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भारत
राजनीति
मोदी के आठ साल: सांप्रदायिक नफ़रत और हिंसा पर क्यों नहीं टूटती चुप्पी?
इन आठ सालों के दौरान मोदी सरकार के एक हाथ में विकास का झंडा, दूसरे हाथ में नफ़रत का एजेंडा और होठों पर हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद का मंत्र रहा है।
अनिल जैन
26 May 2022
Modi

प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के आज, 26 मई को आठ साल पूरे हो गए हैं। इन आठ सालों के दौरान उनकी सरकार के एक हाथ में विकास का झंडा, दूसरे हाथ में नफ़रत का एजेंडा और होठों पर हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद का मंत्र रहा है। इन्हीं के सहारे काम करते हुए मोदी सरकार अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर तो बुरी तरह नाकाम साबित हो ही रही है, देश के अंदरुनी यानी सामाजिक हालात भी बेहद असामान्य बने हुए हैं। पिछले सात-आठ वर्षों के दौरान देश के भीतर चौतरफा बना जातीय और सांप्रदायिक नफरत, तनाव और हिंसा का समूचा परिदृश्य गृहयुद्ध जैसे हालात का आभास दे रहा है।

भारत में जारी सांप्रदायिक और जातीय नफरत फैलाने के अभियान और हिंसा की घटनाओं का जिक्र कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी हुआ है, जिससे भारत की बदनामी हुई है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से इस बारे में एक बार भी ऐसा कुछ नहीं कहा गया है, जिससे लगे कि वे इन घटनाओं से चिंतित या दुखी हैं। हां, इस दौरान उनके कई बयान जरूर ऐसे आए, जिनसे नफरत फैलाने के अभियान और हिंसा की घटनाओं को बढ़ावा मिला।

काफी समय पहले 2016 में गुजरात में तथाकथित गोरक्षकों की ओर से दलितों पर हिंसक हमले की सिलसिलेवार घटनाओं को लेकर जरूर मोदी ने प्रतिक्रिया दी थी, लेकिन उसमें चिंता से ज्यादा नाटकीयता थी। उन्होंने हैदराबाद में एक सभा को संबोधित करते हुए कहा था, ''अगर किसी को हमला करना है तो मुझ पर करे, गोली चलानी है तो मुझ पर चलाए, लेकिन मेरे दलित भाइयों पर हमले न करें।’’ प्रधानमंत्री की इस नाटकीय अपील का कोई असर नहीं होना था और नहीं हुआ। दलितों और मुसलमानों पर हमलों का सिलसिला जारी रहा। हैदराबाद के इस बयान के बाद याद नहीं आता कि मोदी ने इन घटनाओं पर कभी चिंता या नाराजगी जताई हो या राज्य सरकारों को ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सख्त कदम उठाने के निर्देश दिए हो।

बहरहाल देश में सांप्रदायिक और जातीय हिंसा की लगातार बढ़ रही घटनाओं पर पिछले दिनों चिंता जताते हुए देश के 108 पूर्व नौकरशाहों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखा था। इस पत्र में कहा गया था, ''हम देश में नफरत से भरी तबाही का उन्माद देख रहे हैं, जहां बलि वेदी पर सिर्फ मुस्लिम और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के लोग ही नहीं बल्कि हमारा संविधान भी है। हम 'सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ के आपके नारे पर दिल से यकीन करते हुए इस उम्मीद के साथ आपकी अंतरात्मा से अपील करते हैं कि आजादी के इस अमृत महोत्सव वर्ष में आप पक्षपातपूर्ण विचारों से ऊपर उठकर नफरत की राजनीति को खत्म करने का आह्वान करते हुए संबंधित राज्य सरकारों को इस बारे में कारगर कदम उठाने के लिए कहेंगे।’’

पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले पूर्व नौकरशाहों में कुछ तो ऐसे भी रहे, जिन्होंने अपनी सेवानिवृत्ति से पहले मौजूदा सरकार के साथ भी काम किया है। पूर्व नौकरशाहों की इस अपील पर प्रधानमंत्री ने तो अपनी चुप्पी नहीं तोड़ी, अलबत्ता उनकी अपील का जवाब देने के लिए कुछ पूर्व जजों, पूर्व सैन्य अफसरों और पूर्व नौकरशाहों सहित 197 लोगों को मैदान में उतार दिया गया। इन लोगों ने प्रधानमंत्री मोदी के नाम अपने खुले पत्र में इस बात को ही नकार दिया कि देश में किसी तरह की नफरत का माहौल है और हिंसा की घटनाएं बढ़ रही हैं।

