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दुनिया का हर कोना बुरी तरह से प्रभावित है
संयुक्त राष्ट्र संघ का खाद्य और कृषि संगठन (एफ़एओ) हर महीने एक मासिक खाद्य मूल्य सूचकांक जारी करता है। 3 जून को जारी विज्ञप्ति से पता चलता है कि खाद्य क़ीमतों में 40% की वृद्धि हुई है, जो कि 2011 के बाद से सबसे बड़ी वृद्धि है।
ट्राईकोंटिनेंटल : सामाजिक शोध संस्थान
15 Jun 2021
फ़ैज़ल लाईबी साही (इराक़), कैफ़े 2, 2014
फ़ैज़ल लाईबी साही (इराक़), कैफ़े 2, 2014

संयुक्त राष्ट्र संघ का खाद्य और कृषि संगठन (एफ़एओ) हर महीने एक मासिक खाद्य मूल्य सूचकांक जारी करता है। 3 जून को जारी विज्ञप्ति से पता चलता है कि खाद्य क़ीमतों में 40% की वृद्धि हुई है, जो कि 2011 के बाद से सबसे बड़ी वृद्धि है। इस खाद्य मूल्य वृद्धि का प्रभाव विकासशील देशों पर पड़ेगा, जिनमें से अधिकांश मूल खाद्य पदार्थों के प्रमुख आयातक हैं।

क़ीमतें कई कारणों से बढ़ सकती हैं, वर्तमान वृद्धि का प्रमुख कारण है महामारी के दौरान वैश्विक अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से को हुआ नुक़सान। लॉकडाउन से संबंधित रुकी हुई माँग, शिपिंग बाधाओं और तेल की क़ीमतों में वृद्धि के कारण अमीर व ग़रीब सभी देशों में सामान्य मुद्रास्फीति का डर बना हुआ है। अमीर देशों के पास -धनी बॉन्डधारकों की शक्ति के कारण- मुद्रास्फीति का प्रबंधन करने के बहुत कम उपाय हैं, और ग़रीब देश विनाशकारी ऋण संकट चक्र में फँसे हुए हैं।

खाद्य पदार्थों की क़ीमतें ऐसे समय में बढ़ी हैं जब दुनिया के कई हिस्सों में बेरोज़गारी की दर आसमान छू रही है। 2 जून को, अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) ने अपनी वार्षिक विश्व रोज़गार और सामाजिक आउटलुक: रुझान 2021 रिपोर्ट जारी की है, जिससे पता चलता है कि महामारी-संबंधित आर्थिक नुक़सान लाखों नौकरियों और काम के घंटों के नुक़सान के रूप में सामने आया है। आईएलओ की रिपोर्ट के अनुसार कोविड-19 द्वारा इस आर्थिक संकट में तेज़ी से बढ़ौतरी हुई है, जिसने 'काम की दुनिया में लंबे समय से चली आ रही संरचनात्मक चुनौतियों और असमानताओं में इज़ाफ़ा किया है, [और] ग़रीबी कम करने, लैंगिक समानता और काम की परिस्थितियाँ अच्छी करने की हालिया प्रगति को क्षीण किया है'।

इस संकट के 'अत्याधिक असमान' प्रभावों ने 'हमारे समय के तीन रंगभेदों (धन, दवा और भोजन)' को और गहरा किया है। भारत जैसे देशों में टीकाकरण कार्यक्रम में रुकावट पैदा हो रही है जबकि भारत दुनिया के 60% टीकों का उत्पादन करता है। अर्जेंटीना जैसे देश धनी बॉन्डधारकों को ऋण भुगतान हेतु थोड़ा अधिक समय देने के लिए नहीं मना पाने की वजह से गंभीर ऋण चुनौतियाँ का सामने कर रहे हैं। ऐसी परिस्थितियाँ में हालात बेहतर नहीं करेंगी बल्कि भुखमरी और निराशा बढ़ाएँगी।



