NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
किसानों के प्रदर्शन में मुसलमानों की शिरकत का सवाल कितना वाजिब?
कृषि कानूनों के विरोध प्रदर्शन में मुसलमानों को हिस्सा लेना चाहिए या नहीं? इस सवाल के जवाब को तो छोड़िए, खुद यह सवाल बता रहा है कि आज हम कहां पहुंच चुके हैं।
मुशाहिद रफ़त
19 Jan 2021
किसानों के प्रदर्शन में मुसलमानों की शिरकत का सवाल कितना वाजिब?

किसान आंदोलन में टिकरी बॉर्डर पर सिख बुजुर्ग के पैरों की मालिश करता एक मुस्लिम युवक हो या फिर गाजीपुर बॉर्डर पर फल बांटते जमाअत-ए-इस्लामी हिंद जैसे संगठन का जत्था, किसानों को समर्थन देने पहुंचे मुसलमानों को कैमरे ने बिल्कुल नजरअंदाज नहीं किया। सिंघु बॉर्डर पर पंजाब के मलेरकोटला से आए मुस्लिम युवकों का किसानों को जर्दा (यानी पीले मीठे चावल) खिलाना और उससे कुछ दिन पहले मलेरकोटला में ही रिलायंस के एक पेट्रोल पम्प पर किसानों के बीच हिजाब पहने लड़कियों का पहुंचना, यह सबकुछ सोशल मीडिया के जरिए लाखों लोगों तक पहुंचा। दूसरी तरफ, एक सिख का वेश धरकर नमाज पढ़ने वाले मुस्लिम युवक का फर्जी फोटो वायरल हुआ और जर्दे को बिरयानी बनाकर पेश किया गया, मानो बिरयानी कोई विभाजनकारी व्यंजन हो। सवाल है कि यह सबकुछ इतना न्यूजवर्दी कैसे बना ? किसानों के आंदोलन में मुसलमानों का शामिल होना, किसी भी दूसरे समुदाय या समूह के शामिल होने से अधिक महत्वपूर्ण या हैरान कर देने वाला क्यों है ?

कृषि कानूनों के विरोध प्रदर्शन में मुसलमानों को हिस्सा लेना चाहिए या नहीं? इस सवाल के जवाब को तो छोड़िए, खुद यह सवाल बता रहा है कि आज हम कहां पहुंच चुके हैं।

आखिर किसानों के प्रदर्शन में उनके साथ कोई भी क्यों खड़ा नहीं हो सकता? क्यों यह सवाल पैदा होना चाहिए कि मुसलमान अगर इसमें शामिल हुए तो एक समुदाय के तौर पर उनकी अपनी छवि को या फिर पूरे प्रदर्शन की छवि को नुकसान तो नहीं पहुंचेगा?

सीएए-एनआरसी के खिलाफ शाहीन बाग के प्रदर्शन में किसान यूनियनों के जत्थों का पंजाब से दिल्ली पहुंचना और प्रदर्शनकारियों के लिए कई दिनों तक लंगर का इंतजाम करना किसे याद नहीं। पंजाब ही क्यों, दिल्ली में रहने वाले सिखों और दूसरे समुदायों ने भी शाहीन बाग में अपना हक अदा किया था। किसान जत्थे के जाने के बाद अपना एक फ्लैट बेचकर लंगर जारी रखने वाले डीएस बिंद्रा को कौन भुला सकता है। तो क्या कृषि कानूनों के विरोध में मुसलमानों को सिर्फ इसलिए शामिल हो जाना चाहिए क्योंकि उन्हें पंजाब के किसानों के एहसान का बदला चुकाना है? इसका जवाब अलग-अलग लोग अलग-अलग तरह से दे सकते हैं। मगर सैद्धांतिक बात तो यही है कि हुकूमत के किसी खराब फैसले के खिलाफ देश में कहीं भी कोई भी प्रदर्शन कर रहा हो तो किसी एक शख्स को या फिर समुदाय को सिर्फ अपनी शख्सियत या फिर सामुदायिक पहचान की वजह से उसका समर्थन नहीं करना चाहिए। अगर सही मायने में मुसलमानों को या किसी भी समुदाय को लगता है कि ये तीन नए कानून किसान विरोधी हैं तभी इसमें हिस्सा लेना चाहिए।

