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भारत
राजनीति
जतिन दास से फादर स्टेन स्वामी तक: राजनैतिक क़ैदियों की दुर्दशा
जतिन दास की शहादत आज से 92 साल पहले लाहौर जेल में राजनैतिक बंदियों के अधिकारों के लिए लड़ते हुए हुई थी। निर्मम ब्रिटिश सरकार ने कपट से जतिन दास की हिरासत को मौत की सज़ा में बदल दिया था। आज़ाद भारत की सरकार भी अपने समय के राजनैतिक कैदियों के साथ वैसा ही व्यवहार कर रही है।
हर्षवर्धन
13 Sep 2021
जतिन दास

जतिन दास (27 अक्टूबर, 1904-13 सितंबर, 1929) भारत के पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने राजनीतिक कैदियों की लड़ाई लड़ते हुए शहादत दी। उनकी ऐतिहासिक भूख हड़ताल ने ब्रिटिश राज में भारतीय राजनीतिक कैदियों पर हो रहे जुल्म और अत्याचार का पर्दाफाश किया और उस सवाल पर एक चेतना पैदा कि जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।

जतिन दास का जन्म 27 अक्टूबर सन 1904 को भवानीपुर, कलकत्ता(आज के कोलकाता) में एक साधारण परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम बंकिम बिहारी दास तथा माता का नाम सुहासिनी देवी था। उनकी उम्र दस साल भी नहीं हुई थी जब ही उनकी मां का देहांत हो गया, इसके बाद उनका पालन-पोषण उनके पिता ने किया। जतिन बचपन से ही पढ़ाई में काफ़ी मेधावी थे। वे स्कूल से लेकर कॉलेज तक की सभी परीक्षाओ में प्रथम श्रेणी से पास हुए। 

जतिन दास का राजनीतिक जीवन में प्रवेश उनके कॉलेज के दिनों में असहयोग आंदोलन के दौरान में हुआ। कॉलेज की पढ़ाई छोड़कर दास पूरे उत्साह से असहयोग आंदोलन में कूद पड़े, जिसकी वजह से उनके पिता काफी नाराज हो गए और उनको घर से निकल जाने को कहा।

जतिन घर से निकल गए और कुछ दिन बिना खाये-पिये अत्यंत ग़रीबी में गुजारे। इसके पश्चात वो भवानीपुर कांग्रेस कमेटी की ऑफिस में रहने चले गए। जब कांग्रेस नेताओं ने उन्हें पार्टी के आर्थिक कोष से मदद करने की पेशकश की तो जतिन ने यह कहते हुए मना कर दिया की वो देश के स्वतंत्रता संग्राम का चंदा है। अपना खर्चा निकालने के लिए वे ट्यूशन पढ़ाने लगे। असहयोग आंदोलन के स्थगित हो जाने के बाद जतिन दास पुनः कॉलेज में भर्ती हो गए और अपने स्वास्थ्य पर भी ध्यान देने लगे।

असहयोग आंदोलन के दौर में ही जतिन दास उत्तर भारत के मशहूर क्रांतिकारी नेता शचीन्द्रनाथ सान्याल के संपर्क के आए और उनके माध्यम से क्रांतिकारी पार्टी (हिप्रस यानी हिंदुस्तान प्रजातंत्र सेना) के सदस्य बने। अंडमान जेल से छूटने के बाद सान्याल ने 1923 में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (हिप्रस) की स्थापना की थी। जतिन दास हिप्रस के काम में पूरे उत्साह के साथ लग गए और जल्द ही सान्याल के करीबी और विश्वासपात्र बन गए। उनको संगठन की महत्त्वपूर्ण ज़िम्मेदारियाँ मिलने लगीं।

31 जनवरी 1925 को ‘हिप्रस’ के घोषणापत्र, 'द रिवोल्यूशनरी' का वितरण उत्तर भारत के प्रमुख शहरों में एक ही दिन किया गया। जतिन ने इस पर्चे को कलकत्ता में छपवाया, उसको पार्टी के अलग-अलग केन्द्रों पर भेजा तथा तय दिन अपने साथियों की मदद से कलकत्ता में बड़ी कुशलता से इसका वितरित किया।

