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दिल्ली में किसानों ने बोला हल्ला तो यूपी के कई जिलों में कर्मचारियों और छात्र संगठनों की रही हड़ताल
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार द्वारा हड़ताल से एक दिन पहले ही एस्मा लगाए जाने के बावजूद रेलवे, बैंक, एलआईसी और बिजली विभाग के हड़ताल में कर्मचारियों की बड़ी संख्या देखने को मिली।
गौरव गुलमोहर
27 Nov 2020
दिल्ली में किसानों ने बोला हल्ला तो यूपी के कई जिलों में कर्मचारियों और छात्र संगठनों की रही हड़ताल

देश भर में किसानों और मजदूरों ने गुरुवार को एक दिन की हड़ताल में शामिल होकर केंद्र सरकार की कई नीतियों खास तौर पर नए कृषि और श्रम कानूनों के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराया। आज हड़ताल के दूसरे दिन किसान संगठनों ने उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ और सुल्तानपुर, मेरठ, बागपत, शामली जैसे कई जिलों में चक्का जाम कर विरोध दर्ज कराया।

पंजाब और हरियाणा के किसान जहां दिल्ली पहुंचने के लिए पुलिस द्वारा छोड़े जा रहे आंसू गैस और वाटर कैनन का सामना कर रहे हैं वहीं उत्तर प्रदेश के कई जिलों में हड़ताल के दौरान कर्मचारियों को यूपी पुलिस ने गिरफ्तार किया है।

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार द्वारा हड़ताल से एक दिन पहले ही एस्मा लगाए जाने के बावजूद इलाहाबाद में रेलवे, बैंक, एलआईसी और बिजली विभाग के हड़ताल में कर्मचारियों की बड़ी संख्या देखने को मिली। दस राष्ट्रीय मज़दूर संगठनों के आह्वान पर इलाहाबाद के कर्मचारियों की एकदिवसीय हड़ताल में एटक, इंटक, सीटू, एक्टू और एआईयूटीयूसी के साथ आइसा, एसएफआई, आईसीएम के साथ ही अन्य वामपंथी छात्र संगठन हड़ताल में शामिल रहे।

प्रदेश की राजधानी लखनऊ में हड़ताल में शामिल कर्मचारियों, मजदूरों को यूपी पुलिस ने गिरफ्तार किया और उन्हें हड़ताल करने से रोक दिया। इसके अलावा सुल्तानपुर, वाराणसी, आजमगढ़, मऊ, बस्ती और रायबरेली जैसी कई जगहों पर हड़ताल का मिला-जुला असर देखने को मिला।

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष व पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने प्रदर्शनकारियों पर किये गये हमले को सरकारी आतंक बताते हुए ट्वीट किया कि "आज ‘संविधान दिवस’ पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन के सांविधानिक अधिकार पर घोर निंदनीय हमला हुआ है। भाजपा सरकार द्वारा किसानों पर हमला सरकारी आतंक का अति वीभत्स रूप है।"

हालांकि मजदूरों, किसानों व कर्मचारियों की संगठित हड़ताल में समाजवादी पार्टी के साथ ही अन्य विपक्षी पार्टियों के छात्र व महिला संगठनों की भागदारी नगण्य रही।

जिला हड़तालों के केंद्र में नए कृषि व श्रम कानून

संगठित व असंगठित क्षेत्रों के कर्मचारियों की इस साल की यह दूसरी आम हड़ताल है। साल के शुरू में 8 जनवरी को केंद्र सरकार द्वारा 44 श्रम कानूनों को चार कोड में लाने के खिलाफ देशव्यापी हड़ताल देखने को मिली थी। लेकिन केंद्र सरकार द्वारा लॉकडाउन के दौरान जून महीने में कृषि सुधार के नाम पर बनाये गए तीन कानून से किसानों में खासा नाराज़गी देखने को मिल रही है। वहीं पंजाब के किसान लगातार तीन महीने से आंदोलनरत हैं लेकिन केंद्र की मोदी सरकार किसानों की बात-चीत करने को तैयार नहीं है।