वेन काहिल बार्कर (दक्षिण अफ़्रीका), भगवान में हमें विश्वास है, 2018

न्यू फ़्रेम पत्रिका (जोहानेसबर्ग, दक्षिण अफ़्रीका) के संपादक इस तथ्य से चकित थे कि उनके देश में युवा बेरोज़गारी 74.7% है (और समग्र बेरोज़गारी 42.3% है, जो कि अपने आप में एक हैरान करने वाला आँकड़ा है)। ज़्यादा-से-ज़्यादा लोग जीवित रहने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। न्यू फ़्रेम संपादकीय के शब्दों पर ध्यान देना चाहिए:

लाखों लोग मुश्किल भरी ज़िंदगी जी रहे हैं, शर्म, असफलता, भय और निराशा के दम घोटूँ चक्रों की निष्क्रियता में अपना समय बिताते हुए। कुछ लोग दिन में ज़्यादातर समय सोने लगते हैं। कुछ धर्म के लेन-देन की ओर मुड़ जाते हैं, इनाम की आशा में चढ़ावे चढ़ाते हैं। कुछ सस्ती अफ़ीम से अपना दर्द कम करने के प्रलोभन में फँस जाते हैं। कुछ उधार लेते हैं, जितना भी वो ले सकें, जहाँ से भी ले सकें, जैसे भी ले सकें। कुछ, अक्सर परिवार, दोस्तों और समुदाय की सहायता से, डटे रहने की पर्याप्त उम्मीद बनाए रखने का कोई तरीक़ा खोज लेते हैं।

इन लोगों और उनके परिवारों पर इन सबके असर, उनकी प्रतिभाओं और संभावनाओं की भारी बर्बादी को हमारे देश, उसे चलाने वाले लोग और अधिकतर इलीट वर्ग संकट के रूप में नहीं देखते।

ज़िंदगियों को कचरे की तरह प्रस्तुत किया जाता है, आवाज़ों को ठोस बातों के बजाये शोर की तरह, प्रदर्शनों को यातायात मुद्दों या अपराध के रूप में पेश किया जाता है। लोगों को बताया जाता है कि उनकी पीड़ा व्यक्तिगत विफलता का मामला है। अपनी स्थिति से निपटने के उनके प्रयासों का कारण है [उनका] नैतिक विघटन। विरोध प्रदर्शन या बेदख़ली के दौरान सरकार बेख़ौफ़ उनकी हत्या कर सकती है। 

दक्षिण अमेरिका या दक्षिण एशिया, पापुआ न्यू गिनी या इक्वेटोरियल गिनी के लोगों को इनमें से कोई भी बात नयी नहीं लगेगी।

क्षुल सोलर (अर्जेंटीना), ऊँचे मकान, 1922

आईएलओ की रिपोर्ट से पता चलता है कि '2021 की पहली छमाही में सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र लैटिन अमेरिका और कैरिबियन, और यूरोप और मध्य एशिया' रहे हैं। हालाँकि 'सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र' जैसे वाक्यांश का कोई मतलब नहीं रह गया है। दुनिया का हर कोना बुरी तरह से प्रभावित है, हर क्षेत्र दुखों से घिरा हुआ है।

फिर भी, लैटिन अमेरिका और कैरिबियन में कोविड-19 से सबसे अधिक नुक़सान हुआ है, वैश्विक आबादी का 8.4% होने के बाद भी महामारी के कारण हुई कुल मौतों में से वहाँ 27.8% मौतें हुईं (हालाँकि ये आँकड़ा पूर्णत: सही नहीं है, क्योंकि भारत में आँकड़े छिपाए जा रहे हैं)। पूरे लैटिन अमेरिका और कैरिबियन में कोविड-19 संक्रमण का प्रकोप अब भी जारी है, मई 2021 के अंत में मरने वालों की संख्या दस लाख से पार कर गई है। इस क्षेत्र की दीर्घकालिक कमज़ोरियों और अनिश्चित लॉकडाउन के परिणामस्वरूप, वहाँ पर बेरोज़गारी का दर ऊँचा है और वस्तुओं और सेवाओं के निर्यात के अनुपात में बाहरी ऋण सेवा बहुत ज़्यादा (59% से ऊपर)।