सरकार की हिमायत में सामने आए 197 लोगों के इस समूह ने अपने पत्र में कहा कि 108 पूर्व नौकरशाहों की चिट्ठी राजनीति से प्रेरित और सरकार को बदनाम करने के लिए चलाए जा रहे अभियान का हिस्सा है। इतना ही नहीं, सरकार से असहमत हर व्यक्ति को देशद्रोही करार देने का जो चलन पिछले आठ साल से शुरू हुआ है, उसी के मुताबिक इन 197 लोगों ने भी सांप्रदायिक नफरत और हिंसा की बढती घटनाओं पर जताई गई चिंता को पूर्व नौकरशाहों का राष्ट्र-विरोधी दृष्टिकोण करार दिया है।

इसी तरह तीन साल पहले 2019 में जब देश के 49 जाने-माने कलाकारों और बुद्धिजीवियों ने भीड़ के हाथों बढ़ती हत्या की घटनाओं पर चिंता जताते हुए प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर सख्त कदम उठाने के मांग की थी, तब भी प्रधानमंत्री तो मौन रहे थे लेकिन कंगना रनौत, प्रसून जोशी, विवेक अग्निहोत्री, पल्लवी जोशी, मधुर भंडारकर जैसे कुछ कलाकारों सहित 69 लोग सरकार के बचाव में सामने आए थे। इन लोगों ने भीड़ के हाथों हत्या की घटनाओं पर जताई गई चिंता को सरकार को बदनाम करने की साजिश करार दिया था।

पिछले साल के अंत में हरिद्वार और रायपुर में हुई तथाकथित 'धर्म संसद’ में कतिपय 'साधु-संतों’ की ओर से मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंदुओं से हथियार उठाने का जो आह्वान किया गया था और महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे की जय-जयकार की गई थी, उसको लेकर भी राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और प्रधान न्यायाधीश को चिट्ठियाँ लिखी गई थीं, जो बेअसर रहीं। सुप्रीम कोर्ट के 76 वकीलों ने भारत के प्रधान न्यायाधीश एनवी रमना को पत्र लिखकर हरिद्वार में दिए गए नफ़रत फैलाने वाले भाषणों का संज्ञान लेने का अनुरोध किया था। पत्र में कहा गया था कि ऐसे मामलों में पुलिस कार्रवाई न होने पर त्वरित न्यायिक हस्तक्षेप ज़रूरी हो जाता है।

उसी दौरान सशस्त्र बलों के पांच पूर्व प्रमुखों और सौ से ज्यादा अन्य गणमान्य नागरिकों ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर अनुरोध किया था कि देश की एकता और अखंडता की रक्षा के लिए सरकार, संसद और सुप्रीम कोर्ट तत्काल प्रभाव से कार्रवाई करे। इन तमाम अपीलों और चिंताओं का नतीजा शून्य रहा। हरिद्वार के बाद भी रायपुर, इलाहाबाद और जगहों पर विवादास्पद धर्म संसदों के आयोजन हुए और उनमें अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ नफ़रत भरे भड़काऊ भाषण भी होते रहे।

पिछले आठ वर्षों के दौरान ही पुणे में तर्कशील आंदोलन के कार्यकर्ता डॉ. नरेंद्र दाभोलकर, कोल्हापुर में कम्युनिस्ट नेता गोविंद पानसरे, धारवाड़ में कर्नाटक विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति एमएम कलबुर्गी, बेंगलुरू में पत्रकार गौरी लंकेश आदि प्रतिष्ठित हस्तियां की हिंदुत्ववादी संगठनों के कार्यकर्ताओं के हाथों मारी गईं तब भी प्रधानमंत्री चुप्पी साधे रहे। उन्होंने इन हत्याओं की निंदा तक नहीं की।

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद देश में एक और विचित्र चलन शुरू हुआ है, वह यह कि सरकार के किसी भी विरोधी या आलोचक रहे व्यक्ति की मौत पर खुशी मनाना और सोशल मीडिया में उस दिवंगत व्यक्ति का तरह-तरह से चरित्र हनन करना। किसी विरोधी नेता के गंभीर रूप से बीमार हो जाने पर उसकी बीमारी को लेकर मजाक उड़ाना भी आम बात हो गई है। इस सिलसिले की शुरुआत मोदी के प्रधानमंत्री बनने के तुरंत बाद ही प्रसिद्ध कन्नड़ साहित्यकार और शिक्षाविद यूआर अनंतमूर्ति की मौत से हो गई थी। अनंतमूर्ति मोदी के आलोचक थे। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के कुछ दिनों बाद ही उनकी मृत्यु हो गई थी, तब मोदी समर्थकों ने पटाखे जला कर और मिठाई बांट कर उनकी मृत्यु का जश्न मनाया था। उसके बाद सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश, अभिनेता इरफान, शायर राहत इंदौरी, पत्रकार विनोद दुआ आदि कई नाम हैं जिनके मरने पर प्रधानमंत्री मोदी के मुरीदों ने खुल जश्न मनाया और दिवंगतों को तरह-तरह से अपमानित किया। ऐसा नहीं कि सोशल मीडिया नियमित सक्रिय रहने वाले मोदी को इन सब बातों की जानकारी न हो, मगर उन्होंने अपने समर्थकों की इस प्रवृत्ति पर न तो कभी नाराजगी जताई और न उन्हें ऐसा करने से मना किया।

