NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
घरेलू हिंसा के फ़र्ज़ी आंकड़े बन रहे संसदीय चर्चा और संसदीय रिपोर्टों का आधार!
आख़िर क्या है इन आंकड़ों के पीछे की सरकारी सच्चाई? ये मामला सिर्फ़ आंकड़ों तक सीमित नही है बल्कि मामला इससे कहीं ज़्यादा गंभीर है।
राज कुमार
11 Dec 2021
domestic violence

एनसीआरबी 2020 की रिपोर्ट के अनुसार घरेलू हिंसा के आंकड़ों में भारी कमी देखी गई है। लेकिन क्या सचमुच घरेलू हिंसा के मामलों में कमी आई है? आखिर क्या है इन आंकड़ों के पीछे की सरकारी सच्चाई? ये मामला सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नही है बल्कि मामला इससे कहीं ज्यादा गंभीर है। आइए! इसे समझते हैं।

एनसीआरबी 2020 रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2018 में घरेलू हिंसा संरक्षण अधिनिनयम के तहत कुल 579 केस दर्ज़ हुए, वर्ष 2019 में एक्ट के अंतर्गत 553 केस और वर्ष 2020 में 446 केस दर्ज़ किये गये हैं। 28 राज्य और 8 केंद्र शासित प्रदेश यानी कुल 36 में से 26 में घरेलू हिंसा संरक्षण अधिनियम के तहत मामलों की संख्या शून्य है। सबसे ज्यादा मामले मध्य प्रदेश में दर्ज़ किये गये हैं, कुल 180 मामले। रिपोर्ट पर यक़ीन करें तो भारत से घरेलू हिंसा बाय-बाय हो चुकी है। लेकिन सवाल उठता है कि क्या ये आंकड़ें सही हैं?

क्या आंकड़े सही हैं?

इन आंकड़ों की सच्चाई को जांचने के लिए किसी फैक्ट-चेक या अतिरिक्त मेहनत की ज़रूरत नहीं है। आप सहज बुद्धि से बता सकते हैं कि आंकड़ें ग़लत हैं। फिर भी आप महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की 22 सितंबर 2020 की इस प्रेस विज्ञप्ति पर नज़र डालें जिसमें घरेलू हिंसा की बढ़ोतरी पर चिंता ज़ाहिर की गई है। प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार मार्च 2020 से 20 सिंतबर 2020 तक यानी मात्र सात महीनों में कुल 13,410 शिकायतें दर्ज़ की गई हैं।

इसके अलावा नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे की रिपोर्ट में आप राज्यवार उन महिलाओं का प्रतिशत देख सकते हैं जो पति द्वारा हिंसा का शिकार होती हैं। नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे 2019-20 के अनुसार बिहार में 18-49 आयु वर्ग की 40.6% प्रतिशत महिलाओं ने घरेलू हिंसा का सामना किया है। कर्नाटक में ये आंकड़ा 44.5% है। जबकि एनसीआरबी की रिपोर्ट में कर्नाटक में घरेलू हिंसा संरक्षण अधिनियम के तहत मामलों की संख्या शून्य है।

मतलब स्पष्ट है कि एनसीआरबी के आंकड़े सही नहीं है। अब सवाल उठता है कि जब घरेलू हिंसा में बढ़ोतरी हुई है तो एनसीआरबी के आंकड़ों में कमी क्यों दिखा रहे हैं?

क्या ये सिर्फ़ विभागीय तालमेल की कमी का मामला है?

इसे विभागीय तालमेल की कमी का मामला समझने की भूल न करें। इसे सिविल और क्रिमिनल केस की बहस में भी न घसीटें।

गौरतलब है कि घरेलू हिंसा संरक्षण अधिनियम 2005, 9. (b) के तहत स्पष्ट है कि संरक्षण अधिकारी प्रत्येक शिकायत की एक प्रति संबंधित पुलिस स्टेशन को भी भेजेगा। यानी कायदे से घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत दर्ज़ तमाम मामलों का रिकॉर्ड संबंधित पुलिस स्टेशन के पास भी होना चाहिये। इसके अलावा एनसीआरबी की रिपोर्ट में अन्य कई सिविल मामलों के भी आंकड़े दर्ज होते हैं। एनसीआरबी की रिपोर्ट सिर्फ क्रिमिनल केस की रिपोर्ट नहीं होती है। इसके अलावा एनसीआरबी की रिपोर्ट में घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 के तहत दर्ज मामलों का एक अलग से खंड बनाया गया है। जहां नाम मात्र आंकड़े दर्ज ही हैं।

