NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
नौ महीने से चल रहे किसान आंदोलन की वे पांच विशेषताएं, जिनसे सरकार डरी हुई है!
इस किसान आंदोलन की विशेषता है कि ये अपने असली गुनहगारों को भलीभांति पहचानता है इसलिए इनके निशानों  में सिर्फ नेता ही नहीं हैं, अडानी के शोरूम और अम्बानी के पेट्रोल पम्प और संस्थान भी हैं। उन्हें पता है कि राक्षस की जान किस गिद्द में है।
बादल सरोज
24 Aug 2021
नौ महीने से चल रहे किसान आंदोलन की वे पांच विशेषताएं, जिनसे सरकार डरी हुई है!

26 अगस्त को नौ महीने पूरे कर रहे किसान आंदोलन को किसी परिचय या भूमिका की आवश्यकता नहीं है। यहां सीधे इसकी कुछ विशेषताओं पर आते हैं।  इस असाधारण किसान आन्दोलन की इन सबसे भी कहीं ज्यादा बुनियादी और दूरगामी छाप छोड़ने वाली विशेषतायें पाँच हैं।  

पहली है इस लड़ाई का नीतिगत सवालों पर पूरी तरह से स्पष्ट होना। आम किसान से लेकर नेताओं तक हरेक की जुबान पर एक ही बात है, खरीद मेंकॉर्पोरेट, खेती में ठेका और उपज की जमाखोरी कालाबाजारी वाले तीनो कृषि कानूनों और बिजली संबंधी प्रस्तावित क़ानून की पूरी तरह से वापसी। उनकी पक्की राय है कि ये सिर्फ किसानो का नहीं भारत की जनता का सर्वनाश करने  वाले क़ानून हैं और चूँकि जिंदगी और मौत के बीच कोई बीच का रास्ता नहीं होता, इसलिए इनकी वापसी के अलावा कोई बीच का रास्ता नहीं है। इसके साथ उनकी मांग है न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के आधार पर निर्धारित करना और उसे कानूनी दर्जा देकर, उससे कम पर खरीदना दंडनीय अपराध बनाना। इन मांगो पर उनकी जानकारियां एकदम अपडेटेड हैं जिन्हे वे गजब की सरलता से बताते भी हैं। ध्यान देने की बात है कि यह माँगे नहीं हैं - ये नवउदारीकरण के अश्वमेध यज्ञ के घोड़े की नकेल पकड़ उसे पीछे लौटाने जैसी बात है। नीतियों को उलटने और देश की जरूरत के हिसाब से नीतियां बनवाने की बात है।

दूसरी यह कि वे असली गुनहगारों को भी भलीभाँति पहचानते हैं इसलिए उनके आंदोलन के निशानों  में सिर्फ चिरकुट नेता नहीं हैं।  अडानी के शोरूम और अम्बानी के पेट्रोल पम्प और संस्थान हैं। उन्हें पता है कि राक्षस की जान किस गिद्द में है।  दिल्ली चलो में भी वे कॉर्पोरेट नियंत्रित मोदी के गोदी मीडिया से बात तक नहीं कर रहे हैं। उसे अपने घेराव के डेरों में आने नहीं दे रहे हैं। देश भर में एक डेढ़ लाख से ज्यादा जगहों पर इस तिकड़ी - मोदी, अडानी, अम्बानी के पुतले फूंके गए। आंदोलन के हर आह्वान का निशाना कॉर्पोरेट रहा। यह हालिया दौर के संघर्षों के हिसाब से बहुत नयी और साहसी बात है। 

तीसरी असाधारणता है हुक्मरान भाजपा-आरएसएस जिसे अपना ब्रह्मास्त्र मानती है उस धर्माधारित साम्प्रदायिक विभाजन के मामले में पूरी तरह स्पष्ट होना। छहों सीमाओं पर और उनके समर्थन में देश भर में  चलने वाली सभाओं में तकरीबन हर वक्ता किसानो की मुश्किलों और इन तीन चार कानूनों पर अपनी बात कहने के साथ ही भाजपा और मोदी के विभाजनकारी एजेंडे का पर्दाफ़ाश जरूर करता है। उसे समझने की जरूरत पर जोर देता है और सभी धर्मों को मानने वालों से इस साजिश को समझने की अपील करता है। जिन्होंने पहले कभी इन दुष्टों की संगत की थी वे अब बाकायदा माफियां मांगते हैं और भविष्य में ऐसा न करने की कसम खाते घूम रहे हैं। सिर्फ कहने में ही नहीं बरतने में भी यही सदभाव और सौहार्द्र नजर आता है। हिन्दू, मुस्लिम, सिख मिलकर लंगर चलाते हुए साफ़ नजर आते हैं। इस तरह यह संघर्ष बिना किसी सैध्दांतिक सूत्रीकरण में जाए ही साम्प्रदायिकता के जहर के उतार की दवाई भी दे रहा है और बिना किसी अतिरंजना के कहा जा सकता है कि आज के समय में यह एक बड़ी बात है।  

