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पटना से ग्राउंड रिपोर्ट: बिहार में उथल-पुथल, शुरू हो गया किसान संघर्ष
मंगलवार को लाठीचार्ज के बावजूद बिहार के हज़ारों किसानों ने शांतिपूर्वक प्रदर्शन किया। इस दौरान ऐलान किया गया कि जरूरत हुई तो यहाँ से भी किसान दिल्ली कूच करेंगे।
अनीश अंकुर
30 Dec 2020
पटना से ग्राउंड रिपोर्ट: बिहार में उथल-पुथल, शुरू हो गया किसान संघर्ष

29 दिसम्बर के विधानसभा घेराव और राजभवन मार्च की तैयारी का एलान  11 दिसम्बर को केदारभवन (जनशक्ति परिसर) में हुई किसान संगठनों की बैठक में किया गया था। अगले दिन से इसके लिए तैयारियां शुरू कर दी गई। 14 दिसम्बर को पूरे बिहार के समाहरणालयों पर किसान संगठनों द्वारा प्रदर्शन किया गया। पटना में उस दिन बुद्धा स्मृति पार्क से चला प्रदर्शन डाकबंगला चौराहा के प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रवेश कर हिन्दी भवन तक पहुंचा (हिन्दी भवन , फणीश्वरनाथ रेणु के नाम पर बना था जिसे अब समाहरणालय में तब्दील कर दिया गया है)। उसी दिन ये पूरा इलाका लाल झंडों से पट चुका था।

29 दिसम्बर के विधानसभा के घेराव को लेकर गहमागहमी शुरू हो गई थी। पर्चे निकाले जा रहे थे, पोस्टर बनाये जा रहे थे। पटना के विभिन्न सांस्कृतिक आयोजनों में भी ये पर्चे वितरित किये जा रहे थे।

अखबारों से ये भी खबर आ रही थी कि महाराष्ट्र से चर्चित किसान नेता अखिल भारतीय किसान सभा के अध्यक्ष अशोक धवले भी बिहार के किसानों के इस मार्च में शामिल होने जा रहे हैं।

अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के आह्वान पर तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने, बिजली बिल 2020 वापस लेने, मंडी व्यवस्था फिर से बहाल करने और न्यूनतम समर्थन मूल्य पर धान सहित सभी फसलों की खरीद की गारंटी करने की मांग को लेकर ये राजभवन मार्च किया जा रहा था।

29 दिसम्बर को गांधी मैदान के गेट नम्बर 10 के पास सुबह 10 से ही प्रदर्शनकारियों का इकट्ठा होना शुरू हो गया था। किसानों का जत्था रात से ही पटना आने लगा था, खासकर उत्तर बिहार के दूर दराज के किसानों का। मैदान में किसानों की गाड़ियां  जहाँ-तहां लगी थी। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि किसानों का जुलूस नहीं अपितु किसानों की रैली है।

एक डेढ़ वर्ष पूर्व भी किसानों का एक बड़ा प्रदर्शन यहीं से निकला था। किसानों और उनके कार्यकर्ताओं की संख्या उतनी बढ़ चुकी थी कि अलग-अलग हिस्सों व समूहों में बंटकर किसान नारा लगाते, गीत गाते, गपशप करते नज़र आ रहे थे। सीवान के चर्चित गायक निर्मोही जी एक नया गीत " भैया किसनवा हो ! संगठन बनाव बरियार...."  सुना रहे थे जिसे चारों ओर से किसानों व मीडियाकर्मियों ने घेर रखा था। किसान संघर्षों के दौरान एक लोकप्रिय धुन पर निर्मोही जी का  गीत ' क्रांतिकारी किसनवा......' खासा लोकप्रिय रहा है।

