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मोदी सरकार के 'आपराधिक' और 'विभाजनकारी' षड्यंत्र के ख़िलाफ़ है 8 जनवरी की हड़ताल
8 जनवरी को न केवल श्रमिक वर्ग के गुस्से का सामूहिक इज़हार होगा बल्कि देश के सभी ज्वलंत मुद्दों का सामूहिक इजाहर होगा।
बी सिवरमन
07 Jan 2020
8th jan strike

कुछ अर्थों में, 8 जनवरी 2020 की आम हड़ताल विलक्षण है। न्यूज़क्लिक से बात करते हुए सीटू महासचिव तपन सेन ने कहा, ‘‘यद्यपि हड़ताल का मूल मकसद है श्रमिक वर्ग का श्रम सुधार, निजीकरण, स्थिर अल्प वेतन और बढ़ते काॅन्ट्रैचुअलाइज़ेशन जैसे बुनियादी मुद्दों पर विरोध, जिन्हें सामान्यतः मीडिया में कवरेज नहीं दिया जाता  है।  इस बार की आम हड़ताल का खास महत्व है। यह इसलिए कि इसे छात्र-युवा का व्यापक समर्थन मिल रहा है, क्योंकि दो दिन पहले जे एन यू में छात्रों पर जो बर्बर हमला हुआ, उसके विरोध में छात्रों ने भी हड़ताल की घोषणा की है। फिर, किसानों ने समर्थन में ‘ग्रामीण हड़ताल’ भी घोषित की है। यह हड़ताल देश को मोदी की अपराधिक और विभाजनकारी षडयंत्र से बचाने के लिए है।’’

सही कह रहे हैं तपन सेन-इस बार की आम हड़ताल का विशेष महत्व है क्योंकि यह हड़ताल एक ऐसे माहौल में हो रहा है, जब विभिन्न किस्म के संधर्षों का एक संगम दिख रहा है और सरकार की साम्प्रदायिक विभाजनकारी कार्यनीति के साथ देश में, खासकर उत्तर प्रदेश में सीएए/एनपीआर-विरोधी आन्दोलनकारियों पर हिंसक राज्य दमन चल रहा है। इस वजह से हड़ताल को नया राजनीतिक महत्व मिला है।

अधिकतर यूनियन, जो हड़ताल में भाग ले रहे हैं। एनआरसी और एनपीआर के खिलाफ हैं और तमिल नाडू में हड़ताल आयोजन संयोजन समिति ने हड़ताल की एक प्रमुख मांग के रूप में सीएए को वापस लेने की बात रखी है।

ऐटक जो भारत का सबसे पुराना ट्रेड यूनियन है और इस साल शताब्दी वर्ष मना रहा है, ने कहा कि हड़ताली श्रमिक सरकार की ऑल-राउंड फेलयोर और उसे ढकने के लिए चलाई जा रही विभाजनकारी नीति के खिलाफ जनता के असली सवालों को सामने ला रहे हैं। श्रमिकों के सभी हिस्से-अकुशल इन्फाॅरमल श्रमिकों से लेकर सरकारी कर्मचारियों तक-सभी मोदी सरकार के श्रमिक वर्ग के हकों पर बढ़ते हमलों पर प्रतिरोध करने के लिए साथ आए हैं।

सरकार श्रमिकों के उन अधिकारों को छीन रही है जो उन्हें 100 साल की अवधि में श्रम सुधारों के माध्यम से हासिल हुए थे। 2 जनवरी को श्रम मंत्री ने सभी केंद्रीय ट्रेड यूनियनों को एक बैठक के लिए बुलाया था और उन्होंने कहा था कि सरकार को वर्तमान संसद सत्र में पेश औद्योगिक विवाद कोड के मामले में और सामाजिक सुरक्षा व व्यावसायिक स्वास्थ्य तथा सुरक्षा कोड के मामले में जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिये। पर मंत्री लेशमात्र भी पीछे हटने को तैयार न थे और इन संहिताओं पर आगे बातचीत के लिए तक राज़ी नहीं हुए। इसलिए मीटिंग भंग हो गई और हमें हड़ताल की ओर बढ़ना पड़ा।’’

सीटू से सम्बद्ध दक्षिण रेलवे एम्प्लाॅइज़ यूनियन के नेता श्री ईलंगोवन रामलिंगम ने बताया कि यह 1991 के नरसिंहा राव-मनमोहन सिंह के नव-उदारवादी नीतियों के बाद की उन्नीसवीं हड़ताल है, और मोदी सरकार में चौथी। हमारी लड़ाई की महत्वपूर्ण उपलब्धियां रही हैं। उदाहरण के लिए औद्योगिक विवाद कोड के तहत यह तय किया गया था कि किसी उद्योग को बन्द करने के लिए सरकार से अनुमति तभी लेनी होगी जब उसमें 300 कर्मी हों, पर अब इसे घटाकर 100 तक लाया गया, जो औद्योगिक विवाद कानून के 5बी धारा में है। सेवानिवृत्त कर्मचारियों को पदाधिकारी बनने नहीं दिया जाता और बड़े अखिल भारतीय यूनियनों में भी पदाधिकारियों की संख्या केवल 10 रखी गई थी।

पर विरोध से इन प्रावधानों को खत्म किया गया।इसी तरह वेतन कोड में ट्रेड यूनियनों के दबाव से न्यूनतम वेतन की गणना के लिए आइक्राॅड फाॅरमूला को स्वीकारा गया; अब वेतन संशोधन ऑटोमैटिक है। यदि ये हड़तालें न हुई होतीं तो देश की अर्थव्यवस्था बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हाथों बिक गयी होती और हम ‘बनाना रिपब्लिक’ बन जाते। हम श्रमिक ही सच्चे देशभक्त हैं और सरकार-समर्थक अवसरवादी नकली राष्ट्रवादी हैं!’’

