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भारत
राजनीति
दिल्ली में महिलाओं को मुफ़्त बस यात्रा स्वागत योग्य, लेकिन कर्मचारियों पर कौन ध्यान देगा?
जहां केजरीवाल सरकार बसों को अधिक सुलभ बनाने के लिए सराहना की पात्र है, वहीं सरकार ने बीमार पड़े सार्वजनिक परिवहन के अन्य मोर्चों पर अपनी आंखें बंद कर रखी हैं।
मुकुंद झा
30 Oct 2019
DTC
Image courtesy: Hindustan Times

दिल्ली की सार्वजनिक बसों में महिलाओं के लिए मुफ्त यात्रा योजना भाई दूज के दिन मंगलवार से शुरू हो गई। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इस अवसर पर कहा कि महिला सुरक्षा, सशक्तिकरण और अर्थव्यवस्था में महिलाओं की हिस्सेदारी को बढ़ाने की ओर यह एक ऐतिहासिक कदम है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने जून में किए गए वादे को पूरा करते हुए, महिलाओं के लिए योजना की घोषणा करते हुए कहा कि मुफ्त सवारी योजना को वरिष्ठ नागरिकों और सभी छात्रों को भी शमिल किया जा सकता है।

यह एक स्वागतयोग्य कदम है, यह देखते हुए कि यह निर्णय महिलाओं के लिए सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देगा। जो कुल 45 लाख दैनिक बस सवारी का   लगभग एक तिहाई हैं।  

हालांकि,  सार्वजनिक परिवहन को सफल तभी कहा जा सकता है जब वो अपने सेवा-उन्मुख उद्देश्य को प्राथमिकता देती हो। इसलिए केजरीवाल सरकार बसों को अधिक सुलभ बनाने के लिए सराहना की पात्र है, लेकिन सरकार ने बीमार पड़े सार्वजनिक परिवहन के अन्य मोर्चों पर अपनी आंखें बंद कर रखी हैं।
 
अगर हम किसी DTC या क्लस्टर-स्कीम बस में जाते हैं, दोनों ही अपने पीक समय पर बुरी तरह भरी होती हैं। यह परिवहन सेवा की बदहाल स्थिति को बताती है। क्योंकि लगातर बढ़ती आबादी के अनुपात में बसों की संख्या काफी कम है। सार्वजनिक बसों का बेड़ा संकुचित हुआ है ।

इस बात को सरकारी आकड़े भी गवाही देते हैं। इस वर्ष जून में दिल्ली के पहले जारी बजट के अनुसार ,वर्ष 2017-18 में डीटीसी बसों की संख्या 3,974 थी। केजरीवाल सरकार द्वारा निर्धारित लक्ष्य को 2018-2019 तक 4,176 तक बढ़ाना था। हालांकि, लक्ष्य के विपरीत, वास्तव में संख्या घटकर 3,897 रह गई। क्लस्टर-स्कीम बसों (आमतौर पर ऑरेंज बसों के रूप में पहचाने जाती हैं) के बेड़े के लक्ष्य भी हासिल नहीं कर पाई थी। 2018-19 में बेड़े का आकार बढ़ाकर 2,758 करने का लक्ष्य रखा गया था, हालांकि उसी वर्ष सड़क पर केवल 1,679 बसें ही चल सकी थी।

इसका अर्थ यह है की सरकार ने महिला यात्रियों को मुफ्त-सवारी योजना के माध्यम से जो आमंत्रण दिया है उसके लिए क्या बस सेवा तैयार है ? क्योंकि वर्तमान स्थति में नए यात्रियों को समायोजित करना मुश्किल है।

