसौदा पर आपत्ति या सुझाव भेजने की अंतिम तारीख 11 अगस्त तक बढ़ा दी है। हालाँकि इस पर थोड़ी अस्पष्टता बनी हुई है, लेकिन  देश में अभी कोरोना संकट के कारण जैसे हालात हैं उन्हें देखते हुए इस मसौदे पर जनता द्वारा सुझाव भेजने के लिए और समय दिया जाना आवश्यक है क्योंकि यह मसौदा देश में पर्याववरण से जुड़े नियमों में बड़ा बदलाव लाने के लिए लाया गया है।

दरअसल पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 के तहत देश में विकास व आधारभूत ढाँचा से जुड़ी विभिन्न परियोजनाओं को पर्यावरण, वन एवं मौसम बदलाव मंत्रालय से पर्यावरणीय अनुमति (environmental  clearance-EC/environmental permission-EP) लेनी होती है। यह अनुमति इसी क़ानून के तहत जारी किये गए पर्यावरणीय प्रभाव का अध्ययन अधिसूचना  (Environmental Impact Assessment-EIA Notification) के नियमों के अनुसार दी जाती है। वर्तमान में पर्यावरणीय प्रभाव का अध्ययन अधिसूचना 2006 लागू है, जिसमें पिछले वर्षों में कई संशोधन हुए हैं।

अब भारत सरकार के पर्यावरण, वन एवं मौसम बदलाव मंत्रालय ने पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना 2020 (EIA Notification 2020) का मसौदा जारी किया है और इस पर 30 जून 2020 तक आम लोगों से आपत्ति या सुझाव मांगे गए थे। इस मसौदे को मंत्रालय ने 23 मार्च 2020 को  जारी किया था और ये मंत्रालय के वेबसाइट पर 11 अप्रैल को प्रकाशित हुआ था। लेकिन इस दौरान देश में कोरोना महामारी को रोकने के लिए लॉकडाउन लागू था और सभी लोग लॉकडाउन की परेशानीयों में घिरे थे, जो अभी तक समाप्त नहीं हुई है। ऐसे समय में मंत्रालय को पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना 2020 का मसौदा जारी करना क्यों ज़रूरी लगा और 30 जून तक ही इस पर टिपण्णी मंगवाना क्यों ज़रूरी था, ये समझ के बाहर है।

जहाँ तक पर्यावरण संरक्षण की बात है, भाजपा सरकार की नीति इस मामले में हमेशा ही आर्थिक हितों या उद्योगों के हितों को पर्यावरणीय हितों पर तरजीह देने की रही है। 2014 के बाद से पर्यावरण नीतियों में कई ऐसे बदलाव किये गए हैं  जो पर्यवरण संरक्षण या मौसम बदलाव को रोकने के अनुकूल नहीं हैं। उदाहरण के लिए हाल ही में तटीय क्षेत्र नियमों में बदलाव करके तटीय क्षेत्र-1, जो पर्यावरण की दृष्टि से सबसे संवेदनशील क्षेत्र है, में कई प्रकार की पहले प्रतिबंधित गतिविधियों को अनुमति दी गयी और अन्य बदलाव किये गए जिससे निर्माण उद्योग और पर्यटन उद्योगों को लाभ मिले।  

इसके अलावा वन्यजीव पर राष्ट्रीय समिति में स्वतंत्र सदस्यों की संख्या में कमी, अत्यंत प्रदूषित क्षेत्रों में नई परियोजनाओं पर रोक को हटाना, वन कानूनों के प्रावधानों को कमजोर करते हुए संरक्षित क्षेत्रों के काफी करीब तक विभिन्न परियोजनाओं की स्वीकृति, औद्योगिक एवं संरचनागत परियोजनाओं की स्वीकृति देने के लिये वन कानूनों के मानकों में बदलाव आदि ऐसे कुछ नीतिगत बदलाव इस सरकार के पहले कार्यकाल के आरंभ में ही किये गए थे जिनसे औद्योगिक तथा ढ़ाचागत परियोजनाओं को पर्यावरणीय तथा वन स्वीकृति मिलना आसान हो गया। यही नहीं भाजपा सरकार ने पर्यावरण संरक्षण के संस्थाओं को भी कमज़ोर किया है।

