NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
विशेष : रवांडा नरसंहार की हत्यारी मीडिया और भारत के टीवी चैनल
हमें रवांडा नरसंहार की पृष्ठभूमि और तैयारियों के बारे में जानना चाहिए। इसमें बहुत सारी ऐसी चीजें मिल सकती हैं, जिन्हें शायद आज हम अपने आसपास देख रहे हों।
दुष्यंत/अभिनव प्रकाश
17 May 2020
रवांडा नरसंहार
फाइल फ़ोटो, साभार : worldvision.or

सोचिए, क्या यह संभव है कि कोई पत्रकार या अख़बार बच्चों को उकसाए कि वे अपने मां-बाप की हत्या कर दें और वो भी सिर्फ इसलिए कि उनके माता-पिता भिन्न धार्मिक या जनजातीय पहचान वाले हैं? बच्चे तो फिर भी भोले-भाले होते हैं। कल्पना कीजिए कि क्या ऐसा हो सकता है कि कोई पत्रकार व्यस्क लोगों को भड़काए कि वे अपनी पत्नी/ अपने पति की हत्या करें क्योंकि वो एक ख़ास धार्मिक पहचान या वर्ण से ताल्लुक रखते हैं। जी हाँ, यह संभव है और इतिहास में ऐसा हो चुका है।

1994 में रवांडा के भीषण नरसंहार में वहां के लाखों तुत्सी अल्पसंख्यकों को मारा गया। इस नरसंहार में दस धर्मादेश (टेन कमांडमेंट्स) नामक आदेश की बड़ी भूमिका रही। इसने बहुसंख्यक हूतू समुदाय को तुत्सी अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ खूब भड़काया। इस धर्मादेश को एक अख़बार और कई रेडियो स्टेशनों से भी प्रसारित किया गया था। इन प्रसारणों में तुत्सी लोगों के ख़िलाफ़ जमकर जहर उगले जाते थे। इसका परिणाम यह हुआ कि यहां भड़की हिंसा ने कम से कम 10 लाख तुत्सी और उदारवादी हूतू नागरिकों की जान ली।

इस नरसंहार की जांच के लिए 2002 में अंतरराष्ट्रीय अपराध अदालत का गठन हुआ। रवांडा सरकार के एक पूर्व अधिकारी ने अंतरराष्ट्रीय अदालत में अख़बारों और रेडियो स्टेशनों पर दस धर्मादेश (टेन कमांडमेंट्स) के नफ़रती प्रसारणों का पक्ष रखा। उनका कहना था कि ये प्रसारण "हूतू समुदाय के लोगों के बीच एकजुटता का संदेश देने, और यह बताने के लिए था कि हर हूतू की लड़ाई एक ही है।" इस नरसंहार को इसलिए भी अंजाम दिया गया कि यह बताया जा सके कि हूतू और तुत्सी समुदाय के लोगों के बीच कभी कोई संबंध नहीं रहा है। उनका कहना था कि इसी भावना से प्रेरित होकर कई लोगों ने अपनी तुत्सी पत्नी की हत्या की, कई बच्चों ने तुत्सी समुदाय से आने वाले अपने मां-बाप की ही हत्या कर दी।

अंतरराष्ट्रीय अपराध अदालत ने इस मामले में तीन पत्रकारों को उम्रकैद की सज़ा सुनाई। हिंसा भड़काने में इन तीनों पत्रकारों की बड़ी भूमिका थी। इनके द्वारा फैलाया गया ज़हर इतना भयावह रूप ले चुका था कि एक पड़ोसी दूसरे पड़ोसी पर टूट पड़ते थे और कई बार मां-बाप अपने बच्चों को हिंसा करने के लिए साथ लेकर जाते थे। रेडियो स्टेशन का इस्तेमाल भी हिंसा भड़काने के लिए खूब हुआ। रेडियो पर उकसाया जाता था कि कब्र अभी भी नहीं भरे हैं, सब लोग काम पर (हत्या के लिए) चलें। अख़बारों ने सालों तक सुनियोजित तरीके से तुत्सी समुदाय के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाई थी।

हमें रवांडा नरसंहार की पृष्ठभूमि और तैयारियों के बारे में जानना चाहिए। इसमें बहुत सारी ऐसी चीजें मिल सकती हैं, जिन्हें शायद आज हम अपने आसपास देख रहे हों।

