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आंदोलन
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भारत
राजनीति
सबसे ख़तरनाक है किसान आंदोलन से लड़ने का योगी मॉडल!
योगी सरकार प्रदेश के हर कोने में किसान आंदोलन को सख्ती से कुचलने में लगी है। लेकिन किसान आंदोलन देश के इस सर्वाधिक महत्वपूर्ण राज्य में, जो मोदी जी की केंद्रीय सत्ता का सबसे मजबूत स्तम्भ बना हुआ है, भारी राजनीतिक उलटफेर का सबब बन सकता है।
लाल बहादुर सिंह
26 Dec 2020
किसान आंदोलन

किसान आंदोलन को आज एक महीना पूरा हो गया। पर गतिरोध ज्यों का त्यों बरकरार है। कल प्रधानमंत्री द्वारा किसानों के खातों में 2000 रुपये की लंबित किसान सम्मान राशि डालने और इस अवसर पर उनके आक्रामक सम्बोधन से यह साफ है कि सरकार पीछे हटने के मूड में बिल्कुल नहीं है, वह कृषि कानूनों के मूल बिंदुओं पर रत्ती भर भी टस से मस होने को तैयार नहीं है। 

उनका पूरा जोर विपक्ष विशेषकर कम्युनिस्टों को कठघरे में खड़ा करने के बहाने किसान आंदोलन को बदनाम करने पर केंद्रित था।

उन्होंने बेहद शरारतपूर्ण ढंग से यह आरोप लगा दिया, जो कि पूरी तरह से बेबुनियाद है, कि आंदोलन की मूल मांगे पीछे चली गयी हैं, अब इसका इस्तेमाल करके उन लोगों को रिहा करने की मांग हो रही है जो हिंसक राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में लिप्त थे।

प्रधानमंत्री के भाषण की अंतर्वस्तु, उसका तेवर, उनका belligerence सरकार द्वारा आंदोलन के दमन की नीयत का संकेत है। सरकार अगर इस रास्ते पर बढ़ती है तो यह एक महात्रासदी होगी, सबके लिए।

बहरहाल, ऐसा लगता है कि देश के अंदर और बाहर सामाजिक-राजनीतिक ताकतों का संतुलन फिलहाल इस बात की इजाजत नहीं दे रहा है कि वह दमन के बल पर आंदोलन को कुचल सके। इसके लिए वे शायद आंदोलन का समर्थन कमजोर पड़ने और आंदोलनकारियों की किसी बड़ी गलती का इंतज़ार करेंगे।

ऐसी परिस्थिति में संघ-भाजपा तथा मोदी सरकार दोहरी रणनीति पर काम कर रहे हैं। एक ओर वे किसान संगठनों को लंबे समय तक निरर्थक वार्ताओं के चक्र में उलझाकर, थका कर आंदोलन को diffuse कर देना चाहते हैं। इसके लिए बिना किसी ठोस प्रस्ताव के वे लगातार यह दिखा रहे हैं कि वे बातचीत को उत्सुक हैं और कानूनों में  संशोधन को तैयार हैं, पर किसान नेता अड़ियल रूख अख्तियार किये हुए हैं, और कानूनों को रद्द करने या  MSP की कानूनी गारंटी जैसी 'तर्कहीन' अव्यवहारिक मांगें कर रहे हैं, क्योंकि उनका एजेंडा कुछ और है और उनका आंदोलन विपक्ष द्वारा प्रायोजित है। यह भी दिखाया जा रहा है कि सरकार किसानों के लिए बहुत कुछ कर रही है,  लंबित किसान सम्मान राशि का 25 दिसम्बर को क्रिसमस गिफ्ट के बतौर उनके खाते में  ट्रांसफर किया जाना इसी रणनीति का हिस्सा है। यह व्यापक किसानों को अपने पक्ष में जीत लेने और आंदोलन को अलग-थलग कर देने के उद्देश्य से प्रेरित है।