पर्यावरणीय प्रभाव का अध्ययन अधिसूचना 2006 में भी हाल के वर्षों में कई बदलाव कर उसे लचीला बनाया गया है, जैसे कोयला खदानों के विस्तार को पर्यावरण प्रभाव अध्ययन के तहत होने वाली जन सुनवाई से मुक्त करना, 2000 हेक्टेयर से कम क्षेत्र वाले सिंचाई परियोजनाओं को पर्यावरणीय स्वीकृति से छूट आदि।

इससे भी बड़ी बात ये है कि, चाहे किसी की भी सरकार रही हो, पर्यावरणीय क़ानूनों / नियमों को बहुत ही ढीले ढाले ढंग से लागू किया जाता है और इन मामलों में हमेशा ही ज़ोर परियोजनाओं को स्वीकृति देने पर होता है न कि उन्हें रोकने या पर्यावरण के अनुकूल बनाने पर। झारखण्ड में हुए एक अध्ययन के मुताबिक़ कम्पनियों द्वारा पर्यावरण प्रभाव अध्ययन (EIA) रिपोर्ट अपूर्ण और खामियों से भरे होते हैं और इस प्रक्रिया में होने वाली जन सुनवाई (जो कि लोक विमर्श का हिस्सा है) को कंपनियां और सरकारें आनन फानन में बिना लोगों को अच्छी तरह सूचित किये महज़ खानापूर्ति की तरह पूरा करती हैं।

ऐसे में आवश्यकता पर्यावरण सम्बन्धी नियमों और क़ानूनों को मज़बूत बनाने और उन्हें प्रभावी रूप से लागू करने की है। लेकिन अब पर्यावरण, वन एवं मौसम बदलाव मंत्रालय ‘पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना 2020’ का मसौदा लाया है जिसे कहने को तो परियोजनाओं द्वारा पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन से रोकने के लिए लाया गया है लेकिन ये एक प्रकार से उन उल्लंघनों को वैधता प्रदान करेगा।

सरकार ने 2017 में एक आदेश लाकर बग़ैर पर्यावरणीय अनुमति (EC/EP) के निर्माण कार्य प्रारंभ करने वाले परियोजनाओं को बाद में अनुमति प्रदान करने का प्रावधान किया था। लेकिन अब पर्यावरणीय प्रभाव का अध्ययन अधिसूचना 2020 में इसे बाक़ायदा संस्थागत कर दिया गया है, अर्थात उद्योग बिना पर्यावरणीय अनुमति (EC/EP) परियोजना कार्य प्रारम्भ कर सकेंगे और बाद में यह अनुमति ले सकेंगे (धारा 22)। यहाँ यह ध्यान दिलाना ज़रूरी है कि पूर्व में ऐसी कोशिशों पर सर्वोच्च न्यायालय और राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण एतराज़ कर चुके हैं।

मसौदा पर्यावरणीय प्रभाव का अध्ययन अधिसूचना 2020 में अधिकांश क्षेत्रों की परियोजनाओं को तीन श्रेणियों A, B1 एवं B2 में बांटा गया है। तथा B2 श्रेणी की परियोजनाओं को पर्यावरणीय अनुमति (EC) प्राप्त करने के लिए पर्यावरणीय प्रभाव का अध्ययन रिपोर्ट बनाने और लोक परामर्श (public consultation) से छूट दे दी गयी है (धारा 10)।  इसके अलावा मसौदे में जन सुनवाई की सुचना देने की अवधी को भी घटा कर 45 दिन से 40 दिन कर दिया गया है।

लोक परामर्श वो प्रक्रिया है जिसमें परियोजना से प्रभावित हो सकने वाले लोग जन सुनवाई भाग लेते हैं और पर्यावरणीय अनुमति देने वाले अधिकारियों के सामने अपनी बात रखते हैं। किसी भी परियोजना, छोटी या बड़ी, से पर्यावरण और समुदाय व लोग भी प्रभावित होते हैं। पर्यावरणीय नुक़सानों का प्रभाव भी अधिकांशतः उन लोगों पर होता है जो पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों पर सर्वाधिक निर्भर होते हैं। लोक परामर्श की प्रक्रिया से अधिकारियों को उन प्रभावित होने जा रहे लोगों की बात सुनकर उचित फैसला करने में मदद मिलती है। अतः  B2 श्रेणी के परियोजनाओं को लोक परामर्श से बाहर रखने का कोई औचित्य नहीं है।

