NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
बिहार विधानसभा चुनाव के पांच अहम सबक़
इस चुनाव में बिहार की जनता ने भी लगभग सभी सियासी दलों को एक संदेश दिया है जो आगामी दिनों में प्रदेश और देश की राह तय करेंगे। चुनाव में जीत हार से परे इस सबक़ को हम सबको जानना चाहिए।
अमित सिंह
16 Nov 2020
बिहार विधानसभा चुनाव के पांच अहम सबक़
Image courtesy: Veekeez

बिहार चुनाव में एनडीए की जीत के बाद नीतीश कुमार के नेतृत्व में एक बार फिर सरकार बनी है। हालांकि, इस चुनाव में बीजेपी ने जेडीयू से ज्यादा सीटें हासिल कीं, बावजूद इसके उन्होंने मुख्यमंत्री का पद नीतीश कुमार को ही दिया है।

गौरतलब है कि बिहार विधानसभा की 243 सीटों पर हुए चुनाव में एनडीए ने 125 सीटें हासिल कर पूर्ण बहुमत प्राप्‍त कर लिया है। विपक्षी महागठबंधन को इस चुनाव में 110 सीटें हासिल हुई हैं। अंतिम तौर पर घोषित नतीजों में भाजपा को 74, जदयू को 43, राजद को 75, कांग्रेस को 19 सीटें प्राप्‍त हुई हैं। वाम दलों को 16 सीटें गई हैं।

इस चुनाव में बिहार की जनता ने भी लगभग सभी सियासी दलों को एक संदेश दिया है जो आगामी दिनों में प्रदेश और देश की राह तय करेंगे। चुनाव में जीत हार से परे इस सबक़ को हम सबको जानना चाहिए।

कमज़ोर नीतीश युग की शुरुआत

नीतीश कुमार लगातार भले ही चौथे कार्यकाल के लिए राज्य के मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं लेकिन एनडीए में उनका पहले वाला रुतबा नहीं रहा। उनकी पार्टी बीजेपी से छोटी पार्टी हो गई है। साथ ही यह बात भी किसी से छिपी नहीं है कि यह उनका आखिरी कार्यकाल है। नीतीश कुमार ने कहा कि वे चाहते थे कि भाजपा का मुख्यमंत्री बने पर भाजपा के कहने पर मुख्यमंत्री बन रहे हैं। जाहिर है कि यह बयान उनकी ताकत का नहीं मजबूरी का अहसास कराता है।

बता दें कि नीतीश कुमार बिहार और भारत की राजनीति में एक विशिष्ट स्थान रखते हैं। लंबे समय से राजनीति में रहने के बावजूद उन्होंने अपनी छवि पढ़े लिखे, भ्रष्टाचार से मुक्त और अच्छे प्रशासक की बनाई है। पिछड़ा वर्ग से ताल्लुक रखने वाले नीतीश को सुशासन बाबू का खिताब भी जनता से मिला है। लेकिन पिछले पांच साल के कार्यकाल में उनके सुशासन की चमक फीकी पड़ गई।

इसके चलते बिहार के मतादाताओं ने उनका कद घटा दिया है। इशारा साफ है कि उन पर पहले जैसा भरोसा नहीं रहा।

सुशील मोदी का जाना और भविष्य की तैयारी

भाजपा ने बदलाव की ओर पहला कदम बढ़ाते हुए सुशील मोदी की बजाय तारकिशोर प्रसाद को विधानमंडल दल का नेता और रेणु कुमारी को उपनेता बनाया है। ऐसे में सुशील मोदी का हटना नीतीश कुमार के लिए भी संदेश है कि गठबंधन में उनके एकाधिकार का युग समाप्त हो गया है।

साथ ही भाजपा ने नया नेता चुनकर बदलाव और भविष्य का तैयारी का साफ संदेश दिया है। इसके लिए भाजपा ने सामाजिक समीकरण का भी ध्यान रखा है। 74 सीटें जीतने के बाद भाजपा जिस तरह से अपने पत्ते खेल रही है उससे साफ है कि वह सिर्फ इतने से ही संतुष्ट नहीं होने वाली है।