 आजकल एक मोबाइल के सहारे छोटे-छोटे यूट्यूब चैनलों की संख्या में इतना इजाफा हो चुका है कि हर घेरे के पास कोई न कोई  चैनल जरूर नज़र आता।  दिल्ली के चैनलों में सिर्फ एनडीटीवी के प्रतिनिधि नज़र आये। हालिया विधानसभा चुनावों में कम्युनिस्ट पार्टियों के चुनकर आये विधायकों को किसान घेर कर उनका भाषण सुन रहे थे और मीडियाकर्मी उन्हें लाइव दिखा रहे थे।

वामदलों के किसान संगठन के अतिरिक्त समाजवादी धारा के किसान संगठन अपने बैनर व नेता के साथ मशगूल थे।

उधर AISF के युवा साथी डफली पर संगीतमय नारे लगातार लगाए जा रहे थे। यहां भी किसानों के हुजूम ने उन्हें घेर रखा था। मैदान में कवि, लेखक, रंगकर्मी, संस्कृतिकर्मी और शिक्षाविद भी नजर आ रहे थे। प्रलेस, जसम के जुड़े  कवि व गायक भी जुलूस में शामिल थे।

विशाल फैले गांधी मैदान में बड़ी संख्या में महिलाएं भी नज़र आ रही थी। गेट नम्बर 10 के पास गांधी जी की एक मूर्ति हुआ करती थी जिसे लालू प्रसाद ने अपने कार्यकाल के दौरान बनवाया था। लेकिन नीतीश कुमार ने मैदान के पश्चिमी-उत्तरी छोर पर मूर्तिकार रामसुतार की एक बहुत ऊंची प्रतिमा बनवा दी तब छोटी गांधी मूर्ति को एवं पार्क को हटा दिया गया।

गांधी मैदान में अमूमन यहीं से जुलूस निकाला करता है। लेकिन इस बार अब तक गेट नम्बर 10 खुला न था। ऐसा पहली बार हो रहा था कि मुख्य द्वार को प्रशासन ने अब तक खोला न था। गेट नम्बर 10 गांधी  मैदान के दक्षिणी छोर ओर स्थित है। लेकिन अब बताया गया कि अब जुलूस मैदान के उठती छोर पर स्थित गेट नम्बर 6 से निकलेगा।

लाल झंडा कांधे पर लिए किसानों का जत्था पर जत्था गेट नम्बर छह की ओर जाने लगा। लेकिन कुछ समय बाद वो जत्था वहां से लौटने लगा था।

अचानक कुछ पत्रकारों ने बताया कि प्रशासन सारे गेट बंद कर चुका है। यहां से निकलने का कोई रास्ता नहीं है।

कुछ देर तके अफरा-तफरी रही इसी दरम्यान गेट नम्बर 10 के बगल में एक बहुत  छोटे से गेट को नौजवान साथियों ने तोड़ डाला और धीरे धीरे किसानों का जुलूस उस गेट से सरकने लगा। लेकिन किसानों की संख्या इतनी अधिक थी कि किसानों को निकलने में काफी कठिनाई का सामना करना पड़ रहा था।

लेकिन धीरे धीरे कर जुलूस निकलने लगा। पता चला कि पूर्व की ओर गेट नम्बर 8 भी खुला हुआ है। कुछ जत्था उस ओर चले गए । देखते-देखते  गांधी मैदान से लेकर फ्रेजर रॉड तक का  समूचा इलाका लाल झंडों से पट गया।  एक्जीविशन रोड की ओर से आने वाली सभी  गाड़ियां रुक गई।

जुलूस के पहले  गांधी मैदान में मौजूद कार्यकर्तागण यह अनुमान लगा रहे थे कि जुलूस को जेपी गोलंबर (मौर्या होटल)  से तो आगे बढ़ने ही नहीं देगा!  लेकिन किसानों का जत्था आगे बढ़ता जा रहा था। 