फ़र्ज़ी आंकड़े बन रहे चर्चा का आधार

20 मार्च 2020 को लोकसभा में घरेलू हिंसा की स्थिति और वर्ष 2016, 2017, और 2018 में देश में घरेलू हिंसा के कुल मामलों की संख्या के बारे में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय से सवाल पूछा गया। सवाल का जवाब देते हुए महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने बताया कि देश में घरेलू हिंसा के वर्ष 2016 में कुल 437, वर्ष 2017 में 616 और वर्ष 2018 में 579 मामले दर्ज़ किये गये हैं। ये सभी आंकड़े एनसीआरबी की रिपोर्ट से लिये गये थे। ये आंकड़े सच्चाई से कोसों दूर हैं। लेकिन संसद में चर्चा और सवाल-जवाब का हिस्सा बन रहे हैं।

बात सिर्फ यहां तक सीमित नही है। संसदीय स्थायी समिति ने 15 मार्च 2021 को राज्यसभा और लोकसभा में महिलाओं एवं बच्चों के खिलाफ अपराध से संबंधित रिपोर्ट प्रस्तुत की। इस रिपोर्ट में घरेलू हिंसा के जिन आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया है वो सभी आंकड़ें एनसीआरबी की रिपोर्ट से लिये गये हैं। हम आपको पहले ही बता चुके हैं कि ये आंकड़े सही नहीं हैं। ये अत्यंत गंभीर मसला है। क्योंकि आंकड़ों और रिपोर्टों के आधार पर ही भविष्य की प्राथमिकताएं और नीतियां तय होती हैं।

आंकड़ों में कमी कारण घरेलू हिंसा संरक्षण अधिनियम की सरकारी दुर्दशा है

महिला आंदोलन के लंबे संघर्षों की बदौलत ये अधिनियम हासिल हुआ। लेकिन केंद्र और राज्य सरकारों ने पिछले 15 सालों में इस अधिनियम की दुर्दशा ही की है। अधिनियम के अंतर्गत संरक्षण अधिकारी की नियुक्ति का प्रावधान है। पीड़ित महिला के न्याय का पूरा मामला संरक्षण अधिकारी के इर्द-गिर्द घूमता है। संरक्षण अधिकारी इस अधिनियम की धुरी है। लेकिन कुछेक राज्यों को अपवाद स्वरूप छोड़ दें तो लगभग सभी राज्यों में स्वतंत्र संरक्षण अधिकारी की नियुक्ति नहीं की गई है। जहां स्वतंत्र संरक्षण अधिकारी की नियुक्ति की गई है तो वहां भी उन्हें अन्य ज़िलों का अतिरिक्त भार भी सौंप दिया गया है। उदाहरण के तौर पर हरियाणा में स्वतंत्र संरक्षण अधिकारियों की नियुक्ति की गई है। लेकिन इनकी संख्या नाकाफी है। परिणामस्वरूप कई संरक्षण अधिकारियों को दो-दो ज़िलों का कार्यभार देखना पड़ रहा है। कहीं-कहीं तो संरक्षण अधिकारी की अतिरिक्त ज़िम्मेदारी बीडीओ निभा रहे हैं।

महाराष्ट्र से शिव सेना के सांसद डॉ. श्रीकांत एकनाथ शिंदे ने महिला एवं बाल विकास मंत्रालय से संरक्षण अधिकारियों की नियुक्ति बारे लोकसभा में सवाल पूछा था। उन्होंने पूछा था कि क्या राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के द्वारा घरेलू हिंसा संरक्षण अधिनियम के तहत पर्याप्त स्वतंत्र संरक्षण अधिकारियों की नियुक्ति की गई है? अगर नहीं, तो क्या केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों से इस बारे जवाब मांगा है? राज्य सरकारों ने क्या जवाब दिया है? क्या सरकार ने संरक्षण अधिकारियों को सुविधाजनक ढंग से कार्य करने के लिए बजट मुहैया कराने बारे राज्य सरकारों को कहा है?

इन सवालों के जवाब में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय राज्य मंत्री डॉ. विरेंद्र कुमार ने जवाब दिया कि सभी राज्यों में संरक्षण अधिकारियों की नियुक्ति कर दी गई है। ज्यादातर राज्यों में अन्य अधिकारियों को अतिरिक्त कार्यभार सौंपा गया है।