वह आगामी चुनावों के लिए अभी से मैदान तैयार करने लगी है। मोदी शाह के नेतृत्व वाले बीजेपी की यही खासियत उसे दूसरों से अलग बना रही है। वह ऐसा खेल कर रहे हैं कि जनता कनफ्यूज हो रही है। बिहार चुनाव कवर कर रहे ज्यादातर पत्रकारों का यह मानना था कि सत्ता विरोधी लहर नीतीश के लिए है, उसकी सहयोगी बीजेपी पर इसका असर कम है।

तेजस्वी रहे मैन ऑफ द मैच

तमाम आलोचनाओं और कमियों के बावजूद इस पूरे बिहार चुनाव के मैन ऑफ द मैच तेजस्वी यादव रहे हैं। बिहार के जनता ने इस युवा नेता पर भरोसा जताया है। उनकी पार्टी इस चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। उनके गठबंधन को चुनावों में भले ही जीत न मिली हो लेकिन तेजस्वी ने यह दिखा दिया है कि जनता अब भी विकल्पहीनता की शिकार नहीं है।

एनडीए गठबंधन के तमाम दांव पेंच, संसाधनों और लोकलुभावन योजनाओं के बीच युवा तेजस्वी को इतना वोट मिलना मायने रखता है। गठबंधन को लेकर भी उनकी सूझबूझ का लोहा इस बार सबने माना है। अपने पिता की अनुपस्थिति में उन्होंने एक लंबी लड़ाई लड़ी और बिहार की जनता ने इसमें उनका पूरा साथ दिया है।

तेजस्वी के इस प्रदर्शन ने दूसरे तमाम राज्यों के उन क्षेत्रीय दलों में उत्साह भरने का काम किया है जो कही न कही बीजेपी के उभार के बाद हाशिए में चले गए हैं। आगामी पांच साल तेजस्वी के पास एक बहुत ही परिपक्व राजनेता के रूप में उभरने का मौका है। उन्हें बस ध्यान यह रखना है कि जनता से जुड़े रहना है।

'डार्क हॉर्स' का ख़िताब वाम दलों को

बिहार में चुनावी हाशिये पर रहे वामपंथी दलों ने 16 सीटों पर जीत हासिल कर लंबे समय बाद वापसी की है। क्रमश: छह और चार सीटों पर चुनाव लड़ने वाली भाकपा और माकपा ने दो-दो सीटें जीती हैं। भाकपा (माले) ने 19 सीटों पर चुनाव लड़कर 12 सीटों पर जीत हासिल की है।  

वाम दलों के विपक्षी महागठबंधन को भले ही सत्ता हासिल नहीं हुई हो लेकिन भाकपा, माकपा, भाकपा माले इस विधानसभा चुनावों में सबसे ज्यादा फायदे में रहने वाली पार्टियों के तौर पर उभरी हैं। अब इस प्रदर्शन के कारणों को लेकर जानकारों में तमाम तरह के मतभेद हो सकते हैं लेकिन इसका एक बड़ा कारण जमीनी स्तर पर मौजूदगी है, इससे किसी को इंकार नहीं है।

पिछले कई चुनावों से मिल रही विफलताओं से घबराए बिना भी लगातार आंदोलनों, प्रदर्शनों के जरिये मजदूरों और शोषितों की आवाज उठाने का नतीजा सीटों के रूप में इस चुनाव में दिखा है। साथ ही वाम दलों ने इस बार बिहार के विशिष्ट सामाजिक-राजनीतिक ताने-बाने को गहराई से समझने की कोशिश की जिसने इस परिणाम को संभव बनाया है। वाम दलों की यह सफलता दिखाती है कि जनता के बीच में रहना हमेशा ही आपके लिए फायदेमंद रहता है। उन्हें इस चुनाव के फार्मूले को दूसरे राज्यों में भी अप्लाई करना होगा।

कांग्रेस को करना होगा विचार

बिहार विधानसभा चुनाव में सबसे लचर प्रदर्शन कांग्रेस का रहा है। बिहार में महागठबंधन सत्‍ता से महज कुछ सीट दूर रह गया। कांग्रेस 70 सीट पर चुनाव लड़ी थी और उसे सिर्फ 19 सीटों पर ही कामयाबी मिली है।