आगे-आगे ऑल इंडिया किसान संघर्ष समन्वय समिति बिहार का बैनर लिए हुए सभी किसान संगठनों के नेता चल रहे थे जुलूस में बिहार राज्य किसान सभा, बिहार राज किसान सभा जमाल रोड, अखिल भारतीय किसान महासभा, ऑल इंडिया अग्रगामी किसान सभा, ए.आई.के. के.एम.एस,  गाँव बचाओ संघर्ष मोर्चा, राष्ट्रीय किसान मंच, ऑल इंडिया खेत मजदूर किसान सभा, भारतीय किसान मजदूर विकास संगठन, अखिल भारतीय किसान मजदूर सभा, जय किसान आंदोलन, प्रगतिशील किसान संघ, किसान मजदूर नौजवान मोर्चा , मेगा औद्योगिक पार्क प्रभावित किसान संघर्ष मोर्चा, एन.ए.पी.एम, सबरी, नेशन फॉर फार्मर,   संयुक्त किसान संघर्ष मोर्चा ,जनमुक्ति संघर्ष वाहिनी, अखिल भारतीय स्वामी सहजानंद सरस्वती राष्ट्रीय विचार मंच ,अखिल भारतीय बाढ़ सुखाड़ एवं कटाव पीड़ित संघर्ष मोर्चा ,जागता किसान मंच, स्वामी सहजानंद सरस्वती आश्रम समिति, बिहार राज गन्ना उत्पादक संघ आदि संगठनों के लोग अपने अपने बैनर लेकर राजभवन मार्च में जुलूस के शक्ल में चल पड़े।

लेकिन जेपी गोलंबर के समक्ष उपस्थित बैरिकेड व पुलिसकर्मियों को इस विशाल जत्थे को रोकने का साहस न हुआ।  किसानों के गगनबेधी नारों और उत्साह के आगे पुलिस के लिए यह सम्भव भी नहीं था।

किसान विरोधी कृषि कानूनों को वापस लो, जन विरोधी बिजली विधेयक वापस लो, अंबानी अड्डानी की गुलामी छोड़, फेकू मोदी होश में आओ, कारपोरेट भगाओ, खेती बचाओं, का जोरदार नारा लगाते हुए राजभवन जाने का जज्बा लिए आगे बढ़ चला।

अब जुलूस उस प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रवेश कर चुका था जिस इलाके में एक लंबे अर्से से कोई जुलूस नहीं जा पाया था। अब पूरा फ्रेजर रोड आंदोलनकारियों के कब्जे में आ गया था। जुसूल का एक सिरा अब पटना की हृदयस्थली माने जाने वाली डाकबंगला चौराहे पर पहुंच चुका था जबकि दूसरा अब तक गांधी मैदान से निकल ही रहा था। दोनों जगहों के बीच लगभग डेढ़ किमी का फासला था।

दरअसल पुलिस ने किसानों के विशाल हुजूम को देख कई प्वाइंट्स पर बैरिकेड लगा रखा था। जैसे  जेपी गोलंबर, डाकबंगला चौराहा, इन्कम टैक्स चौराहा। पुलिस की रणनीति संभवतः यह थी कि यदि एक प्वांइट पर रोकने में सफल न हो सके तो दूसरे पर कोशिश करेंगे। जेपी गोलंबर की असफलता के बाद पुलिसकर्मियों ने डाकबंगला चौराहे पर कमर कस ली।

जुलुस का अगला हिस्सा जब डाकबंगला पहुंचा तब पुलिस ने आक्रामक होकर लाठी चार्ज किया। उसके कई लोगों खासकर ए.आई.एस.एफ के साथियो अक्षत, राहुल,  बुजुर्ग कार्यकर्ता तारकेश्वर ओझा को चोटें आयीं। लेकिन पीछे से आती किसानों के रेले ने पुलिसकर्मियों को पीछे धकेल दिया। पुलिसकर्मी पीछे हटते दिखाई दिए।  अब पूरा इलाका आंदोलनकारी किसानों के कब्जे में आ चुका था। नारों व हुंकारों से आसमान गूंजता मालूम होता था। फ्रेजर रोड के दोनों ओर आमलोग किसानों व पुलिसकर्मियों के मध्य हो रहे आगे बढ़ने, पीछे धकेलने को दिलचस्पी लेकर देखते रहे। लेकिन किसान नेतागण माइक से आक्रोशित किसानों का  शांत रहने  की लगातार अपील किए जा रहे थे। डाकबंगला चौराहे पर खड़े प्रेस छायाकारों की बड़ी संख्या अपने लिए  नाटकीय क्षणों को कैद करने के लिए एक दूसरे से धक्का-मुक्की किए जा रही थी।

