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किसान संगठन और राजनीतिक दलः कौन किसे दिखाएगा रास्ता
किसान संगठनों की एकजुटता के संघीय मॉडल को अगर देश के विपक्षी दलों ने अपनाया तो राष्ट्रीय स्तर पर एक विपक्षी मोर्चे की शक्ल उभर सकती है। जिसमें किसी एक के नेतृत्व पर राजी होने की बजाय सामूहिक नेतृत्व की स्वीकार्यता बनेगी।
अरुण कुमार त्रिपाठी
08 Dec 2020
किसान
Image courtesy: The Hindu

दिल्ली को घेर कर बैठे किसान संगठनों की जीत होती है या हार, यह तो भविष्य ही बताएगा लेकिन एक बात जरूर है कि उन्होंने अपनी एकजुटता से चमत्कार कर दिया है। अगर सरकार यह एकजुटता तोड़ नहीं पाई तो आने वाले समय में देश भर में गांव, गरीब, किसान और मजदूरों का एजेंडा चलेगा और बेरोजगारों का मुद्दा भी उठेगा। उसी के साथ बनेगा संघर्ष के सामूहिक नेतृत्व का संघीय मॉडल। इसी मॉडल से प्रेरणा लेकर देश में बन सकता है विपक्षी दलों की एकता का एक मोर्चा, जिसमें किसी एक के नेतृत्व पर राजी होने की बजाय सामूहिक नेतृत्व की स्वीकार्यता बनेगी।

किसान आंदोलन पर अलगाववादी और विदेशी फंडिंग का आरोप लगाने वाले यह नहीं बता रहे हैं कि संभवतः यह इतिहास में पहली बार हुआ है कि अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (एआईकेएससीसी) के बैनर तले देश भर के कुल 250 किसान संगठनों ने नरेंद्र मोदी जैसे ताकतवर प्रधानमंत्री की सरकार को घेरने का साहस दिखाया है। हैरानी की बात है कि इस आंदोलन में पंजाब के 32 किसान संगठन शामिल हैं और यह सब वे संगठन हैं जो दो तीन महीने पहले एक दूसरे से अलग ही कार्यक्रम किया करते थे और सबके विचार और एजेंडा भिन्न होते थे। उससे भी बड़ी बात यह है कि इस आंदोलन का कोई एक नेता नहीं है। आज न तो महेंद्र सिंह टिकैत की तरह कोई करिश्माई व्यक्तित्व है और न ही शरद जोशी और नंजुंदास्वामी जैसा कोई नेता बचा है। नेता कई हैं लेकिन सबका अपना अपना प्रभाव क्षेत्र है और वे ज्यादा मशहूर नहीं हैं।

इसकी एक वजह तो यह है कि पिछले बीस वर्षों में उदारीकरण के प्रभावों के कारण किसान और मजदूर नेताओं का करिश्मा लगातार खत्म किया गया है। तेजी से उभरे इलेक्ट्रानिक मीडिया ने वह करिश्मा या तो जाति और धर्म के नेताओं के खाते में डाल दिया है या फिर परंपरा, ईश्वर और भारतीयता के नाम पर कारोबार करने वालों के माथे वह टीका लगा दिया है। उन्होंने कारपोरेट गुरू, विज्ञापन गुरू और मनोरंजन की दुनिया के टीवी स्टारों को तो चढ़ाया लेकिन किसानों और मजदूरों को अपनी बीट से ही बाहर कर दिया। नरेंद्र मोदी के करिश्माई नेतृत्व की परिघटना तो कई शक्तियों और प्रक्रियाओं से मिलकर बनी है लेकिन उसी के समांतर बाबा रामदेव और योगी आदित्यनाथ को मीडिया ने धार्मिक कारोबार और राजनीतिक ध्रुवीकरण के लिए गढ़ा है। अन्ना हजारे के नेतृत्व को एक विशेष मकसद के लिए खड़े किए जाने के बाद राष्ट्रीय फलक पर न तो किसी किसान नेता की छवि उभरी और न ही किसी ट्रेड यूनियन नेता की। नंजुदस्वामी, टिकैत और शरद जोशी के निधन के साथ वह स्थान तो रिक्त हो गया और शंकर गुहा नियोगी और दत्ता सामंत की हत्या के साथ करिश्माई ट्रेड यूनियन नेताओं की भी चर्चा नहीं होती। इस तरह के नेतृत्व को खत्म करने में तेजी से उभरे दक्षिणपंथी नेतृत्व और कारपोरेट मीडिया का बड़ा हाथ है।

