NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
अब मंदी सिर्फ़ 'पिंक न्यूज़पेपर्स' की हेडलाइन नहीं, बल्कि हमारे घरों, दुकानों और सड़क तक उतर आई है
ध्यान दीजिएगा कि यह आँकड़े जो जारी हुए हैं यह सितंबर तक के हैं और हम देख रहे हैं कि मार्केट अक्टूबर और नवंबर में भी नहीं सुधर पाया है, यानी तीसरी तिमाही में भी सुधार के लक्षण नही दिखाई दे रहे हैं...।
गिरीश मालवीय
30 Nov 2019
Economic slowdown in India

आज सभी अखबारों में जीडीपी की गिरती हुई दर की चर्चा है। पहली बार अखबार ओर मीडिया स्थिति की गंभीरता को समझने का प्रयास करता दिखाई दे रहा है। लेकिन वास्तविकता यह है अर्थव्यवस्था की बदहाली इतनी विकट है कि अब मंदी सिर्फ पिंक न्यूजपेपर्स की हेडलाइन तक ही सीमित नहीं रह गई है अब यह हमारे घरों, दुकानों और सड़कों तक उतर आयी है।

यह मंदी हमें प्रत्यक्ष नजर आने लगी है। सब इसी की बात कर रहे हैं। वैसे इस मंदी की, इस स्लोडाउन की नींव तो तभी पड़ गयी थी जब असंगठित क्षेत्र ध्वस्त होना शुरू हुआ था। 2017 का आखिरी महीना आते आते नोटबन्दी ओर जीएसटी का सम्मिलित असर बाजार पर दिखना शुरू हो गया था। इनफॉर्मल सेक्टर में रोजगार पा रहे लोगों की कमर टूटना शुरू हो गई थी। लाखों लोग अपने जमे जमाए काम धंधों से हाथ धो बैठे थे।

2018 के बाद से हर तिमाही GDP की दर जो गिरना शुरू हुई वह अब तक थमी नही है। वजह साफ है कि उपभोक्ता की क्रयशक्ति ही कम हो गयी है। बहुत कम लोग ही रिस्क उठा कर पूँजी लगा कर नया काम करने को उत्सुक नजर आ रहे है। बाजार का सेंटिमेंट पूरी तरह से बिगड़ा हुआ है।

पिछली 6 तिमाही से लगातार जीडीपी की ग्रोथ रेट गिरती ही जा रही है। और आने वाले समय में इसमें सुधार होने की कोई उम्मीद नहीं दिख रही है, क्योंकि मार्केट में कोई डिमांड ही नही दिखाई दे रही है। त्योहारी ओर शादी ब्याह का सीजन लगने के बावजूद मार्केट में सुस्ती छाई हुई है। ध्यान दीजिएगा कि यह आँकड़े जो जारी हुए हैं यह सितंबर तक के हैं और हम देख रहे हैं कि मार्केट अक्टूबर ओर नवम्बर में भी नहीं सुधर पाया है, यानी तीसरी तिमाही में भी सुधार के लक्षण नही दिखाई दे रहे हैं...।

जब नोटबंदी की गयी तब पूर्व प्रधानमंत्री एवं विश्व में मान्यता प्राप्त अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह ने इसे संगठित लूट और सुनियोजित कानूनी दुरूपयोग बताते हुये GDP में दो प्रतिशत कमी आने की आशंका जताई थी ओर यह बात कालांतर में बिल्कुल सच साबित हुई।

दरअसल पिछले साल जब जीडीपी के दूसरी तिमाही के आँकड़े घोषित किये गए थे तब उस तिमाही की ग्रोथ 7 प्रतिशत बताई गयी थी। मुझे याद है कि तब भारतीय मूल के एक जानेमाने अर्थशास्त्री मेर्टन कॉलेज, ऑक्सफोर्ड के एमरिट्स फेलो और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के रीडर एमरिट्स का बयान बड़ा चर्चित हुआ था। उन्होंने कहा था कि " मैं एक बात कहूंगा, (भारत का राष्ट्रीय खाता) एक मात्र ऐसी जगह है जहां आप सात फीसद वृद्धि देख सकते हैं। आपको यह कहीं और नज़र नहीं आ सकती है।