लैटिन अमेरिका के देशों में एक प्रमुख समस्या है मज़दूर वर्ग -जिसमें काम कर रहे और बेरोज़गार दोनों शामिल हैं- के बीच ग़रीबी का बढ़ना। जिनके पास काम है -हालाँकि उनमें से कई पहले की तुलना में कम घंटों के लिए और अनिश्चित परिस्थितियों में काम कर रहे हैं- उनके सामने भी भुखमरी और आक्रोश की चुनौतियाँ उसी प्रकार से खड़ी हैं जैसे कि अब लगभग स्थायी रूप से बेरोज़गार हो चुके मज़दूरों के समक्ष। आईएलओ के लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई निदेशक विनीसियस पिनहेइरो ने कहा कि रोज़गार सृजन की नीतियाँ 'आर्थिक सुधार के केंद्र में होनी चाहिए', लेकिन अंतर्राष्ट्रीय वित्त की जकड़न सरकारों के लिए रोज़गार पैदा करने वाली नीतियों को अपनाना मुश्किल बना देती हैं।

एंथनी ओकेलो (केन्या), ऊपर से आदेश, 2012

यही कारण है कि ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान ने -समान विचारधारा वाले  अन्य शोध संस्थानों के साथ मिलकर- बोलिवेरीयन अलाइयन्स फ़ॉर द पीपल ऑफ़ आवर अमेरिका- पीपुल्ज़ ट्रेड ट्रीटी (एएलबीए-टीसीपी) के नेतृत्व में '790 करोड़ के लिए योजना' का मसौदा तैयार करना शुरू किया है। हमने पाँच बिंदु की योजना का एक मसौदा तैयार किया है जिनसे हमें उम्मीद है कि चर्चा और बहस शुरू होगी:

क. मज़दूरी पर दबाव कम करने के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य, सार्वजनिक शिक्षा और सार्वजनिक अवकाश जैसी सामाजिक वस्तुओं और सेवाओं के स्तर में वृद्धि करना।

ख. ट्रेड यूनियनों और ट्रेड यूनियनवाद की संस्कृति को मज़बूत करना ताकि लोग ख़ुद को निराश, अलग-थलग व्यक्तियों के रूप में न देखें जो काम खोजने की कोशिश कर रहे हैं या अपने कार्यस्थलों को अपने दम पर सुधारने की कोशिश कर रहे हैं।

ग. रोज़गार की तलाश में बेरोज़गारों की सहायता के लिए सार्वजनिक रूप से वित्तपोषित रोज़गार केंद्र बनाना। इन केंद्रों का आधार बेरोज़गारों की यूनियन के नेटवर्क में होना चाहिए।

घ. साधन परीक्षण और कार्य आवश्यकताओं के बिना ही सामाजिक कल्याण की मज़बूत एवं सार्वजनिक रूप से वित्तपोषित प्रणालियाँ प्रदान करें।

ङ. सभी के लिए निर्वाह लायक़ वेतन के साथ कार्य सप्ताह को छोटा करने की प्रक्रिया शुरू करें।

हम इन बिंदुओं पर आपके किसी भी प्रकार के सुझावों का स्वागत करते हैं, जो कि एक एकीकृत योजना का हिस्सा होंगे जिसमें इसके लिए धन जुटाने का प्रस्ताव शामिल है। यदि आपका कोई सुझाव है, तो कृपया उन्हें plan@thetricontinental.org पर ईमेल करें।

