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किसान-आंदोलन ने इस देश को बदल दिया
किसान-आंदोलन ने हमारे लोकतंत्र को बचा लिया है। इतिहास का यह सबक एक बार फिर सही साबित हुआ कि फासीवाद का नाश मेहनतकश वर्गों के प्रतिरोध से ही होता है। 
लाल बहादुर सिंह
26 Nov 2021
kisan andolan
फ़ोटो साभार: सोशल मीडिया

ठीक एक साल पूर्व 26 नवम्बर, 2020 की तरह आज फिर हजारों-हजार किसान राजधानी दिल्ली की ओर कूच कर रहे हैं । तब वे एक हमलावर सरकार के भीषण दमन का मुकाबला करते हुए राजधानी पहुंचने की जद्दोजहद कर रहे थे, आज वे लड़ाई का पहला अहम मोर्चा जीतने के बाद आत्मविश्वास और जोश से भरे हुए अगले पायदान की ओर बढ़ रहे हैं। 

विश्व-इतिहस के इस अनोखे आन्दोलन की-जो uninterrupted 365 दिनों के बाद भी जारी है- पहली  वर्षगांठ पर आज मोर्चों पर किसानों का विराट समागम जीत के जश्न के साथ शहीदों की स्मृति एवं उनके सपनों को मंजिल तक पहुंचाने, अधूरी लड़ाई को पूरा करने के संकल्प का ऐलान भी होगा।

किसान-आंदोलन ने इस देश को बदल दिया

एक साल के ऐतिहासिक आंदोलन और अकूत बलिदान के बाद किसानों को तो अपने आंदोलन से अभी कोई material gain नहीं हुआ है, पर उनके महान आन्दोलन ने इस देश को बहुत कुछ दिया है। सच यह है कि किसानों ने 1 साल में इस देश को बदल कर रख दिया है और एक बार फिर सबको  याद दिला दिया है कि "किसान इस देश की आत्मा हैं " और सामाजिक-राजनीतिक बदलाव की धुरी हैं।

याद कीजिये नवम्बर 2020 का भारत कितना डरा-सहमा देश था। संविधान की धज्जियां उड़ाते हुए Article 370 का खात्मा-कश्मीर का विभाजन,  CAA-NRC-NPR का खौफ, उसके खिलाफ उठ खड़े हुए शाहीन बागों के विरुद्ध साम्प्रदायिक उन्माद, दिल्ली दंगे के नाम पर अल्पसंख्यकों का भीषण दमन, भीमा कोरेगांव मामले में ताबड़तोड़ बुद्धिजीवियों, लोकतान्त्रिक शख्सियतों की गिरफ्तारियां, मज़दूर-विरोधी लेबर कोड और अंततः पहले अध्यादेश, फिर राज्यसभा में कानूनी-संवैधानिक प्रावधानों को बुलडोज़ करते हुए खुले-आम कारपोरेट के पक्ष में कृषि कानूनों की घोषणा-ऐसा लग रहा था कि भारत अब एक कारपोरेट- फ़ासिस्ट हिन्दू राष्ट्र बन कर रहेगा, शायद 2025 में संघ की शताब्दी के बहुत पहले ही ! तब का भारत एक डरा हुआ, आतंकित, तनावग्रस्त-चिंताकुल भारत था, जो लोकतन्त्र पर लटकती तलवार और अघोषित आपातकाल के साये में जी रहा था।

19  नवम्बर को घुटने टेक कर मोदी सरकार द्वारा कानूनों की वापसी की घोषणा से देश ने राहत की सांस ली है,  लगता है कि देश फासीवाद के खूनी पंजे से लहूलुहान बाहर निकल आया है। यह स्पष्ट सन्देश गया है कि मोदी-शाह-संघ-भाजपा नहीं, अपराजेय इस देश की महान जनता है, किसान योद्धा हैं। 