लेकिन असली सवाल यह है कि छह जुलाई 2017 को बने अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति ने कैसे सिर्फ तीन सालों में इतना बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिया ? यह छतरी संगठन मंदसौर में किसानों पर गोली चलाए जाने के बाद बना था और इसका मुख्यालय मंदसौर ही है। इसमें आरंभ में 130 संगठन थे लेकिन अब उनकी संख्या 250 से ऊपर जा चुकी है। निश्चित तौर पर यह आंदोलन अपने विस्तार और प्रभाव में 1920 के असहयोग आंदोलन से कम साबित नहीं होने जा रहा है। बस कमी यही है कि इसके पास गांधी जैसा कोई नेता नहीं है। यह सब कैसे हुआ यह समझना भी जरूरी है और इससे सबक लेना भी। अगर सरकार के आरोपों की भाषा में अनुमान लगाएं तो कहा जा सकता है कि किसानों को कुछ राजनीतिक दलों ने काफी भ्रमित किया गया है। यानी वह भ्रम इतना है कि किसान घर बार छोड़कर सिर पर कफन बांधकर निकल पड़े हैं। किसानों की ओर से देखा जाए तो लगता है कि पिछले 30 सालों से चल रही उदारीकरण की प्रक्रिया ने महामारी के इस समय में सबसे करारी दस्तक दी है और किसान ने इसे अपने अस्तित्व के संकट से जोड़ लिया है, इसीलिए वह जाड़ा-पाला और महामारी की परवाह किए बिना सड़क पर उतर आया है। तीसरी वजह यह हो सकती है कि तमाम किसान संगठनों ने आपसी तालमेल इतना जबरदस्त बनाया है कि वे इतने सारे लोगों को लामबंद कर सके हैं।

यह एकजुटता हैरान इसलिए करती है कि इससे पहले देश को किसान संगठनों की एकजुटता टूटने का बड़ा बुरा अनुभव रहा है। अखिल भारतीय किसान यूनियन का गठन तीन माह पहले 13-14 जुलाई को देश भर के निर्दलीय किसान संगठनों के एक सम्मेलन में हुआ था। दो अक्टूबर 1989 को दिल्ली के बोट क्लब पर देश के दो बड़े किसान नेता शरद जोशी और महेंद्र सिंह टिकैत के समर्थकों के बीच मारपीट तक हुई और मराठी लोगों ने कहा कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों ने उनके साथ गुंडागीरी की। उस घटना पर प्रसिद्ध समाजवादी चिंतक किशन पटनायक ने एक टिप्पणी लिखी थी जिसका शीर्षक था ` किसान आंदोलन की कमजोरियां’ । उसमें उन्होंने लिखा कि , ``उस समय बोट क्लब पर पांच लाख किसान जमा थे। कुछ अखबार वालों ने लिखा कि वह पंचायत हरियाणा के मुख्यमंत्री देवीलाल के जन्मदिन पर आयोजित रैली से काफी बड़ी थी। ...अखबार वालों ने महेंद्र सिंह टिकैत को इस गड़बड़ी के लिए अधिक दोषी बताया। ...शरद जोशी और टिकैत पर सबकी निगाह थी। ...पंचायत का संचालन कैसे हो, मंच की व्यवस्था कैसी हो इसी पर विवाद था। ...टिकैत का कहना था कि मंच पर सिर्फ सभापति और संचालक बैठेंगे, नेतागण नहीं बैठेंगे। जिसको बुलाया जाएगा वह मंच पर अपना भाषण देगा और लौटकर आ जाएगा। ...यह उत्तर प्रदेश किसान संगठन की शैली है। शरद जोशी टिकैत का सुझाव मानने को तैयार नहीं थे। महाराष्ट्र की शैली अलग है। उनका कहना है कि मंच पर सारे वक्ता बैठेंगे। ’’

