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'एक दुआ': कन्या भ्रूण हत्या पर आधारित एक महत्वपूर्ण फिल्म
चाहे ओलंपिक में हमारी महिला खिलाड़ी हों, चाहे शाहीन बाग़ में संघर्ष करने वाली बहादुर महिलाएं या किसान आन्दोलन की अगुवाई करने वाली किसान महिलाएं; महिलाएं अपने परिवार और इस देश दोनों की नैया पार लगाने में सक्षम हैं!
रचना अग्रवाल
08 Aug 2021
'एक दुआ': कन्या भ्रूण हत्या पर आधारित एक महत्वपूर्ण फिल्म

26 जुलाई 2021 को वूट ओटीटी प्लेटफॉर्म पर प्रदर्शित फिल्म ' एक दुआ' में एक ऐसी मां की वेदना का बखूबी प्रस्तुतीकरण किया गया है जिसके अजन्मे बच्चे को यह पता चलने पर कि वह लड़की है, धोखे से मार दिया जाता है। एक ऐसी औरत जिसकी चीत्कार सुनकर दिल करुणा से भर जाता है और जो लोग इस कृत्य में शामिल होते हैं उनके प्रति मन में आक्रोश पैदा हो जाता हैl

कहानी की शुरुआत में आबिदा (ईशा देओल) को दिखाया जाता है जो एक निम्न मध्यम वर्ग से ताल्लुक रखती है और अपने पति सुलेमान (राजवीर अंकुर सिंह) व अपनी सास के साथ ऐसे परिवार में रहती है जहां बेटे को बरकत और बेटी को जहमत समझा जाता है l

आबिदा दो बच्चों की मां है (एक लड़का और एक लड़की)l उसकी नजर में दोनों बच्चे बराबर हैं और वह अपनी परवरिश में लड़की दुआ व उसके भाई के बीच भेदभाव करना उचित नहीं समझतीl इसके विपरीत उसका पति जो कि एक कैब ड्राइवर है व उसकी सास जो लालची और दकियानूसी विचारों की औरत है कोई भी ऐसा मौका नहीं छोड़ते जिससे दुआ का तिरस्कार हो और वो अपने भाई के समक्ष अपने को हीन समझे।

आबिदा के फिर गर्भवती होने पर उसकी सास द्वारा इस बात पर जोर दिया जाता है कि परिवार में दूसरा लड़का ही पैदा होना चाहिए क्योंकि उनके अनुसार बड़ा होकर लड़का ही है जो परिवार का भरण-पोषण करता है और पैसों की तंगी को दूर करता है। फिल्म का एक डायलॉग "एक और बेटा हो जाएगा तो घर में बरकत आ जाएगी, मेरे पास दो बेटे होते तो मुझे जुगाड़ की जिंदगी नहीं जीनी पड़ती" पितृसत्तात्मक समाज की उस संकीर्ण सोच की तरफ संकेत करता है जहां परिवार में लड़कों का होना अति आवश्यक माना जाता हैl इस सोच के अनुसार लड़के ही वंश को आगे बढ़ाते हैं और बुढ़ापे का सहारा होते हैं व लड़कियां तो सर पर बोझ होती है l दहेज की कुप्रथा के कारण यह ' बोझ' और बढ़ जाता है।

इसी सोच के चलते अल्ट्रासाउंड कराने पर यह पता चलने पर कि औरत के गर्भ में लड़की है लोग भ्रूण हत्या करने में भी लेश मात्र संकोच नहीं करते क्योंकि उन्हें तो लड़का चाहिए था, रिपोर्ट में लड़की कैसे आ गई? यह बात उनके बर्दाश्त के बाहर होती है और वे जन्म देने वाली मां को इसका कसूरवार मानते हैं और उसे मानसिक व शारीरिक रूप से प्रताड़ित करते हैंl  जबकि मेडिकल साइंस ने इस बात को एक सिरे से खारिज कर दिया गया है कि लड़का या लड़की होना औरत पर निर्भर करता हैl इसके बावजूद औरतों पर यह जुल्म क्यों? यह हमारे समाज की कड़वी सच्चाई है कि आज भी कई पिछड़े राज्यों में जागरूकता के अभाव में लड़कों को अधिक महत्व देने की वजह से बहुत सी मांए काफी तकलीफ उठाती हैं और बच्चा पैदा करने से डरती है कि कहीं उनके बेटी पैदा ना हो जाएl लड़की के पैदा होने पर कई बार परिवार वाले उसे अपनाने के लिए तैयार नहीं होते और पैदा होने पर उसे मार देते हैंl