टोपी-दाढ़ी, हिजाब-नक़ाब से आगे की बात

बेशक, किसानों की सेवा करते मुसलमानों की तस्वीरें इस मुल्क के लोकतंत्र की वो खूबसूरत दलीलें हैं जिन्हें सिर्फ मल्टीमीडिया डिवाइस में ही नहीं बल्कि अपने दिलों में भी संजो कर रखना चाहिए। सिर्फ इसलिए नहीं क्योंकि इन तस्वीरों में नजर आने वाले किरदार टोपी, पगड़ी, दाढ़ी, हिजाब या नकाब से पहचाने जा सकते हैं बल्कि इसलिए क्योंकि वो खुद से बिल्कुल अलग पहचान रखने वालों की सेवा में जुटे हैं। इसलिए क्योंकि वह पीड़ा का अर्थ जानते हैं, उन्होंने पीड़ा भोगी है और वह नहीं चाहते कि देश का कोई भी नागरिक पीड़ित किया जाए।

आपको याद होगा कि अमेरिका में जब ब्लैक लाइव्स मैटर आंदोलन अपने चरम पर पहुंचा तो उसमें केवल काले ही नहीं बल्कि गोरे भी शामिल थे और हिस्पैनिक समुदाय का प्रतिनिधित्व भी था। दरअसल, जब कोई विरोध प्रदर्शन किसी वर्ग विशेष की पहचान की सीमाओं से निकलकर सही और गलत के व्यापक पैमाने पर परखा जाने लगता है, तभी वह सही मायने में लोकतांत्रिक प्रदर्शन बनता है। यह समझ पैदा करना जरूरी है कि शाहीन बाग में सिख या अन्य समुदायों के लोग इसलिए शामिल नहीं हुए थे क्योंकि वो केवल धर्म के आधार पर भेदभाव की बात थी। उस ऐतिहासिक प्रदर्शन में शामिल होने वाले हर व्यक्ति और वर्ग ने सच और झूठ, सही और गलत, लोकतांत्रिक और गैरलोकतांत्रिक का पैमाना मद्देनजर रखा था। ठीक इसी तरह कृषि कानूनों का विरोध करने के लिए अगर कोई व्यक्ति या समुदाय सामने आता है तो जरूरी है कि उसे पहले इन कानूनों को, या कम से कम किसानों के दृष्टिकोण को ठीक से समझना होगा। बेहतर होगा कि इस समझ का बीज उस समुदाय के बीच ही अंकुरित हो। कृषि करने वाले मुसलमानों को सबसे पहले आगे आना चाहिए। अन्य समुदाय के किसानों को उन्हें समझाने की कोशिश करनी होगी। ठीक वैसे ही जैसा कि हरियाणा के नूंह जिले के मुसलमान किसानों को समझाया गया। उन्हें भरोसा दिलाया गया कि वे साथ आएंगे तो किसी को उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचाने दिया जाएगा।

रही बात ऐसे मुसलमानों की जो खेती नहीं करते, तो उन्हें सिर्फ नागरिक की हैसियत से इस आंदोलन में शरीक होना चाहिए। कृषि कानून के विरोध में उनका जुटना सीएए-एनआरसी के नाम पर उनको परेशान करने वाली सरकार के खिलाफ विरोध करने का एक मौका भर नहीं होना चाहिए। नागरिक की हैसियत से अगर उनमें यह समझ पैदा हो चुकी है और वह अपनी धार्मिक पहचान के साथ इस विरोध प्रदर्शन में शामिल होना चाहते हैं या किसी भी रूप में समर्थन देना चाहते हैं तो फिर हिचकिचाहट या झिझक नहीं रहेगी।

यह भी समझना जरूरी है कि यहां समुदायों के दो अलग-अलग प्रकार हैं। हिंदू, सिख और मुसलमान अपने आप में समुदाय तो हैं मगर इनकी सामुदायिक पहचान धर्म के आधार पर होती है। दूसरी तरफ, कृषि से जुड़े सभी लोग मिलकर एक आर्थिक समुदाय बनाते हैं, चाहे वे किसी भी धर्म के हों। यही वजह है कि बिरयानी और खालिस्तानी जैसे लाख प्रोपागंडा के बावजूद पूरा देश किसानों के विरोध प्रदर्शन को हिंदू, सिख या मुसलमान के चश्मे से नहीं देख रहा है। जाहिर है, जिनको यह चश्मा रास आता है वो यही कोशिश करेंगे कि इसे हर आँख पर चढ़ा दिया जाए। सिख बुजुर्ग के पैरों की मालिश करने वाला मुस्लिम युवक हो या मलेरकोटला में सिर पर आँचल रखकर किसानों के समर्थन में भाषण देने वाली मुस्लिम युवती, सभी को बिना कोई चश्मा लगाए किसानों के साथ खड़ा होना होगा। तभी उन्हें सबकुछ साफ दिखाई देगा और यह सवाल हवा हो जाएगा कि मुसलमानों को विरोध प्रदर्शन में शामिल होना चाहिए या नहीं ?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

