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तीन प्रमुख नीतियों पर बार-बार बदलते रुख से बिगड़ गये कोविड-19 के हालात
कम से कम तीन बड़े नीतिगत निर्णय ऐसे रहे हैं जिन्हें लागू करने या उसमें बदलाव पर हमेशा सवाल उठेंगे। ये हैं- टेस्टिंग, लॉकडाउन और अनलॉक और प्रवासी मज़दूर। इन तीनों ही मसलों पर केंद्र सरकार की नीतियां ढुलमुल दिखीं हैं, जिसका ख़ामियाज़ा देश को उठाना पड़ा है।
प्रेम कुमार
16 Jun 2020
कोविड-19
Image courtesy: The Economic Times

कोरोना वायरस (कोविड-19) संक्रमण में नकारात्मक अग्रता भारत ने हासिल की है और अब हम इस बीमारी में दुनिया में चौथे नंबर पर और एशिया में पहले नंबर पर पहुंच गए हैं। दुनिया में सबसे सख्त लॉकडाउन में जाने के बावजूद यह स्थिति तब आयी है जब लॉकडाउन के फेज से भारत निकलने की कोशिशों में जुटा हुआ है। इसी विडंबना में कोरोना से लड़ने की नीति में बड़ी खोट छिपी है।

कम से कम तीन बड़े नीतिगत निर्णय ऐसे रहे हैं जिन्हें लागू करने या उसमें बदलाव पर हमेशा सवाल उठेंगे। ये हैं-

  • ·          टेस्टिंग
  • ·          लॉकडाउन और अनलॉक
  • ·          और प्रवासी मज़दूर

इन तीनों ही मसलों पर केंद्र सरकार की नीतियां ढुलमुल दिखीं हैं, जिसका ख़ामियाज़ा देश को उठाना पड़ा है।

ख़तरनाक तरीके से बदलती रही टेस्टिंग पॉलिसी

14 जून को कोविड-19 के लिए रैपिड एंटीजेन डिटेक्शन टेस्ट के लिए आईसीएमआर की एडवाइजरी आयी है। यह नयी तकनीक है और इसमें कम समय में अधिक से अधिक लोगों का टेस्ट हो सकेगा। इसके तहत दो टेस्ट हैं। एक टेस्ट निगेटिव आने पर दूसरा टेस्ट होगा। पॉजिटिव आने पर दूसरा टेस्ट नहीं होगा। ताजा आदेश में टेस्टिंग का दायरा बढ़ा दिया गया है। यानी 18 मई को जो टेस्टिंग की पॉलिसी थी उसे बदल दिया गया।

अब बगैर लक्षण वाले संभावित कोविड मरीजों की भी जांच होगी। सर्दी, खांसी, बुखार, सांस लेने में तकलीफ आदि की शिकायत करने वाले लोगों को एक बार फिर इस दायरे में रखा गया है। ऐसा तब किया गया है जब दिल्ली में कोरोना संक्रमण की लगातार बढ़ती संख्या ने सुप्रीम कोर्ट को संज्ञान लेने पर मजबूर कर दिया। गृहमंत्रालय ने दिल्ली सरकार और दिल्ली के एलजी के साथ बैठक की और कई फैसलों में एक बड़ा फैसला टेस्टिंग बढ़ाने का था।

17 मार्च और 20 मार्च तक टेस्टिंग की जो पॉलिसी थी उसमें विदेश यात्रा, विदेशियों से संपर्क, कोविड संक्रमित की चेन में शामिल होना, हेल्थ वर्कर होना जैसी स्थितियां शामिल थीं। 9 अप्रैल आते-आते तक टेस्टिंग के दायरे में अधिक से अधिक लोगों को लाने की पॉलिसी हो गयी। इसकी वजह थी कि लगातार बगैर लक्षणों वाले कोरोना संक्रमित मरीजों का मिलना। मगर, आश्चर्यजनक तरीके से 18 मई को इस टेस्टिंग पॉलिसी से यू टर्न ले लिया गया और 20 मार्च वाली टेस्टिंग पॉलिसी पर देश लौट आया।

18 मई के बाद देशभर में टेस्टिंग घटती चली गयी। 20 मई को 24 घंटे में 1 लाख टेस्टिंग की क्षमता तक भारत पहुंच चुका था। 23 मई को 1,15,364 लोगों की टेस्टिंग हुई। मगर, आश्चर्य है कि 23 मई के समान ही 15 जून को टेस्टिंग की संख्या बनी हुई है। अभी यह 24 घंटे में 1,15,519 है। अब तक देश में 57,74,133 लोगों की टेस्टिंग देशभर में हो चुकी है।

टेस्टिंग नियंत्रित करने की नीति देश को महंगी पड़ी है। और, अब दिल्ली के लिए 6 दिन के भीतर 18 हजार टेस्टिंग प्रति दिन के स्तर पर पहुंचने का लक्ष्य रखा गया है। मगर, यही लक्ष्य दूसरे राज्यों के लिए क्यों नहीं दिए जाते? उम्मीद की जानी चाहिए कि टेस्टिंग पॉलिसी पर 14 जून की नयी गाइडलाइन के बाद बाकी राज्यों में भी टेस्टिंग बढ़ेगी।

लॉकडाउन-अनलॉक पॉलिसी में सही-गलत क्या?

