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भारत
राजनीति
गांधी बनाम सावरकरः हिंद स्वराज बनाम हिंदुत्व
असली सवाल महात्मा गांधी बनाम सावरकर का नहीं है। असली सवाल उन दो दृष्टियों का है जो एक दूसरे से भिन्न हैं और जिनकी नैतिकता में जमीन आसमान का अंतर है। यह अंतर्विरोध रहेगा और ‘अमृत महोत्सव’ में इस पर चर्चा होनी ही चाहिए।
अरुण कुमार त्रिपाठी
18 Oct 2021
gandhi ji and sawarkar

वामपंथ से दक्षिणपंथ की ओर आए अपने एक समाजशास्त्री मित्र दावा करते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बहुत बदल रहा है। वह अपने भीतर सभी को समाहित करने में लगा हुआ है। देखिए ना उसने डॉ. भीमराव आंबेडकर को प्रातः स्मरणीय बना लिया। महात्मा गांधी को अपना लिया, भगत सिंह को अपना लिया और भारत की जातियों के अंतर्विरोध को भी साध लिया।

लेकिन ऐसा होता तो रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के कथन पर इतना विवाद न होता। उनका यह कहना कि सावरकर ने अंग्रेजों से माफी गांधी के कहने पर मांगी थी, इतिहास के फर्जी लेखन का प्रमाण है। वह हास्यास्पद भी लगता है। क्योंकि इसका एक वार संघ औऱ सावरकर के अनुयायियों पर भी होता है। यह एक प्रकार का इकबालिया बयान है कि सावरकर ने माफी मांगी थी जिस तथ्य से संघ परिवार लगातार इनकार करता रहा है।

लेकिन असली सवाल महात्मा गांधी बनाम सावरकर का नहीं है। असली सवाल उन दो दृष्टियों का है जो एक दूसरे से भिन्न हैं और जिनकी नैतिकता में जमीन आसमान का अंतर है। कोई भी क्रांतिकारी या स्वतंत्रता सेनानी जब भी किसी व्यवस्था का विरोध करता है तो वह उसके कानूनों को तोड़ता है। इस तरह से वह उस व्यवस्था की नजर में एक प्रकार का अपराध करता है। गांधी उस अपराध को स्वीकार करते हैं और उसका दंड भुगतने को तैयार रहते हैं। लेकिन उसके लिए वे माफी नहीं मांगते। जबकि सावरकर की फितरत दूसरी है। अव्वल में तो वे व्यवस्था विरोधी कोई भी कार्य खुद करने की बजाय किसी दूसरे को उकसाते हैं। फिर जब वह कार्य हो जाता है तब वे उस व्यक्ति से दूरी बना लेते हैं और उसे पहचानने से इनकार कर देते हैं। ताकि कानूनी कार्रवाई से स्वयं बच सकें।

हालांकि सावरकर नासिक के कलेक्टर जैक्सन की हत्या को उकसाने और अंग्रेज बादशाह के विरुद्ध युद्ध छेड़ने की साजिश के आरोप से बच नहीं सके और उन्हें इस अपराध में दोहरी उम्र कैद की सजा हुई। इस सजा के माध्यम से अंग्रेजों ने उन्हें वीर और क्रांतिकारी का तमगा पहना दिया हालांकि उस तमगे को वे अपने माफीनामे से खुद ही उतार कर फेंकते रहे।

सावरकर के जीवन में दो प्रमुख घटनाएं ऐसी हैं जिनमें वे अपने किसी साथी को हत्या के लिए उकसाते हैं और खुद कट कर निकल लेते हैं। एक घटना है मदन लाला धींगड़ा को अंग्रेज अधिकारी विलियम हट कर्जन की हत्या के लिए उकसाने की और दूसरी है महात्मा गांधी की हत्या के लिए नाथूराम गोडसे को उकसाने की। कानूनी रूप से वे दोनों में बच निकले। हालांकि गांधी की हत्या में उन पर संदिग्ध के रूप में मुकदमा चला। लेकिन पहले वाले में तो वैसा भी नहीं हुआ। नाथूराम गोडसे तो उनसे 27 साल छोटे थे यानी पुत्रवत थे जबकि धींगड़ा उन्हीं के वय के थे।