किशन पटनायक ने अखिल भारतीय किसान आंदोलन की संभावनाओं और कमजोरियों का विश्लेषण करते हुए अंत में निष्कर्ष निकाला है,  `` किसी भी जनांदोलन को अगर लंबे समय तक चलाना है तो राजनीति के साथ एक संबंध बनाना ही होगा। उसके बगैर जनांदोलन का स्वरूप ट्रेड यूनियन वाला ही रहेगा। ट्रेड यूनियन को भी बनाए रखने के लिए राजनीति का आश्रय लेना पड़ता है। या तो अपनी कोई राजनीति होगी या फिर किसी बनी बनाई राजनीति का आश्रय लेना पड़ेगा।’’ वे किसान संगठनों के अपने साथ अराजनैतिक शब्द जोड़ने पर भी सवाल करते हैं और सुझाव देते हैं, `` अराजनैतिक शब्द का सिर्फ यह अर्थ हो सकता है—मौजूदा राजनैतिक दलों की संस्कृति और तिकड़म से अपने को अलग रखना। इस अर्थ में `अराजनैतिक’ रहना ठीक है। तब फिर एक नई राजनीति शुरू करनी पड़ेगी। हरेक क्रांति एक नई राजनीति शुरू करती है।’’

किसान संगठन भले ही अपने को राजनीतिक दलों से दूर बताएं और केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद इसके लिए उन्हें बधाई दें लेकिन हकीकत यही है कि इन संगठनों को जोड़ने में वामपंथी दलों के किसान संगठन के नेताओं ने बड़ी भूमिका निभाई है। हन्नान मोल्ला और अतुल अनजान जैसे नेता और उनके कार्यकर्ता उस सीमेंट की तरह से काम कर रहे हैं जो इन सैकड़ों संगठनों को बांधे हुए है और उनके अंतर्विरोधों को उभरने नहीं दे रहे हैं। यही काम मेधा पाटकर, डॉ सुनीलम और योगेंद्र यादव भी कर रहे हैं जिन्होंने बलवीर सिंह राजेवाल, डॉ. दर्शनपाल और जोगिंदर सिंह अग्राहा, गुरनाम सिंह छड्डनी और राकेश टिकैत जैसे नेताओं को जोड़ रखा है। यही वह सूत्र है जिसके बारे में किशन पटनायक जैसे राजनीतिक विचारकों ने सुझाव दिया था और जिसके महत्व को हाल में अपने एक इंटरव्यू में हन्नान मोल्ला ने स्वीकार भी किया है। यही कारण है कि सरकार समर्थक मीडिया और सरकार के प्रवक्ता सबसे ज्यादा हमला इन्हीं लोगों पर कर रहे हैं और कह रहे हैं कि यह लोग किसान थोड़े ही हैं। किसान संगठनों का यह आंदोलन एक बड़ा राजनीतिक प्रयोग है जो पूरे देश के किसान कार्यक्रम के लिए एक नीति और शास्त्र के निर्माण का काम करेगा।

यह कारपोरेट अर्थशास्त्रियों और सरकारी नीतिकारों को चुनौती तो देगा ही किसानों के भीतर अपने बेहतर जीवन की समझ विकसित करेगा। इसमें कृषि में निवेश, लाभकारी खेती और पर्यावरण के सवाल भी उठ रहे हैं। लेकिन उससे भी बड़ी बात है कि किसान संगठनों की एकजुटता के संघीय मॉडल को अगर देश के विपक्षी दलों ने अपनाया तो एक राष्ट्रीय स्तर पर एक विपक्षी मोर्चे की शक्ल उभर सकती है। इस संदर्भ में भारत बंद को दिया गया 15 राजनीतिक दलों का समर्थन महत्वपूर्ण है। हालांकि केंद्र की शक्तिशाली मोदी सरकार और उसके पीछे खड़े संघ परिवार की शक्ति को कम करके नहीं आंकना चाहिए। वे लांछित करने, बांटने, ललचाने, फुसलाने, धमकाने और दमन करने के उपायों से बाज नहीं आएंगे। आमचुनाव अभी चार साल दूर है और क्षेत्रीय चुनाव भी अपने में तमाम तरह के निहित स्वार्थ और विभाजन पैदा करते हैं। इस बीच यह आंदोलन और इससे उभरती विपक्षी एकता पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश के चुनावों पर असर डाल सकते हैं और अगर उसमें उम्मीद बनती है तो नई राजनीति की संभावना पैदा हो सकती है।  

(लेखक वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)   

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