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आंदोलन
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भारत
राजनीति
बात बोलेगी: यूनियनों के बल पर ही किसानों ने दी मोदी को करारी चोट
इस किसान आंदोलन ने एक बार फिर संगठन की शक्ति और ज़रूरत साबित की है। तभी तो महिला किसान कहती हैं- “हमारे साथ संगठन की शक्ति है। उसने हमें हक के लिए लड़ना-बोलना सिखाया है। अपनी जत्थेबंदी (यूनियन) पर हमें अपने परिवार जैसा और कई बार तो उससे भी बढ़कर भरोसा है।”
भाषा सिंह
26 Dec 2020
किसान आंदोलन

--हमारे साथ संगठन की शक्ति है। उसने हमें हक के लिए लड़ना-बोलना सिखाया है। अपनी जत्थेबंदी (यूनियन) पर हमें अपने परिवार जैसा और कई बार तो उससे भी बढ़कर भरोसा है। वरना सोचो एक महीना हो गया दिल्ली की सड़कों पर, खुले आसमान के बीच, पर किसी के चेहरे पर शिकन नहीं हैं, वापस जाने की बात नहीं है। रोज-रोज हमारी ताकत बढ़ती जा रही है। बिना जत्थेबंदी के हम किसान औरतों का यहां हो या पंजाब, जिंदा रहना मुमकिन नहीं है--- कवंजीत कौर, 46 साल, बठिंडा, पंजाब

-हमारे घर के सभी लोग अगस्त से ही मोदी सरकार के इन तीन कृषि कानूनों के खिलाफ आवाज़ उठा रहे हैं। हम भी स्कूल के बाद उनके साथ फेयर प्राइस के सामने धरना करने जाते थे। हम तो अपने दोस्तों को भी बताते हैं कि मिलकर आवाज उठानी बहुत जरूरी है। पहले नारा लगाने में शर्म आती थी, आवाज नहीं निकलती थी, फिर लगा सबकी आवाज में मेरी आवाज मिल गई तो अलग से नहीं सुनाई देगी, एक कलेक्टिव आवाज हो गई। सबसे बड़ी बात यह समझ में आई कि जुड़ने से ताकत मिलती है, मोदी सरकार के कानून के खिलाफ सभी लोग जुड़ कर ही तो आवाज़ उठा पा रहे हैं, अकेले-अकेले आवाज तो दब जाती। मेरा सबसे प्यारा नारा—इंकलाब जिंदाबाद है--यह लगाना बहुत अच्छा लगता। -- विश्वप्रीत कौर , 13 साल, 7वीं क्लास, संगरूर।

--मुझे ठंड तो थोड़ी ज्यादा लगती है, लेकिन सीखने को बहुत मिलता है। हमारे खेल भी नए बन गये हैं। डंडों पर झंडा लगाना, दौड़-दौड़कर चाय पिलाना, रोटी खिलाना, कंबल के लिए रेस लगाना...फिर कनेक्शन पकड़ना (इंटरनेट) और क्लास का होमवर्क डाउनलोड करना। पढ़ाई में भी दिमाग भिड़ाना। घर में ऑनलाइन क्लास में तो नींद आ जाती था, यहां (टिकरी बार्डर) पर तो यह संभव ही नहीं है। ऐसा लगता है जैसे हम उस टाइम में आ गये हैं, जब आज़ादी की लड़ाई चल रही थी। हमारी किताबों में है न, कैसे सब लोग देश को बचाने के लिए घरों को छोड़कर बाहर आ गये थे। हम सब भी तो जल्थेबंदियों (यूनियनों) के बैनर तले खेती को बचाने के लिए सड़कों पर डट गये हैं। हम भी इतिहास बना रहे हैं--- जसंविदर कौर, 9वीं क्लास, जलालाबाद, पंजाब

--मैं अपनी बाकी उम्र भी यहीं बैठ कर गुजार सकती हूं, लेकिन अपनी खेती को अंबानी-अडानी को नहीं सौंप सकती। मोदी सोचता है कि हम किसान बेवकूफ हैं, पर उसे ये समझना होगा कि हमसे ज्यादा खेती के बारे में कम से कम वह तो नहीं जानता। मुझ से बहस करे, मैं बताती हूं कि एसेंशियल कॉमेडिटी एक्ट में बदलाव से किसान ही नहीं आप जैसे तमाम नागरिकों की जेबें ढीली होंगी, कंपनियों को फायदा होगा, ट्रेड वाले काले कानून से तो हमारी जमीनें ही छिन जाएंगी और तीसरे वाले से ठेके पर हो जाएगा सारा खेल। हम जत्थेबंदी नाल (साथ) जुड़े हैं, एक-एक प्वाइंट पता है। अब देखो वो (मोदी) कहता है कि हमें भड़का रहे हैं, और मैं कहती हूं (अपनी छाती पर हाथ ठोंक कर) तू बिका है उनके (अंबानी-अडानी) के पास। -- बलजीत कौर , 67 साल, जालंधर, पंजाब