ऐसा लगा कि मामला कुछ देर के लिए शांत हो गया। जब अखिल भारतीय किसान सभा के अध्यक्ष अशोक धवले एक  टाटा-407 वाली ट्रक  पर सवार होकर आंदोलनकारियों को संबोधित कर रहे थे कि अचानक एक बार फिर पुलिस के साथ झड़प हो गयी। भगदड़ सी मच गयी। अशोक धवले का भाषण डाकबंगला चौराहे के पूर्वी हिस्से में चल रहा था जबकि पुलिस के साथ झड़प पश्चिमी हिस्से में चल रही थी। पीछे हटकर किसानों ने फिर अचानक हमला जैसे कर दिया। इस बार किसान काफी आक्रामक मुद्रा में थे। एक पुलिसकर्मी की जिप्सी आंदोलकारियों के मध्य फंस गयी। वह हताश होकर जिप्सी को बैक करने की  कोशिश करने लगा। किसान नेताओं को  मंच से उतरना पड़ा। और यह समझाना पड़ा कि अनर्थक पुलिसकर्मियों से हमें नहीं भिड़ना है। बल्कि मंच से किसी नेता ने पुलिसकर्मियों की धन्यवाद तक दिया कि इस प्रतिबंधित क्षेत्र में उनलोगों ने आने दिया।

जब किसान थोड़े शांत हुए तब उन्हें बैठने के लिए कहा गया। इसी बीच भारी संख्या में पुलिस बल बुला लिया गया। इसके अलावा वज्रवाहन, पानी की बौछारें वाली बड़े वाहन ओदालनकारियों के सामने खड़े कर दिए गए। चारों ओर तमाशबीनों की भीड़ इस अभूतपूर्व दृश्य को दम साधे देख रही थी। उन्हें अंदाजा था कि पुलिस अब कार्रवाई करेगी कि तब करेगी! आंदोलनकारियों में से किसी एक ने वज्रवाहन के ड्राइवर से पूछा कि ‘ क्या चलाने का भी आर्डर है?’ ड्राइवर का जवाब  दिलचस्प था ‘‘ उम्मीद तो नहीं है लेकिन भरोसे के साथ कुछ भी कहा नहीं जा सकता।’’ फिर शीघ्र ही  कहा ‘‘ अरे भाई ! किसानों का ही है न? हमलोग भी तो उसी के न बच्चे है? ’’ कैसे चला देंगे?’’

डाकबंगला चौराहे ओर खड़े लोग पुलिस आंदोलन कारियों के बीच की धक्का-मुक्की को जदयू-भाजपा के बीच की आपसी खींचतान से जोड़ कर देख रहे थे। कोई कह रहा था कि " भाजपा किसानों पर लाठी चलाना चाह रही है जबकि  जदयू  ऐसा नहीं चाहती।" दूसरा व्यक्ति टोकता " दरअसल इसी बहाने जदयू,  भाजपा पर दबाव बनाना चाह रही है।" तीसरा व्यक्ति कहता " यदि होम डिपार्टमेंट भाजपा के पास रहता तो अब तक गोली चल जाता"। चौथी टिप्पणी थी " इसीलिए तो भाजपा नीतीश कुमार पर होम डिपार्टमेंट हर हालत में लेना चाहती है ताकि  वामपंथियों के आंदोलन को कुचला जा सके।"