यदि आप निर्यात और आयात देखते हैं तो वे बिल्कुल सपाट हैं। ये कम हुये हैं या बराबर रहे अथवा बहुत धीमी वृद्धि हुई। यदि आप संगठित क्षेत्र में रोजगार पर नजर डाले तो वहां ठहराव है।" उन्होंने कहा कि यदि आप औद्योगिक उत्पादन पर नजर डालें तो यह बहुत धीमी रफ्तार से बढ़ रहा है। यदि आप बैंक क्रेडिट पर नजर दौड़ाते हैं तो यह बहुत धीमी वृद्धि कर रहा है। निवेश अनुपात जो 2011 में जीडीपी का 34 फीसद था, अब जीडीपी का 27 फीसद है। अतएव निवेश वाकई लुढ़क गया है। ऐसे में यह विश्वास करना मुश्किल है कि राष्ट्रीय आय सात फीसद सलाना दर से वृद्धि कर रही है।

पिछले साल देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे अरविंद सुब्रमण्यम ने भी साफ साफ कह दिया था कि नोटबंदी का फैसला देश की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा झटका साबित होगा।

कल बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने तीसरी तिमाही के जीडीपी ग्रोथ रेट के आंकड़ों पर सवाल उठाते हुए कहा कि असलियत में जीडीपी ग्रोथ रेट 4.5 नहीं वह 1.5 प्रतिशत है। यानी यह झूठे आँकड़े दिखाकर जनता को भरमाया जा रहा है। इसी बात को सितंबर 2014 से जून 2018 तक नरेंद्र मोदी सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार रह चुके अरविंद सुब्रमण्यन ने हावर्ड यूनिवर्सिटी से प्रकाशित एक रिसर्च पेपर में सिद्ध करके बताया था।

अरविंद सुब्रमण्यम ने इस शोधपत्र में जो सबसे महत्वपूर्ण बात कही थी, वह यह थी कि जीडीपी ग्रोथ रेट की गणना साल 2011 से पहले मैन्यूफैक्चरिंग उत्पादन, मैन्यूफैक्चरिंग उत्पाद और औद्योगिक उत्पादन सूचकांक और मैन्यूफैक्चरिंग निर्यात से निकाली जातीं थी लेकिन बाद के सालों में इस संबंध को लगातार विस्मृत कर दिया जाता रहा है।

सुब्रमण्यम ने अपने शोध पत्र में दिखाया कि किस तरह नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस NSSO ने इस फर्जीवाड़े को अंजाम दिया है… दरअसल उसने एमसीए-21 के नाम से एक नया डाटाबेस बनाया है और उसी से जीडीपी ग्रोथ के आंकड़े निकाले है। जाँच में पता चला है कि उस MCA-21 में शामिल 38% कंपनियां या तो अस्तित्व में ही नहीं थी या फिर उन्हें गलत कैटेगरी में डाला गया था। ऐसा किये जाने से आर्थिक वृद्धि दर औसतन 2.5% ऊंची हो गई हैं।

यह फर्जीवाड़ा आज भी चल रहा है

आपको जानकर हैरानी होगी कि इस साल की पहली छमाही में बुनियादी उद्योगों की वृद्धि दर महज 1.3 फीसदी रही जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में इसमें 5.5 फीसदी का इजाफा हुआ था। जीएसटी संग्रह भी अक्टूबर महीने में लगातार तीसरे महीने 1 लाख करोड़ रुपये से कम रहा है। राजस्व संग्रह पिछले साल अक्टूबर महीने की तुलना में 5.3 प्रतिशत कम रहा। अक्टूबर माह में चालू वित्त वर्ष के 7 महीनों में कर संग्रह में सबसे तेज गिरावट दर्ज की गई है। ताजा आँकड़े तो मैन्युफैक्चरिंग दर को शून्य के भी नीचे बता रहे हैं। यानी भविष्य के आसार बद से बदतर हो रहे हैं।