इसमें सावरकर का निजी तौर कोई दोष भी नहीं कहा जा सकता। यह एक प्रकार की व्यापक प्रवृत्ति है जिसका इतिहास में खूब गौरवगान किया गया है। यह एक प्रकार का मराठा दांव था। इस मुहावरे का प्रयोग वे अपनी प्रसिद्ध पुस्तक `भारत का प्रथम स्वातंत्रय संग्राम’ में भी करते हैं। वे कहते हैं कि नाना धूधू पंत पेशवा के मराठा दांव के आगे अंग्रेज चित्त हो गए थे। लेकिन इस रणनीति और प्रवृत्ति को सिर्फ मराठा दांव तक सीमित करना ठीक नहीं है। पूरी दुनिया में युद्ध में छल, कपट, गोपनीयता यानी षडयंत्रों का प्रयोग होता रहा है। सावरकर उसी का प्रयोग कर रहे थे। वे छापामार मराठा युद्ध के साथ ही बाकुनिन के उग्रवादी स्कूल से भी प्रभावित थे। जिससे बाद में माफी मांगते हुए वे दूरी बनाते हैं। उनकी इसी शैली को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उसके तमाम आनुसंगिक संगठन आज भी अपनाते हैं। इसमें किसी भी कानून विरोधी कृत्य का राजनीतिक लाभ पूरा लिया जाता है लेकिन कानून या न्यायालय के समक्ष उसे स्वीकार नहीं किया जाता। वह बाबरी मस्जिद विध्वंस के दौरान भी देखा गया। जिस तरह से संघ परिवार के सारे आरोपी बच निकले और वे अन्य मामलों से भी बचकर निकलते रहते हैं उससे इसी शैली की पुष्टि होती है।

सवाल सिर्फ हिंसा और अहिंसा का नहीं है। सवाल गोपनीयता, छल कपट और अपने कृत्य की जिम्मेदारी न लेने का है। देशभक्तों और क्रांतिकारियों की यह श्रेणी दोयम दर्जे की ही रहती है। आखिर सुकरात और भगत सिंह जैसे लोग क्यों मानव समाज में अमर हैं। क्योंकि उन्होंने जो कुछ किया उसे स्वीकार किया और उसका अगर कोई दंड है तो उसे भुगतने को खुशी खुशी तैयार रहते थे। सुकरात के साथियों ने उन्हें जेल से निकाल लेने की जुगत बनाई थी लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया था। उनके कुछ साथी कह रहे थे कि जहर का प्याला पीने में थोड़ी देरी दिखानी चाहिए क्योंकि सूरज अभी डूबा नहीं है, तो उनका कहना था कि इससे कुछ हासिल नहीं होने वाला है। जो मृत्यु निश्चित है उससे बचकर भागने से क्या लाभ।