इससे निपटने के लिए सरकार ने अतिरिक्त 5,000 बसों को चलाने की घोषणा की है, जो अपने आप में पर्याप्त नहीं है, इससे भी आगे कि अभी केवल एक हज़ार बसों की खरीद की गई है। यही नहीं हाल के दिनों में केवल ऑरेंज बसों की खरीद की गई है,जिसका मतलब है कि बसों का संचालन दिल्ली  इंटीग्रेटेड मल्टी मोडल सिस्टम (DIMTS)  के तहत किया जाएगा। जो  दिल्ली सरकार के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (GNCTD) और IDFC फ़ाउंडेशन के बीच एक संयुक्त उद्यम कंपनी है।

जिसमें दिल्ली सरकार 49.99 फीसदी शेयर  रखती है। यह एक निजी कंपनी बन गई है। DIMTS परियोजनाएं पर पूर्व में भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने भी सवाल खड़े किये। इस जांच ने निजी कंपनी को "विशेष उपचार" यानी फायदा पहुंचने की ओर इशारा किया है। जो मानदंडों का उल्लंघन करते हैं ।

कर्मचारियों का ठेकाकरण दिल्ली की बस परिवहन सेवा की सबसे बड़ी चिंताओं में से एक है। दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) द्वारा वर्तमान में काम कर रहे 35,000 श्रमिकों में से एक मोटे अनुमान के अनुसार लगभग 15,000,  अनुबंध के आधार पर काम कर रहे हैं। क्लस्टर-स्कीम डीआईएमटीएस बसों की बात करें तो लगभग सभी श्रमिक ठेका मजदूर हैं। 

जिनको प्रति किलोमीटर के मुताबिक वेतन मिलता है,जो समान काम के समान वेतन का उल्लंघन हैं। वो भी उन्हें नियमित नहीं मिलता हैं।  इसके आलावा उन्हें  किसी भी तरह की  सामाजिक  सुरक्षा नहीं मिलती हैं।  यह ध्यान देने वाली बात है  कि  महिला श्रमिकों के लिए भी स्थिति अलग नहीं है।

डीटीसी वर्कर्स यूनिटी सेंटर  ने श्रमिकों की मांगों को लेकर कई बार प्रदर्शन किये , हालांकि उनकी समस्याओ का हल अभी तक नहीं हुआ हैं।

डीटीसी वर्कर्स यूनिटी सेंटर के महासचिव राजेश कुमार ने कहा, "पिछले दिल्ली विधानसभा चुनावों के दौरान, केजरीवाल सरकार ने समान काम के लिए समान वेतन का वादा किया था। हालांकि, अभी भी नौकरियों का नियमितीकरण हजारों सार्वजनिक बस कर्मचारियों के लिए एक दूर की कौड़ी है, अभी तो उन्हें समय पर वेतन ही नहीं मिल रहा है। "

यूनियन ने केजरीवाल सरकार के खिलाफ  दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। जहाँ उन्हें उम्मीद है कि उन्हें राहत मिलेगी।

जुलाई 2007 में DIMTS  के तहत क्लस्टर-स्कीम बसों की शुरुआत की गई थी।  जो दिल्ली में निजी  बसों के कारपोरेटीकरण के लिए किया गया था। जिसमें सिर्फ   श्रमिकों के  काम करने की स्थिति को और बदतर किया हैं। केजरीवाल सरकार ने केवल सार्वजनिक परिवहन के 'निजीकरण' को आगे बढ़ाने में पिछली सरकारों की योजना को और तेज़ किया हैं। सरकार ने 1,000 नई क्लस्टर बसों की खरीद की है, जबकि यूनियन  के अनुसार, कॉमनवेल्थ गेम्स के बाद से दिल्ली सरकार के डीटीसी में एक भी बस नहीं जोड़ी गई है।

2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले मुफ़्त सवारी के वादे को पूरा करने के साथ, केजरीवाल सरकार ने सर्वजनिक परिवहन के बेहतरी के लिए एक कदम आगे बढ़ाया है। अब यह देखना है  कि क्या कोई और कदम भी इसके आगे है या नहीं।  अगर है तो क्या उसमे राजधानी की बस सेवा के हजारों श्रमिकों की नौकरियों को नियमित करना शामिल है। 

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