भारत ने जब 24 मार्च की रात 12 बजे से लॉकडाउन लागू किया तब देश में कोरोना मरीजों की संख्या महज 574 थी। आज लद्दाख में भी इससे ज्यादा केस हैं। चार लॉकडाउन और पांचवें लॉकाउन के 14 दिन बाद की स्थिति यह है कि 3 लाख 33 हजार से ज्यादा संक्रमण और 9519 मौत दर्ज हो चुके हैं।

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तीसरा लॉकडाउन शराब की दुकानें खोलते हुए 4 मई को शुरू हुआ था, तो चौथे लॉकडाउन पर 18 मई को इंडियन मेडिकल काउंसिल ऑफ रिसर्च यानी आईसीएमआर ने टेस्टिंग की पॉलिसी बदल दी। नयी पॉलिसी के हिसाब से बगैर डॉक्टर की अनुशंसा के टेस्टिंग कराना रोक दिया गया। ये दोनों फैसले अजीबोगरीब थे। शराब के बहाने राजकोषीय चिंता अचानक ‘जान है जहान है’ की सोच पर हावी हो गयी, वहीं टेस्टिंग को कम करने वाली पहल ने केंद्र सरकार की नीयत पर भी सवाल उठा दिए।

यह भी कम आश्चर्य की बात नहीं है कि तीसरे लॉकडाउन के दौरान ही केंद्र सरकार ने ‘जो जहां है, वहीं रहे’ की पॉलिसी बदल दी। अप्रैल के अंत तक इसी नीति पर देश कायम था। यह दौर प्रवासी मजदूरों के लिए हताशा और निराशा का था। विभिन्न राज्यों के बीच बसें भेजने की स्पर्धा, प्रवासी मजदूरों को मदद पहुंचाने की उत्कंठा, श्रमिक स्पेशल ट्रेनें आदि इसी दौरान देखने को मिले।

पांचवां लॉकडाउन यानी पहला अनलॉक आते-आते ट्रेनों का चलना भी शुरू हो गया। अब राज्य सरकारें लॉकडाउन का फैसला करने लगीं। ऊपर दिए आंकड़े बताते हैं कि स्थिति लगातार भयावह होती रही। कोरोना संक्रमण से लेकर मौत के आंकड़े तक बढ़ते चले गये। मगर, केंद्र सरकार मानो लॉकडाउन के फैसले को खुद ही पलटने में जुटी रही।

प्रवासी मजदूरों पर पॉलिसी ही नहीं दिखी

प्रवासी मजदूरों की समस्या तभी सामने आ गयी थी जब पहले लॉकडाउन के चार दिन बीते थे और आनंद विहार-यूपी बोर्डर पर घर लौटने के लिए लोग पैदल ही निकल पड़े। 29 मार्च को गृहमंत्रालय ने एक निर्देश जारी किया था जिसमें कहा गया था,

“सभी कर्मचारी चाहे वे उद्योग में हैं या दुकानों में और वाणिज्यिक संस्थानों में उनको समय पर बिना किसी कटौती के लॉकडाउन की पूरी अवधि के लिए वेतन का भुगतान देय तिथि पर किया जाएगा।“

इसके अलावा उसी निर्देश में यह भी कहा गया था,

“अगर कोई मकान मालिक किसी श्रमिक या छात्र को अपना घर खाली करने को कहता है तो उनके खिलाफ आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत कार्रवाई होगी।”

सच ये है कि श्रमिकों की नौकरियां भी गयीं, इस दौर में सैलरी भी नहीं मिली और वे घर से बेघर भी हुए। फिर भी गृहमंत्रालय के निर्देश के उल्लंघन पर देश में किसी एक पर भी मुकदमा दर्ज नहीं हुआ। 17 मई को गृहमंत्रालय ने वह आदेश भी वापस ले लिया। इससे पहले 15 मई को सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने प्रवासी मजदूरों के उनके घर लौटने या सड़क पर पैदल चलने को लेकर बेबसी भी दिखलायी।

प्रवासी मजदूरों पर केंद्र सरकार के बदलते रुख को इस बात पर समझा जा सकता है कि अप्रैल के अंत तक ‘जो जहां हैं वहां रहे’ की नीति थी जो मई आते-आते बदल गयी। स्पेशल बसें चलने लगीं, श्रमिक स्पेशल ट्रेनें चल पड़ीं। कुव्यवस्था के बीच प्रवासी करीब डेढ़ सौ मजदूर सड़क पर चलते हुए, भूख से या हादसों का शिकार होकर जान गंवा बैठे। वहीं स्पेशल ट्रेनों से घर लौट रहे दर्जनों लोग ज़िन्दा नहीं बचे। 

लॉकडाउन से लेकर अनलॉक, टेस्टिंग और प्रवासी मजदूरों पर नीतियां एक जैसी नहीं रही। इसमें बदलाव होते रहे। भ्रम की स्थिति सरकार में भी रही और आम लोगों में भी। प्रांतीय सरकारें आज तक लॉकडाउन और अनलॉक में फर्क नहीं समझ सकी हैं। हर प्रांत में अलग-अलग नियम इसके सबूत हैं। टेस्टिंग कम करना ही प्रांतीय सरकारों ने केंद्र सरकार की नीति से सीखा। इन सब कारणों से कोरोना को लेकर लड़ने के बजाय इसे छिपाने की प्रवृत्ति बढ़ती चली गयी। ऐसे में अब ख़तरनाक नतीजे तो आएंगे ही। मगर, सरकार समय पर सीख ले, यह सबसे अधिक ज़रूरी लगता है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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