इसी तरह भगत सिंह के साथियों ने भी पहले उन्हें बम फेंकने से रोका था उसके तमाम लोगों ने उन्हें माफी मांगने की सलाह दी थी। उन्होंने दोनों को मना कर दिया। बल्कि इस बात के लिए उन्होंने अपने पिता से बेहद कड़े शब्द भी कहे थे। उनके साथियों ने इस बात का भी प्रस्ताव रखा था कि उन्हें किसी तरह से जेल से निकाल लिया जाए। लेकिन वे इसके लिए भी तैयार नहीं हुए। उन्होंने जो किया उसे स्वीकार किया और उसकी सजा भुगतने को तैयार हो गए। भगत सिंह जानते थे कि वे क्रांतिकारियों की इतनी बड़ी सेना नहीं तैयार कर सकते जो अंग्रेजों को हरा दे लेकिन वे इस बात में यकीन करते थे कि ऐसे नौजवानों की कतार खड़ी कर देंगे जो हिम्मत हारने वाली नहीं होगी। संयोग से जब भगत सिंह अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों को अंजाम दे रहे थे तब सावरकर जेल में माफीनामा लिख रहे थे और कह रहे थे कि अगर सरकार उन्हें माफ कर देगी तो उनसे प्रेरित तमाम युवा क्रांतिकारी अपना रास्ता छोड़कर संविधान को मानने वाली मुख्यधारा में लौट आएंगे। हालांकि यह सावरकर की गलतफहमी थी। क्योंकि पिछली सदी का दूसरा और तीसरा दशक भारत की क्रांतिकारी गतिविधियों के तेज होने का है। यानी सावरकर के माफी मांगने से कोई क्रांतिकारिता नहीं छोड़ रहा था। भगत सिंह जिस दौर में थे वह महात्मा गांधी की नैतिकता का दौर था। कोई माने या न माने लेकिन भगत सिंह की क्रांतिकारी नैतिकता में महात्मा गांधी का वह प्रभाव था जिसे उन्होंने देश के राजनीतिक वातावरण में निर्मित किया था।

अपने अपराध को स्वीकार करने और उसकी अधिकतम सजा भुगतने का साहस जिसमें होता है वह अव्वल दर्जे का क्रांतिकारी होता है। इसी वजह से भगत सिंह को शहीदे आजम कहा जाता है और गांधी को महात्मा। कोई भी क्रांतिकारी या वीर अपनी मृत्यु से भयभीत नहीं होता। यह कमजोरी न तो भगत सिंह में कहीं दिखती है और न ही गांधी में। गांधी को जब मोतिहारी में कैद किया गया और जमानत देने को कहा गया तो उन्होंने उससे इनकार कर दिया। हारकर अंग्रेजों ने उन्हें छोड़ दिया। गांधी को जब अहमदाबाद की अदालत में राजद्रोह के आरोप में छह साल की सजा हुई तो उन्होंने अपना कोई बचाव नहीं किया था। उन्होंने यंग इंडिया और नवजीवन में तीन लेख लिखे थे और उन तीनों के आधार पर उन्हें छह साल की सजा हुई। लेकिन उन्होंने जस्टिस ब्रूम्सफील्ड की अदालत में उसका कोई बचाव नहीं किया। बल्कि उन्होंने कहा कि इस तरह का अपराध मैं बार बार करूंगा क्योंकि आपने हमारे देश को बर्बाद कर दिया है। इस पर जज ने सजा करते हुए कहा कि चूंकि आरोपी ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया है इसलिए मेरे पास अधिकतम सजा देने के अलावा कोई चारा नहीं है लेकिन अगर अंग्रेज सरकार इस सजा को माफ करेगी तो सबसे ज्यादा खुशी उन्हें होगी।

गांधी अपने किसी भी आंदोलन की तैयारी गुप्त रूप से नहीं करते थे। वे उसकी अग्रिम सूचना वायसराय को दे देते थे। ऐसा वे दक्षिण अफ्रीका से ही कर रहे थे। चंपारण आंदोलन में जब उन्होंने एलआईयू वालों को किसानों के बीच बैठने की इजाजत दी तो स्थानीय लोग परेशान होने लगे। लेकिन गांधी का कहना था कि हम कुछ भी गलत और गोपनीय कर ही नहीं रहे हैं तो छिपाने का क्या मतलब। दरअसल गांधी ऐसी पारदर्शी समाज व्यवस्था और राज्य व्यवस्था का निर्माण करना चाहते थे जिसमें सरकार और जनता के बीच में कोई परदा न हो। अगर सरकार का इरादा जनता का दमन करना नहीं है तो उसके पास जनता से छुपाने के लिए कुछ नहीं होना चाहिए। वह सत्य पर आधारित एक समाज होगा।

