NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
सुधार नहीं, केवल संकेत भर
चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में 20.1 फीसदी वृद्धि की वजह रही बेस इफेक्ट यानी पिछले वर्ष की समान अवधि की नकारात्मक विकास दर से तुलना देश की अर्थव्यवस्था अभी महामारी की शुरुआत के स्तर पर ही बमुश्किल पहुंच पाई है और इसे वाकई पटरी पर आने में अभी खासा समय लग सकता है।
शशि कुमार झा
02 Sep 2021
सुधार नहीं, केवल संकेत भर

चालू वित्त वर्ष यानी 2021-22 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) के दौरान जब देश कोविड महामारी की भयावह दूसरी लहर से जूझ रहा था, अर्थव्यवस्था ने 20.1 फीसदी की बढोतरी दर्ज कराई है। अर्थव्यवस्था में सुधार का यह संकेत वाकई एक राहत की बात है लेकिन 20 प्रतिशत का खुशगवार सा दिखने वाला यह आंकड़ा दरअसल भ्रामक है। वर्ष दर वर्ष के आधार पर इतनी शानदार वृद्धि दरअसल भ्रामक है क्योंकि वित्त वर्ष 2021-22 की पहली तिमाही में 20.1 प्रतिशत की यह कथित वृद्धि न केवल वित्त वर्ष 2020-21 की चैथी तिमाही (जनवरी-मार्च 2021-22) के मुकाबले 16.9 प्रतिशत कम है बल्कि यह वित्त वर्ष 2019-20 की पहली तिमाही की तुलना में भी लगभग 9.2 प्रतिशत कम है। मतलब यह कि चूंकि पिछले वित्त वर्ष में अर्थव्यवस्था का आकार काफी सिकुड़ गया था इसलिए अब थोड़ी भी ग्रोथ अधिक दिखेगी। यह बात निर्यात से लेकर आईआईपी और कोर सेक्टर पर भी लागू होती है।
 
देश की अर्थव्यवस्था अभी भी महामारी की शुरुआत के स्तर पर ही बमुश्किल पहुंच पाई है और इसे वाकई पटरी पर आने में अभी खासा समय लग सकता है। यह साल-दर-साल अर्थात पिछले वित्त वर्ष (2020-21) की इस अवधि की तुलना में 20.1 प्रतिशत अधिक है जब आर्थिक विकास की दर कोविड के कारण पिछले वर्ष लगाए गए राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन की वजह से नकारात्मक 24.4 फीसदी यानी सामान्य स्तर से 24.4 फीसदी कम हो गई थी। आर्थिक या सांख्यिकीय शब्दों में कहा जाए तो अभी 20.1 प्रतिशत की वृद्धि के आंकड़े उसी के निम्न आधार यानी कम बेस इफेक्ट की तुलना में इतना अधिक प्रतीत हो रहा है।
 
अगर देखा जाए तो पिछले कुछ समय में कुछ क्षेत्रों जैसे निर्यात, मैन्यूफैक्चरिंग, कुछ हद तक कृषि और संबद्ध गतिविधियों में अच्छी चमक देखी गई है जिससे आगे चलकर अर्थव्यवस्था के पटरी पर आने में मदद जरुर मिलेगी लेकिन इससे रोजगार, एमएसएमई जैसे क्षेत्रों को तत्काल कोई राहत मिलती नहीं प्रतीत होती। निर्यात क्षेत्र में चमकदार प्रदर्शन के लाख दावों के बावजूद भारत बांग्ला देश, वियतनाम जैसे छोटे छोटे देशों की तुलना में भी निचले पायदान पर है, यह सरकार के लिए शर्मिंदगी का एक बड़ा सबब है। श्रम से जुड़े क्षेत्रों, होटल, परिवहन, संचार जैसे क्षेत्रों तक इसका लाभ पहुंचने में अभी समय लग सकता है। घरेलू मांग में मायूसी अभी भी बरकरार है, निजी निवेश सुस्त पड़ा है और सरकार भी विकास को बढ़ावा देने के लिए निवेश करने के मोर्चे पर बहुत कुछ नहीं कर पा रही है क्योंकि टीकाकरण में तेजी के बावजूद महामारी की तीसरी लहर की आशंका अभी भी बरकरार है। बैंक क्रेडिट में बढोतरी भी अर्थव्यवस्था में वृद्धि का एक पैमाना माना जाता है और समझा जाता कि इससे अर्थव्यवस्था से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों में गतिविधियां बढ़ रही हैं और इसके बावजूद कि पिछली तिमाही में कंपनियों का वित्तीय प्रदर्शन अच्छा रहा हैं, पिछले कुछ समय से बैंक क्रेडिट में कोई अपेक्षित बढोतरी नहीं देखी गई है।

