NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
कृषि
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
आठवें दौर की वार्ता भी विफल : जब सरकार चाहती ही नहीं तो कैसे बनेगी बात!
किसान आंदोलन : अब बातचीत के लिए अगली तारीख़ 15 जनवरी तय की गई है। इससे पहले 11 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट में इस पूरे मामले की सुनवाई है।
मुकुल सरल
08 Jan 2021
आठवें दौर की वार्ता भी विफल

तूने चाहा नहीं हालात बदल सकते थे
मेरे आँसू तेरी आँखों से निकल सकते थे

आज सरकार और किसानों के बीच बातचीत को लेकर हालात नज़र एटवी के इस शेर की तरह ही हैं। सरकार नहीं चाहती की कोई हल निकले, तो फिर कैसे हल निकलेगा! कैसे किसानों के हालात बदलेंगे।

सरकार आज भी तीनों कृषि क़ानूनों को वापस लिए जाने की बजाय कोई और विकल्प मांग रही है, जबकि किसान संगठनों ने पहले दिन से ही साफ़ कर दिया था कि बात होगी तो इन तीनों क़ानूनों को वापस लेने की प्रक्रिया पर ही होगी।

सरकार किसानों को संशोधन का झुनझुना देकर बहलाना चाहती है लेकिन किसानों ने साफ़ कर दिया है कि तीनों क़ानूनों को वापस लिए जाने से कम कुछ भी मंज़ूर नहीं।

आज भी वार्ता बेनतीजा रही, इसकी सूचना देते हुए केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि किसान नेताओं के साथ वार्ता में कोई फैसला नहीं हुआ; क्योंकि किसान संगठनों ने नये कृषि कानूनों को वापस लेने की अपनी मांग का कोई विकल्प नहीं दिया।

उन्होंने कहा कि सरकार तब तक कुछ नहीं कर सकती, जबतक कि किसान संगठन नये कानूनों को वापस लेने की अपनी मांग का विकल्प नहीं देते हैं। एक बार फिर उन्होंने दोहराया कि कई संगठन इन कानूनों का समर्थन कर रहे हैं। हालांकि अब तक ऐसे कोई भी प्रभावी और वास्तविक किसान संगठन सामने नहीं आए हैं जिन्होंने सरकार के इन तीनों क़ानूनों का समर्थन किया हो। पिछले दिनों कृषि मंत्री ने जिन संगठनों के समर्थन की चिट्ठियां ट्वीट कर जाहिर की थीं, उनमें लगभग सभी संगठन या नेता बीजेपी या आरएसएस से ही किसी न किसी रूप में जुड़े हैं या फिर उनका किसानों से कोई वास्ता ही नहीं है। जबकि सरकार से बात कर रहे 40 संगठनों के नेताओं का यह दावा है कि वे 450 से भी ज़्यादा किसान संगठनों के प्रतिनिधि हैं।

आपको मालूम है कि 4 जनवरी को सातवें दौर की वार्ता विफल होने पर सरकार ने आज 8 जनवरी को किसानों को 8वें दौर की बातचीत के लिए बुलाया था। किसानों ने पहले ही साफ कर दिया था कि बात होगी तो सिर्फ़ क़ानून वापस लेने की, लेकिन जैसा अंदेशा था कि सरकार भी अपना वही रवैया बरकरार रखते हुए संशोधन की बात ही दोहराएगी, वही हुआ।

अब बातचीत के लिए अगली तारीख़ 15 जनवरी तय की गई है। आप जानते हैं कि इससे पहले 11 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट में इस पूरे मामले की सुनवाई है। हालांकि आंदोलन कर रहे किसान संगठन इस मामले में कोर्ट में कोई पार्टी यानी कोई पक्ष नहीं है, लेकिन किसानों के नाम पर कुछ लोग और सरकार कोर्ट गए हैं। अब 11 जनवरी को कोर्ट इस पूरे आंदोलन पर अपना कोई फ़ैसला तो नहीं लेकिन ऑब्जर्वेशन या दिशा-निर्देश ज़रूर दे सकता है। जैसा अभी उसने गुरुवार को सरकार से पूछा कि क्या किसान आंदोलन में कोरोना प्रोटाकाल का पालन हो रहा है। अगर नहीं तो सरकार उसका पालन कराए, वरना तब्लीगी जमात वाली स्थिति हो सकती है। कोर्ट की इस टिप्पणी को लेकर भी बहुत लोगों ने आपत्ति जताई है।

देश भर के किसान अपनी मांगों को लेकर दिल्ली की सीमाओं पर पिछले 44 दिन से से बैठे हैं। किसानों का मानना है कि पहले से ही बदहाल किसान इन नए कृषि क़ानूनों के आने से और बदहाल और मजबूर हो जाएगा। प्राइवेट मंडिया खुलने से उसे एपीएमसी की मंडिया बंद होने का ख़तरा है तो कॉन्ट्रेक्ट फॉर्मिंग से अपनी ज़मीने जाने का ख़तरा है। आवश्यक वस्तु अधिनियम में छूट देने से कालाबाज़ारी बढ़ेगी जिससे आम उपभोक्ता को भी नुकसान होगा। कुल मिलाकर किसानों की समझ है कि ये क़ानून कॉरपोरेट को लाभ पहुंचाने के लिए लाए गए हैं और उसे गुलामी की ओर धकेल देंगे। यही नहीं आम जनता भी महंगाई इत्यादि से त्रस्त रहेगी। इसलिए किसान इन क़ानूनों को वापस लेने के साथ न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी की क़ानूनी गारंटी की मांग कर रहा है।