विद्वानों द्वारा स्वाभाविक लिंग अनुपात 103 से 107 के बीच माना जाता है और उससे ज़्यादा कोई भी संख्या भ्रूण हत्या की सूचक है। जनगणना के आंकड़ों के हिसाब से 1961 में 100 छह साल से कम उम्र की लड़कियों की तुलना में भारत में 102.4 लड़के थे, 1980 में लड़कों की संख्या 104.2 हो गई, 2001 में 107.5  और 2011 में 108.9 !  बच्चों का लिंग अनुपात पूर्वी और दक्षिणी राज्यों में तो ठीक है लेकिन पश्चिमी और उत्तर-पश्चिमी राज्यों में बेहद बुरा है जैसे महाराष्ट्र, हरियाणा और जम्मू-कश्मीर में। हरियाणा में तो हर सौ लड़की के बराबर में 120 लड़के हैं। ये आंकड़े वाकई भयावह हैं। फिल्म ‘एक दुआ’ में तो कहानी के केंद्र में एक मुस्लिम परिवार है लेकिन जनगणना कमिश्नर सी चंद्रमौली की 2011 की और संयुक्त राष्ट्र की 2010 की रपटों के अनुसार लिंग अनुपात हिन्दू-बहुल इलाकों में अधिक गड़बड़ है जबकि मुस्लिम-बहुल, इसाई-बहुल या सिख-बहुल इलाकों में बेहतर है।

1994 में भारत सरकार ने Pre-Conception and Pre-Natal Diagnostic Techniques Act  (PCPNDT) पारित किया था जिसने जन्म से पहले लिंग जानने और भ्रूण हत्या पर प्रतिबन्ध लगा दिया। लेकिन यह कानून आज भी व्यवहार में ठीक से और सख्ती से लागू नहीं हो पाया है। 2004 में इस कानून में संशोधन भी किया गया लेकिन अभी भी गैरकानूनी तरीके से भ्रूण का लिंग पता लगा लेना धड़ल्ले से जारी है। 2015 में सरकार ने बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना भी शुरू की जिसमे शैक्षिक उपलब्धि पर बेटियों को कैश ट्रांसफर का प्रावधान किया गया लेकिन यह योजना भी अभी तक नाकाफी रही है।   

इसीलिए फिल्म ‘एक दुआ’ का महत्व बढ़ जाता है। निर्देशक राम कमल मुखर्जी ने कुछ दृश्यों को इस तरह फिल्माया है कि औरत की बेबसी पर (जिसके बच्चे को गर्भ में ही मार दिया गया है) दिल रो उठता है और बरबस ही आंखों में आंसू आ जाते हैं। एक औरत जो अपने अजन्मे बच्चे से भावनात्मक रूप से काफी हद तक जुड़ जाती है, यह पता चलने पर उसका होने वाला बच्चा लड़की है, इस बात पर जोर देना कि वह बच्चा गिरा दे कहां की इंसानियत है? यह एक ऐसा अपराध है जो क्षमा योग्य नहीं हैl लड़कों और लड़कियों में भेदभाव करने की मानसिकता के पीछे हमारे सामंती समाज की सोच है, हमारे लोगों का पिछड़ापन है, आर्थिक विपन्नता और दहेज़ प्रथा जैसी कुरीतियाँ हैं।