सरकार के लिए राहत की एक बड़ी बात यह जरुर रही है कि भले ही दूसरी लहर के दौरान महामारी की भयावहता पहली लहर की तुलना में बहुत अधिक थी, लेकिन इस अवधि के दौरान स्थानीय स्तर पर लगाये गए लॉकडाउन का आर्थिक प्रभाव पहली लहर के मुकाबले कम नुकसानदायक रहा। दूसरी लहर का प्रभाव देश के ग्रामीण क्षेत्रों में भी देखा गया लेकिन इससे कृषि संबंधित गतिविधियां बहुत अधिक बाधित नहीं हुईं और उसकी मजबूती बनी रही। पहली तिमाही में अर्थव्यवस्था को गति निर्माण और विनिर्माण क्षेत्रों से मिली। लॉकडाऊन में ढील और महामारी में कमी आने के बाद अपने काम पर लौटे मजदूरों की बदौलत रियल एस्टेट सहित बुनियादी ढांचे से जुड़े क्षेत्रों में गतिविधियां बढ़ीं जिसका प्रभाव निर्माण क्षेत्र पर काफी अधिक पड़ा। चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-जून तिमाही में 68.3 फीसदी की शानदार बढोतरी दर्ज की जो पिछले वर्ष की समान अवधि में 49.5 फीसदी की गिरावट का शिकार था। इसी प्रकार मैन्यूफैक्चरिंग यानी विनिर्माण क्षेत्र में भी 49.6 फीसदी की बढोतरी देखी गई जिसने पिछले वर्ष की इस अवधि में 36 फीसदी का गोता खाया था। मूडीज ने भी इसकी तस्दीक की कि अब भारत के अर्थव्यवस्था की मजबूती की राह पर लौटने के संकेत दिखाई दे रहे हैं और पहली तिमाही में तेज विकास दर से इसके 9.6 फीसदी की वृद्धि दर के हासिल कर लेने का भरोसा और मजबूत हुआ है। लेकिन इन क्षेत्रों में भी ऐसी चमक पिछले वर्ष की तुलना में है न कि वास्तव में अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत हो गई है कि सरकार वाहवाही में जुट जाए और अपनी पीठ ठोकने लगे।

विडंबना यह है कि अगस्त के निर्यात ऑर्डरों में बढोतरी तो देखी गई लेकिन वृद्धि की दर तुरंत सुस्त भी पड़ गई। विनिर्माताओं की लागत में वृद्धि हुई जिसे उन्होंने अपनी फीस में वृद्धि करने के जरिये ग्राहकों पर डाल दिया। अगस्त में रोजगार के स्तर भी व्यापक रूप से स्थिर ही बने रहे क्योंकि कंपनियों के पास उनकी वर्तमान आवश्यकताओं के अनुरूप पर्याप्त श्रमबल थे। इससे पिछले महीने की तुलना में रोजगार सृजन में कमी आई। सरकार के स्तर पर भले ही प्रयास किए जा रहे हैं लेकिन निजी उपभोग और निवेश दोनों ही चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही के दौरान भी कोविड पूर्व स्तर से काफी नीचे बने हुए हैं। वित्तीय/रियल एस्टेट सेक्टर की सेहत भी बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती जो पिछले वर्ष के नकारात्मक 5 प्रतिशत की तुलना में केवल 3.7 प्रतिशत अधिक है। खासकर रियल सेक्टर में इससे अधिक वृद्धि की उम्मीद की जा रही थी क्योंकि इस सेक्टर में अर्थव्यवस्था को तेज गति से पटरी पर लाने की क्षमता है, विशेष रूप से यह देखते हुए कि बैंकिंग (डिपोजिट और क्रेडिट) क्षेत्र का प्रदर्शन भी लचर ही रहा है। सेवा क्षेत्र से भी सरकार को अब काफी उम्मीदं होंगी। सरकार के लिए अभी भी आर्थिक विकास दर में योगदान देने का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम टीकाकरण में तेजी लाना ही है। डेल्टा वैरियंट का खौफ और दक्षिण के राज्यों खासकर केरल की स्थिति को सामान्य नहीं बनने दे रही। बहुत कुछ इस बात पर भी निर्भर करेगा कि भविष्य में लॉकडाउन की नौबत फिर से न आए।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