सबसे बड़ी बात तो यह है कि देश का राजकोषीय घाटा अक्टूबर के अंत में 7.2 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया है और बजट में पूरे साल के लिए लगभग 7.1 लाख करोड़ का अनुमान लगाया गया था यानी सिर्फ 7 महीने में साल भर का घाटा हो गया है। हालात इतने बदतर है कि मोदी सरकार द्वारा राज्यों को जीएसटी लगाने से हुई क्षतिपूर्ति की रकम भी नहीं दी जा रही है।

आसान है कह देना कि जीडीपी गिर रही है, या यह कह देना कि फिल्में तो आज भी 100 करोड़ का कलेक्शन 3 दिनों में कर रही है, पर बहुत मुश्किल है शाम को दुकान बढ़ा कर जाते हुए एक छोटे व्यापारी से आंख से आंख मिलाकर पूछना कि भाई बाजार में ग्राहकी कैसी चल रही हैं, किस्तें चुकाने का दर्द उसकी आवाज़ में उभर जाता है…

(लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं।)

indian economy
Economic Recession
economic crises
GDP growth-rate
modi sarkar
Narendra modi
Nirmala Sitharaman
Indian media

Related Stories

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

आर्थिक रिकवरी के वहम का शिकार है मोदी सरकार

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

क्या जानबूझकर महंगाई पर चर्चा से आम आदमी से जुड़े मुद्दे बाहर रखे जाते हैं?

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?


बाकी खबरें

  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बिहार : गेहूं की धीमी सरकारी ख़रीद से किसान परेशान, कम क़ीमत में बिचौलियों को बेचने पर मजबूर
    30 Apr 2022
    मुज़फ़्फ़रपुर में सरकारी केंद्रों पर गेहूं ख़रीद शुरू हुए दस दिन होने को हैं लेकिन अब तक सिर्फ़ चार किसानों से ही उपज की ख़रीद हुई है। ऐसे में बिचौलिये किसानों की मजबूरी का फ़ायदा उठा रहे है।
  • श्रुति एमडी
    तमिलनाडु: ग्राम सभाओं को अब साल में 6 बार करनी होंगी बैठकें, कार्यकर्ताओं ने की जागरूकता की मांग 
    30 Apr 2022
    प्रदेश के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने 22 अप्रैल 2022 को विधानसभा में घोषणा की कि ग्रामसभाओं की बैठक गणतंत्र दिवस, श्रम दिवस, स्वतंत्रता दिवस और गांधी जयंती के अलावा, विश्व जल दिवस और स्थानीय शासन…
  • समीना खान
    लखनऊ: महंगाई और बेरोज़गारी से ईद का रंग फीका, बाज़ार में भीड़ लेकिन ख़रीदारी कम
    30 Apr 2022
    बेरोज़गारी से लोगों की आर्थिक स्थिति काफी कमज़ोर हुई है। ऐसे में ज़्यादातर लोग चाहते हैं कि ईद के मौक़े से कम से कम वे अपने बच्चों को कम कीमत का ही सही नया कपड़ा दिला सकें और खाने पीने की चीज़ ख़रीद…
  • अजय कुमार
    पाम ऑयल पर प्रतिबंध की वजह से महंगाई का बवंडर आने वाला है
    30 Apr 2022
    पाम ऑयल की क़ीमतें आसमान छू रही हैं। मार्च 2021 में ब्रांडेड पाम ऑयल की क़ीमत 14 हजार इंडोनेशियन रुपये प्रति लीटर पाम ऑयल से क़ीमतें बढ़कर मार्च 2022 में 22 हजार रुपये प्रति लीटर पर पहुंच गईं।
  • रौनक छाबड़ा
    LIC के कर्मचारी 4 मई को एलआईसी-आईपीओ के ख़िलाफ़ करेंगे विरोध प्रदर्शन, बंद रखेंगे 2 घंटे काम
    30 Apr 2022
    कर्मचारियों के संगठन ने एलआईसी के मूल्य को कम करने पर भी चिंता ज़ाहिर की। उनके मुताबिक़ यह एलआईसी के पॉलिसी धारकों और देश के नागरिकों के भरोसे का गंभीर उल्लंघन है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License