किसान संगठनों का मानना है कि तीन नए कृषि कानून मंडी सिस्टम और न्यूनतम समर्थन मूल्य खत्म करने और खेती में कॉरपोरेट को बढ़ावा देने वाले हैं जिससे किसानों को भारी नुकसान होने वाला है। हड़ताल के दौरान वक्ताओं ने तीन कृषि कानूनों को सरकार द्वारा अडानी-अम्बानी को लाभ पहुंचाने वाला कानून बताया।

वहीं, मज़दूर संगठन बारह सूत्रीय मांगों के साथ वेतन संहिता अधिनियम, 2019, व्‍यावसायिक सुरक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य और कार्यस्‍थल स्थिति विधेयक, 2019, श्रम संगठनों व औद्योगिक संबंध बिल और सामाजिक सुरक्षा बिल को मज़दूर विरोधी बताते हुए हड़ताल में शामिल हुए।

एलआईसी भवन की सभा में नार्थ सेंट्रल जोन इंश्योरेंस इम्प्लाइज फेडरेशन के महासचिव राजीव निगम ने कहा कि जो कानून अंग्रेज भी नहीं पास कर सकते थे वो कानून यह सरकार पास कर रही है। राजीव निगम एलआईसी पर सरकारी हमले की ओर इशारा करते हुए कहते हैं कि "सुनामी, बाढ़, सूखा में मदद करने वाले संस्थान एलआईसी को खत्म करने की कोशिश हो रही है। जो एलआईसी पर हमला कर रहे हैं वे राष्ट्रवादी नहीं क्षद्म राष्ट्रवादी हैं, हम राष्ट्रवादी हैं जो इसे बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।

सीआईटीयू के संयोजक अविनाश कुमार मिश्र ने सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि हमारी हड़ताल का असर सरकार पर पड़ता है वर्ना अभी तक पब्लिक सेक्टर और श्रमिक गुलामी के शिकार हो जाते। यही कारण है आज 29 साल बाद भी इतनी बड़ी संख्या में पब्लिक सेक्टर बचे हैं। दुनिया के किसी देश में जहां आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत हुई वहां पब्लिक सेक्टर समाप्त हो गये।

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में जहां किसानों ने तीन नए कृषि कानूनों के खिलाफ हल्ला बोला है वहीं यूपी के कई जिलों की एकदिवसीय हड़ताल में केंद्रीय विभागों के कर्मचारियों की भागीदारी आधिक रही। केंद्रीय विभागों के कर्मचारी मुख्य मांग श्रम कानूनों के खात्मे के साथ बारह सूत्रीय मांगों निजीकरण, महंगाई और बेरोजगारी के खिलाफ सड़क पर उतरे।

इलाहाबाद की हड़ताल में शामिल मज़दूर संघ के नेता अनिल वर्मा हड़ताल को सफल बताते हुए कहते हैं कि "इस हड़ताल का असर जरूर पड़ेगा, समाज में सभी वर्ग हड़ताल में हैं। मजदूरों के हित में जो भी कानून थे खत्म कर दिए गए। बीमा से लेकर पीएफ तक खत्म किया जा रहा है। सरकार तेजी से कारपोरेटीकरण कर रही है यह समाज के किसी भी वर्ग के लिए हितकर नहीं है।"

