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किसानों को आंदोलन और राजनीति दोनों को साधना होगा
आज सिंघु बॉर्डर पर संयुक्त किसान मोर्चा की अहम बैठक हो रही है। किसान आंदोलन के स्थगित होने के बाद यह पहली बैठक है। इस बैठक में केंद्र सरकार द्वारा किसानों के साथ किये गए समझौते के क्रियान्वयन की समीक्षा होगी और आगे की रणनीति का एलान होगा।
लाल बहादुर सिंह
15 Jan 2022
kisan
फाइल फोटो

आज सिंघु बॉर्डर पर संयुक्त किसान मोर्चा की अहम बैठक हो रही है। किसान आंदोलन के स्थगित होने के बाद यह पहली बैठक है। इस बैठक में केंद्र सरकार द्वारा किसानों के साथ किये गए समझौते के क्रियान्वयन की समीक्षा होगी और आगे की रणनीति का एलान होगा। इसमें 26 जनवरी के ट्रैक्टर मार्च और पंजाब में चुनाव लड़ रहे किसान-संगठनों के बारे में भी अहम फैसला हो सकता है।

पब्लिक डोमेन में उपलब्ध जानकारी और किसान-नेताओं के बयानों से यह साफ है कि मोदी सरकार ने समझौतों के क्रियान्वयन की दिशा में एक महीने में कोई कदम नहीं उठाया है।

पंजाब में किसानों के खिलाफ खतरनाक बयानबाजी करके प्रधानमंत्री एक तरह उनके साथ हुए समझौते की भावना की पहले ही हत्या कर चुके हैं और समझौता तोड़ चुके हैं। 

क्या संयुक्त किसान-मोर्चा समझौते की पूरी तरह अनदेखी और एक तरह से वायदाखिलाफी करने वाली भाजपा सरकार के खिलाफ, फिर से मोर्चा खोलेगा तथा चुनावी राज्यों के किसानों से वोट की चोट देकर उसके ऊपर दबाव बढ़ाने की अपील करेगा, ताकि वह समझौते को लागू करने को मजबूर हो?

वैसे तो राकेश टिकैत के अनुसार आंदोलन से किसान 4 महीने की छुट्टी पर हैं, लेकिन वास्तविक जीवन में किसानों के लिए फिलहाल आराम हराम ही लगता है। किसान-विरोधी राज के खिलाफ जीवन-मरण संघर्ष में अपने ऐतिहासिक आंदोलन से किसानों ने जो नयी चेतना और जागृति हासिल की है, वह उन्हें तब तक चैन से नहीं बैठने देगी जब तक अपने हित में नीतियां बनाने वाली सरकार वे नहीं बनवा लेते। 

उनका पाला एक ऐसे प्रधानमंत्री से पड़ा है जो न सिर्फ उनके आंदोलन को कुचलने के लिए सारी सीमायें पार कर गया था, बल्कि इस समय जब उनका आंदोलन स्थगित है, तब भी उन्हें बदनाम करने के लिए अपनी जान के लिए खतरे जैसी भड़काऊ बयानबाजी करने में भी संकोच नहीं करता।

यह देखना सुखद था कि मोदी के बयान पर  पंजाब चुनाव को लेकर पैदा हुए मतभेदों से ऊपर उठते हुए पूरा संयुक्त मोर्चा फिर चट्टान की तरह एकताबद्ध हो गया। बलबीर सिंह राजेवाल और गुरनाम सिंह चढूनी समेत 9 मेम्बरी कमेटी के full panel ने अपने बयान में कहा," यह बहुत अफसोस की बात है कि अपनी रैली की विफलता को ढकने के लिए प्रधानमंत्री ने "किसी तरह जान बची" का बहाना लगाकर पंजाब प्रदेश और किसान आंदोलन दोनों को बदनाम करने की कोशिश की है।  संयुक्त किसान मोर्चा देश के प्रधानमंत्री से यह उम्मीद करता है कि वह अपने पद की गरिमा को ध्यान में रखते हुए ऐसे गैर जिम्मेदार बयान देने से बाज आएंगे। "

इसीलिए सच यही है कि राकेश टिकैत समेत कोई भी किसान नेता या कार्यकर्ता इस समय न छुट्टी मना रहा है, न आराम कर रहा। वे सब  दिल्ली का सेमी-फाइनल माने जा रहे  विधानसभा चुनावों में लगे हुए हैं, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष ढंग से। राकेश टिकैत के गृह-राज्य उत्तर प्रदेश में किसान-आंदोलन पहले ही डबल इंजन सरकार की विदाई की पटकथा लिख चुका है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सामाजिक-राजनीतिक समीकरणों को उलट-पुलट करते हुए किसान-आंदोलन ने ऐसे chain-reaction को trigger किया, जो अब अपने अंजाम की ओर बढ़ रहा है।

यह बेहतर होता कि संयुक्त किसान मोर्चा एकताबद्ध ढंग से चुनाव में अपने एजेंडा और कार्यक्रम के साथ हस्तक्षेप करता, जैसे उन्होंने पश्चिम बंगाल चुनाव में सफलतापूर्वक किया था। बहरहाल 3 कानूनों पर मोदी सरकार के पीछे हटने और समझौते के साथ आंदोलन स्थगित होने के कारण परिस्थिति में एक गुणात्मक बदलाव आ गया था। 

इस नई परिस्थिति में भी जरूरत यही थी कि मोर्चा नई एकताबद्ध रणनीति के साथ सामने आता, जिसमें अलग-अलग राज्यों की ठोस राजनीतिक स्थिति के अनुरूप अलग कार्यनीति भी हो सकती थी,  लेकिन चुनाव में हस्तक्षेप के प्रश्न पर मोर्चे के घटकों में गहरे मतभेद सामने आ गए, इसलिए वे चुनावी राज्यों में, विशेषकर आंदोलन के गढ़ पंजाब में किसी एक कार्यनीति पर आगे नहीं बढ़ सके।