इसके अलावा वे क्रांतिकारी पार्टी के लिए हथियार और धन की व्यवस्था भी करते थे। उनके साथी शिव वर्मा के अनुसार जतिन दास को छोटे रिवॉल्वर तथा पिस्तौल आदि जमा करने में काफी सफलता प्राप्त हुई थी, जिसमें उनकी मदद कलकत्ता के प्रसिद्ध कम्युनिस्ट नेता कॉमरेड कुतुबुद्दीन भी करते थे। एक बार जब संगठन को हथियारों की सख्त ज़रूरत आ पड़ी तो जतिन ने कुछ छोटी-छोटी यूरोपियन फर्म्स में से लूटकर धन इकठ्ठा किया। इससे उन्होंने छह माउजर पिस्तौल ख़रीदीं, जिनमे से दो बनारस केंद्र और चार रामप्रसाद बिस्मिल को भेज दीं।

जतिन दास का 'हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' को बनाने में कितना योगदान था इसका आँकलन हम श्रीमती प्रतिभा सान्याल (शचीन्द्र नाथ सान्याल की पत्नी) के एक वक्तव्य से कर सकते हैं, जो उन्होंने कोलकत्ता  स्थित जतिनदास-पार्क में जतिन दास की मूर्ति के अनावरण के अवसर पर दिया था:

“…मैं जतिन को उनकी पार्टी द्वारा दिए गए नाम 'राबिन' से जानती थी। जतिन को पहली बार देख मैं उनकी क्षमता के बारे में आशंका से अपने पति को अवगत कराया। उन्होंने बस इतना कहा कि यह तो वक़्त ही तय करेगा कि इस लड़के में कुछ दम है या नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि राबिन ने अब तक अपनी योग्यता का बखूबी परिचय दिया है और एक दिन ऐसा भी आ सकता है जब सारा विश्व उनकी निस्वार्थ मानसिक ढृढ़ता का नजारा देखेगा… हमारा जीवन बहुत कठिन था। न रुपया पैसा था, न छत, न कोई सिर पर हाथ रखने वाला। धीरे-धीरे राबिन सभी की उम्मीदों पर खरा उतरने लगा। वह न केवल मेरे पति के संगठन का प्राण बन गया वरन मेरे परिवार का मुख्य आधार भी। उसने मेरे और हमारे बच्चों के लिए घर का बंदोबस्त किया। साथ ही, चार ऐसे सुरक्षित ठिकाने ढूंढ निकाले, जहां मेरे पति छिप सकें और संगठन का काम आगे बढ़ा सकें”

जेल यात्रा और भूख हड़ताल

लाहौर षड्यंत्र केस (1928-29) से पहले भी जतिन कई बार जेल जा चुके थे। उनकी पहली गिरफ्तारी राहत कार्य से वापस लौटते हुए एक जनसभा में भाषण देने के लिए हुई। तब उनको चार दिन जेल में रखकर इस शर्त पर छोड़ दिया गया कि वो आगे से राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा नहीं लेंगे। उनको दूसरी बार अक्टूबर 1921 में एक सभा में भाग लेने के कारण गिरफ्तार किया गया। उनको एक माह की सजा हुई। तीसरी बार असहयोग आंदोलन के दौर में धरना देते वक़्त पुलिस से झड़प होने पर उनको गिरफ्तार किया गया। इस बार उनको तीन महीने की सज़ा हुई।

जतिन दास को चौथी बार काकोरी षड्यंत्र (1925) और दक्षिणेश्वर बम कांड के मामले में गिरफ्तार किया गया। लेकिन जब पुलिस उनके खिलाफ कोर्ट में  कोई सबूत नहीं पेश कर पाई तो उनको बंगाल क्रिमिनल ऑर्डिनेंस के तहत गिरफ्तार कर बंगाल में ही नजरबंद कर दिया गया। बंगाल क्रिमिनल ऑर्डिनेंस के तहत पुलिस किसी भी व्यक्ति को अनिश्चितकालीन समय के लिए हिरासत में रख सकती थी तथा गिरफ्तार हुए व्यक्ति से दुबारा सुनवाई का अधिकार भी छीन लिया गया था।