पूरे 30 दिन का समय हो गया देश के सबसे बड़े किसान आंदोलन को, देश की राजधानी दिल्ली को चारों तरफ से घेरे हुए। यह मशाल जली थी सबसे पहले पंजाब से, जहां 20 जून, 2020  में तीन कृषि अध्यादेशों के पारित होने के बाद से किसान यूनियनों ने इनके खिलाफ लामबंदी शुरू कर दी थी और 9 अगस्त से किसानों ने पंजाब में प्रदर्शन शुरू कर दिये थे। ऑल इंडिया किसान संघर्ष कॉर्डिनेशन कमेटी (एआईकेएससीसी) ने भी 9 अगस्त को आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में कई जगहों पर इन अध्यादेशों के खिलाफ प्रदर्शन किये। फिर सितंबर में सारे नियमों को ताक में रखकर, अफरा-तफरी में इन कानूनों को संसद में (लोकसभा में 17 सितंबर 2020 और राज्यसभा में 20 सितंबर 2020) पारित किये जाने के बाद से आंदोलन बहुत तेज हो गया।

देश भर की तमाम किसान यूनियनों-संगठनों ने इन तीन कानूनों---(1) आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम 2020 (Essential Commodities (amendment) Act 2020), (2) कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) अधिनियम, 2020 (Farmers Producers Trade and Commerce (Promotion and Facilitation) Act 2020 और  (3) कृषि (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत अश्वासन और कृषि सेवा करार अधिनियम, 2020 ( The Farmers’ (Empowerment and Protection) Agreement of Price Assurance and Farm Services Act 2020) जो अनुबंध खेती (contract farming) से जुड़ा है, को देश की खेती के लिए मौत का वारंट बताया।

जमीन पर इन कानूनों के खिलाफ इतना तगड़ा आक्रोश है कि पंजाब के अकाली दल को मजबूरी में भाजपा नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) से रिश्ता खत्म करना पड़ा, हरियाणा में भाजपा के नेतृत्व वाली खट्टर सरकार को समर्थन दे रहे दुष्यंत चौटाला पर भी समर्थन वापस लेने का तगड़ा दबाव है। भाजपा को छोड़कर कमोबेश तमाम राजनीतिक दल इन कानूनों के खिलाफ है।

बेहद अनूठा है यह किसान आंदोलन

तमाम अन्य बातों के अलावा, यह किसान आंदोलन बेहद अनूठा है और यह भारतीय लोकतंत्र को बचाने की तमाम लड़ाइयों को एक अलग मुकाम तक, अलग स्तर तक ले जाने की शक्ति रखता है। इस शक्ति का राज या कुंजी छुपी हुई है किसान यूनियनों की संगठित ताकत में इस ओर ध्यान दिया जाना, बात करना बेहद जरूरी है। ये तमाम किसान जो कड़कड़ाती सर्दी, कोरोना के जानलेवा संकट को झेलते हुए, मोदी-खट्टर सरकार की तमाम रुकावटों-पानी की बौछारों को चीरते हुए दिल्ली का सरहद तक पहुंचे हैं—वे किसानों की संगठित ताकत का जीता-जागता उदाहरण है। जैसा आपने ऊपर दी टेस्टिमनी, वक्तव्यों में पढ़ा होगा, ये तमाम महिलाएं और बच्चियां न सिर्फ इस जुझारू किसान आंदोलन का हिस्सा हैं, बल्कि बता रही हैं कि बिना जत्थेदारियों के महिला किसानों को दिल्ली तक पहुंच पाना और डटा रहना असंभव था। पूंजीवादी प्रचार-प्रसार के दौर में यूनियनों को एक नकारात्मक शब्द में तब्दील करने की जो घिनौनी साजिश रची गई और उसके तहत यूनियनों को खत्म किया गया, उसने तमाम गलत कानूनों के खिलाफ मोर्चेबंदी को कमजोर किया। सुधार के नाम पर श्रमिकों के तमाम अधिकार उनसे छीन लिये गये, उन्हें बंधुआ मजदूरों में तब्दील कर दिया गया। तमाम सरकारी उपक्रमों को औने-पौने दामों पर बेच दिया गया, रेलवे बेच दी और आम नागरिकों के खिलाफ उठाए गये तमाम कानूनों को ही देश के हित के नाम पर स्थापित करने का पूरा बेशर्म खेल मोदी सरकार ने खुल्लम-खुल्ला खेला, और खेल रही है।