इसके ठीक विपरीत सावरकर के जीवन का बड़ा हिस्सा गोपनीयता और षडयंत्र से निर्मित होता है।

सावरकर के बारे में समाजशास्त्री और मनोविज्ञानी आशीष नंदी ने ठीक ही लिखा है कि वे काला पानी की सजा में बुरी तरह टूट गए थे और उसके प्रभाव में उन्होंने अपने विचार बदल लिए। वे देश को आजाद कराने की बजाय अपने को आजाद कराने पर केंद्रित हो गए। उनमें वीरता के स्फुलिंग हैं लेकिन वे हर स्थिति में वीर बने रहें ऐसा नहीं हैं। फिर वे एक समावेशी राष्ट्र बनाने की बजाय हिंदू राष्ट्र बनाने लगे। औपनिवेशिक शक्तियां यही तो चाहती थीं। यानी अपनी आजादी और अंग्रेजों से संरक्षण पाने के लिए आजादी की लड़ाई को ही कमजोर करने लगे।

सावरकर और गांधी के बीच नैतिकता का यह अंतर बड़ा है और उससे भी बड़ा अंतर है उनके विचारों का। वह बहस हिंद स्वराज और हिंदुत्व के बीच है। इस अंतर को प्रसिद्ध साहित्यकार और विचारक यू आर अनंतमूर्ति ने अपने जीवन के अंतिम चरण में अपने लंबे लेख में बहुत स्पष्ट तरीके से व्यक्त किया है। हिंद स्वराज जहां घृणा की जगह पर प्रेम की भाषा सिखाता है वहीं हिंदुत्व राष्ट्र निर्माण के बहाने दमन और घृणा के लिए उकसाता है। गांधी का हिंद स्वराज हिंदू और मुस्लिम एकता को आजादी की अनिवार्य शर्त मानता है। वे अंग्रेजों से भी घृणा नहीं सिखाता। गांधी उन सभी लोगों को भारत का नागरिक मानते हैं जिनका जन्म इस देश में हुआ है। उनका मानना था कि इस देश के ज्यादार मुस्लिम तो पहले हिंदू ही थे। इसलिए उनमें मूल रूप से कोई फर्क नहीं है।

जबकि सावरकर भारत की नागरिकता के लिए उन्हीं को योग्य मानते हैं जिनकी पितृभू और पुण्यभू दोंनों भारत में ही है। यानी जो लोग भारत में ही पैदा हुए हैं और जिनका धर्म भी यहीं पैदा हुआ है। वे भी भारत के स्वाभाविक और विश्वसनीय नागरिक हैं। जिनके धर्म का उद्गम स्थल भारत में नहीं कहीं और है वे भले ही भारत में पीढियों से रह रहे हों और उनका जन्म भी यहीं हुआ हो लेकिन उन्हें वे भारत के वफादार नागरिक के रूप में नहीं देखते। वे उनकी निष्ठा पर सदैव संदेह करते हैं।

विडंबना देखिए कि सावरकर नास्तिक होने के बावजूद भारत को एक हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते हैं जबकि गांधी ईश्वर में जबरदस्त आस्था रखने के बावजूद भारत को एक सेक्यूलर लोकतंत्र बनाना चाहते हैं। यूआर अनंतमूर्ति ने ठीक ही लिखा था कि भारतीय राजनीति का यह अंतर्विरोध गहरा है और आसानी से मिटने वाला नहीं है। दोनों लोगों के विचारों और जीवन से जो राजनीतिक दृष्टि निकलती है उसमें नैतिकता और विचारधारा में जमीन आसमान का अंतर है। संघ परिवार इस अंतर की लिपाई पुताई करने में लगा है लेकिन भारतीय राजनीति के विश्लेषकों और राजनीतिकों को इस अंतर को स्पष्ट करते हुए सदैव याद रखना होगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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