NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
कानून
कृषि
समाज
भारत
राजनीति
कृषि कानूनों को एक निश्चित अवधि के लिए टालने का सरकार का प्रस्ताव, किसान करेंगे चर्चा
आज बुधवार को 10वें दौर की वार्ता इस नोट पर ख़त्म हुई कि केंद्र सरकार तीनों कृषि कानूनों को निलंबित करने और एक समिति के गठन के लिए उच्चतम न्यायालय में हलफ़नामा देने को तैयार है। इसी के साथ अगली बैठक के लिए 22 जनवरी की तारीख़ तय की गई।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
20 Jan 2021
farmers meeting

दिल्ली: जिस तरह किसानों के तेवर कड़े हो रहे हैं सरकार कुछ बैकफुट पर दिखाई दे रही है। हालांकि गाड़ी अभी भी जहां की तहां अटकी है, लेकिन पहली बार सरकार ने अपनी ओर से किसानों को एक निश्चित समय अवधि के लिए तीनों कृषि कानूनों का अमल टालने का आश्वासन दिया और इसके लिए कोर्ट तक में शपथपत्र देने की बात कही है।

किसान नेताओं के मुताबिक सरकार ने दोनों पक्षों की सहमति से एक निश्चित समय के लिए तीनों कृषि कानूनों को निलंबित करने और एक समिति के गठन के लिए उच्चतम न्यायालय में हलफनामा दायर करने का प्रस्ताव दिया है।

इसी एक पहलकदमी या बढ़त के साथ किसान संगठनों के साथ सरकार की 10वें दौर की वार्ता समाप्त हो गई। अब अगली बैठक 22 जनवरी को दोपहर 12 बजे होगी।

हालांकि किसान संगठन कानूनों को वापस लेने की अपनी मांग पर अडिग हैं, लेकिन कानूनों को निलंबित करने के सरकार के प्रस्ताव पर बृहस्पतिवार को चर्चा करेंगे।

आपको बता दें कि केंद्र सरकार ने बुधवार को किसान संगठनों के प्रतिनिधियों से 10वें दौर की वार्ता में एक बार फिर तीनों कृषि कानूनों में संशोधन का प्रस्ताव रखा लेकिन प्रदर्शनकारी किसान इन कानूनों को निरस्त करने की अपनी मांग पर क़ायम रहे।

किसानों ने यह आरोप भी लगाया कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को कानूनी गारंटी देने पर चर्चा टाल रही है।

सरकार की ओर से बैठक में केंद्रीय कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर, रेल, वाणिज्य और खाद्य मंत्री पीयूष गोयल तथा केंद्रीय वाणिज्य राज्य मंत्री सोमप्रकाश शामिल थे।

करीब साढ़े पांच घंटे की बैठक के बाद जो एक बात रिजल्ट के तौर पर सामने आई वो यह कि सरकार ने तीनों कृषि कानूनों को एक वर्ष या उससे अधिक समय के लिए निलंबित रखने और किसान संगठनों व सरकार के प्रतिनिधियों की एक समिति गठित करने भी प्रस्ताव रखा।

किसान नेताओं ने बताया कि मंत्रियों ने प्रस्ताव दिया कि जब तक समिति की रिपोर्ट नहीं आ जाती तब तक कृषि कानून निलंबित रहेंगे। उन्होंने तब तक किसानों को अपना आंदोलन स्थगित करने का आग्रह किया।

ज्ञात हो कि कृषि कानूनों के अमल पर उच्चतम न्यायालय ने अगले आदेश तक पहले ही रोक लगा रखी है। शीर्ष अदालत ने भी एक समिति गठित की है।

कोर्ट की रोक से सरकार की रोक में फ़र्क़ यही है कि सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि कानूनों  के अमल पर रोक अनिश्चितकाल तक के लिए नहीं है, यानी यह रोक कब हटा ली जाए, कुछ पता नहीं। यह कल भी हटाई जा सकती है और परसो भी, लेकिन सरकार ने एक निश्चित अविधि तक इन कानूनों को टालने का आश्वासन दिया है।