यानी ज्यादातर राज्यों में वो अधिकारी संरक्षण अधिकारी का कार्यभार संभाल रहे हैं जो पहले से ही काम के बोझ से लदे पड़े हैं। जबकि सब जानते हैं कि घरेलू हिंसा जैसे मामले में अधिकारियों को अतिरिक्त तौर पर संवेदनशीलत और इत्मिनान की ज़रूरत होती हैं। ताकि पीड़िता को सहानुभूति के साथ सुन सके। पीड़िता अपनी बात बताते हुए अनेक बार भावनात्मक उद्वेगों से गुजरती है, रोती है। क्या इन अतिरिक्त कार्यभार संभाल रहे अधिकारियों के पास इतना समय और धीरज होता है कि पीड़िता को संवेदनशीलता से सुन सकें। एनसीआरबी रिपोर्ट में घरेलू हिंसा संरक्षण अधिनियम के तहत आंकड़ों की कमी का कारण घरेलू हिंसा संरक्षण अधिनियम की सरकारी दुर्दशा है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं ट्रेनर हैं। आप सरकारी योजनाओं से संबंधित दावों और वायरल संदेशों की पड़ताल भी करते हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

गोवाः घरेलू हिंसा में बढ़ोतरी लेकिन आंकड़े शून्य!

Domestic Violence
Parliamentary reports on Domestic Violence
NCRB 2020 report
NCRB Data
Ministry of Women and Child Development

Related Stories

मायके और ससुराल दोनों घरों में महिलाओं को रहने का पूरा अधिकार

दलित और आदिवासी महिलाओं के सम्मान से जुड़े सवाल

यूपी चुनाव: दलितों पर बढ़ते अत्याचार और आर्थिक संकट ने सामान्य दलित समीकरणों को फिर से बदल दिया है

लिएंडर पेस और रिया पिल्लई मामले में अदालत का फ़ैसला ज़रूरी क्यों है?

जेंडर बजट में कटौती, मोदी सरकार के ‘अमृतकाल’ में महिलाओं की नहीं कोई जगह

मैरिटल रेप: घरेलू मसले से ज़्यादा एक जघन्य अपराध है, जिसकी अब तक कोई सज़ा नहीं

एमपी में एससी/एसटी के ख़िलाफ़ अत्याचार के 37,000 से अधिक मामले लंबित, दोष-सिद्धि की दर केवल 36 फ़ीसदी

गोवाः घरेलू हिंसा में बढ़ोतरी लेकिन आंकड़े शून्य!

क्या वाकई देश में महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराधों में कमी आई है?

एनसीआरबी: कोविड-19 उल्लंघन के कारण अपराध दर में 28% वृद्धि, एससी /एसटी के ख़िलाफ़ अपराध में 9% इज़ाफ़ा


बाकी खबरें

  • नीलांजन मुखोपाध्याय
    यूपी: योगी 2.0 में उच्च-जाति के मंत्रियों का दबदबा, दलितों-पिछड़ों और महिलाओं की जगह ख़ानापूर्ति..
    02 Apr 2022
    52 मंत्रियों में से 21 सवर्ण मंत्री हैं, जिनमें से 13 ब्राह्मण या राजपूत हैं।
  • अजय तोमर
    कर्नाटक: मलूर में दो-तरफा पलायन बन रही है मज़दूरों की बेबसी की वजह
    02 Apr 2022
    भारी संख्या में दिहाड़ी मज़दूरों का पलायन देश भर में श्रम के अवसरों की स्थिति को दर्शाता है।
  • प्रेम कुमार
    सीबीआई पर खड़े होते सवालों के लिए कौन ज़िम्मेदार? कैसे बचेगी CBI की साख? 
    02 Apr 2022
    सवाल यह है कि क्या खुद सीबीआई अपनी साख बचा सकती है? क्या सीबीआई की गिरती साख के लिए केवल सीबीआई ही जिम्मेदार है? संवैधानिक संस्था का कवच नहीं होने की वजह से सीबीआई काम नहीं कर पाती।
  • पीपल्स डिस्पैच
    लैंड डे पर फ़िलिस्तीनियों ने रिफ़्यूजियों के वापसी के अधिकार के संघर्ष को तेज़ किया
    02 Apr 2022
    इज़रायल के क़ब्ज़े वाले क्षेत्रों में और विदेशों में रिफ़्यूजियों की तरह रहने वाले फ़िलिस्तीनी लोग लैंड डे मनाते हैं। यह दिन इज़रायली क़ब्ज़े के ख़िलाफ़ साझे संघर्ष और वापसी के अधिकार की ओर प्रतिबद्धता का…
  • मोहम्मद सज्जाद, मोहम्मद ज़ीशान अहमद
    भारत को अपने पहले मुस्लिम न्यायविद को क्यों याद करना चाहिए 
    02 Apr 2022
    औपनिवेशिक काल में एक उच्च न्यायालय के पहले मुस्लिम न्यायाधीश, सैयद महमूद का पेशेवराना सलूक आज की भारतीय न्यायपालिका में गिरते मानकों के लिए एक काउंटरपॉइंट देता है। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License