इसे टक्कर दे रहे हैं कि किसान अपने-अपनी यूनियनों के जरिये जिसे किसान अपनी हक की लड़ाई कहते हैं, खेती को बचाने के लिए आजादी का संघर्ष कहते हैं और इसके लिए जी-जान लगाये हुए बैठे हुए हैं। इस किसान आंदोलन की तीखी धार से भी जाहिर है कि ये किसान यूनियनें विचारधारा और आंदोलन की आंच पर पकी हुई हैं। उन्हें कोई भ्रम नहीं है कि कौन दोस्त है और कौन दुश्मन। महिला किसानों को बहुत बड़ी संख्या में दिल्ली में उतारने के पीछे भी जत्थेबंदियों की ताकत है। उनके घर से लेकर दिल्ली तक एक-एक महिला, उसके परिवार की हिफाजत करना, उनके लिए टायलेट से लेकर नहाने का इंतजाम जिस दक्षता के साथ किया गया है, वह यूनियनों की संगठित ताकत को दर्शाता है।

भारतीय किसान यूनियन (उग्राहां) की महिला नेता बिंदू ने हमें बताया कि यहां (टिकरी बॉर्डर) पर करीब 20 हजार महिला किसान अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुकी हैं। इनमें से अधिकांश महिलाओं का यूनियन से जुड़ाव कम से कम छह से 10 साल पुराना है। कइयों का इससे भी पुराना है और कई पिछले छह महीने में जुड़ी हैं। ये तमाम महिलाएं यूनियन के बारे में, उसके क्रियाकलापों के बारे में अच्छे से जानती हैं। खेती संकट पर खूब जमकर बात होती है। चूंकि ये तमाम महिलाएं खुद खेती करती हैं, लिहाजा खेती के संकटों के बारे में उनकी पकड़ बहुत जमीनी होती है।

धरने पर बैठीं कंवलप्रीत कौर ने बताया कि वह पिछले सात साल से उग्राहा जत्थेबंदी के साथ जुड़ी हुई हैं। उनके पास दस किले (10 एकड़) जमीन है। वह खुद खेती करती हैं। सब कुछ बोती है, लेकिन सरकार की गलत नीतियों से तबाह हैं। इस बार उन्होंने आलू बोया, बहुत अच्छी फसल हुई, जब बेचने गईं तो एक रुपये-दो रुपये किलो का रेट मिल रहा था। गुस्से में सारा आलू फेंक कर आ गईं। यूनियन से जुड़ने की वजह से उन्हें यह अच्छा तरह से पता है कि यह सरकार की गलत नीतियों की वजह से है। वह ठोंक बजाकर कहती हैं कि मोदी सरकार कानून वापस नहीं लेगी जब तक, तब तक वे यहीं बैठी रहेंगी। उन्होंने बताया कि यूनियन के जरिये ही उन्हें पता चला कि किस तरह से मोदी सरकार नया बिजली बिल लाई है, जिससे बेहद महंगी हो जाएगी बिजली, जैसे पेट्रोल-डीजल के दाम अनियंत्रित हो गए हैं, वैसे ही बिजली भी होने वाली है।

किसान यूनियन या जत्थेदारियों के साथ जुड़ाव की वजह से किसानों के स्वर तीखे राजनीतिक हैं। वे बड़े पैमाने पर हो रही साजिशों को समझ पा रहे हैं। आजाद भारत का संभवतः यह पहला इतना बड़ा किसान आंदोलन है, जिसने देश के दो शीर्ष कॉरपोरेट घरानों को निशाने पर लिया है। यह पहला आंदोलन है जो सीधे-सीधे अंबानी और अडानी के खिलाफ अभियान को अपने टॉप एजेंडे में रखा हुआ है। यहां पर मौजूद हर किसान महिला, पुरुष, बच्चा मोदी और अंबानी-अडानी के रिश्तों के बारे में बेखौफ ढंग से बातचीत करने को तैयार है। सिंघु बॉर्डर से लेकर टिकरी बॉर्डर तक—हर जगह अंबानी और अडानी के उत्पादों के बहिष्कार के पोस्टर लगे हुए हैं। हर एक व्यक्ति के पास आपकों यह समझाने के लिये पर्याप्त तर्क हैं कि कैसे मोदी सरकार ये कानून अपने दोस्त अंबानी-अड़ानी को लाभ देने के लिए लाई है। और ऐसा भी नहीं है कि अंबानी-अडानी का विरोध करने की इन किसानों की अपील का कोई असर नहीं हुआ। किसान आंदोलन की अपील के समर्थन में जब लोगों ने जिओ के नंबर को दूसरे मोबाइल ऑपरेटर के पास पोर्ट करा लिए (बदला लिये) तो घबराकर जिओ के मालिक मुकेश अंबानी को टेलीफोन रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (ट्राई) को पत्र लिखना पड़ा और हस्तक्षेप करने की अपील करनी पड़ी। उधर अडानी को हिंदी के अखबारों में पहले पेज पर विज्ञापन देना पड़ा, जिसमें बताया गया कि ये कानून किसानों के लिए लाभकारी हैं और अडानी समूह किसानों का हितैषी है। इसे किसानों की संगठित मांग की जीत ही कहा जा सकता है।