जिलों में हड़ताल का असर

कई राज्यों में पूर्ण बंदी रही तो वहीं यूपी के कुछ जिलों में हड़ताल का मिला जुला असर देखने को मिला। इलाहाबाद में एसबीआई बैंक के अलावा कई बैंकों में काम बाधित रहा और एलआईसी, डाक, बीमा समेत कई केंद्रीय विभागों में दिनभर काम ठप रहा। इलाहाबाद में हड़ताल के दौरान मज़दूर संगठनों के साथ अधिवक्ता एवं छात्र संगठनों ने एलआईसी भवन से एजी ऑफिस तक मोटरसाइकिल व पैदल तीन किलोमीटर लम्बी रैली निकालकर अपना विरोध दर्ज कराया। वहीं लखनऊ में पुलिस ने हड़ताल में शामिल मजदुरों व केंद्रीय विभाग के कर्मचारियों को हजरतगंज के दारूमसफा से गिरफ्तार कर इको गॉर्डन में छोड़ दिया।

लखनऊ हड़ताल में शामिल आल इंडिया प्रोग्रेसिव वुमेन एसोसिएशन की ज्वाइंट सेक्रेटरी मीना सिंह बताती हैं कि "लखनऊ अंग्रेजों के दलालों के कब्जे में है। यदि हम कुछ भी लोकतांत्रिक ढंग से करना चाहते हैं तो हमें करने नहीं दिया जाता। हड़ताल में इकट्ठा लोगों को गिरफ्तार कर हड़ताल को असफल बनाने की कोशिश की गई। लेकिन यकीनन हड़ताल का आम जनता पर असर होगा क्योंकि ये सभी मुद्दे आम जनता से जुड़े हैं।"

उत्तर प्रदेश के पूर्वी जिलों में इलाहाबाद, लखनऊ के अलावा बनारस, आजमगढ़, मऊ, बस्ती में भी मज़दूर संगठनों ने बारह सूत्री मांगों को लेकर जिला अधिकारी को ज्ञापन सौंपकर हड़ताल समाप्त किया। आजमगढ़ की हड़ताल में शामिल ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव स्टूडेंट फोरम के राहुल कुमार हड़ताल को सकारात्मक दृष्टि से देखते हुए कहीं न कहीं रस्मी हड़ताल मानते हैं। उनका मानना है कि इस हड़ताल की तैयारी में ढेर सारी कमियां रह गईं।

राहुल कुमार हड़ताल के विषय में कहते हैं कि "हम इस हड़ताल को सकारात्मक दृष्टि से देखते हैं लेकिन दस ट्रेड यूनियन द्वारा जो कॉल हुई उसकी पहुंच सीमित रही। कहीं न कहीं यह मानना होगा कि व्यापक प्रचार की कमी रही। किसान संगठनों को जहां शामिल होना चाहिए उन्होंने सिर्फ समर्थन देते हुए अपनी भूमिका अदा की।"

हड़ताल में शामिल आइसा की प्रदेश सह-सचिव शिवानी मिताक्षरा हड़ताल को सफल मानती हैं और वे कहती हैं कि हम किसानों, मज़दूरों के अलावा छात्रों के मुद्दों के साथ हड़ताल में शामिल हैं। सरकार शिक्षा का जिस तेजी से बाजारीकरण कर रही है उसका प्रभाव युवाओं साफ़ तौर पर नज़र आने लगा है। सीटें कम हो रही हैं, प्रतियोगी परीक्षाओं के परिणाम अधर में लटके हैं कोई भर्ती प्रक्रिया पूरी नहीं की जा रही है।

मज़दूर, किसान के समर्थन में कवि व छात्र संगठन

प्रदेश में मज़दूर, किसानों के समर्थन के साथ सामाजिक कार्यकर्ता, कवि, अधिवक्ता और छात्र संगठन हड़ताल में शामिल हुए। प्रदेश के विभिन्न वामपंथी छात्र संगठनों ने शिक्षा के बाजारीकरण, ऑनलाइन शिक्षा को बढ़ावा देने, दसवीं-बारहवीं की पुस्तकों से संवैधानिक व लोकतांत्रिक मूल्यों वाले अध्यायों की कटौती करने व बढ़ती बेरोजगारी के खिलाफ अपनी मांगों के साथ हड़ताल में शामिल हुए।