किसान-आंदोलन ने हमारे लोकतन्त्र को बचा लिया है। इतिहास का यह सबक एक बार फिर सही साबित हुआ कि फासीवाद का नाश मेहनतकश वर्गों के प्रतिरोध से ही होता है। स्वाभाविक रूप से इसमें हरे और लाल झंडे की एकता ने, किसानों और मेहनतकशों की एकता ने, किसान योद्धाओं और वामपन्थी -कम्युनिस्ट ताकतों ने निर्णायक भूमिका निभाई है। शहीद भगत सिंह के विचार और बलिदानी परम्परा, डॉ0 आंबेडकर के संवैधानिक मूल्य और गांधीवादी सत्याग्रह की प्रेरणा इनका सबसे बड़ा सम्बल बनी।

आंदोलन की रैडिकल अन्तर्वस्तु और इसकी ऐतिहासिक उपलब्धि को dilute करने के लिए कहानी गढ़ी जा रही है कि मोदी जी ने security concerns की वजह से कानून वापस लिए, आंदोलन के दबाव या चुनावी नुकसान के डर से नहीं। एक चर्चित बुद्धिजीवी ने जो अभी कल तक आंदोलन की obituary लिख रहे थे, प्रस्थापना दिया कि कृषि कानूनों को वापस लेकर मोदी जी ने ( सिखों की ओर दोस्ती का हाथ बढाकर ) सावरकर के हिंदुत्व की रक्षा की है ! कोई उनसे पूछे कि 26 जनवरी को जब सिख विरोधी उन्माद भड़काया जा  रहा था, सिखों का जन-संहार प्रायोजित किया जा रहा था, उस समय सावरकर का हिंदुत्व कहाँ था ?

बहरहाल, कृषि-कानून निरस्त होने के बाद भी किसानों की असल लड़ाई- अपनी फसल और मेहनत की वाजिब कीमत के लिए MSP की कानूनी गारण्टी की-वह तो अभी जस की तस है।

दरअसल, 3 कानून  की लड़ाई तो किसानों के ऊपर अचानक मोदी सरकार द्वारा थोप दी गयी थी। गहरे संकट में फंसे किसान तो अपने उपज की  वाजिब कीमत- स्वामीनाथन आयोग की संस्तुति के अनुरूप MSP- और कर्ज-मुक्ति की लड़ाई लड़ रहे थे, जो मंदसौर गोलीकांड के बाद एक संगठित राष्ट्रीय स्वरुप ग्रहण करने लगी थी। लेकिन सरकार ने इन माँगों को address करना दूर, उल्टे 3 कानूनों के माध्यम से उनके ऊपर एक नया और अभूतपूर्व हमला बोल दिया जो कृषि के पूरे ढांचे को ही बदल देने वाला था। जाहिर है इस हमले से निपटने की-3 कृषि कानूनों को रद्द कराने की लड़ाई फौरी तौर पर सबसे ऊपर आ गयी और एक ऐतिहासिक आंदोलन के लिए उत्प्रेरक ( catalyst ) बन गयी। पर किसान पहले दिन से उसके साथ अपनी मूल मांग- MSP की कानूनी गारण्टी की मांग लगातार उठा रहे थे। कर्ज़ मुक्ति की मांग जरूर मांगपत्र से हट गई थी, जिस पर हाल ही में आंदोलन के एक शीर्ष-नेता डॉ0 दर्शन पाल ने अफसोस भी जाहिर किया।

लेकिन आज कारपोरेटपरस्त, pro-reform बुद्धिजीवियों, अर्थशास्त्रियों, कृषि-विशेषज्ञों, पत्रकारों की पूरी फौज किसानों को आंदोलन से वापस लौटाने के लिए उतर पड़ी है । आन्दोलन से देश की सुरक्षा के लिए खतरे का हवाला दिया जा रहा है। सेना के एक पूर्व अधिकारी ने, जो एक थिंक-टैंक के स्वयम्भू कर्ताधर्ता हैं, कहा है कि, ' कृषि कानूनों के पूरे प्रकरण ने भारत की आंतरिक फूट को उजागर किया है, अब इसे पाटने का समय है।" कहा जा रहा है कि चीन-पाकिस्तान इस फूट का फायदा उठा सकते हैं !