इसके साथ मीडिया के बड़े घरानों-गोदी मीडिया का जिस तरह से किसान आंदोलनकर्ताओं ने ‘बैंड बजाया’ है, वह भी उल्लेखनीय है। आंदोलन के हर कोने से यह आवाज इतनी तेज सुनाई देती है कि गोदी मीडिया को घुसने नहीं देना है। बैनर-पोस्टर सब लगे हुए हैं। एक जगह तो नेशनल मीडिया फॉर सेल, एक के साथ एक फ्री के बैनर भी लगा दिये है। और अब उसका असर यह हुआ कि ज़ी न्यूज को अपने कार्यक्रम में डिस्क्लेमर चलाना पड़ रहा है कि वह किसान आंदोलन के साथ है।

अखिल भारतीय किसान महासभा से जुड़ी महिलाएं मंच से लेकर किताबों के वितरण, लाइब्रेरी बनाने में बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रही है। जसबीर नट नारे लगाने से लेकर भाषण देने, महिलाओं के लिए तमाम इंतजामों की गारंटी करने का काम बखूबी कर रही हैं, साथ ही नवकिरण नट टॉली टाइम्स नाम का अखबार तमाम साथियों के साथ मिल कर निकाल रही हैं। जिस तरह से ये अखबार निकल रहा है, वह अपने आप में इतिहास रच रहा है इस बीच अखिल भारतीय किसान सभा के नेतृत्व में महाराष्ट्र के किसान दिल्ली के किसानों के समर्थन में दिल्ली राजस्थान बॉर्डर पर पहुंचकर राष्ट्रीय फलक पर आंदोलन को गुंजा रहे हैं, वह लड़ाई के लंबे चलने का संकेत है।

अखिल भारतीय किसान यूनियन के अशोक धावले का सही ही कहना है कि किसानों की यह संगठित शक्ति ही मोदी सरकार को इतनी कड़ी टक्कर दे पा रही है, वरना यह निरंकुश सत्ता तो किसानों को कुचलने के मंसूबे बनाए हुए थी। सर्दी में पानी की बौछारों से लेकर सड़कों पर गड्डे खोद दिये थे।

क्रांतिकारी किसान यूनियन के डॉ. दर्शन पाल को जहां चिंता सता रही कि किस तरह से यह आंदोलन देशव्यापी बने, ताकि केंद्र की मोदी सरकार पर इसका असर तगड़ा पड़े, वहीं जोगिंदर सिंह उग्राहां को किसानों के संगठित उभार से राजनीतिक फलक में बड़ी तब्दीली के आसार दिख रहे हैं। उधर किसान यूनियन के राकेश टिकैत का यह पूछना कि किसान जब सड़कों पर हैं तब मंदिर वाले कहां हैं—एक बड़े राजनीतिक सवाल को जन्म दे रहा है। वह पूछ रहे हैं कि आंदोलन में मंदिर वाले कहां है, किसानों को एक कप चाय तक नहीं पूछी। हमारी मां-बहनें मंदिरों में दूध चढ़ाती रहीं, औऱ ये लोग यहां नहीं आए, इनका पता भी लेना पड़ेगा। अब यह सवाल उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोनों के लिए परेशानी का सबब हो सकता है, अगर किसानों की संगठित शक्ति इसे आगे लेकर चले...।

कम से कम एक बात तो तय है कि ये किसान आंदोलन संगठन और यूनियनों की शक्ति और जरूरत को बहुत शिद्दत से महसूस कराता है। जिस तैयारी के साथ किसानों ने, महिला किसानों ने घर छोड़कर देश की राजधानी के दरवाजे पर अपने गांव बसाएं हैं, वह बिना यूनियनों की लामबंदी के संभव नहीं था। 

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