किसानों की हड़ताल के समर्थन में हिंदी के जनकवि अष्टभुजा शुक्ल फेसबुक पोस्ट में लिखते हैं कि "आज जब पूँजीपतियों की शुभेच्छु सरकार अपनी जनविरोधी नीतियों के कारण किसानों और उनकी खेती को नीलाम कर देने पर तुली हुई हो तो एक बड़े जनांदोलन की सुगबुगाहट साँस भर रही है। यह आंदोलन यदि राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं से आगे बढकर स्वतः स्फूर्त रौ मे उठ खड़ा हुआ और किसान जाग गया तो वह अपना वाजिब हक लेकर ही मानेगा।

वे आगे अपील करते हुए लिखते हैं कि "एक बहुत छोटे किसान और पैरवीकार लेखक के तौर पर मैं किसानों के दिल्ली में जुटान और प्रदर्शन का समर्थन करता हूँ और उनके साथ खड़ा होने में एक भारतीय नागरिक की भाँति गर्व का अनुभव करता हूँ। इसके साथ यह करबद्ध अपील भी करता हूँ कि प्रबुद्ध समाज भी किसानों के हक में हाथ उठाकर खडे हों।"

उत्तर प्रदेश में आम छात्र पिछले कुछ वर्षों से रोजगार के सवाल को लेकर आंदोलनरत हैं। योगी सरकार के छह महीने के भीतर सभी सरकारी भर्तियों को क्लियर करने के वादे के बाद छात्रों का आंदोलन कुछ थमा जरूर है लेकिन कबतक छात्र आंदोलन से दूर रहते हैं कुछ कहा नहीं जा सकता। इलाहाबाद हड़ताल में शामिल आइसा जिला सचिव सोनू यादव हड़ताल को सफल बताते हुए कहते हैं कि "सरकार ने इस देश के मजदूर श्रमिक वर्ग को महामारी के बहाने उनकी रोजी-रोटी छीन ली उन्हें सड़क पर ला दिया और अब यह फासीवादी सरकार, सरकारी कर्मचारियों को भी निजीकरण, निगमीकरण, जबरदस्ती रिटायर करने की नीति तथा पेंशन की गारंटी ना होना जैसे जनविरोधी कानून लाकर कर्मचारियों और उनके बच्चों का भविष्य अंधकार में डाल रही है।"

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय गेट के सामने छात्र संगठन भगत सिंह छात्र मोर्चा ने हड़ताल के समर्थन हुए सरकार की शिक्षा के निजीकरण, नई शिक्षा नीति व विश्वविद्यालय को जल्द से जल्द खोलने की मांग की। भगत सिंह छात्र मोर्चा के सचिव अनुपम राय कहते हैं कि "बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले ज्यादातर छात्र/किसान परिवार से हैं। किसान और श्रमिकों के श्रम से ही मूलभूत आवश्यकताएं पूरी होती हैं तो हमारा कर्तव्य है कि हम किसानों और मज़दूरों के साथ खड़े हों। इसके अलावा हम लोगों ने विश्वविद्यालय खोलने, नई शिक्षा नीति रदद् करने की मांग को लेकर हड़ताल में शामिल हुए।"

उत्तर प्रदेश में रोजगार के आंदोलन को आगे बढ़ा रहे इंकलाबी नवजवान सभा के प्रदेश सचिव सुनील मौर्य मोदी सरकार पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि "रेलवे, बैंक, बीएसएनएल व अन्य सेक्टर का सरकार धड़ल्ले से प्राइवेटाइजेशन कर रही है, केंद्रीय विभागों के निजीकरण होने से नौकरियां खत्म हो जाएंगी। इसी कारण अब जो भर्ती फॉर्म आ रहे हैं उसमें सीटें कम होती जा रही हैं। वे आगे कहते हैं कि "लोकतांत्रिक आवाज को खत्म करने के लिए कानून बनाये जा रहे हैं यह लड़ाई लोकतंत्र और संविधान बचाने की लड़ाई है।"

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।

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