पंजाब में भाजपा को शिकस्त देने की चुनौती तो थी नहीं, अन्य गैर-भाजपा राजनीतिक दल भी सुसंगत किसान-परस्त पार्टियां नहीं ही है, इस स्थिति में किसान संगठनों के एक हिस्से को यह लगा कि उन्हें आंदोलन की पूंजी का लाभ उठाते हुए राजनीतिक ताकत बनाने और सत्ता में हिस्सेदारी की ओर बढ़ना चाहिए, देविंदर शर्मा जैसे आंदोलन समर्थक कृषि-विशेषज्ञ भी किसानों की पार्टी की लगातार वकालत करते रहे हैं।

चुनाव में उतरने वाले सारे किसान-संगठन भी एक साथ नहीं है। हरियाणा के किसान नेता गुरुनाम सिंह चढूनी के संरक्षण में बना दल अकेले लड़ रहा है, जबकि बलबीर सिंह राजेवाल की सरपरस्ती में शुरू में 22 संगठन मिलकर संयुक्त समाज मोर्चा बनाये थे, लेकिन उनमें से कई अब उससे अलग हो गए हैं।

ऐसा लगता है कि ये कोई व्यवस्थित कार्यक्रम आधारित दल न होकर चुनाव लड़ने के इच्छुक संगठनों और नेताओं के तदर्थ मंच (platform) जैसे हैं, जाहिर है अस्थिरता और बिखराव इनके चरित्र और संरचना में निहित है। दरअसल, पंजाब के बड़े किसान संगठन- जोगिंदर उगराहा, डा. दर्शन पाल, दल्लेवाल जैसे नेता चुनाव की इस पूरी कवायद से अलग हैं।  

इसलिए पंजाब के मौजूदा राजनीतिक माहौल में चुनाव में उतर रहे किसान-संगठन अपने वोट और सीट के लिहाज से शायद ही  कोई खास छाप छोड़ पाएं, पर उनको मिलने वाले वोट सत्ता के उलट-फेर में भूमिका निभा सकते हैं।

जिन संगठनों के नेता चुनाव में जा रहे हैं, उन्हें निश्चय ही किसानी-लोकतन्त्र व देश बचाने के कार्यक्रम और सुस्पष्ट भाजपा विरोधी दिशा के साथ ही ऐसा करना चाहिए। साथ ही किसान-प्रश्न पर संदिग्ध (dubious ) साख वाले दलों के साथ चुनावी गठजोड़ से बचना चाहिए। तभी वे अपने ऐतिहासिक आंदोलन की भावना के साथ न्याय कर पाएंगे, अपनी किसान-हितैषी छवि को अक्षुण्ण रख पाएंगे और भविष्य में यही दिशा किसान-आंदोलन और उनके बीच सेतु बनाएगी।

किसान-आंदोलन का मूल सकारात्मक मुद्दा- किसानों की मेहनत और फसल की वाजिब कीमत (MSP ) का सवाल और स्वामीनाथन आयोग के C-2 फॉर्मूले के आधार पर मूल्य निर्धारण-अभी जस का तस है। यह साफ है कि मोदी सरकार इसे आसानी से स्वीकार करने वाली नहीं है।

सर्वोपरि हमारे राष्ट्रीय जीवन के एक नाजुक दौर में लोकतंत्र और देश को कारपोरेट-फासीवाद के शिकंजे से बचाने का जो ऐतिहासिक दायित्व किसान-आंदोलन ने अपने कंधे पर उठाया, वह भी अभी अधूरा है।

दल बनाकर चुनावी राजनीति में प्रवेश का कोई ऐसा फैसला जो आंदोलन के इन बड़े उद्देश्यों के साथ न्याय न कर सके, आंदोलन को नई ऊंचाई पर न ले जाये, वह निश्चय ही आत्मघाती और premature है। यह अतीत के उन आंदोलनों की श्रृंखला में एक बार फिर एक विराट सम्भावना की भ्रूण-हत्या जैसा होगा जो आधे रास्ते ही अपने महत्वाकांक्षी नेताओं की सत्ता-लिप्सा की बलि चढ़ गए।

सच यह है कि राजनैतिक अर्थतंत्र पर कब्जा जमाए वित्तीय पूँजी के धनकुबेर और कारपोरेट घराने तब तक हमारे लोकतंत्र को रौंदते रहेंगे तथा किसानों के श्रम  को लूटते रहेंगे और कृषि क्षेत्र पर नियंत्रण के लिए लगातार नए नए तरीके ईजाद करते रहेंगे, जब तक किसान मौजूदा सत्ता-संरचना और नीतिगत ढाँचे को नहीं बदल देते।  इसके लिए एक ओर किसानों को अपने आंदोलन को नई ऊंचाई पर ले जाना होगा, दूसरी ओर समाज  के अन्य मेहनतकश तबकों के साथ मिलकर राजनीतिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप करते हुए सत्ता को जनोन्मुख बनाना होगा।

जाहिर है किसानों को आंदोलन और राजनीति दोनों को साधना होगा, बेशक सही timing और रणनीति के साथ।

क्या आज की अहम बैठक में संयुक्त किसान मोर्चा  एक बार फिर अपने एजेंडा के आधार पर भाजपा को वोट की चोट देते हुए किसानों से मतदान की अपील करेगा? बैठक के फैसलों की ओर पूरे देश की निगाह रहेगी।

(लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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