इसी बीच मामला शांत होने लगा था। एक-एक कर किसान संगठनों के नेताओं के भाषण होने लगे थे। सभा की अध्यक्षता ऑल इंडिया किसान संघर्ष समन्वय समिति के नेताओं  अशोक प्रसाद सिंह, ललन चौधरी एवं विशेश्वर यादव ने संयुक्त रूप से की। अधिकांश किसान संगठनों का नाम 'ऑल इंडिया किसान सभा' था। उनके नेताओं के आधार पर उस किसान सभा की संबध्दता का पता चल पाता। दरअसल यह नाम प्रख्यात किसान नेता स्वामी सहजानन्द सरस्वती ने रखा था।  अलग-अलग किसान संगठन खुद को स्वामी सहजानंद से प्रेरित बताते हैं।

ऑल इंडिया किसान सभा के महासचिव तथा स्वामीनाथन कमीशन के पूर्व सदस्य अतुल कुमार अंजान ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा,  " जो धरती को जोते बोए वो धरती का मालिक होवे"। अतुल कुमार अंजान एक लंबी बीमारी के बाद पहली बार मंच पर नजर आ रहे थे। उनका चेहरा थोड़ा-थोड़ा बदला सा था। चेहरे पर दाढ़ी कम हो गयी थी।

उन्होंने मोदी सरकार को किसान विरोधी सरकार कहते हुए पहली जनवरी को संविधान की हिफाजत का संकल्प लेने का आह्वान किया। अशोक धावले ने सभा को संबोधित करते हुए कहा " किसानों की अपार भीड़ यह साबित करती है कि आम किसान मोदी सरकार के कानून को समझने लगे हैं।"

अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के बिहार संयोजक राजाराम सिंह ने सभा को संबोधित करते हुए कहा " बिहार के किसानों ने भी अंगडाई ली है, और जरूरत हुई तो यहाँ से भी किसान दिल्ली कूच करेंगे।" तब वे आम बिहार के आम किसानों की भावनाओं को ही व्यक्त कर रहे थे।

सभा को किसान नेता अनिल कुमार सिंह रामायण सिंह, बैजनाथ सिंह, लालबाबू महतो, चंद शेखर प्रसाद, बी वी सिंह, अशोक बैठा,  शम्भू सिंह, मुकेश राम जीवन सिह, राम बहादुर आजाद, आशीष रंजन,  नंद किशोर सिंह,  अशोक प्रियदर्शी ,अशोक कुमार सिंह, नरेश यादव, छोटे श्रीवास्तव आदि ने भी सभा को संबोधित किया। बाद में किसानों के प्रतिनिधिमण्डल ने राज्यपाल से मिलकर उन्हें  स्मारपत्र देने गया।

सभी वाम दलों ने किसानों पर लाठीचार्ज की निंदा की और किसानों से आगामी 1 जनवरी को संविधान की प्रस्तावना पढ़ने की अपील के साथ सभा का समापन हुआ।

किसानों के इस जुलूस में शामिल होकर  'असोसिएसन फॉर स्टडी एन्ड एक्शन'( ए. एस. ए) के संयोजक अनिल कुमार राय ने टिप्पणी की " दिल्ली के सिरहाने से उठा हुआ किसानों का शोर अब पूरे भारतवर्ष में गूंजने लगा है। दर्जनों जीवन की आहुतियाँ लेकर भी तृप्त न होने वाली सत्ता की राक्षसी के खिलाफ अब पूरे देश के किसान और मजदूर हुँकार भरने लगे हैं। रोज मिटते जा रहे किसानों के हृदय की आग अब सड़कों पर सैलाब बनकर बह निकली है। दिल्ली की सरहदों के शोर से बिहार की ठंडी-बुझी राख भी धधक उठी और किसानों के तुर्यनाद से दिशाएँ स्तब्ध हो गईं। प्रशासन के बेवजह लाठीचार्ज से भड़काए जाने के बावजूद किसानों-मजदूरों का विशाल जन-सैलाब डाकबंगला चौराहा पर तीनों काले कानूनों की वापसी की माँग शांतिपूर्वक करता रहा।"

(अनीश अंकुर वरिष्ठ स्वतंत्र लेखक और पत्रकार हैं।) 

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