उसके इस प्रदर्शन के बाद तारिक अनवर, कपिल सिब्बल जैसे पार्टी के नेता और शिवानंद तिवारी जैसे साथी दलों के नेता सवाल उठा रहे हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने कांग्रेस नेतृत्व की आलोचना करते हुए पार्टी में अनुभवी ज्ञान रखने वाला, सांगठनिक स्तर पर अनुभवी और राजनीतिक हकीकत को समझने वाले लोगों को आगे लाने की मांग की है। पार्टी नेतृत्व पर बिना लागलपेट के आलोचना करते हुए सिब्बल ने कहा कि आत्मचिंतन का समय खत्म हो गया है।

गौरतलब है कि कांग्रेस की इस तरह की आलोचना लंबे समय से हो रही है। बिहार चुनाव में मिले संदेश ने इसे और भी स्पष्ट किया है। निसंदेह तमाम आलोचनाओं से परे कांग्रेस को आत्ममंथन करना चाहिए।

Bihar Elections 2020
Bihar Election Results
Nitish Kumar
NDA Government
Tejashwi Yadav
RJD
mahagathbandhan
sushil modi

Related Stories

बिहार: पांच लोगों की हत्या या आत्महत्या? क़र्ज़ में डूबा था परिवार

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बिहार : दृष्टिबाधित ग़रीब विधवा महिला का भी राशन कार्ड रद्द किया गया

बिहार : नीतीश सरकार के ‘बुलडोज़र राज’ के खिलाफ गरीबों ने खोला मोर्चा!   

बिहार : सरकारी प्राइमरी स्कूलों के 1.10 करोड़ बच्चों के पास किताबें नहीं

सवर्णों के साथ मिलकर मलाई खाने की चाहत बहुजनों की राजनीति को खत्म कर देगी

बिहार : गेहूं की धीमी सरकारी ख़रीद से किसान परेशान, कम क़ीमत में बिचौलियों को बेचने पर मजबूर

तेजप्रताप यादव की “स्टाइल ऑफ पॉलिटिक्स” महज मज़ाक नहीं...

बिहारः मुज़फ़्फ़रपुर में अब डायरिया से 300 से अधिक बच्चे बीमार, शहर के विभिन्न अस्पतालों में भर्ती

कहीं 'खुल' तो नहीं गया बिहार का डबल इंजन...


बाकी खबरें

  • covid
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 2,568 नए मामले, 97 मरीज़ों की मौत 
    15 Mar 2022
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 0.08 फ़ीसदी यानी 33 हज़ार 917 हो गयी है।
  • tree
    श्रुति एमडी
    तमिलनाडु के चाय बागान श्रमिकों को अच्छी चाय का एक प्याला भी मयस्सर नहीं
    15 Mar 2022
    मामूली वेतन, वन्यजीवों के हमलों, ख़राब स्वास्थ्य सुविधाओं और अन्य कारणों ने बड़ी संख्या में चाय बागान श्रमिकों को काम छोड़ने और मैदानी इलाक़ों में पलायन करने पर मजबूर कर दिया है।
  • नतालिया मार्क्वेस
    अमेरिका में रूस विरोधी उन्माद: किसका हित सध रहा है?
    15 Mar 2022
    संयुक्त राज्य अमेरिका का अपनी कार्रवाइयों के सिलसिले में सहमति बनाने को लेकर युद्ध उन्माद की आड़ में चालू पूर्वाग्रहों को बढ़ाने का एक लंबा इतिहास रहा है।
  • डॉ. राजू पाण्डेय
    डिजिटल फाइनेंस: कैशलेस होती दुनिया में बढ़ते फ़्रॉड, मुश्किलें भी आसानी भी..
    15 Mar 2022
    हर साल 15 मार्च के दिन विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस मनाया जाता है। इस वर्ष कंज़्यूमर इंटरनेशनल के 100 देशों में फैले हुए 200 कंज़्यूमर समूहों ने "फेयर डिजिटल फाइनेंस" को विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस की थीम…
  •  Scheme Workers
    न्यूज़क्लिक टीम
    क्यों आंदोलन की राह पर हैं स्कीम वर्कर्स?
    14 Mar 2022
    हज़ारों की संख्या में स्कीम वर्कर्स 15 मार्च यानि कल संसद मार्च करेंगी। आखिर क्यों हैं वे आंदोलनरत ? जानने के लिए न्यूज़क्लिक ने बात की AR Sindhu से।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License