बैठक के दौरान किसान नेताओं ने कुछ किसानों को एनआईए की ओर से जारी नोटिस का मामला भी उठाया और आरोप लगाया कि किसानों को आंदोलन का समर्थन करने के लिए प्रताड़ित करने के मकसद से ऐसा किया जा रहा है।

सरकार के प्रतिनिधियों ने कहा कि वे इस मामले को देंखेंगे। पहले सत्र में तकरीबन एक घंटे की चर्चा के बाद दोनों पक्षों ने ब्रेक लिया। किसान नेता राकेश टिकैत ने कहा, ‘‘आज की बैठक में कोई समाधान नहीं निकला। हम अगली तारीख को फिर मिलेंगे।’’ टिकैत ने कहा कि किसान संगठन के नेताओं ने किसानों को एनआईए की नोटिस का मुद्दा भी उठाया।

उन्होंने कहा, ‘‘सरकार ने कुछ संशोधनों का प्रस्ताव दिया लेकिन किसान संगठनों ने स्पष्ट कर दिया कि उन्हें तीनों कानूनों को निरस्त करने से कम पर कुछ मंजूर नहीं है।’’

किसान नेता कविता कुरूगंती ने कहा कि बैठक एनआईए नोटिस से जुड़े मुद्दे से शुरू हुई। इसके बाद किसान संगठनों की ओर से कानूनों को निरस्त करने की मांग उठाई। उन्होंने कहा कि किसान नेताओं ने बताया कि सरकार की ओर से कृषि मंत्री ने संसद में दिए जवाबों में कृषि को राज्य का विषय बताया है और यहां तक कि कृषि-बाजार को भी राज्य का विषय बताया गया है।

सरकार ने पिछली वार्ता में किसान संगठनों से अनौपचारिक समूह बनाकर अपनी मांगों के बारे में सरकार को एक मसौदा प्रस्तुत करने को कहा था।

उल्लेखनीय है कि सरकार और किसान संगठनों के मध्य चल रही वार्ता के बीच उच्चतम न्यायालय ने 11 जनवरी को गतिरोध समाप्त करने के मकसद से चार सदस्यीय समिति का गठन किया था लेकिन प्रदर्शनकारी किसानों ने नियुक्त सदस्यों द्वारा पूर्व में कृषि कानूनों को लेकर रखी गई राय पर सवाल उठाए। इसके बाद एक सदस्य भूपिंदर सिंह मान ने खुद को इस समिति से अलग कर लिया ।

उच्चतम न्यायालय ने नये कृषि कानूनों पर गतिरोध खत्म करने के लिए गठित की गई समिति के सदस्यों पर कुछ किसान संगठनों द्वारा आक्षेप लगाए जाने को लेकर बुधवार को नाराजगी भी जाहिर की।

साथ ही, शीर्ष न्यायालय ने यह भी कहा कि उसने समिति को फैसला सुनाने का कोई अधिकार नहीं दिया है, यह शिकायतें सुनेगी तथा सिर्फ रिपोर्ट देगी।

इस बीच, राष्ट्रीय राजधानी में गणतंत्र दिवस के अवसर पर प्रदर्शनकारी किसानों की प्रस्तावित ट्रैक्टर परेड को रोकने के लिए एक न्यायिक आदेश पाने की दिल्ली पुलिस की उम्मीदों पर पानी फिर गया।

दरअसल, शीर्ष न्यायालय ने केंद्र को (इस संबंध में दायर) याचिका वापस लेने का निर्देश देते हुए कहा कि यह ‘‘पुलिस का विषय’’ है और ऐसा मुद्दा नहीं है कि जिस पर न्यायालय को आदेश जारी करना पड़े।

ट्रैक्टर परेड: किसान नेताओं ने वैकल्पिक मार्ग के सुझाव को ख़ारिज किया

केन्द्र के नये कृषि कानूनों का विरोध कर रही किसान यूनियनों ने 26 जनवरी को प्रस्तावित अपनी ट्रैक्टर परेड के लिए वैकल्पिक मार्ग के सुझाव को बुधवार को खारिज कर दिया।