बंगाल ऑर्डिनेंस के तहत जतिन दास को तीन साल तक जेल में रखा गया। उनको पहले प्रेसीडेंसी जेल में रखा गया फिर वहां से मिदनापुर जेल ले जाया गया। मिदनापुर में अत्यधिक गर्मी की वजह से जतिन को 'लू' लग गई जिससे उनका   स्वास्थ्य काफी बिगड़ गया। इलाज के लिए उनको कलकत्ता के अलीपुर केंद्रीय कारागार लाया गया। ठीक होने के उपरांत उनको पहले ढाका केंद्रीय कारागार, फिर मैमन सिंह जेल (जो अब बांग्लादेश में है) भेज दिया गया।

मैमन सिंह जेल में ही जतिन दास ने पहली बार राजनीतिक कैदियों के अधिकार की लड़ाई लड़ी। जेल के महानिरीक्षक का ये आदेश था कि जब भी कोई अंग्रेज़ अफसर राजनीतिक बंदी के कोठरी के सामने से गुजरे तो वो उठ कर अफसर को सलाम करे। इसी मामले में एक दिन जतिन और महानिरीक्षक के बीच बहस हो गई, जिसके बाद जतिन को बुरे तरीके से पीटा गया और जेल में दंगा और अधिकारियों पर हमला करने के जुर्म में अदालत में उनके विरुद्ध चालान पेश कर दिया गया। जेल अधिकारियों के इस द्वेषपूर्ण और मनमाने व्यावहार के विरोध में जतिन ने भूख हड़ताल आरंभ कर दी जो इक्कीस दिनों तक चली और तभी ख़त्म हुई जब महानिरीक्षक ने उनसे बाकायदा माफी मांगी। इसके बाद उनको मार्च 1928 में पंजाब की मियांवाली जेल (अब पाकिस्तान में) में स्थान्तरित कर दिया गया।

आखिरकार अक्टूबर 1928 में जतिन दास को रिहा कर दिया गया। रिहा होने का कुछ समय बाद वे भगत सिंह से कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन के समय मिले। भगत सिंह ने जतिन दास को क्रांतिकारियों को बम बनाने का प्रशिक्षण देने हेतु अनुरोध किया, जिसको जतिन ने सहज रूप से स्वीकार कर लिया।

जतिन दास को पांचवी बार लाहौर षड्यंत्र केस (1928-29) में गिरफ्तार किया गया। उनको जब कलकत्ता से लाहौर लाया गया को पहले उनको एक दिन की रिमांड पर रखा गया, फिर पंद्रह दिनों के लिए रिमांड बढ़ा दी गई। जब इस रिमांड की समय-सीमा ख़त्म होने पर उन्होंने जमानत के लिए याचिका दायर की तो कोर्ट ने अस्वीकार कर दिया। जब अठारह दिनों की रिमांड के बाद भी पुलिस उनके खिलाफ सबूत पेश नहीं कर पाई तो अदालत ने उनको अंतरिम जमानत दे तो दी लेकिन रातों-रात अपने फैसले से पलट भी गई। विशेष न्यायाधीश ने जतिन दास को जमानत देने से इंकार कर दिया।

लाहौर षड्यंत्र केस शुरू होने के कुछ दिन बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को दिल्ली जेल से लाहौर लाया गया। लाहौर जेल में राजनैतिक बंदियों की हालत देखकर और उनके अधिकारों की मांग रखते हुए भगत सिंह और दत्त ने भूख हड़ताल शुरू कर दी। 13 जुलाई को लाहौर षड्यंत्र के बाक़ी अभियुक्तों, जिसमें जतिन दास भी थे, ने भगत और दत्त के समर्थन में भूख हड़ताल की घोषणा कर दी।

क्रांतिकारियों की मांग थी कि उनको अच्छा खाना, पढ़ने के लिए अख़बार, शौच की उचित सुविधा, अच्छे कपड़े इत्यादि चीजें मुहैया करवाई जाएँ। अंग्रेज़ सरकार ने उनकी मांगे मानने से इंकार कर दिया और जेल में हड़ताली क्रांतिकारियों पर खूब दमन किया। भूख हड़ताल के ग्यारहवें दिन से जब कुछ  हड़तालियों की हालत बिगड़ने लग गयी तब जेल प्रसाशन ने कुछ डॉक्टरों और सिपाहियों कि एक टीम क्रांतिकारियों को ज़बरन खाना खिलाने के लिए बनाई। इसके बाद हर रोज क्रांतिकारियों और डॉक्टर-सिपाही के बीच खाना खिलाने और नहीं खाने का घमासान शुरू हुआ जो हर बीतते दिन के साथ और भीषण होता गया।