कुमारस्वामी एआइसीसीटीयू के पूर्व अध्यक्ष और तमिल नाडू के प्रमुख ट्रेड यूनियन नेता भी हैं। उन्होंने बताया, ‘‘सभी यूनियन 21,000रु प्रति माह के न्यूनतम वेतन की मांग कर रहे हैं। पर मोदी सरकार ने 4618 प्रति माह के हास्यास्पद न्यूनतम वेतन की घोषणा की है, जो साल भर में 60,000 रु तक नहीं बनता। पर यही सरकार, उच्च जातियों के भीतर के तथाकथित ‘‘कमज़ोर हिस्सों’’ को 66,666रु की मासिक आय सीमा तय कर चुकी है,-जो करीब 8 लाख रु प्रति माह होता है। यह दोहरा मापदंड क्यों?’’ आगे अन्होंने कहा कि सरकार जनता को बांटती है, उन्हें असली मुद्दों से भटकाती है और लोकतंत्र व साम्प्रदायिक सौहार्द्र को खण्डित करती है। हिंदुओं को मुसलमानों के विरुद्ध भड़काने की उसकी साजिश उसी पर भारी पड़ रही है। इस तरह अपने जाल में घिरकर वह हताशा में लोकतांत्रिक विरोध का बर्बर तरीके से दमन कर रही है। दरअसल, यह सरकार हिंदू-विरोधी है क्योंकि वह मुट्ठीभर अंबानियों-अडानियों के इशारे पर बहुसंख्यक हिंदुओं के खिलाफ काम कर रही है।’’

यह आम हड़ताल कई क्षेत्रीय संघर्षों का प्रतिफल है। ऑल इंडिया बैंक एम्प्लाॅइज़ ऐसोसिएशन के नेता विश्वनाथ नायक जो बंग्लुरु में हैं, और अब सेवानिवृत्त हैं, कहते हैं,’’ बैंकिग में बुनियादी परिवर्तन हो चुका है। अब मोबाइल बैंकिग, इंटरनेट बैंकिग, एटीएम, कैश जमा मशीनें और भांति-भांति के ऐप आने के कारण मानव बैंकिंग और कर्मचारी-पब्लिक का आपसी संपर्क खत्म होता जा रहा है। अब अफसरों की एक न्यूनतम संख्या सभी डिजिटल प्रणालियों को संभाल लेती है। इसके कारण कर्मचारियों का व्यर्थ हो जाना, बैंकों की बंदी और व्यापक ट्रन्सफर की परिघटना देखी जा रही है। पहले दौर से कर्मचारी अभी उबरे नहीं थे कि बैंक-मर्जर की गलत नीति पर काम होने लगा।

कर्मचारी नाराज़ हैं और यह हड़ताल में परिलक्षित होगा। सरकार ने इस बहाने से कि बैंक एनपीए से ग्रस्त हैं, अब दो साल से वेतन संशोधन नहीं किया। पर मेरे पास डिफाॅल्टरों की पूरी लिस्ट है। अधिकतर गुजराती व्यवसायी हैं और मोदी-शाह के गुर्गे हैं। यह लुटेरे चैकीदार की सरकार है। ये जनता का पैसा हड़पकर बड़े काॅरपोरेट्स को बैंक क्रेडिट के रूप में देते हैं; फिर उन्हें बुरे ऋण के नाम पर माफ कर देते हैं। पर जब कर्मचारियों की बात आती है तो अस्थायी और ठेका श्रमिकों को स्थायी श्रमिक के बराबर वेतन देने का सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का पालन करने से भी इंकार करती है। तब श्रमिकों के पास सड़क पर उतरने के अलावा चारा क्या है?’’

एटक नेता डा. संजीवा रेड्डी ने कहा ,‘‘हड़ताल मोदी के एकतरफा नीति और यूनियनों से बात न करने का नतीजा है।’’साथ ही रेलवे कर्मचारी भी 500 प्राइवेट रेलगाड़ियों को लाने के प्रस्ताव के खिलाफ संघर्षरत हैं। रेलवे यूनियन ने 2-7 जनवरी तक विरोध-सप्ताह घोषित किया और वे भी 8 जनवरी को हड़ताल में शामिल होंगे। इंडियन रेलवेज़ के जनरल मैनेजर और रेलवे वोर्ड ने अलग-अलग से चेतावनी दी है कि जो भी धरना, प्रदर्शन और रैलियों, यहां तक कि गेट-मीटिंगों में भाग लेंगे उनके विरुद्ध कानूनी कार्यवाही होगी। बीएसएनएल कर्मचारी भी सरकार द्वारा बीएसएनएल को कमज़ोर कर काॅरपोरेट हाथों में सौंपने की रणनीति के विरुद्ध लड़ रहे हैं।

41  आर्डिनेंस फैक्टरियों के डिफेंस सिविलियन कर्मी भी डिफेंस उत्पादन इकाइयों को काॅरपोरेट हाथों में देने के खिलाफ अपने 1 माह लंबे संघर्ष को अब समाप्त कर पाए हैं। 23 सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों के कर्मचारी भी विनेवेश सहित निजीकरण के खिलाफ युद्ध छेड़ चुके हैं। और, कुछ ही दिनों पहले कर्नाटक में 30,000 आशा कर्मी सरकारी कर्मचारी का दर्जा मांगते हुए हड़ताल पर गई थीं। तो 8 जनवरी श्रमिक वर्ग के गुस्से का सामूहिक इज़हार है और युद्ध तो अभी शुरू हुआ है!

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