इसी को लेकर किसान और सरकार के बीच बातचीत का दौर चल रहा है। बार-बार वार्ता विफल होने के चलते किसानों ने अपना दबाव बढ़ाते हुए कल, 7 जनवरी को दिल्ली के चारों तरफ़ ज़बर्दस्त ट्रैक्टर मार्च भी निकाला। और 26 जनवरी यानी गणतंत्र दिवस के दिन दिल्ली के भीतर ट्रैक्टर मार्च करने का ऐलान किया है। इस बीच भी जागरूकता और एकजुटता के लिए कई कार्यक्रम तय हैं।

कुल मिलाकर किसान अपने संकल्प और एकजुटता से सरकार पर लगातार दबाव बढ़ा रहे हैं, लेकिन सरकार फ़िलहाल क़ानून वापस लेने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं दिख रही है। ऐसे में आने वाले दिन और संघर्ष और तनाव भरे रहने वाले हैं।

इसे पढ़ें : “सबसे ख़तरनाक यह मान लेना है कि रोटी बाज़ार से मिलती है”

किसान आंदोलन : …तुमने हमारे पांव के छाले नहीं देखे

बतकही: वे चटनी और अचार परोस कर कह रहे हैं कि आधा खाना तो हो गया...

farmers protest
farmers protest update
Farm Bills
Farmer Government Meeting
Farmers vs Government
Agriculture Laws
BJP
Modi government
Narendra modi
Narendra Singh Tomar

Related Stories

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"

मूसेवाला की हत्या को लेकर ग्रामीणों ने किया प्रदर्शन, कांग्रेस ने इसे ‘राजनीतिक हत्या’ बताया

दलितों पर बढ़ते अत्याचार, मोदी सरकार का न्यू नॉर्मल!

बिहार : नीतीश सरकार के ‘बुलडोज़र राज’ के खिलाफ गरीबों ने खोला मोर्चा!   

आशा कार्यकर्ताओं को मिला 'ग्लोबल हेल्थ लीडर्स अवार्ड’  लेकिन उचित वेतन कब मिलेगा?

दिल्ली : पांच महीने से वेतन व पेंशन न मिलने से आर्थिक तंगी से जूझ रहे शिक्षकों ने किया प्रदर्शन

राम सेना और बजरंग दल को आतंकी संगठन घोषित करने की किसान संगठनों की मांग

विशाखापट्टनम इस्पात संयंत्र के निजीकरण के खिलाफ़ श्रमिकों का संघर्ष जारी, 15 महीने से कर रहे प्रदर्शन

आईपीओ लॉन्च के विरोध में एलआईसी कर्मचारियों ने की हड़ताल


बाकी खबरें

  • प्रियंका शंकर
    रूस के साथ बढ़ते तनाव के बीच, नॉर्वे में नाटो का सैन्य अभ्यास कितना महत्वपूर्ण?
    19 Mar 2022
    हालांकि यूक्रेन में युद्ध जारी है, और नाटो ने नॉर्वे में बड़ा सैन्य अभ्यास शुरू कर दिया है, जो अभ्यास ठंडे इलाके में नाटो सैनिकों के युद्ध कौशल और नॉर्वे के सैन्य सुदृढीकरण के प्रबंधन की जांच करने के…
  • हर्षवर्धन
    क्रांतिदूत अज़ीमुल्ला जिन्होंने 'मादरे वतन भारत की जय' का नारा बुलंद किया था
    19 Mar 2022
    अज़ीमुल्ला ख़ान की 1857 के विद्रोह में भूमिका मात्र सैन्य और राजनीतिक मामलों तक ही सिमित नहीं थी, वो उस विद्रोह के एक महत्वपूर्ण विचारक भी थे।
  • विजय विनीत
    ग्राउंड रिपोर्ट: महंगाई-बेरोजगारी पर भारी पड़ी ‘नमक पॉलिटिक्स’
    19 Mar 2022
    तारा को महंगाई परेशान कर रही है तो बेरोजगारी का दर्द भी सता रहा है। वह कहती हैं, "सिर्फ मुफ्त में मिलने वाले सरकारी नमक का हक अदा करने के लिए हमने भाजपा को वोट दिया है। सरकार हमें मुफ्त में चावल-दाल…
  • इंदिरा जयसिंह
    नारीवादी वकालत: स्वतंत्रता आंदोलन का दूसरा पहलू
    19 Mar 2022
    हो सकता है कि भारत में वकालत का पेशा एक ऐसी पितृसत्तात्मक संस्कृति में डूबा हुआ हो, जिसमें महिलाओं को बाहर रखा जाता है, लेकिन संवैधानिक अदालतें एक ऐसी जगह होने की गुंज़ाइश बनाती हैं, जहां क़ानून को…
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    मध्यप्रदेश विधानसभा निर्धारित समय से नौ दिन पहले स्थगित, उठे सवाल!
    19 Mar 2022
    मध्यप्रदेश विधानसभा में बजट सत्र निर्धारित समय से नौ दिन पहले स्थगित कर दिया गया। माकपा ने इसके लिए शिवराज सरकार के साथ ही नेता प्रतिपक्ष को भी जिम्मेदार ठहराया।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License