प्रधानमंत्री मोदी अगर चाहते तो इस तरह की घटनाओं और प्रवृत्तियों पर लगाम लग सकती थी। लेकिन उन्होंने इस बारे में कभी कोई पहल की ही नहीं। पूछा जा सकता है कि आखिर मोदी ने क्यों नहीं चाहा कि इस तरह की नफरत फैलाने वाली तमाम बातों और सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं पर अंकुश लगे? क्यों नहीं उन्होंने अपने समर्थकों को ऐसा करने से बाज आने को कहा? जब वे लोगों से गैस सब्सिडी छोड़ने को कह सकते हैं, स्वच्छ भारत अभियान का हिस्सा बनने की अपील कर सकते हैं, कोरोना काल में लोगों से ताली-थाली बजवा सकते हैं और लोग उनके कहने पर अपने घरों की लाइट बंद कर मोमबत्तियां जला सकते हैं, तो वे अपने समर्थकों से सांप्रदायिक नफरत और हिंसा रोकने को क्यों नहीं कह सकते?

दरअसल अव्वल तो जिस विचार परंपरा में मोदी की राजनीतिक शिक्षा-दीक्षा हुई है, उसके चलते मोदी ऐसा कर ही नहीं सकते। गुजरात का मुख्यमंत्री बनने से लेकर देश के प्रधानमंत्री पद तक सफर उन्होंने नफरत की राजनीति पर विकास और राष्ट्रवाद की चाशनी लपेट कर ही तय किया है। इसी राजनीति की वजह से ही वे अपने समर्थकों के नायक बने हुए हैं और उनके समर्थक उन्हें दैवीय शक्ति का प्रतीक और भगवान विष्णु का अवतार तक बताने में संकोच नहीं करते हैं।

मोदी भी यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि आरएसएस-भाजपा के कार्यकर्ताओं के बीच उनकी जो लोकप्रियता है, उसके पीछे यही सांप्रदायिक नफरत या मुसलमानों के प्रति द्वेष की राजनीति है। वे यह भी जानते हैं कि देश का जो खाया-अघाया और पढ़ा-लिखा मध्यम वर्ग उन्हें प्रकट तौर पर 'विकास पुरुष’ मान कर उनका मुरीद बना हुआ है, उसके भी अंतर्मन में उनकी हिंदू नायक की छवि ही पैठी हुई है और इसी छवि की वजह से वह महंगाई और बेरोजगारी के अभूतपूर्व संकट सहित तमाम तरह की दुश्वारियों को झेल रहा है।

परपीड़क मानसिकता के उनके इस समर्थक वर्ग को मुसलमानों के उत्पीडन और अपमान से राहत मिलती है। वह आश्वस्त है कि मोदी की वजह से ही आज देश में मुसलमान दोयम दर्जे का नागरिक बना हुआ है और आगे भी उसकी यह स्थिति मोदी की वजह से ही बनी रहेगी। इसीलिए मोदी के इस समर्थक वर्ग को न तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में रुपए की गिरती हालत परेशान करती है और न ही चीन द्वारा भारतीय सीमाओं के अतिक्रमण पर वह उद्वेलित होता है।

चूंकि मोदी अपने समर्थकों के इस मनोविज्ञान को अच्छी तरह समझते हैं, इसीलिए वे सांप्रदायिक नफरत और हिंसा की घटनाओं पर हमेशा न सिर्फ खामोश बने रहते हैं, बल्कि उपद्रवियों को कपड़े से पहचाने जाने वाले जैसे बयान देकर अपने समर्थकों को उकसाने का काम भी करते हैं। इन्हीं सबके बीच वे थोड़े-थोड़े अंतराल के बाद किसी न किसी बहाने धार्मिक स्थानों पर जाकर वहां धार्मिक वेशभूषा धारण कर धार्मिक कर्मकांड के जरिए अपनी धर्मनिष्ठ हिंदू नायक की छवि भी बनाए रखते हैं। प्रधानमंत्री के रूप में अपने आठ साल के कार्यकाल में उन्होंने यही सब किया है और कहने की आवश्यकता नहीं कि वे आगे भी यही करते रहेंगे। वे यह भी अच्छी तरह जानते हैं कि जिस दिन उनकी यह छवि दरक गई उस दिन उनके समर्थकों की निगाह में उनकी कोई हैसियत नहीं रह जाएगी।

(लेखक स्वतंत्र वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।) 

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