ऐसे ही एक हाथापाई के दौरान जेल अधिकारियों ने जतिन दास की नाक में रबर की नली डाल कर दूध पिलाने की कोशिश की। हाथापाई की वजह से वो नली उनके पेट में न जाकर फेफड़े में चली गयी। जेल के डॉक्टर ने लगभग एक सेर दूध फेफड़े में उतार दिया गया। इसके बाद जतिन दास की हालत बिगड़ती चली गई। बिगड़ती हालत के बावजूद जतिन दास लगातार खाना खाने, दवाई लेने, पानी पीने और इलाज करवाने से मना करते रहे। उनकी जिद थी कि जबतक उनकी मांगे नहीं मानी जाएँगी, वे भूख हड़ताल नहीं तोड़ेंगे। बेरहम अंग्रेज़ सरकार भी अपनी जिद पर अड़ी रही। भूख हड़ताल के तिरसठवें दिन जतिन दास ने अपनी आखिरी साँस ले ली।

जब जतिन दास मरणशैय्या पर पड़े थे तो उनसे मिलने पंजाब असेंबली के सदस्य और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डॉ. गोपीचंद भार्गव आए। डॉ. भार्गव ने जब जतिन दास से पूछा कि “आप दवाई और पानी क्यों नहीं ले रहे?”, दास ने उत्तर दिया, "मैं मरना चाहता हूं।" डॉ. भार्गव ने पूछा, "क्यों"? जिसके जवाब में दास ने कहा, "अपने देश के लिए, राजनीतिक बंदियों की दशा सुधार में सुधार हो इसलिए"

जतिन दास से फादर स्टैन स्वामी तक

जतिन दास की शहादत आज से 92 साल पहले लाहौर जेल में राजनैतिक बंदियों के अधिकारों के लिए लड़ते हुए हुई थी। तब भारत अंग्रेज़ो का गुलाम हुआ करता था। आज भारत आजाद है और आज़ादी का अमृत महोत्सव मनाने की तैयारी कर रहा है। लेकिन आजादी के 74 साल बाद भी भारत में राजनीतिक कैदियों के साथ हो रहे बर्ताव में कोई खास अंतर नहीं है। हाल में ही वरिष्ठ मानवाधिकार कार्यकर्ता फादर स्टैन स्वामी की मृत्यु पुलिस हिरासत में हुई। स्टैन स्वामी लगातार बीमार चल रहे थे लेकिन उनकी जमानत याचिका को अदालत लगातार ख़ारिज करते रही। पार्किंसन्स रोग से ग्रसित 84 वर्षीय स्टैन स्वामी ने जब खाने के लिए 'स्ट्रॉ' और ‘सिप्पर’ की मांग की तो वो भी उनको करीबन एक महीने बाद मिली। सर्दी के कपड़ो के लिए भी उनको याचिका दायर करनी पड़ी थी। 

भीमा कोरेगांव हिंसा में गिरफ्तार किसी भी व्यक्ति की अदालत में अभी तक सुनवाई शुरू भी नहीं हुई है। एक ओर उनकी जमानत की याचिकाएं लगातार ख़ारिज की जा रही हैं तो दूसरी ओर कोरोना महामारी के दौर में उनको मूलभूत सुविधाएं जैसे दवाइयाँ, पोषक खाना और क्वारंटाइन से वंचित रखा गया है। ऐसी ही हालत 2020 के दिल्ली दंगों में गिरफ्तार किये गए छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की है। 

निर्मम ब्रिटिश सरकार ने कपट से जतिन दास की हिरासत को मौत की सजा में बदल दिया था। आजाद भारत की सरकार भी अपने समय के राजनैतिक कैदियों के साथ वैसा ही व्यवहार कर रही है।

(लेखक जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के शोधार्थी हैं, लेख में व्यक्त विचार निजी हैं।)

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