GDP
GDP growth-rate
indian economy
Nirmala Sitharaman
Modi government

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

GDP से आम आदमी के जीवन में क्या नफ़ा-नुक़सान?

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

आर्थिक रिकवरी के वहम का शिकार है मोदी सरकार

क्या जानबूझकर महंगाई पर चर्चा से आम आदमी से जुड़े मुद्दे बाहर रखे जाते हैं?

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

आख़िर फ़ायदे में चल रही कंपनियां भी क्यों बेचना चाहती है सरकार?

तिरछी नज़र: ये कहां आ गए हम! यूं ही सिर फिराते फिराते


बाकी खबरें

  • make in india
    बी. सिवरामन
    मोदी का मेक-इन-इंडिया बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा श्रमिकों के शोषण का दूसरा नाम
    07 Jan 2022
    बहुराष्ट्रीय कंपनियों के गिग कार्यकर्ता नई पीढ़ी के श्रमिक कहे जा सकते  हैं, लेकिन वे सीधे संघर्ष में उतरने के मामले में ऑटो व अन्य उच्च तकनीक वाले एमएनसी श्रमिकों से अब टक्कर लेने लगे हैं। 
  • municipal elections
    फर्राह साकिब
    बिहारः नगर निकाय चुनावों में अब राजनीतिक पार्टियां भी होंगी शामिल!
    07 Jan 2022
    ये नई व्यवस्था प्रक्रिया के लगभग अंतिम चरण में है। बिहार सरकार इस प्रस्ताव को विधि विभाग से मंज़ूरी मिलने के पश्चात राज्य मंत्रिपरिषद में लाने की तैयारी में है। सरकार की कैबिनेट की स्वीकृति के बाद इस…
  • Tigray
    एम. के. भद्रकुमार
    नवउपनिवेशवाद को हॉर्न ऑफ़ अफ्रीका की याद सता रही है 
    07 Jan 2022
    हिंद महासागर को स्वेज नहर से जोड़ने वाले रणनीतिक तौर पर बेहद महत्वपूर्ण लाल सागर पर अपने नियंत्रण को स्थापित करने की अमेरिकी रणनीति की पृष्ठभूमि में चीन के विदेश मंत्री वांग यी की अफ्रीकी यात्रा काफी…
  • Supreme Court
    अजय कुमार
    EWS कोटे की ₹8 लाख की सीमा पर सुप्रीम कोर्ट को किस तरह के तर्कों का सामना करना पड़ा?
    07 Jan 2022
    आर्थिक तौर पर कमजोर वर्ग को आरक्षण देने के लिए ₹8 लाख की सीमा केवल इस साल की परीक्षा के लिए लागू होगी। मार्च 2022 के तीसरे हफ्ते में आर्थिक तौर पर कमजोर सीमा के लिए निर्धारित क्राइटेरिया की वैधता पर…
  • bulli bai aap
    सना सुल्तान
    विचार: शाहीन बाग़ से डरकर रचा गया सुल्लीडील... बुल्लीडील
    07 Jan 2022
    "इन साज़िशों से मुस्लिम औरतें ख़ासतौर से हम जैसी नौजवान लड़कियां ख़ौफ़ज़दा नहीं हुईं हैं, बल्कि हमारी आवाज़ और बुलंद हुई है।"
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License