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किसान संसद : महिला किसानों की ललकार, गद्दी छोड़े मोदी सरकार
बात बोलेगी: महिला किसान नेताओं ने महात्मा गांधी द्वारा 1942 में 9 अगस्त को दिए गए ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ के नारे को याद करते हुए ‘मोदी गद्दी छोड़ो, कॉरपोरेट देश छोड़ो’ के नारे के साथ मोदी सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव पारित किया।
भाषा सिंह
09 Aug 2021
किसान संसद : महिला किसानों की ललकार, गद्दी छोड़े मोदी सरकार

करीब 15 राज्यों की किसान महिलाओं ने 9 अगस्त 2021 को एतिहासिक बनाया। किसान संसद का नेतृत्व करते हुए इन महिला किसान नेताओं ने महात्मा गांधी द्वारा 1942 में 9 अगस्त को दिए गए ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ के नारे को याद करते हुए ‘मोदी गद्दी छोड़ो, कॉरपोरेट देश छोड़ो’ के नारे के साथ मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित किया। देश की राजधानी दिल्ली में जंतर-मंतर पर भीषण सुरक्षा के बीच चल रही किसान संसद ने 13 दिनों तक विधिवत तरीके से तीनों कृषि बिलों पर चर्चा करते हुए इन्हें न सिर्फ देश के अन्नदाताओं के खिलाफ बल्कि देश के आम नागरिक के लिए विनाशकारी बताया और इन्हें रद्द कर दिया गया।

तेरह दिनों तक चली किसान संसद में दो दिन महिला किसानों के नाम थे—जिसमें तमाम राज्यों से आई हुईं महिला किसान नेताओं ने निर्धारित समय के भीतर (करीब 3-5 मिनट) अपनी बातें रखीं। आज किसान संसद में दो एक्सपर्ट वक्ता भी बुलाए गये थे—जिनमें अर्थशास्त्री नवशरण कौर और पटियाला विश्वविद्यालय की प्रो. अनुपमा। इन दोनों के भाषणों से ही आज की संसद की कार्यवाही शुरू हुई, जो शाम तक चलती रही।

नवशरण कौर ने तीनो कानूनों के किसान विरोधी और देश विरोधी चेहरे को उजागर करते हुए कहा,  किसान संसद ने देश और दुनिया को दिखाया कि किस तरह से लोकतंत्र को बहस-मुबाहिसें के साथ जिंदा रखना चाहिए। दरअसल किसान आंदोलन लोकतंत्र की एक पाठशाला है, जहां संविधान, अधिकारों और कर्तव्यों के बारे में जबर्दस्त शिक्षा-दीक्षा हो रही है। जिस तरह से महिला किसानों ने कमान संभाली है आंदोलन की और आज यहां से मोदी सरकार के खिलाफ हुकुम जारी किया गया है, वह लंबे समय तक याद रखा जाएगा।

जिस तरह का गुस्सा और आक्रोश महिला किसान नेताओं में था और जिस तरह से वे इस बात को दोहरा रही थीं कि जब तक ये तीन कृषि कानून वापस नहीं लिये जाते, तब तक वे अपने आंदोलन में डटी रहेंगी, इसे आगे बढ़ाती रहेंगी। आज किसान महिला संसद में भारत के उन तमाम खिलाड़ियों को शाबाशी दी गई, जो ओलंपिक में मेडल जीत कर आए और जिन्होंने बेहतरीन खेल का प्रदर्शन किया। इस बारे में  ट्रॉली टाइम्स की संपादक नवकिरण नट ने कहा, कम से कम ओलंपिक में जिस तरह से किसानों की बेटियों और बेटों ने अपनी मेहनत दिखाई है, उससे तो मोदी सरकार को चेत जाना चाहिए। ओलंपिक मेडल जीतने वाले इस देश की मिट्टी से जुड़े हुए खिलाड़ी हैं, उन्हें ज्यादा से ज्यादा हौसला किसानी ने दिया है और इससे पता चलता है कि किसानों में कितना दम है। अगर हम ठान लें तो कुछ भी कर सकते हैं।

हरियाणा की अंतरराष्ट्रीय शूटर पूनम पंडित जो उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के इस्माइलपुर से वास्ता रखती हैं, उन्होंने पूरे तेवर के साथ कहा,  ओलंपिक में किसानों की मेहनत चमकी है, गोल्ड मेडल किसान का बेटा लाया है। किसान आज कह रहा है कि मोदी सरकार ठीक नहीं कर रही, बिना मतलब के हिंदू-मुसलमान कर रही है—देश बांट रही है, तो सरकार को सुनना पड़ेगा। देश के किसान को कमजोर समझकर मोदी सरकार ने गलती कर दी। अब हम किसान औरतें उसे ठीक करके ही चैन पाएंगी।

लखनऊ से आई महिला नेता मीना सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि सिर्फ पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ही नहीं पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी योगी- मोदी सरकार के खिलाफ गुस्सा है। यह आने वाले विधानसभा चुनावों में सत्ता परिवर्तन की राह खोल सकता है। जिस तरह से किसानों और आम नागरिकों के हकों की बटमारी की जा रही है, उससे सिर्फ हिंदू-मुसलमान कार्ड खेलकर जनता को भरमाया नहीं जा सकता।

किसान संसद के पहले सत्र की स्पीकर प्रो. रणधीर कौर भंगु और वाइस स्पीकर रीमन नैन

तीन सत्रों में बंटे आज के सत्र में बड़ी संख्या में महिला किसान नेताओं ने शिरकत की। पहले सत्र की स्पीकर पंजाब की प्रो. रणधीर कौर भंगु और वाइस स्पीकर हरियाणा की रीमन नैन थी, जबकि दूसरे सत्र में उत्तर प्रदेश की सुनीता टिकैत और पंजाब की उषा रानी ने सत्र को संचालित किया। सभी ने एक स्वर में मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर सहमति जताई और ऐलान किया कि मोदी सरकार को हटाना ही किसानों और देश के हित में है, क्योंकि वह सिर्फ कॉरपोरेट घरानों के लिए काम कर रही है।

 किसान संसद के दूसरे सत्र को सुनीता टिकैत और उषा रानी ने सत्र संचालित किया।

महिला किसानों का किसान संसद के आखिरी दिन को नेतृत्व करना और पूरे पेशेवर अंदाज में सत्र का पूर्ण आत्मविश्वास और राजनीतिक परिपक्वता के साथ संचालन करना—निश्चित तौर पर बदलते किसान आंदोलन की उजली तस्वीर है। क्या जिस तरह से 1942 में गांधी के भारत छोड़ो नारे की गूंज रही और भारत के इतिहास में वह एक अमिट छाप छोड़ पाया, क्या आज किसान संसद का नारा—मोदी गद्दी छोड़ो भी उस तरह का असर पैदा कर पाएगा---यह तो समय ही बताएगा।

कैमरे की नज़र से

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