अदालत में बहस के दौरान दोषी पत्रकारों ने न्यायाधीशों पर ही पक्षपाती होने का आरोप लगाकर उन्हें हटाने की मांग की। पक्षपाती होने का परिणाम इन पत्रकारों से ज्यादा कौन जान सकता था। अदालत में अपना बचाव करते हुए इन्होंने कहा था कि इतिहास में पहले भी इस तरह की हिंसा हो चुकी है और "सालों पहले तुत्सी समुदाय के लोगों ने भी ऐसा ही किया था।" अदालत ने इस पर कहा था, "हिंसा को इतिहास का सहारा लेकर या इतिहास में घटी किसी घटना का परिणाम बताकर सही ठहराने से हिंसा को बढ़ावा मिलता है। हिंसा रोकने का प्रयास करना जरूरी था।"

एक अन्य चश्मदीद ने कोर्ट को प्रोपगैंडा के एक अलग दस्तावेज़ के बारे में बताया। इस दस्तावेज़ में विरोधियों के ख़िलाफ़ झूठ, षड्यंत्र, अपमान को जायज ठहराया गया था। इसके साथ-साथ इसमें यह बताया गया था कि आम लोगों के मन में यह बात बिठा देना जरूरी है कि क्रूरता, युद्ध, नफ़रत, दासता और अन्याय तुत्सी समुदाय के लोगों की पहचान है। ये लोग हूतू समुदाय के लोगों के ख़िलाफ़ क्रूरता की साजिश रच रहे हैं।

उस समय रवांडा के एक बड़े अख़बार "कंगूरा" ने तुत्सी लोगों के ख़िलाफ़ कई अफ़वाह फैलाईं। एक लेख में उसने कहा कि तुत्सी समुदाय की महिलाएं हूतू मर्दों को शादी के लिए बहलाती हैं और उसके बाद हूतू परिवारों में आकर ये जासूस का काम करती हैं। अंतरराष्ट्रीय अपराध अदालत ने इस लेख के दूसरे भाग का जिक्र भी किया था। इसमें तुत्सी लोगों को रक्तपिपासु बताते हुए आरोप लगाया गया था कि ये लोग हूतू समुदाय के ऊपर हावी होकर तुत्सी राज कायम करना चाहते हैं। आज भारतीय मीडिया में भी कई बार तत्कालीन रवांडा मीडिया की झलक मिल जाती है। इसी साल फरवरी में जब दिल्ली दंगों में मुसलमानों को मारा जा रहा था, कई तथाकथित पत्रकार यह बताने कि कोशिश में थे कि इससे घबराने की कोई बात नहीं है और हमें इतिहास में हुए हिन्दुओं की हत्याओं की याद करनी चाहिए।

रवांडा में कुछेक राजनीतिक ताकतों ने एक समुदाय को निशाना बनाने का सपना देखा और पूरा किया। उस समय की मीडिया की भी बलिहारी हो जिसने आम लोगों को नफ़रत में इस कदर डुबोया कि महीनों तक यह कत्लेआम जारी रहा। इस घटना से हम समझ सकते हैं कि आम लोग समय आने पर तमाम बुनियादी जरूरतों को भूलकर अल्पसंख्यकों को ख़त्म करने का बीड़ा उठा लेते हैं। अल्पसंख्यकों को गद्दार बताकर हर एक घटना, हर एक समस्या की जड़ घोषित कर दिया जाता है। अगर मीडिया संस्थानों के मालिकों और पत्रकारों की रजामंदी नहीं होती तो रवांडा का नरसंहार इतना भयावह नहीं होता।

अब रवांडा अपने इतिहास के इस काले अध्याय को शोक दिवस के रूप में याद करता है। जाहिर है कि रवांडा फिर से इतिहास की अपनी यह ग़लती नहीं दोहराना चाहता। रवांडा जैसी ग़लती कोई दूसरा देश ना कर बैठे, हम सिर्फ और सिर्फ इसकी उम्मीद ही कर सकते हैं।

रवांडा की हत्यारी मीडिया के कितने करीब भारतीय पत्रकारिता?

हाल के कुछ सालों में भारतीय मीडिया ने फेक न्यूज़ का सहारा लेकर न सिर्फ सांप्रदायिकता का झंडा उठाया है, बल्कि उसे अपार जन-समर्थन भी मिल रहा है। जनता को बार-बार यह बताने की कोशिश की गई है कि उनकी समस्या रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास नहीं है बल्कि उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती है लव-जिहाद और इस्लामिक राष्ट्र बनाने जैसी साजिशों को नाकाम करना। टीवी चैनलों में बहस के नाम पर मुसलमानों के ख़िलाफ़ धड़ल्ले से जहर उगला जा रहा है। आज जब पूरा विश्व कोरोना महामारी की चपेट में है और इसके उपाय निकालने की कोशिश में लगा है, भारतीय मीडिया अपने अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने की कोशिश में लगा है।