जन के विभाजन का एक और रूप जातिगत ऊँच-नीच की जीवित सलामत बजबजाती कीच  है।  इस आंदोलन ने कम से कम दिल्ली की सीमाओं पर तथा स्थानीय लामबन्दियों में इसे शिथिल होते हुए देखा है। आंदोलन के नेताओं के भाषणों में यह मुद्दा बना है। इस मामले में दिल्ली की सीमाओं पर बसे प्रदेशों के गाँवों की दशा को देखते हुए यह काफी उल्लेखनीय बात है।  

चौथी और सबसे नुमाया खूबी है इसकी जबरदस्त चट्टानी एकता। मंदसौर गोलीकाण्ड के बाद लगातार संघर्षरत करीब ढाई सौ संगठनो वाली अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (एआईकेएससीसी) इसकी धुरी है। पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश की अलग-अलग किसान यूनियन और राष्ट्रीय किसान महासंघ इसके साझे मोर्चे में हैं। अलग अलग विचारधाराओं और नेताओं के आग्रहों के बावजूद इस लड़ाई के मामले में एकजुटता में ज़रा सी भी कसर नहीं है। यह एकता रातोंरात नहीं बनी। इसके पीछे जहां कृषि संकट की भयावहता और कार्पोरेटी हिन्दुत्व वाली सरकार की निर्लज्ज नीतियों को तेजी से लागू करने की हठधर्मिता से उपजी वस्तुगत (ऑब्जेक्टिव) परिस्थितियाँ हैं तो वहीं इनके खिलाफ आक्रोश को आकार देने के लिए, सबको जोड़ने की अखिल भारतीय किसान सभा और उसकी ओर से उसके महासचिव हन्नान मौल्ला  द्वारा धीरज के साथ की गयी कोशिशें हैं और नाशिक से मुम्बई तक किसान सभा के पैदल मार्च और राजस्थान के किसान आन्दोलन से बना असर भी है। ऐसी एकता बनाना कम मुश्किल नहीं है मगर उसे चलाना और बनाये रखना और भी कठिन है। इन 200 दिनों ने इन सारी मुश्किलों और कठिनाईयों को आसानी के साथ निबाहते हुए ऐसी स्थिति पैदा कर दी है कि अब एकाध-दो के इधर-उधर विचलन के बाद भी किसान नहीं डिगने वाला। 

यही एकता इस आंदोलन के मंच - संयुक्त किसान मोर्चा के किये आह्वानों के साथ हो रही लामबंदी के रूप में दिखती है।  मेहनतकश संगठनों की ऊपर कही जा चुकी बात, अलग भी रख दें तो हाल के दौर में यह पहला मौक़ा था जब 24 विपक्षी दल इकठ्ठा होकर भारत बंद के समर्थन में उतरे। 

पांचवी विशेषता है इसकी राजनीतिक सर्वानुमति है जिसका घोषित एकमात्र उद्देश्य है कॉर्पोरेट परस्त किसान विरोधी मोदी सरकार को हटाना, भाजपा को हराना। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में यह अभियान चलाया जा चुका है और मिशन उत्तरप्रदेश-उत्तराखंड के नाम पर इसका आगाज़ 5 सितम्बर को मुज़फ्फरनगर से होने वाला है। तिकड़मों के बादशाहों, थैलियों के भामाशाहो और सीबीआई ईडी के घोड़ों पर सवार नादिरशाहों की हुकूमत के खिलाफ यह कम बड़ी बात नहीं है। यही संकल्पबध्दता है जिसने देश की 19 राजनीतिक पार्टियों को इसकी मांगों के समर्थन में सड़कों पर उतरने की प्रेरणा दी है। एनडीए में शामिल कई दल भी किसानो के पक्ष में बोलने के लिए मजबूर हुए।

उत्तरकांड

एक आम सवाल यह पूछा जाता है कि आखिर कब तक चलेगा यह आंदोलन ? यह हमदर्दों और शुभाकांक्षियों का प्रश्न है इसलिए इसे संज्ञान में लिया जाना चाहिए। 

पंजाब से शुरू हुए इस आंदोलन का जल्दी ही हरियाणा और पश्चिमी उत्तरप्रदेश में असरदार हो जाना पुरानी बात हो गयी। यह स्वाभाविक था। ये वे इलाके हैं जहां कृषि अपेक्षाकृत विकसित है और तीन चौथाई सरकारी खरीद यहीं से होती है। किन्तु इस बीच यह देश के बाकी प्रदेशों में भी पहुँच चुका है। जिन प्रदेशों में एमएसपी पर खरीद का सरकारी ढाँचा तकरीबन है ही नहीं, वहां भी इसकी धमक सुनाई दे रही है। व्यापकता और विस्तार के ये आयाम दिल्ली बॉर्डर पर डटे किसानों की ताकत और हौंसला बढ़ाने वाले हैं। 