यह सब खालिस्तानी-माओवादी-टुकड़े टुकड़े गैंग के पुराने हौवा का नया संस्करण है, जो आज जब आंदोलन अगले चरण की ओर बढ़ रहा है, उसे बदनाम करने के लिए शुरू हो गया है। यह दुष्प्रचार राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल  द्वारा हाल ही में गढ़े गए " सिविल सोसाइटी युद्ध का नया Frontier-4th जनरेशन Warfare " की खतरनाक Doctrine का ही हिस्सा है।

अब नया नैरेटिव यह बनाया जा रहा है कि MSP की कानूनी गारण्टी दे पाना सम्भव नहीं है और यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह होगा। अखबारों में बाकायदा सम्पादकीय लिखकर सलाह दी जा रही है,  "MSP पर जिद छोड़ें किसान नेता"। WTO-कारपोरेटपरस्त अनिल घनवत ने, जो कृषि-कानूनों पर उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित कमेटी के सदस्य भी थे, लोगों को डराया है कि, " MSP गारण्टी कानून से देश की अर्थव्यवस्था हिल जाएगी।"

बहरहाल, इस पर किसानों के ब्रह्मास्त्र का किसी के पास जवाब नहीं है-वे कह रहे हैँ कि मोदी जी ने तो गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए 2011 में Group on Consumer Affairs के मुखिया के बतौर खुद ही तत्कालीन मनमोहन सरकार से इसकी संस्तुति किया था।

सुप्रसिद्ध अर्थशास्त्री अरुण कुमार, कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा से लेकर स्वयं किसान-आंदोलन के नेताओं और बुद्धिजीवियों ने अकाट्य तर्कों और तथ्यों के साथ यह स्थापित कर दिया है कि MSP की गारंटी न सिर्फ सम्भव है बल्कि यह देश की विराट कृषक आबादी की क्रयशक्ति बढ़ाकर हमारी समूची संकटग्रस्त अर्थव्यवस्था के लिए बहुत बड़ा बूस्टर डोज साबित होगी। यह अनायास नहीं है कि देश की व्यापक जनता किसानों की इस लड़ाई का समर्थन कर रही है। C-Voter के एक स्नैप-पोल के अनुसार  70% लोगों ने किसानों के लिए MSP कानून का समर्थन किया है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि 63% NDA-भाजपा समर्थकों ने  भी इसका समर्थन किया है ।

खबर आई है कि कृषि- कानूनों की वापसी के बाद डरी मोदी सरकार ने अब कुख्यात नए श्रम-कानूनों ( लेबर कोड ) को भी वापस लेने का मन बना लिया है, कारपोरेट लॉबी के चिल्ल-पों मचाने के बावजूद कि इससे अर्थव्यवस्था को झटका लगेगा ! 

जाहिर है यह आंदोलन का by product, उसका side effect है। यह किसान- आंदोलन की  ताकत तथा उनके साथ मजदूरों की जुगलबंदी के संभावित परिणामों से डर का फल है।

कृषि कानूनों के सूत्रधार अशोक गुलाटी की वह बदतरीन आशंका और मोदी को दी गयी चेतावनी सच साबित होने जा रही है कि कृषि कानूनों की वापसी से नवउदारवादी सुधारों के पूरे पैकेज के लिए खतरा पैदा हो सकता है, उनके रोलबैक के लिए लड़ाई छिड़ सकती है ! आने वाले दिनों में विनाशकारी मोदी-राज के खिलाफ बहुआयामी जनांदोलनों की इंद्रधनुषी छटा देखने को मिल सकती है जो इस देश मे नीतिगत बदलाव का वाहक बनेगी।

 कारपोरेट-फासीवादी स्टेट के गठजोड़ को विजयी चुनौती देने वाला यह आंदोलन न सिर्फ हमारे देश के आंदोलनों के इतिहास में एक अलग मुक़ाम हासिल कर चुका है, वरन वैश्विक पैमाने पर भी वित्तीय पूँजी-WTO के  हमले के खिलाफ पूरी दुनिया में लड़ते किसानों-मेहनतकशों के लिए मॉडल बन चुका है।

लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।

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