आज भारत में वो तमाम चीज़ें होती दिख रही हैं, जो रवांडा की मीडिया ने किया था। जैसे वहां तुत्सी समुदाय के लोगों को घेरा जाता था, वैसे आज यहां मुसलमानों को घेरा जा रहा है।

सरकार का मुखपत्र बन चुके इन टीवी चैनलों द्वारा उड़ेले जा रहे ज़हर का ही परिणाम है कि आज मॉब लिंचिंग और जगह-जगह पर हो रहे सांप्रदायिक दंगे हमें आम लगने लगे हैं। भारतीय पत्रकारिता आज रवांडा की उस हत्यारी मीडिया के कितने करीब आ चुकी है, यह समझना हमारे लिए ज्यादा मुश्किल नहीं है।

(लेखक दुष्यंत अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। अभिनव प्रकाश कारवां ए मोहब्बत की मीडिया टीम से जुड़े हैं।)

(नोट : रवांडा नरसंहार और मीडिया की भूमिका को लेकर पिछले दिनों ‘न्यूज़लॉन्ड्री’ ने भी एक अच्छा वीडियो कार्यक्रम प्रस्तुत किया है।)

Rwandan genocide
Media
Murderer Media
Indian media
Tutsi Minorities
International crime court
Communalism
communal violence

Related Stories

डिजीपब पत्रकार और फ़ैक्ट चेकर ज़ुबैर के साथ आया, यूपी पुलिस की FIR की निंदा

राज्यसभा सांसद बनने के लिए मीडिया टाइकून बन रहे हैं मोहरा!

आर्यन खान मामले में मीडिया ट्रायल का ज़िम्मेदार कौन?

मोदी@8: भाजपा की 'कल्याण' और 'सेवा' की बात

तिरछी नज़र: ये कहां आ गए हम! यूं ही सिर फिराते फिराते

विचार: सांप्रदायिकता से संघर्ष को स्थगित रखना घातक

विशेष: कौन लौटाएगा अब्दुल सुब्हान के आठ साल, कौन लौटाएगा वो पहली सी ज़िंदगी

मोदी के आठ साल: सांप्रदायिक नफ़रत और हिंसा पर क्यों नहीं टूटती चुप्पी?

क्यों अराजकता की ओर बढ़ता नज़र आ रहा है कश्मीर?

क्या ज्ञानवापी के बाद ख़त्म हो जाएगा मंदिर-मस्जिद का विवाद?


बाकी खबरें

  • language
    न्यूज़क्लिक टीम
    बहुभाषी भारत में केवल एक राष्ट्र भाषा नहीं हो सकती
    05 May 2022
    क्या हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देना चाहिए? भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष से लेकर अब तक हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की जद्दोजहद कैसी रही है? अगर हिंदी राष्ट्रभाषा के तौर पर नहीं बनेगी तो अंग्रेजी का…
  • abhisar
    न्यूज़क्लिक टीम
    "राजनीतिक रोटी" सेकने के लिए लाउडस्पीकर को बनाया जा रहा मुद्दा?
    05 May 2022
    बोल के लब आज़ाद हैं तेरे के इस एपिसोड में अभिसार सवाल उठा रहे हैं कि देश में बढ़ते साम्प्रदायिकता से आखिर फ़ायदा किसका हो रहा है।
  • चमन लाल
    भगत सिंह पर लिखी नई पुस्तक औपनिवेशिक भारत में बर्तानवी कानून के शासन को झूठा करार देती है 
    05 May 2022
    द एग्ज़िक्युशन ऑफ़ भगत सिंह: लीगल हेरेसीज़ ऑफ़ द राज में महान स्वतंत्रता सेनानी के झूठे मुकदमे का पर्दाफ़ाश किया गया है। 
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    गर्भपात प्रतिबंध पर सुप्रीम कोर्ट के लीक हुए ड्राफ़्ट से अमेरिका में आया भूचाल
    05 May 2022
    राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कहा कि अगर गर्भपात पर प्रतिबंध लगाने वाला फ़ैसला आता है, तो एक ही जेंडर में शादी करने जैसे दूसरे अधिकार भी ख़तरे में पड़ सकते हैं।
  • संदीपन तालुकदार
    अंकुश के बावजूद ओजोन-नष्ट करने वाले हाइड्रो क्लोरोफ्लोरोकार्बन की वायुमंडल में वृद्धि
    05 May 2022
    हाल के एक आकलन में कहा गया है कि 2017 और 2021 की अवधि के बीच हर साल एचसीएफसी-141बी का उत्सर्जन बढ़ा है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License