दूसरी और तीसरी पारस्परिक संबध्द अहम् बातें है इस आंदोलन से बना माहौल और इसके नेतृत्व का राजनीतिक हस्तक्षेप का महत्त्व समझना, बेझिझक उसे करना। जो किसानों की मांगों और आंदोलन से सहमत नहीं है उनका भी मानना है कि इस संघर्ष ने देश के 90 फीसदी किसानो के मन में यह बात बिठा दी है कि ये क़ानून उसके खिलाफ हैं और यह भी कि नरेंद्र मोदी किसान विरोधी हैं। हाल में हुए 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों और उसके थोड़े से पहले हुए पंजाब, उत्तर प्रदेश और केरल के स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा का सूपड़ा साफ़ होना इस आंदोलन से बने प्रभाव का नतीजा है। संयुक्त किसान मोर्चे द्वारा अगली वर्ष होने वाले चुनावों के मद्देनजर "मिशन उत्तरप्रदेश - उत्तराखण्ड" का एलान किया जा चुका है। अब बात निकल ही चुकी है तो उसका दूर तक जाना तय है।

लेखक लोकजतन के सम्पादक हैं और अखिल भारतीय किसान सभा से जुड़े हुए हैं

farmers protest
New Farm Laws
kisan andolan
MSP
Narendra modi
Modi government
rakesh tikait
Samyukt Kisan Morcha

Related Stories

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"

दलितों पर बढ़ते अत्याचार, मोदी सरकार का न्यू नॉर्मल!

राम सेना और बजरंग दल को आतंकी संगठन घोषित करने की किसान संगठनों की मांग

विशाखापट्टनम इस्पात संयंत्र के निजीकरण के खिलाफ़ श्रमिकों का संघर्ष जारी, 15 महीने से कर रहे प्रदर्शन

आईपीओ लॉन्च के विरोध में एलआईसी कर्मचारियों ने की हड़ताल

सार्वजनिक संपदा को बचाने के लिए पूर्वांचल में दूसरे दिन भी सड़क पर उतरे श्रमिक और बैंक-बीमा कर्मचारी

झारखंड: केंद्र सरकार की मज़दूर-विरोधी नीतियों और निजीकरण के ख़िलाफ़ मज़दूर-कर्मचारी सड़कों पर उतरे!

दो दिवसीय देशव्यापी हड़ताल को मिला व्यापक जनसमर्थन, मज़दूरों के साथ किसान-छात्र-महिलाओं ने भी किया प्रदर्शन

देशव्यापी हड़ताल का दूसरा दिन, जगह-जगह धरना-प्रदर्शन


बाकी खबरें

  • Modi yogi
    अजय कुमार
    आर्थिक मोर्चे पर फ़ेल भाजपा को बार-बार क्यों मिल रहे हैं वोट? 
    14 Mar 2022
    आख़िर किस तरह के झूठ का जाल भाजपा 24 घंटे लोगों के बीच फेंकने काम करती है? जिससे आर्थिक रूप से कमजोर होते जा रहे राज्यों में भी उसकी सरकार बार बार आ रही है। 
  • रवि शंकर दुबे
    पांचों राज्य में मुंह के बल गिरी कांग्रेस अब कैसे उठेगी?
    14 Mar 2022
    मैदान से लेकर पहाड़ तक करारी शिकस्त झेलने के बाद कांग्रेस पार्टी में लगातार मंथन चल रहा है, ऐसे में देखना होगा कि बुरी तरह से लड़खड़ा चुकी कांग्रेस गुजरात, हिमाचल और फिर 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए…
  • अजय गुदावर्ती
    गुजरात और हिंदुत्व की राजनीतिक अर्थव्यवस्था
    14 Mar 2022
    एक नई किताब औद्योगिक गुजरात में सांप्रदायिकता की राजनीतिक अर्थव्यवस्था की परख करती है। इससे मिली अंतर्दृष्टि से यह समझने में मदद मिलती है कि हिंदुत्व गुजरात की अपेक्षा अविकसित उत्तर प्रदेश में कैसे…
  • abhisar sharma
    न्यूज़क्लिक टीम
    कानून का उल्लंघन कर फेसबुक ने चुनावी प्रचार में भाजपा की मदद की?
    14 Mar 2022
    न्यूज़चक्र के इस एपिसोड में आज वरिष्ठ पत्रकार बात कर रहे हैं एक न्यूज़ एजेंसी के द्वारा की गयी पड़ताल से ये सामने आया है की Facebook ने हमेशा चुनाव के दौरान BJP के पक्ष में ही प्रचार किया है। देखें…
  • misbehaved with tribal girls
    सोनिया यादव
    मध्य प्रदेश : मर्दों के झुंड ने खुलेआम आदिवासी लड़कियों के साथ की बदतमीज़ी, क़ानून व्यवस्था पर फिर उठे सवाल
    14 Mar 2022
    मध्य प्रदेश बाल अपराध और आदिवासियों के साथ होने वाले अत्याचार के मामले में नंबर एक पर है। वहीं महिला अपराधों के आंकड़ों को देखें तो यहां हर रोज़ 6 महिलाओं के साथ बलात्कार हो रहा है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License