मसौदे में कई सार्वजनिक परियोजनाओं जैसे सिंचाई परियोजनाओं का आधुनिकीकरण, सभी भवन, निर्माण और क्षेत्रीय विकास परियोजनाओं, अंतर्देशीय जलमार्ग, राष्ट्रीय राजमार्गों के विस्तार या चौड़ीकरण, राष्ट्रीय रक्षा और सुरक्षा से संबंधित सभी परियोजनाओं या "अन्य रणनीतिक परियोजनाओं" को लोक विमर्श से छूट दी गई है। केंद्र सरकार द्वारा, सभी रेखीय परियोजनाएं जैसे सीमावर्ती क्षेत्रों में पाइपलाइनें और 12 समुद्री मील से परे स्थित सभी परियोजनाएं भी इस से बाहर रखी गयीं हैं।

अब राष्ट्रीय सुरक्षा के अलावा "अन्य रणनीतिक" महत्तव की परियोजनाओं के पर्यावरणीय अनुमति से सम्बंधित सूचना भी सार्वजनिक नहीं की जाएगी। ज़ाहिर है ये मसौदा इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता में भी कमी लाने का प्रस्ताव करता है।

इसी प्रकार से सरकार ने मसौदा अधिसूचना 2020 में कई प्रकार की परियोजनाओं को पर्यावरणीय अनुमति लेने की आवश्यकता से मुक्त कर दिया है, जिनके लिए पहले अनुमति लेनी आवश्यक थी। पर्यावरणीय प्रभाव का अध्ययन अधिसूचना 2020 लागू होने पर खनन परियोजनाओं को 50 साल के लिए पर्यावरणीय अनुमति मिल सकती है (धारा 19), जो पहले 30 वर्ष के लिए दी जाती थी।

कुल मिलाकर मसौदा अधिसूचना 2020 पर्यावरणीय हितों की चिंता किये बग़ैर देश को विश्व बैंक के उद्योग व्यापार में आसानी वाले सूचकांक (ease of doing business index) में ऊपर लाने का प्रयास है। सरकार की पहली प्राथमिकता देश को इस सूचकांक में ऊपर करने की है। इसी क्रम में ये बदलाव किये जा रहे हैं। इसी प्रकार केंद्र व राज्य सरकारें देश के श्रम कानूनों में भी उद्योग धंधों के पक्ष में बदलाव कर रही हैं। सरकार की इन कोशिशों के नतीजे भी आ रहे हैं। उद्योग व्यापार में आसानी वाले सूचकांक पर भारत 2014 में 134वें क्रम पर था जो अब 2020 में 67वें स्थान पर आ गया है।

लेकिन दुनिया में आसान उद्योग व्यापार के अलावा अन्य भी सूचकांक हैं। मानव विकास सूचकांक हो या असमानता सूचकांक या फिर भूख का सूचकांक इन सब में हमारी स्थिति अत्यंत ख़राब है और भारत दुनिया के देशों यहाँ तक कि कई मामलों अपने पड़ोसी देशों से भी इन सूचकांकों में पिछड़ता नज़ारा आता है। जहाँ तक पर्यावरण संरक्षण की बात है तो पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक पर भारत को 100 में से मात्र 27.6 अंक मिले हैं और अपना देश 180 देशों में 168वें स्थान पर है तथा दक्षिण एशिया में अफ़ग़ानिस्तान को छोड़ कर सभी देशों का प्रदर्शन हम से बेहतर है।  

अभी मौसम में बदलाव एक बड़ा संकट बना हुआ है, हम पहले से कहीं अधिक प्राकृतिक आपदाओं का सामना कर रहे हैं, हमारे जंगलों में आग लग रही है, हमारे देश में हवा और पानी की गुणवत्ता दिनों दिन खराब हो रही है, हमारे सैकड़ों पक्षी और पशु समाप्ति की कगार पर हैं, और मौसम का मिजाज़ बिगड़ता जा रहा है। ऐसे में पर्यावरण मंत्रालय का लक्ष्य देश में पर्यावरण की स्थिति में सुधार होना चाहिए जो हमें इन संकटों से उबरने में मदद करे और पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक में ऊपर ले जाये, न कि उद्योग व्यापर की आसानी।

लेखक जयपुर स्थित बजट अध्ययन एवं शोध केंद्र (बार्क) के निदेशक हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।

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Real State
Forest Management
Union Ministry of Environment

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