इसे भी पढ़ें : हरियाणा के पलवल में किसान विरोध ने लंबे समय से चली आ रही बाधाओं को किया ध्वस्त

सी ए ए का विरोध कर रहे मुसलमानों की तरह किसानों, सिखों को निशाने पर नहीं लिया जा सकता

farmers protest
kisan andolan
Farm bills 2020
Ghazipur
Jamaat-e-Islami Hind
Muslims
Muslim Protestors
CAA
NRC

Related Stories

राम सेना और बजरंग दल को आतंकी संगठन घोषित करने की किसान संगठनों की मांग

CAA आंदोलनकारियों को फिर निशाना बनाती यूपी सरकार, प्रदर्शनकारी बोले- बिना दोषी साबित हुए अपराधियों सा सुलूक किया जा रहा

मोदी सरकार की वादाख़िलाफ़ी पर आंदोलन को नए सिरे से धार देने में जुटे पूर्वांचल के किसान

ग़ौरतलब: किसानों को आंदोलन और परिवर्तनकामी राजनीति दोनों को ही साधना होगा

यूपी चुनाव: किसान-आंदोलन के गढ़ से चली परिवर्तन की पछुआ बयार

देश बड़े छात्र-युवा उभार और राष्ट्रीय आंदोलन की ओर बढ़ रहा है

किसानों को आंदोलन और राजनीति दोनों को साधना होगा

किसानों ने 2021 में जो उम्मीद जगाई है, आशा है 2022 में वे इसे नयी ऊंचाई पर ले जाएंगे

ऐतिहासिक किसान विरोध में महिला किसानों की भागीदारी और भारत में महिलाओं का सवाल

‘(अ)धर्म’ संसद को लेकर गुस्सा, प्रदर्शन, 76 वकीलों ने CJI को लिखी चिट्ठी


बाकी खबरें

  • लाल बहादुर सिंह
    यूपी चुनाव: पश्चिम से चली बदलाव की हवा के पूर्वांचल में आंधी में तब्दील होने के आसार
    02 Mar 2022
    वैसे तो हर इलाके की और हर फेज के चुनाव की अपनी विशिष्ठतायें हैं, लेकिन सच यह है कि इस चुनाव में-किसानों की तबाही, बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक न्याय, बुलडोजर राज का आतंक- कुछ ऐसे कॉमन मुद्दे उभर गए हैं…
  • election
    न्यूज़क्लिक टीम
    यूपी चुनाव 2022 : सामाजिक ध्रुवीकरण, जातीय विभाजन और नज़रअंदाज़ होते मुद्दे
    01 Mar 2022
    उत्तर प्रदेश के चुनावों में सामाजिक ध्रुवीकरण और जातीय विभाजन के नाम पर वोट मांगने की ज़ोरदार कोशिश की गई वहीँ दूसरी तरफ जनता के बुनियादी मुद्दे नज़रअंदाज़ किए गए. आखिर किन मुद्दों पर जनता ने डाला है…
  • modi
    विजय विनीत
    बनारस की जंग: क्या टूट रहा पीएम मोदी का जादू!
    01 Mar 2022
    "बनारस और इस शहर की तहजीब बुद्ध, कबीर, रैदास, और तुलसीदास की सोच पर खड़ी हुई है। भाजपा के लोग उसे मज़हब के संकीर्ण दायरों में बांधने की कोशिश कर रहे हैं, जिसके चलते पीएम का जादू बेअसर होता जा रहा है।"
  • SWIFT
    आशुतोष पाण्डेय
    स्विफ्ट भुगतान प्रणाली वास्तव में क्या है?
    01 Mar 2022
    रूस को वैश्विक भुगतान प्रणाली से अलग नहीं करने के लिए यूरोपीय संघ की आलोचना की गई थी। लेकिन अमेरिका और ब्रिटेन के साथ,  इस ब्लॉक ने अब यूक्रेन में रूस के युद्ध के आलोक में यह कठोर कदम उठाने का फैसला…
  • strike
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    हिमाचल सरकार ने कर्मचारियों के धरना-प्रदर्शन, घेराव और हड़ताल पर लगाई रोक, विपक्ष ने बताया तानाशाही फ़ैसला
    01 Mar 2022
    इस चेतावनी के अनुसार जिस दिन कर्मचारी धरना प्रदर्शन करेंगे, उस दिन का उनका वेतन काटने के निर्देश दिए गए हैं। कानून का उल्लंघन करने पर तो उसी दिन संबंधित कर्मचारी को सस्पेंड कर दिया जाएगा।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License