सूत्रों ने बताया कि पुलिस अधिकारियों ने प्रस्तावित ट्रैक्टरी रैली को दिल्ली के व्यस्त बाहरी रिंग रोड की बजाय कुंडली-मानेसर पलवल एक्सप्रेस वे पर आयोजित करने का सुझाव दिया था जिसे किसान यूनियनों ने अस्वीकार कर दिया।

यूनियन नेताओं और दिल्ली, उत्तर प्रदेश और हरियाणा पुलिस बलों के अधिकारियों ने गणतंत्र दिवस पर प्रस्तावित रैली के मार्ग और प्रबंधों पर चर्चा करने के लिए यहां विज्ञान भवन में मुलाकात की।

सूत्रों ने बताया कि पुलिस अधिकारियों ने किसान नेताओं को रैली के लिए कुंडली-मानेसर-पलवल (केएमपी) एक्सप्रेसवे मार्ग का सुझाव दिया जिसे उन्होंने खारिज कर दिया।

बाहरी रिंग रोड विकासपुरी, जनकपुरी, उत्तम नगर, बुराड़ी, पीरागढ़ी और पीतमपुरा जैसे दिल्ली के कई क्षेत्रों से होकर गुजरता है बैठक में शामिल एक किसान नेता ने बताया कि बृहस्पतिवार को पुलिस अधिकारियों के साथ वार्ता का एक और दौर हो सकता है।

सूत्रों के अनुसार संयुक्त पुलिस आयुक्त (उत्तरी क्षेत्र) एस एस यादव ने दिल्ली पुलिस की ओर से बैठक का समन्वय किया। उन्होंने बताया कि बैठक में हरियाणा और उत्तर प्रदेश के पुलिस अधिकारी भी मौजूद थे।

टीकरी बॉर्डर पर जहरीला पदार्थ खाने वाले किसान की मौत

दिल्ली के टीकरी बॉर्डर पर कथित रूप से जहरीला पदार्थ खाने वाले एक किसान की बुधवार को यहां एक अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई। पुलिस ने यह जानकारी दी।

पुलिस ने बताया कि मृतक की पहचान जय भगवान राणा (42) के तौर पर हुई है वह हरियाणा के रोहतक जिले में पकासमा गांव के रहने वाले थे। पुलिस के मुताबिक राणा ने मंगलवार को टीकरी बॉर्डर पर प्रदर्शन स्थल पर सल्फास की गोलियां खा ली थीं।

बताया जा रहा है कि किसान राणा एक सुसाइड नोट भी छोड़ कर गए हैं। जिसमें उन्होंने लिखा था कि वह एक छोटा किसान है और केंद्र के नए कृषि कानून के खिलाफ बहुत से किसान सड़कों पर हैं।

उन्होंने एक पत्र में लिखा, “सरकार कहती है कि यह सिर्फ दो या तीन राज्यों का मामला है, लेकिन पूरे देश के किसान कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। दुखद है कि अब यह सिर्फ आंदोलन नहीं, बल्कि मुद्दों की लड़ाई बन गया है। किसानों और केंद्र के बीच बातचीत में भी गतिरोध बना हुआ है।”

पुलिस उपायुक्त (बाहरी दिल्ली) ए कोअन ने कहा कि राणा को एंबुलेंस से संजय गांधी अस्पताल ले जाया गया जहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई।उन्होंने कहा कि मामले में दंड प्रक्रिया संहिता के तहत कानूनी कार्यवाही की जा रही है।

पिछले महीने पंजाब के एक वकील ने भी इसी तरह टीकरी बॉर्डर के प्रदर्शन स्थल से कुछ किलोमीटर दूर जहर खाकर कथित तौर पर खुदकुशी कर ली थी।

किसान यूनियनों का दावा है कि अब तक इस पूरे आंदोलन में 70 से अधिक किसान शहीद हो गए हैं। लेकिन सरकार को कोई फ़र्क नहीं पड़ रहा है। उन्होंने केंद्र सरकार को पूरी तरह से असंवेदनशील सरकार बताया।

(समाचार एजेंसी भाषा के इनपुट के साथ)

farmers protest
Farm Laws
Agricultural laws

Related Stories

राम सेना और बजरंग दल को आतंकी संगठन घोषित करने की किसान संगठनों की मांग

यूपी चुनाव: किसान-आंदोलन के गढ़ से चली परिवर्तन की पछुआ बयार

ख़बर भी-नज़र भी: किसानों ने कहा- गो बैक मोदी!