दूसरी ओर सरकार एजेंडा बदलने की जीतोड़ कोशिश कर रही है। केंद्रीय स्तर पर वैक्सीन पर अतिरिक्त हलचल-स्वयं प्रधानमंत्री का पुणे, हैदराबाद, अहमदाबाद का एक दिन में तूफानी दौरा,  बंगाल में राजनैतिक हलचल को अचानक hype, दिल्ली में केजरीवाल सरकार से सड़क पर टकराव, सतलज-यमुना कैनाल पर पंजाब के खिलाफ हरियाणा को भड़काने की कोशिश, AMU से लेकर शांति निकेतन तक प्रधानमंत्री की मीठी मीठी बातें, ऐसे ही प्रयास हैं।

लेकिन सबसे गंभीर कोशिश UP में योगी सरकार के माध्यम से हो रही है, जहां सवा साल बाद विधान-सभा चुनाव भी होने वाले हैं। वैसे तो आंदोलन का संदेश उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल तक जा रहा है, पर तराई और पश्चिम UP का इलाका जो मुजफ्फरनगर दंगों के बाद से भाजपा का गढ़ बन गया था, वह आंदोलन की सीधी चपेट में है और उसका आगामी निकाय तथा विधान-सभा चुनावों पर भी जबरदस्त असर पड़ना तय है। किसान आंदोलन देश के इस सर्वाधिक महत्वपूर्ण राज्य में, जो मोदी जी की केंद्रीय सत्ता का सबसे मजबूत स्तम्भ बना हुआ है, भारी राजनीतिक उलटफेर का सबब बन सकता है। पंजाब, हरियाणा, उत्तरी राजस्थान, उत्तराखंड, तराई और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में BJP से किसान आंदोलन भारी राजनीतिक कीमत वसूलेगा, यह तय है। 

योगी सरकार प्रदेश के हर कोने में किसान आंदोलन को सख्ती से कुचलने में लगी है। किसानों की तथा उनके समर्थन में राजनीतिक कायकर्ताओं की सड़क पर उतरते ही तुरन्त गिरफ्तारी हो रही है, पश्चिम में जगह जगह टकराव हो रहा है, सम्भल में किसानों को 50 लाख का बॉन्ड भरने को कहा गया, जिसे बाद में आलोचना होने पर 50 हजार किया गया !

योगी के शासन में उत्तर प्रदेश पिछले 4 वर्षों से हिंदुत्व की सबसे बड़ी प्रयोगस्थली बना हुआ है। अब किसान आंदोलन के समानांतर विभाजनकारी एजेंडा सेट करने के लिए, समाज मे विमर्श बदलने की रणनीति के तहत उसे नई ऊंचाई पर पहुंचाया जा रहा है। लव जिहाद का हौआ ( bogey ) जो पिछले कुछ सालों से उछाला गया था, अब उस पर योगी सरकार ने अध्यादेश लाकर और धर्मांतरण पर नया कानून बनाकर उसे राष्ट्रीय स्तर पर मुद्दा बना दिया है और इसे सामाजिक-राजनीतिक विमर्श का केंद्रबिंदु बना देने की जीतोड़ कोशिश हो रही है।

इस नाम पर रोज मुस्लिम नौजवानों की गिरफ्तारियां हो रही हैं, उन्हें बजरंग दल जैसे संगठनों द्वारा अपमानित किया जा रहा है, दूसरी ओर reverse conversion 

(इस्लाम से शुद्धिकरण द्वारा हिन्दू बनाने)को घर वापसी बताकर, नए कानून के खुले उल्लंघन के बावजूद, पुरस्कृत और प्रोत्साहित किया जा रहा है, पुलिस सुरक्षा मुहैया करवाई जा रही है।

अभी दो दिन पहले ही एक बेहद shocking खबर बिजनौर से आई है, वहाँ पुलिस ने गरीब, विधवा मां के 17 साल के नाबालिग बेटे को लव जिहाद के आरोप में जेल भेज दिया, जब वह अपनी 16 साल की दोस्त के साथ अन्य दोस्त की बर्थडे पार्टी से लौट रहा था! नफ़रती राजनीति की सेवा में योगी-राज की पुलिस ने सारी हदें पार कर दी हैं। कार्यकाल की शुरुआत में रोमियो स्क्वैड के नाम पर युवाओं के प्रेम और दोस्ती पर जो पुलिसिया पहरे लगाए गए थे, अब उसे साम्प्रदयिक रंग देकर और कानूनी जामा पहनकर नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया गया है। 