सच्चाई तो यह है कि जिस प्रकार विवाह पश्चात एक लड़का माता पिता की देखभाल कर सकता है उसी प्रकार विवाह होने पर एक लड़की भी अपने माता पिता की पूरी तरह से देखभाल कर सकती है, अगर वह हमारे पुरुष वर्चस्व वाले समाज के बनाए गए दकियानूसी नियमों का पालन ना करके अपने मां-बाप की संरक्षण की जिम्मेदारी सहर्ष स्वीकार कर ले। क्योंकि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि लड़का ही मां-बाप की बेहतर देखभाल कर सकता है l  मैंने ऐसे कई लोगों से बातचीत के आधार पर निष्कर्ष निकाला है कि लड़कियां भावनात्मक रूप से अपने माता-पिता से ज्यादा जुड़ी होती हैं और उनका उनसे एक अटूट रिश्ता होता है जोकि विवाह पश्चात और अधिक गहरा हो जाता हैl  जबकि विवाह पश्चात अधिकतर लड़के अपनी पत्नी और बच्चों की देखभाल के नाम पर इतना व्यस्त हो जाते हैं कि अपने मां-बाप के लिए समय निकालना उनके लिए काफी मुश्किल हो जाता है और कभी-कभी तो वह अपने माता पिता को अतिरिक्त भार समझकर वृद्ध आश्रम में डाल देते हैं जो की बहुत ही शर्मनाक है।

मेरी जानकारी में ऐसे बहुत से परिवार हैं जहां पर परिवार में केवल लड़कियां है और लड़का न होने पर माता-पिता को जरा भी अफसोस नहीं है क्योंकि उन्होंने अपनी लड़कियों की परवरिश इतने अच्छे ढंग से की है कि आज विभिन्न क्षेत्रों में जैसे शिक्षा, खेलकूद , मीडिया, राजनीति इत्यादि में वे आगे बढ़कर अपने देश का नाम रोशन कर रही हैं और अपने माता-पिता से भी उनके संबंध काफी मधुर है जिससे उन्होंने यह साबित कर दिखाया है कि लड़कों की चाह रखना परिवार की आवश्यकता नहीं बल्कि हमारे समाज के दकियानूसी विचारों का परिणाम है। दक्षिण भारत के राज्य और हमारे पूर्वी प्रदेश इसका सशक्त प्रमाण हैं। टोक्यो ओलंपिक में मीराबाई चानु, पी वी सिन्धु और लवलीना बोरगोहाइन के साथ महिला हॉकी टीम ने देश का नाम ऊंचा कर दिया। लेकिन फिर भी "बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ" के नारे लगाने वाले देश में अगर आज भी बेटों की ख्वाहिश में भ्रूण हत्याएं हो रही हैं तो ऐसे लोगों पर सख्त कार्रवाई करना हमारी सरकार का प्रथम कर्तव्य हैl इसके अलावा समाज में जागरूकता फैलाना आवश्यक है जिससे कि बेटियां होने पर परिवार में खुशनुमा माहौल हो और उनका तहे दिल से स्वागत किया जाएl दहेज प्रथा को भी जड़ से मिटाना होगा। यह तभी संभव है जब पितृसत्ता के खिलाफ एक लम्बी लड़ाई लड़ी जाए और तरक्कीपसंद विचारों का प्रचार प्रसार किया जाए|

मात्र 40 मिनट की शॉर्ट फिल्म होने के बावजूद फिल्म ' एक दुआ '  हमारे दिलों-दिमाग पर अमिट छाप छोड़ने पर सफल हुई है क्योंकि इसमें भ्रूण हत्या के मुद्दे को तो उठाया ही है साथ में एक गर्भवती स्त्री जो अपने बच्चे को लेकर काफी उत्साहित है, अचानक उस बच्चे की गर्भ में ही हत्या कर दी जाती है, उसकी मानसिक हालत क्या होगी इस बात को हमारे सामने लाने का भरसक प्रयत्न किया गया है जो हमारे सामने ये प्रश्न खड़ा कर देता है कि आखिर क्यों लड़के की चाह में औरत ही औरत की दुश्मन बन जाती है? इसका जवाब है हमारे समाज की प्रतिक्रियावादी मानसिकता, आर्थिक विषमता और यह भ्रम कि लड़के ही परिवार की नैया पार लगा सकते हैं। चाहे ओलंपिक में हमारी महिला खिलाड़ी हों, चाहे शाहीन बाग में संघर्ष करने वाली बहादुर महिलाएं या नताशा नरवाल या देवांगना कलिता या किसान आन्दोलन की अगुवाई करने वाली किसान महिलाएं, महिलाएं अपने परिवार और इस देश दोनों की नैया पार लगाने में सक्षम हैं!

(रचना अग्रवाल स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार हैं।)

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