किसानों ने 2021 में जो उम्मीद जगाई है, आशा है 2022 में वे इसे नयी ऊंचाई पर ले जाएंगे

ऐतिहासिक किसान विरोध में महिला किसानों की भागीदारी और भारत में महिलाओं का सवाल

पंजाब : किसानों को सीएम चन्नी ने दिया आश्वासन, आंदोलन पर 24 दिसंबर को फ़ैसला

लखीमपुर कांड की पूरी कहानी: नहीं छुप सका किसानों को रौंदने का सच- ''ये हत्या की साज़िश थी'’

कृषि क़ानूनों के निरस्त हो जाने के बाद किसानों को क्या रास्ता अख़्तियार करना चाहिए

इतवार की कविता : 'ईश्वर को किसान होना चाहिये...

किसान आंदोलन@378 : कब, क्या और कैसे… पूरे 13 महीने का ब्योरा


बाकी खबरें

  • tourism sector
    भाषा
    कोरोना के बाद से पर्यटन क्षेत्र में 2.15 करोड़ लोगों को रोज़गार का नुकसान हुआ : सरकार
    15 Mar 2022
    पर्यटन मंत्री ने बताया कि सरकार ने पर्यटन पर महामारी के प्रभावों को लेकर एक अध्ययन कराया है और इस अध्ययन के अनुसार, पहली लहर में 1.45 करोड़ लोगों को रोजगार का नुकसान उठाना पड़ा जबकि दूसरी लहर में 52…
  • election commission of India
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    दिल्ली नगर निगम चुनाव टाले जाने पर विपक्ष ने बीजेपी और चुनाव आयोग से किया सवाल
    15 Mar 2022
    दिल्ली चुनाव आयोग ने दिल्ली नगर निगम चुनावो को टालने का मन बना लिया है। दिल्ली चुनावो की घोषणा उत्तर प्रदेश और बाकी अन्य राज्यों के चुनावी नतीजों से पहले 9 मार्च को होनी थी लेकिन आयोग ने इसे बिल्कुल…
  • hijab
    सीमा आज़ाद
    त्वरित टिप्पणी: हिजाब पर कर्नाटक हाईकोर्ट का फ़ैसला सभी धर्मों की औरतों के ख़िलाफ़ है
    15 Mar 2022
    इस बात को दरअसल इस तरीके से पढ़ना चाहिए कि "हर धार्मिक रीति का पालन करना औरतों का अनिवार्य धर्म है। यदि वह नहीं है तभी उस रीति से औरतों को आज़ादी मिल सकती है, वरना नहीं। "
  • skm
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    एमएसपी पर फिर से राष्ट्रव्यापी आंदोलन करेगा संयुक्त किसान मोर्चा
    15 Mar 2022
    एसकेएम ने फ़ैसला लिया है कि अगले महीने 11 से 17 अप्रैल के बीच एमएसपी की क़ानूनी गारंटी सप्ताह मना कर राष्ट्रव्यापी अभियान की शुरूआत की जाएगी। 
  • Karnataka High Court
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    हिजाब  मामला: हिजाब इस्लाम का अभिन्न हिस्सा नहीं, कर्नाटक उच्च न्यायालय ने खारिज की याचिका
    15 Mar 2022
    अदालत ने अपना फ़ैसला सुनते हुए यह भी कहा कि शिक्षण संस्थानों में यूनिफ़ॉर्म की व्यवस्था क़ानूनी तौर पर जायज़ है और इसे संविधान के तहत दी गई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन नहीं कहा जा…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License