विभिन्न प्रकाशनों के कवर

ट्राईकॉन्टिनेंटल: सामाजिक शोध संस्थान अफ़्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका महाद्वीपों में स्थित अनुसंधान केंद्रों और परियोजनाओं का एक विकेंद्रीकृत नेटवर्क है। इन केंद्रों में से एक ब्यूनस आयर्स में है, जहाँ इंस्टीट्यूटो ट्राईकॉन्टिनेंटल डी इन्वेस्टिगैसिओन सोशल लैटिन अमेरिका और कैरिबियन में संकट का बारीकी से अध्ययन कर रहा है, और इस संकट से बाहर निकलने के तरीक़ों को भी ध्यान से देख रहा है। उदाहरण के लिए, उनकी एक रिपोर्ट अर्जेंटीना के अनिश्चित श्रमिकों, बहिष्कृत श्रमिकों, जिनके श्रम पर समाज टिका हुआ है, के बारे में है। इस रिपोर्ट में, शोधकर्ताओं ने बताया है कि बहिष्कृत श्रमिकों का आंदोलन (एमटीई) केवल मज़दूरों को काम की ख़राब परिस्थितियों के ख़िलाफ़ संघर्ष के लिए प्रेरित ही नहीं करता, बल्कि इन मज़दूरों के पास अर्जेंटीना की अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण की एक एकीकृत योजना भी है। रिसर्च क्लेक्टिव ऑन वर्क- अर्जेंटीना (कोलेक्टिवो डी ट्रैबाहो अर्जेंटीना) की एक अन्य रिपोर्ट ने अमीर और ग़रीब देशों के बीच की असमानता के साथ-साथ विभिन्न ग़रीब देशों के बीच बढ़ी असमानता को उजागर किया है। ये शोधकर्ता श्रम के लैंगिक विभाजन पर विशेष ज़ोर देते हुए ग़रीबी के सामाजिक पुनरुत्पादन का एक स्पष्ट मूल्यांकन पेश कर रहे हैं, ताकि महामारी के संकट से, और पूँजीवाद के संकट से बाहर निकलने के तरीक़ों पर सार्वजनिक बहस को पुख़्ता किया जा सके।

2019 में, ब्यूनस आयर्स की टीम ने ऑब्ज़र्वेटरी ऑफ द कंजंक्चर इन लैटिन अमेरिका और कैरिबियन (ओबीएसएएल) की स्थापना की, जो कि इस क्षेत्र को उलझाने वाली रणनीतियों और नीतियों का विश्लेषण तैयार करती है। ओबीएसएएल की रिपोर्ट हर दो महीने में प्रकाशित की जाती है। उदाहरण के लिए, ओबीएसएएल की रिपोर्ट सं. 12 (मई 2021), में कोलंबिया में बड़े पैमाने पर चल रहे विरोध प्रदर्शनों से लेकर चिली में एक नयी संविधान सभा के चुनाव के बारे में रिपोर्ट शामिल थी। महाद्वीप में काम करने वाली संरचनात्मक प्रवृत्तियों को प्रकट करने वाली घटनाओं पर विश्लेषणात्मक समझ बनाने के लिए इससे बेहतर कोई जगह नहीं हो सकती।

गेरार्डो चावेज़ (पेरू), न्याय अपनी ही भूलभुलैया में, 2009

2 जून को दक्षिण-दक्षिण सहयोग पर संयुक्त राष्ट्र संघ की उच्च-स्तरीय समिति में अपनी प्रस्तुति के दौरान, लैटिन अमेरिका और कैरिबियन पर आर्थिक आयोग (सीईपीएएल) की कार्यकारी सचिव एलिसिया बर्सेना ने कहा कि महाद्वीप को ग़रीबी उन्मूलन, समानता की ओर बढ़ने, और क्षेत्रीय एकीकरण की प्रक्रिया को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। यह एक सही आकलन है, पर संयुक्त राज्य अमेरिका और धनी बॉन्डधारकों की घुसपैठ से प्रभावित है, जिनमें से पहला लैटिन अमेरिका के देशों को आपस में लड़वाना चाहता है और दूसरे क्षेत्रीय ऋण पर कोई समझौता नहीं होने देते। हमारे शोधकर्ता केवल समस्याओं का सबूत ही इकट्ठा नहीं कर रहे, बल्कि वे इन संरचनात्मक संकटों के समाधान के लिए ज़रूरी तत्वों को इकट्ठा करने की भी कोशिश कर रहे हैं। हमारे देशों को इस नवउदारवादी दुःस्वप्न से बाहर निकलने के लिए एक दीर्घकालिक योजना की आवश्यकता है। ऐसा एजेंडा विकसित करने में हमारी मदद करें।

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