मीडिया और संघी नेटवर्क के माध्यम से इसे खूब hype दिया जा रहा है। योगी का अनुसरण करते हुए, अन्य भाजपा सरकारों ने भी इसे हाथों-हाथ लिया है। ऐसा लगता है कि फासीवादी अभियान का यह नया मोर्चा है, संघ-भाजपा के शस्त्रागार का यह सबसे ताजा हथियार है। 

" भारत de facto हिन्दू राज्य बन गया है", चर्चित बुद्धिजीवी Christophe Jaffrelot के इस निष्कर्ष को काउंटर करते हुए भी मोदी की अर्थनीति के कट्टर समर्थक लेकिन साम्प्रदयिक राजनीति के आलोचक स्तम्भकार स्वामीनाथन अय्यर ने माना कि  Hindu State बन जाने की यह बात उत्तर प्रदेश के लिए एक हद तक सच हो सकती है।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आज जिस भाषा मे किसान आंदोलन को लेकर बयानबाजी कर रहे हैं, उसे सुनकर इंदिरा गांधी की याद ताजा हो जाती है। यद्यपि, इसके लिए प्रेरणा उन्हें मोदी जी के उन आक्रामक वक्तव्यों से ही मिल रही है जिनमें वे विपक्ष पर किसानों को गुमराह करने और उनके कंधे पर रखकर बंदूक चलाने का बार-बार मिथ्या आरोप लगा रहे हैं। लेकिन योगी इस Goebellsian कला को अपनी मौलिकता से नई ऊंचाई पर ले गए हैं। अनायास ही वे हिंदुत्व के सबसे चमकते पोस्टर-ब्वाय और बहुतों की निगाह में मोदी जी के सबसे सुयोग्य उत्तराधिकारी यूं ही नहीं हैं।

पिछले दिनों मेरठ के सरदार वल्लभ भाई पटेल कृषि विश्वविद्यालय में भाषण देते हुए योगी ने विपक्ष पर जबरदस्त हमला बोला, उन्होंने आरोप लगाया कि वे किसान आंदोलन के माध्यम से देश को अस्थिर करने का षडयंत्र रच रहे हैं, किसानों को ऐसी ताकतों से सतर्क रहने के लिए उन्होंने आगाह किया। "...वे देश का, ग़रीबों और किसानों का विकास नहीं चाहते। वे किसानों के कंधे पर बंदूक रखकर देश को अस्थिर (destabilize ) करना चाहते हैं। .…. विपक्षी पार्टियां परेशान हैं क्योंकि मोदी जी देश को आगे बढ़ा रहे हैं।” उन्होंने कहा कि कुछ लोग साजिश कर रहे हैं क्योंकि कश्मीर में धारा 370 हटा दी गयी, क्योंकि अयोध्या में राम-मंदिर का मामला हल हो गया है।"

यह Typical इंदिरा गांधी Style है, पहले 70 के दशक में JP movement के समय और फिर सत्ता में पुनर्वापसी के बाद  80 के दशक में पंजाब के घटनाक्रम-आनन्दपुर साहिब प्रस्ताव, किसान आंदोलन और भिंडरवाले परिघटना- को लेकर, उन्होंने ठीक इसी भाषा-शैली में जनाक्रोश से निपटने की रणनीति अपनाई। अफसोस, दोनों बार इसका नतीजा भयानक रहा-पूरे देश, लोकतंत्र और स्वयं उनके अपने लिए। पहली बार देश में आपातकाल लगा, लाखों लोग जेल में डाल दिये गए, उनकी नागरिक स्वतंत्रताएं छीन ली गईं, और अंततः इंदिरा गांधी को अपनी सत्ता गंवानी पड़ी। दूसरी बार ऑपरेशन ब्लूस्टार हुआ, पंजाब में आतंकवाद का खौफनाक दौर आया, सिखों का भयानक कत्लेआम हुआ और इंदिरा गांधी का दुःखद अंत हुआ।

अतीत के उक्त त्रासद घटनाक्रम के अनुभवों से सीखते हुए किसान जनसमुदाय विनाशकारी कृषि-कानूनों के खिलाफ आज पूरी तरह शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक जनांदोलन के माध्यम से  जीवन-मरण संग्राम में उतरा हुआ है, जहाँ आंदोलन के पूरे नैरेटिव में धार्मिक विमर्श का लेशमात्र भी नहीं है, उससे strict separation है। 

वहीं, ऐसा लगता है कि सरकार ने, संघ-भाजपा ने उससे कुछ नही सीखा है, बल्कि नकारात्मक शिक्षा ली है। वे गोदी मीडिया समेत अपनी 100 मुँह वाली शैतानी सेना के साथ पहले दिन से आंदोलनकारियों को विपक्ष द्वारा गुमराह, पंजाबी, खालिस्तानी, देशद्रोही, आतंकवादी, टुकड़े-टुकड़े गैंग, मंदिर-विरोधी, धारा 370 समर्थक, चीन-पाकिस्तान समर्थित,  अतिवादी वामपंथी-नक्सली-माओवादी paint करने में लगे हुए हैं।

पर, किसानों के खिलाफ युद्ध में मोदी सरकार की इस रणनीति को लेकर किसान-आंदोलन का नेतृत्व पूरी तरह सचेत है, इसको आंदोलन के अख़बार Trolley Times के पहले ही अंक में 

सम्पादक सुख दर्शन नथ के अग्रलेख के इस समापन अंश से समझा जा सकता है :

"यद्यपि मोदी सरकार पर पीछे हटने के लिए जबरदस्त दबाव है, परन्तु कॉरपोरेट के साथ अपने रिश्तों तथा फासीवादी विचारधारा के कारण वह कृषि कानूनों को वापस लेने के लिए तैयार नहीं है। इसकी जगह वे आंदोलन को बदनाम करने और अपने  दलालों की शातिर चालों का इस्तेमाल करके बांटने की कोशिश कर रहे हैं। वे तलाश में हैं कि कैसे आंदोलन को हिंसक paint किया जाय और हमला करने का तर्क गढ़ा जाय। वे उकसावेबाजों को किसानों के बीच घुसा रहे हैं, किसानों के बीच झगड़े लगा रहे हैं ताकि उनके ऊपर बर्बर हमले को न्यायोचित ठहराने का सुअवसर मिल जाय।

किसान  भाइयों, एकजुट रहिए औऱ किसी भी तरह की उकसावेबजी के प्रति सतर्क रहिए। स्थानीय जनसमुदाय के साथ प्यार और सहयोग के साथ घुलमिल कर रहिए। हर तरह के बदमाशी करने वाले, समस्या खड़ी करने वाले तत्वों, बेकार की शेखी बघारने वालों,  चिढ़ाने वालों या विभाजनकारी भाषणों और नारों से सावधान रहिए।

मोदी सरकार को तो छोड़िए, अत्याचारी ब्रिटिश हुकूमत भी हमारे एकताबद्ध, अनुशासित प्रतिरोध आंदोलन को कुचल नहीं सकी। उकसावे और बंटवारे की साजिश का जवाब हमें धैर्य, एकता और सतर्कता से देना है। हम लड़ेंगे, हम जीतेंगे ।"

अखबार के शीर्ष पर शहीदे-आज़म भगत सिंह का वह अमर वाक्य अंकित है, " इंकलाब की तलवार विचारों की सान पर तेज़ होती है", जो पूरी दुनिया के क्रांतिकारियों का मार्गदर्शक सिद्धान्त रहा है । (Without revolutionary theory, there can be no revolutionary movement-Lenin)

इस तरह, देश में आज यह दो एजेंडों की भी टक्कर है, राष्ट्रनिर्माण के दो परस्पर विरोधी रास्तों का टकराव है। एक ओर विभाजनकारी नफ़रती राजनीति और कारपोरेट तथा साम्राज्यवादी वित्तीय पूँजी पर निर्भर विकास का अधिनायकवादी/फासीवादी शासन का रास्ता है, दूसरी ओर किसानों-मेहनतकशों की सृजनात्मकता को उन्मुक्त करते हुए, चौतरफा कृषि विकास, उत्पादक अर्थव्यवस्था, रोजगार सृजन पर आधारित बहुलतावादी, लोकतांत्रिक राज और समाज के निर्माण का रास्ता है।

किसान आंदोलन राष्ट्रनिर्माण के इन दो रास्तों के बीच संघर्ष के निर्णायक मोड़ ( Turning point) पर खड़ा है ।

(लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं।)

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